शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

अोवल्युशन इंडक्शन थिरेपी से बन सकती है मां---- पीजीआई अब भरेगा सूनी गोद



अोवल्युशन इंडक्शन थिरेपी  से बन सकती है मां
पीजीआई अब भरेगा सूनी गोद
 40 फीसदी में  ओवैरियन रिजर्व  खडी कर रहा है गर्भधारण में बाधा


तीस के बाद  शादी करने वाली 38 से 42 फीसदी महिलाओं की गोद सूनी होने का कारण ओवैरियन रिजर्व देखा गया है। इस तथ्य  का खुलासा संजय गाधी पीजीआई के एमअारएच( मैटर्नल एंड रिप्रोडेक्टिव हेल्थ) विभाग की प्रो. इंदु लता साहू ने करते  हुए बताया कि सही मैनेजमेंट से इस परेशानी से ग्रस्त पचास फीसदी महिलाअों में गर्भधारण हो जाता है। बताया कि ट्रांस वेजाइन अल्ट्रासाउंड करके हम पहले अंडो की मानीटरिंग करते है जिसमें अंडो की संख्या, कितने दिनों में अंडो मेच्योर हो रहे है की जानकारी हासिल करते है। अंडो की संख्या कम होने पर अोवल्युशन इंडक्शन थिरेपी देते है जिससे अंडो की संख्या बढ जाती है। दंपति को साथ रहने के लिए कहते है । इस दौरान 30 से 40 फीसदी महिलाएं गर्भधारण कर लेती है। कई बार साथ रहने के बाद गर्भधारण नहीं पाता है एेसे में इंट्रा यूट्राइन इंसीमेशन(आईयूआई) तकनीक से स्पर्म को इंजेक्ट करते है। इस तकनीक से 10 से 15 फीसद महिलाएं गर्भधारण कर लेती है। हम लोगों ने अभी दौ से अधिक महिलाअों आईयूआई किया है।  इंफर्टलिटी के मामले हम लोग देख रहे है जिसके लिए संपर्क किया जा सकता है। 

क्या है ओवैरियन रिजर्व
30 साल से अधिक उम्र होने के बाद अंडो संख्या कम होने लगती है।  एक अोवरी में पांच से अधिक अंडो की संख्या होनी चाहिए लेकिन उम्र अधिक होने के कारण संख्या कम हो जाती है जिसके कारण गर्भधारण नहीं होता है। कहा कि लड़कियों की शादी 25 से 30 की उम्र के बीच  करनी चाहिए। तीस के बाद गर्भधारण में परेशानी के साथ ही गर्भधारण होने के बाद कई  तरह की परेशानी की अाशंका रहती है। 

50 फीसदी दंपति नहीं जानते फर्टलिटी पीरियड

प्रो. इंदु ने बताया कि हमारे पास अाने वाले 50 फीसदी दंपति को फर्टलिटी पीरियड के बारे में जानकारी नहीं होती है। यह वह समय जब साथ रहने से गर्भधारण की संभवना सबसे अधिक रहती है। बताया कि पीरियड के 14 वें दिन से पांच दिन पहले और तीन दिन बाद का समय फर्टलिटी पीरियड होता है। कई मामले तो सही समय बताने से ही साल्व हो जाते है। 

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

सर्जरी के बाद पीजीआई कम करेगा स्टे



सर्जरी के बाद पीजीआई कम करेगा  स्टे
संक्रमण और खर्च में अाएगी कमी
पीजीआई ने सर्जरी के बाद फास्ट रिकवरी के लिए तैयार की विशेष योजना
 जागरण संवाददाता। लखनऊ


सर्जरी के बाद परिजन चाहते है कि उनका रिश्तेदार जल्दी ठीक हो कर घर चलें इस चाह को पूरा करने के लिए अब संजय गांधी पीजीआई का एनेस्थेसिया विभाग  फास्ट रिकवरी प्रोटोकाल तैयार किया है। इस प्रोटोकाल को पूरी तरह लागू करने के लिए संस्थान के विभिन्न विभागों को सर्जनों को शामिल को भी शामिल कर रहा है। फास्ट रिकवरी के लिए सर्जरी से पहले और बाद में कुछ खास उपाय की जरूरत होती है। विभाग के प्रमुख प्रो. अनिल अग्रवाल और प्रो. रूचि वर्मा ने बताया कि प्रोटोकाल में 
एपीड्यूरल एनालजेसिया , थोरेसिक एपीड्यूरल तकनीक के जरिए सर्जरी के बाद दर्द कम करना विशेष रूप से शामिल है।  सर्जरी के बाद जल्दी अस्पताल से छुट्टी मिलने से संक्रमण कम होगा, मरीज गुड फील करेगा , पैसा के खर्च कम होगा। अभी सर्जरी के बाद मरीज दस से बारह दिन अस्पताल में स्टे करता है जिसको धीरे -धीरे घटा कर चार से पांच दिन लाना है। इसके लिए सर्जरी से पहले और बाद में कुछ उपाय करना होगा। सर्जरी से पहले और बाद   इंसेटिव स्पाइरोमेटरी शामिल है। इससे फेफेडे की कार्य क्षमता  बढ़ती है ।सर्जरी के दौरान बैलेस एनेस्थेसिया भी शामिल किया गया जिसमें खास तरह की एनेस्थेटिक दवाएं दी जाती है। इसके अलावा जल्दी पेशाब के लिए लगा कैथेटर निकाला जाएगा। मरीज चलना फिरना शुरू देगा।  कई तरह के उपाय है जिसको स्थापित किया जाएगा। संस्थान में स्थापित करने के बाद इसका प्रसार किया जाएगा। प्रो. रूचि वर्मा ने बताया कि शुरूअात घर से करना चाहिए इसलिए पहले हम यहां लागू करने के लिए सेंसटाइजेशन सीएमई शनिवार को करने जा रहे हैं।

