गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

ब्रेन स्ट्रोक के चार घंटे के अंदर पहुंचे पीजीइ तो बच जाएगा ब्रेन

ब्रेन स्ट्रोक के चार घंटे के अंदर पहुंचे पीजीइ तो बच जाएगा ब्रेन  

स्ट्रोक पड़ने के चार घंटे के अंदर दी जाती है खास दवा
आरटीपीए रसायन कम करता है स्ट्रोक की परेशानी

एक लाख में से 73 लोगों को होता है ब्रेन स्ट्रोक 



जागरण संवाददाता। लखनऊ

ब्रेन स्ट्रोक के शिकार लोगों को जिदंगी बचाने के लिए संजय गांधी पीजीआई पूरी तरह तैयार है। स्ट्रोक पड़ने के पहले चार से 4.5 घंटे के अंदर आरटी-पीए रसायन( एक्टीलाइज) दिया जाता है। इससे मरीज को स्ट्रोक के कारण कई नुकसान नहीं होता है। मरीज की जिदंगी सामान्य हो जाती है। संस्थान के न्यूरोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. सुनील प्रधान, प्रो.वीके पालीवाल और प्रो. विनीता मनी ने बताया कि  स्ट्रोक पड़ने के पहले चार घंटे काफी अहम है। चार से 4.5 घंटे के अंदर मरीज को यदि आरटीपीए( टिशू प्लाजमीनजेन एक्टीवेटर) रसायन दी जाए तो उसे ब्रेन स्ट्रोक के कारण होने वाली तमाम परेशानी से बचाया जा सकता है। इमरजेंसी में यदि मरीज को तीन से 3.5 घंटे के अंदर लाया जाता है तो इमरजेंसी में तैनात डाक्टर न्यूरोलाजी के विशेषज्ञों से संर्पक कर सीटी स्कैन कराने के बाद तुंरत दवा दी जाती है। 

अगल बगल के डाक्टर करते हैं समय बर्बाद
 संस्थान के विशेषज्ञों ने कहा कि देखा गया है कि  ब्रेन स्ट्रोक होने के बाद तमाम मरीज पांच से 6 घंटे दूसरे डाक्टरों के पास घूमते रहते है ऐसे में मरीज की हालत और खराब हो जाती है। फिजिशियन तुरंत यदि सही जगह भेज दें तो मरीज को बचाना काफी हद तक संभव होता है। 

स्केमिक स्ट्रोक में कारगर है यह दवा

 विशेषज्ञों ने बताया कि  यह रसायन केवल इस्केमिक स्ट्रोक में ही कारगर है। देश में हर साल एक लाख लोगों मे से 73 लोग ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होते हैं। ब्रेन स्ट्रोक के शिकार 70 फीसदी लोगों में इस्केमिक स्ट्रोक होता है बाकी ब्रेन हैमरेज कारण होता है।  ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होने वाले 40 फीसदी लोग की उम्र चालिस से कम होती है। चालिस फीसदी लोगों