खाली पेट रखने से नहीं गड़बड़ाएगा मेटाबोलिज्म
  
 सर्जरी के दिन मरीज को पांच से 6 घंटे पेट खाली रखा जाता है जिससे शरीर में कई तरह की मेटाबोलिक बदलाव अा जाते है। यह बदलाव सर्जरी के बाद रिकवरी में रूकावट पैदा करते है। अब सर्जरी के पहले विशेष हाई कैलोरी प्रोटीन दिया जाएगा जिसके मेटाबोलिक बदलाव में रूकावट नहीं अाएगी। ग्लूकोज का स्तर सामान्य रहेगा। इसके रिकवरी फास्ट होगी।  




मंगलवार, 24 जुलाई 2018

यू ट्यूब पर पीजीआई सिखा रहा है जीवन बचाने की कला


यू ट्यूब पर पीजीआई सिखा रहा है जीवन बचाने की कला



सीपीआऱ से बच सकती हैै 20 फीसदी लोगों की जिंदगी

पीजीआई के प्रो.संदीप साहू ने बनाया नौ वीडियो

एक महीने में  पचास हजार से अधिक लोगो ने देखा



जागरण संवाददाता। लखनऊ



संजय गांधी पीजीआई के निश्चेतना विभाग के डा. संदीप साहू जीवन बचाने की कला अाम लोगों को सिखाने के लिए नौ वीडीयो यू ट्यूब पर तैयार किया। इस वीडियो के जरिए सीपीआर( कार्डियो पल्मोनरी रीसेक्शन) का तरीका सिखाया जा सकता है। एक व्यक्ति कैसे सीपीअाऱ करे इस वीडियो को पचास हजार से अधिक लोग देख चुके हैं। डा. साहू ने बताया कि किसी को भी हार्ट एटैक की परेशानी उसके कार्य स्थल, स्कूल , घर में पड़ सकता है एेसे में कई बार सांस रूकने लगती है । घर , अाफिस या स्कूल के लोगों में यदि सीपीअार की जानकारी होते एेसे लोगों को बचा कर इलाज के लिए अस्पताल भेजा जा सकता है। बताया कि सीपीआऱ से 30 से 40 फीसदी लोगों की जिंदगी बचायी जा सकती है। सारे वीडियो हिंदी में है। इसे देख कर लोगों को इसे सीखना चाहिए। व्यस्क, बच्चों और नवजात के लिए अलग वीडियो है। वैसे तो सीपीअार के लिए दो लोग है तो एक सांस देता  है और दूसरा चेस्ट कंप्रेश ( दबाता) करता है लेकिन एक व्यक्ति भी काफी हद तक सीपीअार कर सकता है। इसे यू ट्यूब पर डा. संदीप साहू सीपीआऱ के नाम से देखा जा सकता है।




हर कार्य स्थल पर डिफब्रेटर



बताया कि 80 फीसदी लोगों में हार्ट एटैक पड़ने के बाद हृदय गति अनियमित हो जाती है एेसे में सीने पर बिजली का झटका डिफब्रेटर से दिया जाता है। सही समय पर इसे देकर इनको बचाया जा सकता है। डिफब्रेटर में सारे बटन लगे होते जिससे कई भी झटका दे सकता है। इसकी कीमत तीस हजार है जिसे हर कार्य स्थल, स्कूल में होना चाहिए।






रविवार, 22 जुलाई 2018

पीजीआई संविदा कर्मचारी गांधी प्रतिमा पर देंगे धरना

पीजीआई संविदा कर्मचारियो ने नियमित नियुक्ति में मांगी 100 पीसदी प्राथमिकता


गांधी प्रतिमा पर देंगे धरना

जागरण संवाददाता। लखनऊ   

संजय गांधी पीजीआई संविदा कर्मचारी यूनियन  अध्यक्ष अपराजिता तिवारी और महामंत्री गौरव यादव,  दिलीप मौर्य, विमल , अविनाश, पियूष , सोनू  अन्य कर्मचारी नेताओं ने   कहा है कि संस्थान प्रशासन और सरकार हम लोगों के मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो 15 अगस्त को गांधी प्रतिमा पर अनशन के लिए बाद होंगे इसमें लोहिया संस्थान के भी संविदा कर्मचारी शामिल होंगे । संस्थान में जब अाउट सोर्सिग हो रही थी तब संस्थान प्रसासन ने कहा कि नियमित नियुक्ति में प्राथमिकता मिलेगी लेकिन अभी हाल में नर्सेज, अंडेंट  की जगह निकली जिसमें कोई प्राथमिकता नहीं दी गयी। मिली जानकारी के अनुसार अटेंड सहित अन्य पद भी निकलने जा रहे है लेकिन कोई प्राथमिकता नहीं दी रही है। कहा कि हम लोग संस्थान में लंबे समय से काम कर रहे हैं। मांग की पहले हम लोगों को समायोजित किया जाए उसके बाद किसी की तैनाती की जाए। जिंदगी के अाधे दिन यहां काट दिए अब कहां जाए। सौ फीसदी प्राथमिकता दी जाए । सरकार ने रोड वेज में संविदा कर्मचारियों को नियमित कर रहा है। समान कार्य समान वेतन लागू किया जाए। मांग की कि महिला संविदा कर्मचारियों को प्रसूति अवकाश, पूरे महीने का वेतन दिया जाए जबकि 26 दिन का दिया जाता है। संविदा कर्मचारियों को संस्थान में इलाज की निःशुल्क व्यस्था की जाए जैसे छात्रों को दिया जाता है। ईएसअाई और सेलरी पर्ची की मांग की।  कहा कि हम लोगों की मांग पर ध्यान न दिया गया तो हम लोग अांदोलन के लिए बाध्य होंगे। 

89 फीसदी मरीजों को लिखी जाती है ब्रांडेड दवाएं

89  फीसदी मरीजों को लिखी जाती है ब्रांडेड दवाएं 


औसतन एक मरीज लिखी जाती है तीन दवा

22.57 फीसदी मरीजों को लिखी ही इसेन्सियल ड्रग

कुमार संजय । लखनऊ
89 फीसदी दवाअों के  ब्रांड नाम लिखे  जाते है जबकि सलाह है कि दवा का जेनरिक नाम लिखा जाए । इस तथ्य का खुलासा इंडिन जर्नल अाफ पब्लिक हेल्थ में लखनऊ के बडे अस्पताल के एक हजार डाक्टरी पर्चे पर शोध के बाद किया है। देखा गया कि डाक्टर जितनी दवा लिखते है उसमें केवल 10.05 फीसदी दवाएं जेनरिक होती है बाकी 89.98  फीसदी दवाएं ब्रांड नेम से होती है। एक मरीज को कम से तीन दवाअो का एवरेज होता है । शोध में देखा गया कि कुल दवाअों के पर्चे में 31.90 फीसदी में तीन दवाएं थी। 24.30 फीसदी पर्चे में दो दवाएं थी लेकिन 8.80 फीसदी में चार से अधिक दवाएं खाने की सलाह दी गयी थी। विशेषज्ञों ने पाया कि 19.70  फीसदी पर्चो में एंटी  बायोटिक दवाएं लिखी गयी थी। 22.57 पर्चे पर अावश्यक दवाएं यानि इसेन्सियल ड्रग लिस्ट से दवाएं लिखी गयी थी।यह काफी कम है इसकी पीछे कारण जागरूकता की कमी बतायी गयी है।  23.12 फीसदी पर्चे पर विटामिन और मिनिरल दवाएं लिखी गयी थी। 73.60 फीसदी पर्चे पर फिक्स डोज कंबीनेशन(एफडीसी) दवाएं लिखी गयी थी । शोध रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने कहा है कि एफडीसी दवाअो से दवा के गलत प्रभाव के साथ इलाज का खर्च बढ़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दवा लिखने के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानको का पालन नहीं हो रहा है। एक हजार दवा के पर्चों में 54.70 फीसदी पर्चे पुरूषों और 45.30 फीसदी महिलाअों के थे जिस पर शोध हुअा। 

इन्हों ने किया शोध
किंग जार्ज मेडिकल विवि के फार्माकोलाजी विभाग के डा. सरजात हुसैन, डा. सूरज सिंह यादव , डा. कमल किशोर सालवानी और डा. संजय खत्री ने एक हजार दवाअों के पर्चे पर शोध किया। इस शोध को इंडियन जर्नल अाफ पब्लिक हेल्थ ने स्वीकार किया।   विशेषज्ञों के एस्सेसमेंट अाफ ड्रग प्रिस्केप्सन पैर्टन यूजिंग डब्लूएचअो इंडीकेटरस इन टर्सरी केयर टीडिंग हास्पिटल के शीर्षक से शोध की स्वीकार किया गया है।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

पीजीआई में तीन मंत्री भर्ती---संविदा कर्मचारियों ने समान वेतन

पीजीआई संविदा कर्मचारियों ने समान कार्य समान वेतन की मांग

नियमित नियुक्ति में मांगी सौ फीसदी प्राथमिकता


जागरण संवाददाता। लखनऊ   

संजय गांधी पीजीआई संविदा कर्मचारी यूनियन  अध्यक्ष अपराजिता तिवारी और महामंत्री गौरव यादव,  दिलीप मौर्य, विमल , अविनाश, पियूष , सोनू  अन्य कर्मचारी नेताओं ने   संस्थान में जब अाउट सोर्सिग हो रही थी तब संस्थान प्रसासन ने कहा कि नियमित नियुक्ति में प्राथमिकता मिलेगी लेकिन अभी हाल में नर्सेज, अंडेंट  की जगह निकली जिसमें कोई प्राथमिकता नहीं दी गयी। मिली जानकारी के अनुसार अटेंड सहित अन्य पद भी निकलने जा रहे है लेकिन कोई प्राथमिकता नहीं दी रही है। कहा कि हम लोग संस्थान में लंबे समय से काम कर रहे हैं। मांग की पहले हम लोगों को समायोजित किया जाए उसके बाद किसी की तैनाती की जाए। जिंदगी के अाधे दिन यहां काट दिए अब कहां जाए। सौ फीसदी प्राथमिकता दी जाए । सरकार ने रोड वेज में संविदा कर्मचारियों को नियमित कर रहा है। समान कार्य समान वेतन लागू किया जाए। मांग की कि महिला संविदा कर्मचारियों को प्रसूति अवकाश, पूरे महीने का वेतन दिया जाए जबकि 26 दिन का दिया जाता है। संविदा कर्मचारियों को संस्थान में इलाज की निःशुल्क व्यस्था की जाए जैसे छात्रों को दिया जाता है। ईएसअाई और सेलरी पर्ची की मांग की।  कहा कि हम लोगों की मांग पर ध्यान न दिया गया तो हम लोग अांदोलन के लिए बाध्य होंगे। 

सेक्स एडिक्शन है मानसिक बीमारी डब्लूएचओ ने माना

सेक्स एडिक्शन है मानसिक बीमारी डब्लूएचओ ने माना 
इंटरनेशनल डिजीज क्लासीफिकेशन में किया शामिल
समय पर इलाज से बच सकती  है कई की जिंदगी



यौन हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही है। कई बार इसकी शिकार अबोध बच्चियां तक हो रही है। राजधानी में ही सप्ताह में एक घटना पढने को मिल जाती है जिसमें तीन से आठ साल की बच्चियों के साथ रेप की घटना होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे  सेक्‍स एडिक्‍शन या सेक्‍स के प्रति लत एक बडा कारण है। अब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने माना है कि सेक्स की लत मानसिक बीमारी का लक्षण है। जिसे कंपलसिव सेक्सुअल विहैवियर (जबरन यौन संबंध) के नाम से भी जाना जाता है। इसे बीमारी की लिस्ट में रखते हुए इंटरनेशनल क्लासीफिकेशन अफ डिजीज में स्थान दिया। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इस बीमारी से ग्रस्त इंसान मानसिक बीमारी की वजह से खुद को यौन संबंध बनाने से रोक नहीं पाता है। मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा.एसके कार कहते है कि डब्लूएचओ का यह फैसला लती  लोगों के इलाज में मदद करेंगा। विशेषज्ञ कहते है कि  यौन  लती  बीमारी का पता नहीं चलता और जब तक इसके बारे में वो जान पाता हैतब तक देर हो चुकी होती है। हाइपर सेक्सयुलिटी का पूरा इलाज संभव नहीं है लेकिन मेडिकल और प्रेक्टिकल थैरेपी से इसे कम किया जा सकता है।  इस बीमारी से ग्रसित व्‍यक्ति को कहीं भी किसी जगह भी सेक्‍स करने की तलब जग जाती है। सेक्‍स करने के बाद भी उसे कभी संतुष्‍ट‍ि नहीं मिलती है। बस उसमें सेक्स करने तीव्र इच्छा जगी रहती है।

क्‍यों कहा इसे मेंटल डिसऑर्डर
इससे सेक्‍स की वजह से हर जरुरी कार्य को टालने के साथ ही अपनी सेहत को भी नजरअंदाज करने लगता है। इसके लक्षण 6 महीनें में खुलकर सामने आते है। डब्लूएचओ ने गेमिंग एडिक्‍शन के बाद अब इसे मानसिक बीमारी की कैटेगरी में रखा है। इसे मेंटल डिसऑर्डर यानी मानसिक बीमारी की कैटेगेरी में रखने से इलाज के कई ऑप्शन्स मिल पाएंगे और इस क्षेत्र में रिसर्च भी हो पाएगी।

सेक्‍स एडिक्‍शन या सेक्‍स की लत के लक्षण
- पॉर्न विडियो देखते रहते हैं और यदि उन्हें सेक्स के लिए कोई पार्टनर नहीं मिलता तो दूसरे साधन अपनाते हैं।
- एकदम से और हर कहीं से सेक्स करना चाहते हैं। वे अपने पार्टनर को सेक्‍स ऑब्‍जेक्‍ट के तौर पर ही देखते है।
- एडिक्‍शन से ग्रस्‍त लोग अवसादचिंता और अकेलेपन से ग्रसित होते हैं, क्यों कि उन्हें लंबे समय तक साथ देने वाला पार्टनर नहीं मिल पाता है।
-डिसऑर्डर के पीछे की वजह का अभी तक पता नहीं चल पाया हैफिर भी कई रिसर्च स्टडीज़ दावा करती हैं कि यह दिमाग में केमिकल या हार्मोन के असंतुलन और बचपन की कोई यौन हिंसा के कारण ऐसा होता है।
- लती लोगों में अक्‍सर एसटीडी या एड्स होने का खतरा ज्यादा रहता हैक्यों कि अपनी सेक्स इच्छा के चलते ये लोग वैश्याओं और अंजान लोगों से भी सेक्स करने करने को तैयार रहते हैंवो भी बिना किसी सुरक्षा के।

ड्रग्‍स भी होता है एक वजह
जरूरत से ज्यादा ड्रग लेने वाले लोग भी सेक्स एडिक्शन के शिकार हो सकते हैं। उनके साथ ऐसा तब होता हैजब वे इसकी शुरुआत कर रहे होते हैं या फिर उसे छोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं। माना जाता है कि ऐसे लोगों के लिए सेक्स भी नशे का काम करता है।

रविवार, 15 जुलाई 2018

प्लास्टिक सर्जरी केवल सुंदर ही नहीं बल्कि सामान्य कर रहा है दुरूह जिंदगी



प्लास्टिक सर्जरी केवल सुंदर  ही नहीं बल्कि सामान्य कर रहा है दुरूह जिंदगी

पीजीआई ने खोजी जबड़े के जोड़ के सर्जरी की नई तकनीक
 
अब चेहरे के बनावट में नहीं आएगी खराबी



प्लास्टिक सर्जरी केवल सुंदरता निखारने वाली सर्जरी नहीं रह गयी है। शरीर की बनावटी खराबी के असामान्य जिंदगी को सामान्य करने के लिए कई तकनीक विशेषज्ञों ने विकसित की है। एेसी ही एक परेशानी कई बार होती है जिसमें बच्चे के ढ़डी पर चोट लगने के कुछ महीने बाद मुंह नहीं खुल रहा तो संभव है कि बच्चे के ऊपरी और निचले जबड़े का जोड़ टूट गया हो जिसके कारण जबड़े का मूवमेंट न हो पा रहा हो। अब इस जोड़ को ठीक करने की नई तकनीक संजय गांधी पीजीआई के प्लास्टिक के प्लास्टिक सर्जन प्रो.अंकुर भटनागर ने विकसित की है। इस नई तकनीक का नाम है सिलिकांन सीट इंट्रा पोजीशन आर्थोप्लास्टी। पहले डेंटल सर्जन जोड़ के पास बढ़ी हड्डी का बड़ा हिस्सा निकाल कर जबड़े का मूवमेंट ठीक करते थे जिससे चेहरे में विकृति आ जाती थी। नई तकनीक में जोड़ के बीच बढ़ी हड्डी के बीच से केवल दो मिली का हिस्सा निकाल कर उसमें सिलिकांन सीट लगाते हैं। इससे हड्डी आपस में दोबारा नहीं जुड़ती और जबड़े का मूवमेंट सही तरीके से होता रहता है। बच्चे का मुंह आसानी से खुलने लगता और चहरे पर कोई बनावटी कमी नहीं आती है। प्रो.अंकुर ने इस तकनीक से अब दस बच्चों की जबड़े की चाल को ठीक किया है। इस खोज को उन्होंने हाल में ही र्वल्ड कांग्रेस आफ मैक्सीफेसियल सर्जरी में प्रस्तुत किया था।  प्रो.अंकुर ने बताया कि बच्चे कई बार ढ़ुड़ी के बल गिरते है जिसके कारण नीचे के जबड़े और ऊपर के जबड़े का जोड़( कान के नीचे होता है) में टेम्परो मैडिवलर ज्वाइंट एंकलाइलोसिस हो जाता है। जोड़ के टूटने के बाद उसमें हड्डी बढ़ जाती है। इससे यह परेशानी हो जाती है। सर्जरी के बाद बच्चों को जबड़े की एक्ससाइज करानी पड़ती है इसके लिए उन्होंने जबड़े का एक्साइजर भी विकसित किया है। 


.प्रियंका जैसा चाहिए होंठ

प्रिंयका जैसा होंठ बना दीजीए ... प्लास्टिक सर्जन के पास आने वाली लड़कियां आजकल यही डिमांड कर रही है। डाक्टर कहते है कि सर्जरी करनी पड़ेगी। समय और पैसा लगेगा तो कहती है कोई बात नहीं सब कुछ 10 से 15 दिनों में हो जाएगा न आप सर्जरी प्लान करिए।  सुंदरता निखारने के लिए सर्जरी के लिए आने वाले महिलाओं . लड़कियों और लड़को की संख्या में चार गुनी बढ़ी है। प्लास्टिक सर्जरी का विस्तार और सर्जरी का खर्च भी कम हुआ है। सर्जन के पास नाक , होंठ, स्तन की बनावट , चहरे की झुर्री, झांई को दूर करने , प्रसव के पास पेट की चर्बी हटवाने, वजाइल सर्जरी के लिए महिलाएं और लड़कियां आती है। लड़के भी फेस की बनावट ठीक कराने के लिए आ रहे हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि जिन लड़कियों के होंठ पतले है उसे मोटा कराने और नाक की बनावट ठीक कराने के लिए सर्जरी मांग बढ़ी है। लड़कों में हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी की मांग बढ़ी है। 


गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पीजीआई संविदा कर्मचारियों ने प्रमुख सचिव का पैर पकड़ मांगा न्याय

पीजीआई संविदा कर्मचारियों ने प्रमुख सचिव का पैर पकड़ मांगा न्याय


नियमित नियुक्ति में मांगी सौ फीसदी प्राथमिकता

समान कार्य वेतन लागू करने की मांग


संजय गांधी पीजीआई संविदा कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों ने  संस्थान में शुरू होने वाले ट्रामा सेंटर, लिवर ट्रांसप्लांट, मेडिकल टेक्नोलाजी कालेज सहित का जायजा लेने अाए प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा रजनीश दूबे का पैर पकड़ कर जिंदगी बचाने की गुहार लगायी। प्रमुख सचिव के आस्वाशन पर पदाधिकारियों ने उनका पैर छोडा। यूनियन  की अध्यक्ष अपराजिता तिवारी और महामंत्री गौरव यादव,  दिलीप मौर्य, विमल , अविनाश, पियूष , सोनू  अन्य कर्मचारी नेताओं को जैसे पता चला कि प्रमुख सचिव संस्थान में अाए है ज्ञापन लेकर पहुंच गए । बाहर शाति पूर्वक खडे रहे जैसे वह बाहर निकले पदाधिकारी उनका पैर पकड़ लिए । गुहार करने लगे सर हम लोगों की जिंदगी बचा लें। प्रमुख सचिव ने उनका ज्ञापन लेकर कहा कि वह उनके साथ अन्याय नहीं होन देंगें। महामंत्री गौरव यादव ने बताया कि संस्थान में जब अाउट सोर्सिग हो रही थी तब संस्थान प्रसासन ने कहा कि नियमित नियुक्ति में प्राथमिकता मिलेगी लेकिन अभी हाल में नर्सेज, अंडेंट  की जगह निकली जिसमें कोई प्राथमिकता नहीं दी गयी। हम लोग संस्थान में लंबे समय से काम कर रहे हैं। मांग की पहले हम लोगों को समायोजित किया जाए उसके बाद किसी की तैनाती की जाए। जिंदगी के अाधे दिन यहां काट दिए अब कहां जाए। सौ फीसदी प्राथमिकता दी जाए । सरकार ने रोड वेज में संविदा कर्मचारियों को नियमित कर रहा है। समान कार्य समान वेतन लागू किया जाए। मांग की कि महिला संविदा कर्मचारियों को प्रसूति अवकाश, पूरे महीने का वेतन दिया जाए जबकि 26 दिन का दिया जाता है। संविदा कर्मचारियों को संस्थान में इलाज की निःशुल्क व्यस्था की जाए जैसे छात्रों को दिया जाता है। ईएसअाई और सेलरी पर्ची की मांग की।  यूनियन के पदाधिकारी बुधवार को कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी से भी मिल कर न्याय की गुहार लगायी थी

बुधवार, 11 जुलाई 2018

पीजीआई नर्व ब्लाक कर देगा पेल्विक पेन से राहत



40 से 60 अायु वर्ग 15 फीसदी लोग पेल्विक पेन से परेशान

मल्टी स्पेसिएलटी सेंटर पर ही इलाज संभव


क्रानिक पेल्विक पेन से 40 से 60 अायु वर्ग के 10 से 15 फीसद महिलाएं और पुरूषों की जिंदगी थम सी जाती है। दर्द के कारण सामाजिक और निजि जिंदगी थम जाती है जिसके कारण अधिकतर लोग डिप्रेशन की चपेट में जाते है। इस परेशानी में गर्भाशय, मूत्राशय, मल द्वार और इनको बांधे रखने वाली मांस पेशी प्रभावित होती है। परेशानी किसी एक अंग में होती है लेकिन बाकी अंगों के जुडे रहने के कारण सबमें परेशानी अा जाती है। संजय गांधी पीजीआई के एनेस्थेसिया विभाग के प्रमुख प्रो. अनिल अग्रवाल और प्रो. सुजीत 
गौतम, प्रो. संजय धीराज के मुताबिक जिस भीतरी अंग  में परेशानी है उसको दूर करने के साथ हम लोग नर्व ब्लाक लगाकर जिंदगी सामान्य कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि इस परेशानी वही पर इलाज के जाना चाहिए जहां पर स्त्री रोग विशेेषत्र, यूरोलाजिस्ट , गैस्ट्रो इंट्रोलाजिस्ट  और पेन मैनेजमेंट एक्सपर्ट एक छत की नीते हों। इस परेशानी के बारे में जागरूकता न होने के कारण तमाम डाक्टर भी मरीजों को सही तरीके से हैंडिल नहीं कर पाते है । मरीजों को भी नहीं होता है कहां जाना है। इसके लिए हम लोग शनिवार को सीएमई का  अायोजन कर रहे हैं। प्रो. सुजीत ने बताया कि अाम भाषा में पेडूं में दर्द की तेज परेशानी होती है। किसी भी जांच में कुछ खास नहीं निकलता है। इस दर्द का कारण किसी भी तीन अंग में परेशानी हो सकती है। चिकित्सक दर्द की दवा के साथ एंटी बायोटिक और मसल रिलेक्सटेंट देते है लेकिन इससे राहत नहीं मिलती है। हम लोग मांस पेशियों के अाराम के लिए बायोफीडबैक तकनीक से इलाज करते हैं। इसके अलावा रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में स्थित सुपुरीयर हाइपो गैस्ट्रिक प्लेक्सेस में नर्व ब्लाक लगाते है। इसी नर्व से गर्भाशय , मूत्राशय और मल द्वार में दर्द जाता है। पेल्विक फ्लोर( मासपेशी ) में दर्द से निजात के लिए प्यबडेडल नर्व को ब्लाक करते हैं। हम लोग सप्ताह में दो तीन मरीज को पेल्विक पेन से राहत दे रहे हैं । संस्थान में तकनीक स्थापित हो गयी है।   

दर्द को नहीं मानी जाती है बीमारी
 
  प्रो. सुदीप कुबा  प्रो. चेतना , स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. दीपा कपूर, डा. अंजु रानी, पेट रोग विशेषज्ञ प्रो. यूसी घोषाल, प्रो. अभय वर्मा , यूरोलाजिस्ट प्रो. एमएस अंसारी, प्रो.यूबी सिंह ने कहा कि दर्द को हमारे यहां बीमारी नहीं मानी जाती है। लगातार पेन किलर लेने से दूसरी परेशानियां हो सकती है इस लिए सही मैनेजमेंट करने की जरूरत है। 


यह परेशानी तो ले सलाह
- मासिक के समय गर्भाशय के साथ पेट में दर्द
- 10 बार से अधिक पेशाब और पेशाब में जलन
- बैठने पर मल द्वार में दर्द
- पूडूं में दर्द  

लाइफ सेविंग एंड प्राइमरी स्टेबलाइजेशन सूत्र पर शुरू होगा पीजीआई ट्रामा सेंटर

लाइफ सेविंग एंड प्राइमरी स्टेबलाइजेशन सूत्र पर शुरू होगा ट्रामा सेंटर


एम्स ट्रामा सेंटर के प्रभारी ने दिया गुरू मंत्र
एम्स दिल्ली से बेहतर स्थित में शुरू हो रहा है पीजीआई ट्रामा सेटर



दिल्ली एम्स ट्रामा सेंटर के इंचार्ज प्रो. अमित गुप्ता से संजय गांधी पीजीआई के ट्रामा सेंटर को चलाने के लिए तमाम मंत्र दिया। संस्थान का ट्रामा सेंटर शुरू करने के लिए प्रभारी प्रो. अमित अग्रवाल, प्रो. सुशील गुप्ता, प्रो.एसके अग्रवाल , प्रो. अंकुर भटनागर कई स्तर पर लगें है। माना जा रहा है अाठ से दस दिन के अंदर ट्रामा सेंटर शुरू हो जाएगा। संस्थान के पास ट्रामा सेंटर चलाने का अनुभव नहीं है जिसके लिए दिल्ली एम्स के ट्रामा सेंटर के प्रमुख प्रो. अणित गुप्ता को स्टेरियिग कमेटी में रखा गया है। प्रो. गुप्ता ने बताया कि एक दम से पाली ट्रामा के मामले हैडिल नहीं किया जा सकता है। पहले ट्रामा सेंटर को ड्राई चलाना होगा । हम लोगों ने एम्स के ट्रामा सेंटर को एक साल तक ड्राई चलाया फिर धीरे-धीरे हर तरह के मामले हैडिल करने लगे। एसजीपीजीाई ट्रामा सेंटर की तैयारी एम्स से बेहतर इस लिए 6 महीने के ड्राई रन के बाद यह जटिल मामले हैंडिल करने लगेगा। कहा कि पहले लाइफ सेविंग एंड प्राइमरी स्टेबलाइजेशन के सूत्र पर काम करना होगा जिसमे  जान बचा कर हायर सेंटर पर मरीज को भेजा जाता है। देखा गया है कि चलने फिरने वाले लोग भी हल्की की चोट पर ट्रामा सेंटर चले अाते है एेसे लोग न अाए यहां पर वही लोग आए या लाए जाए जो गंभीर रूप से इंजर्ड है। बताया कि एसजीपीजीआई ट्रामा सेंटर को रेड और येलो जोन में बांटा गया है जहां इंजरी के स्कोर के अाधार पर इलाज दिया जाएगा। प्रो. गुप्ता ने कहा कि किसी भी सेंटर को मेच्योर होने में समय लगता है । यह समय एक साल से दो साल तक हो सकता है इसलिए पहले ही दिन से बहुत अधिक उम्मीद नहीं करना चाहिए। कहा कि हम ट्रामा सेंटर चलाने के लिए हर स्तर पर सहयोग करेंगे। मेडिको लीगल साफ्टवेयर भी हम दे रहे हैं। 

रीहैबिलेटेशन सेंटर की है जरूरत

प्रो. अमित गुप्ता ने कहा कि रीढ़ की हड्डी, ब्रेन , लिंब में चोट के बाद कई बार मरीज इलाज के बाद भी लंबे समय तक केयर की जरूरत होती है। इनको ट्रामा सेंटर में रखने के बेड भर जाएंगे एेसे मरीजों के लिए रीहैबिलिटेशन सेंटर की जरूरत है। 

एम्स में भी होती तोड़ -फोड़
एम्स दिल्ली के ट्रामा सेंटर में भी साल में दो -तीन बडी तोड़ -फोड़ की घटनाएं होती है । छोटी- मोटी तो अाम बात है। इसको रोकने के लिए पुलिस, पीसीअार वैन अधिक की जरूरत होती है । इसके साथ घायल के तीमारदार से सही तरीके से कम्युनिकेशन होना जरूरी है। 

पीजीआई का वर्क कल्चर ट्रामा में भी दिखेगा
प्रो. अमित ने कहा कि पीजीआई अपने वर्क कल्चर के नाते देश में नाम स्थापित किया है। यही वर्क कल्चर ट्रामा सेंटर को भी नाम देगा। पीजीआई ट्रामा सेंटर के अधीन प्रदेश के दूसरे ट्रामा सेंटर भी होना चाहिए जिससे वहां पर भी काम हो । 


फेज मैनेर में ट्रामा सेंटर शुरू किया जाएगा। हमारी टीम लगातार कई स्तर पर काम कर रही है। अाठ से दस दिन में क्रियाशील करने की योजना है। 16 संकाय सदस्य, अाठ रेजीडेंट, 50 नर्सेज. 10 टेक्नोलाजिस्ट सहित स्टाफ की तैनाती कर दी गयी है। सीटी स्कैन भी महीने भर में लग जाएगा अभी संस्थान में कराएंगे। 24 घंटे लैब रीजेंट काट्रैक्ट पर लगायी गयी है...प्रो. राकेश कपूर निदेशक       

रविवार, 8 जुलाई 2018

दिसंबर तक पीजीआई में बढ़ जाएगा 134 बेड

पीजीआई में134 बेड वाले वार्ड के विस्तार का ‌कार्य शुरू
-पुरानी ओपीडी में पांच विभागों के वार्ड बनेंगे, साथ ही 24 लैब भी शिफ्ट होगी
-दिसम्बर के आखिरी तक मरीजों की भर्ती शुरू होगी

पीजीआई में न्यूक्लीयर मेडिसिन, रेडियोथेरेपी, जेनेटिक्स, एनेस्थीसिया,
रेडियोलॉजी के मरीजों के लिए बेड की समस्या नहीं होगी। अब इन विभागों के
मरीजों लिए 134 बेड वाला स्थायी वार्ड उपलब्ध मिलेगा। फिलहाल अभी इन
विभागों के मरीज दूसरे विभाग के वार्डों में भर्ती किए जा रहे हैं।
शनिवार को पीजीआई निदेशक डॉ. राकेश कपूर ने 134 बेड वाले वार्ड का
निर्माण कार्य थार्मिक अनुष्ठान के साथ शुरू करा दिया। साथ ही इस भवन में
24 लैब भी शिफ्ट की जाएगी।
पीजीआई सीएमएस डॉ. अमित अग्रवाल बताते हैं कि वर्ष 2017 में पुरानी ओपीडी
नवीन में भवन में शिफ्ट होने के बाद खाली हो गई थी। डॉ. अग्रवाल का कहना
है कि न्यूक्लीयर मेडिसिन, रेडियोथेरेपी, जेनेटिक्स, एनेस्थीसिया,
रेडियोलॉजी का स्थायी वार्ड न होने की वजह से मरीजों को भर्ती करने में
दिक्कत हो रही थी। अभी तक इन विभागों के मरीज दूसरे विभाग के वार्ड में
भर्ती किए जा रहे थे। जबकि उन विभागों में मरीजों का दबाव लगातार बढ़ रहा
था। पुरानी ओपीडी में 134 बेड के विस्तार हेतु प्रशासन ने योजना बनायी।
जिसके तहत शनिवार से निर्माण एजेंसी जल निगम ने कार्य का शुरू करा दिया।
निर्माण एजेंसी ने पुरानी ओपीडी भवन को ध्वस्त कर दिया है। शनिवार को
निर्माण कार्य के शुभारम्भ पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठान में पीजीआई निदेशक
डॉ. राकेश कपूर के अलावा, डॉ. एके शुक्ला, इंजी. एसके अग्रवाल व आरडी
शर्मा के अलावा सीएल वर्मा व बीपी शर्मा मौजूद रहे।
नए वार्ड में 134 बेड होंगे
पुरानी ओपीडी में पांच विभागों के वार्ड बनेंगे। जिसमें कुल 134 बेड
होंगे। इसमें न्यूक्लीयर मेडिसिन के 10 बेड,  रेडियोथेरेपी के 50 बेड,
जेनेटिक्स के 25, एनेस्थीसिया के 25, रेडियोलॉजी 20 के अलावा चार
प्राइवेट रूम बनेंगे। साथ ही संस्थान में संचालित 24 लैब को इसी भवन में
शिफ्ट किया जाएगा। 24 लैब अभी जहां पर चल रही उस जगह पर आपरेशन थियेटर या
अन्य किसी काम में प्रयोग किया जाएगा
वर्जन
पीजीआई निदेशक डॉ. राकेश कपूर बताते हैं कि नए वार्ड बनने से मरीजों को
बहुत राहत मिलेगी। संस्थान में लगातार मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा
है। खासकर न्यूक्लीयर मेडिसिन, रेडियोथेरेपी, जेनेटिक्स, एनेस्थीसिया,
रेडियोलॉजी के स्थायी वार्ड होने की वजह से मरीजों की भर्ती में बड़ी
दिक्कत हो रही है। जिसके चलते पुरानी ओपीडी में ये वार्ड बनाने की योजना
बनायी गई। डॉ. कपूर का कहना है कि दिसम्बर के आखिर तक इस वार्ड को
क्रियाशील कर दिया जाएगा।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

पीजीआई में जो सेंटर नहीं उसके लिए अावंटित हो गया 42 करोड़

पीजीआई में जो सेंटर नहीं उसके लिए अावंटित हो गया 42 करोड़

लिवर ट्रांसप्लांट सेंटर के साथ हिपैटोबिलैरी जुडने पर गैस्ट्रो सर्जरी ने लिखा पत्र


संजय गांधी पीजीआई में जो सेंटर वैधानिक रूप से स्थापित नहीं है उस सेंटर के नाम से 42 करोड़ का बजट जारी हो गया है। इस वजट को लेकर संस्थान प्रशासन परेशान है कि कैसे इसका इस्तेमाल किया जाए । इस मुद्दे को लेकर  लंबी बहस चली लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। संस्थान में लिवर ट्रांस प्लांट यूनिट के लिए भवन बन कर चार साल से  तैयार है लेकिन इसमें लिवर ट्रांसप्लांट शुरू नहीं पाया । इसको शुरू करने के लिए संस्थान प्रशासन ने इसमें हिपैटोबिलेरी भी जोड़ दिया जो गैस्ट्रो सर्जरी का हिस्सा है। हिपैटोबिलेरी को लिवर ट्रांसप्लांट से जोडे जाने पर गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों ने प्रमुख सचिव पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि गैस्ट्रो सर्जरी विभाग बीस साल से काम कर रहा है । हमारे विभाग में 70 फीसदी सर्जरी हिपैटोबिलेरी की होती है। इसे लिवर ट्रांसप्लांट में जोड़े जाने से हम लोग क्या करेंगे। लिवर ट्रांसप्लांट अलग सब स्पेशिएलटी है इसमें हिपैटोबिलेरी नहीं जोड़ा जाना चाहिए । प्रमुख सचिव ने संस्थान प्रशासन से इस पर राय मांगी । मिली जानकारी के मुताबिक संस्थान ने 450 करोड़ का कर्ज लिया जिसमें 42 करोड़ हिपैटोबिलेरी सेंटर के लिए दे दिया गया जबकि यह सेंटर वैधानिक रूप से स्थापित ही नहीं है। लिवर ट्रांसप्लांट सेंटर ही वैधानिक रूप से स्थापित है एेसे में यह धन इस सेंटर पर भी नहीं खर्च हो सकता है। 


लिवर ट्रांसप्लांट के साथ हिपैटोबिलेरी जोड़ने के लिए नहीं अपनायी गयी प्रक्रिया

विभाग के संकाय सदस्यों का कहना है कि कोई भी सेंटर या सब स्पेशिएलटी  स्थापित करने के लिए बोर्ड  अाफ स्टडीज, एकेमडिक बोर्ड और शासी निकाय में फैसला लिया जाता है लेकिन संस्थान प्रशासन ने सीधे शासी निकाय में एजेंडा रखा जिससे शासी निकाय ने नकार दिया था । कहा गया कि लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट के स्थापना के स्थान पर हिपैटोबाइलरी डिजीज का सृजन का प्रस्ताव दोष पूर्ण है। 




गैस्ट्रो सर्जरी के विशेषज्ञों से लगातार संपर्क में हूं जो शासी निकाय से तय विभाग है उसी पर पैसा खर्च किया जाएगा। बजट का दोबारा सही अावंटन की प्रक्रिया अपनायी जाएगी...निदेशक प्रो. राकेश कपूर
 

रविवार, 1 जुलाई 2018

मरीज के प्रति अच्छा बर्ताव रखें डॉक्टर ..नए डाक्टरों को दिया गुरू मंत्र

मरीज के प्रति अच्छा बर्ताव रखें डॉक्टर 





पीजीआई निदेशक डॉ. राकेश कपूर बताते हैं कि मरीजों के प्रति डॉक्टरों का व्यवहार और बर्ताव अच्छा होना चाहिए। क्योंकि मरीज परेशान अवस्था में डॉक्टर के पास आता है। ऐसे में मरीज से अच्छे से बात करनी चाहिए और उसकी समस्याएं सुने। डॉक्टरों में सेवाभाव होना पहली प्राथमिकता है। खासकर नए डॉक्टरों को चाहिए कि वह सीनियर के साथ साझा किए गए अनुभव के आधार पर मरीजों का इलाज करें। मरीजों को डॉक्टर सही सलाह दें ताकि वह समाज में जाकर पीजीआई जैसे संस्थान की अच्छी छाप छोड़ें। न कि संस्थान की बुराई करे।
नोबल प्रोफेशन को बरकार रखें डॉक्टर
पीजीआई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुनील प्रधान बताते हैं कि डॉक्टर का पेशा नोबल प्रोफेशन की श्रेणी में आता है। लिहाजा नए डॉक्टरों को चाहिए इस पेशे को बनाए रखें। नोबल प्रोफेशन का भविष्य नए डॉक्टरों पर है। बेशक कुछ युवा डॉक्टरों में यह अहम होता है कि वह बहुत काबिल हैं। वह सीनियर से अपनी तुलना करने लगते हैं। यह उनमें गतलफहमी होती है। लिहाजा उनमें सीखने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। यह चीजें मेडिकल की किताबों में नहीं पढ़ायी जाती हैं। बल्कि अपने सीनियर से सीखे और उनके अनुभव साझा करने से ही आती हैं।
मरीज की आर्थिक स्थिति देखकर ही इलाज करें
पीजीआई के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुदीप कुमार बताते हैं कि डॉक्टरों को चाहिए कि वह मरीज का इलाज सेवा भाव से करें। मरीज की आर्थिक स्थिति देखकर इलाज करें। बेवजह महंगी दवाएं व इलाज न करें। अक्सर देखने को मिलता है कि डॉक्टर मरीज के पास जब तक पैसा रहता है उसका इलाज करते हैं पैसा खत्म होने पर उसकी छुट्टी कर देते हैं। जबकि उसे फायदा होने के बजाए दिक्कत बढ़ जाती है। ऐसे में डॉक्टरों को चाहिए कि उन्हें नोबल प्रोफेशन के मुताबिक काम करना चाहिए। ऐसे में डॉक्टर मरीज की आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर उसे सरकारी अस्पतालों ही भेजें। ताकि उसे बाद में दिक्कतें न उठानी प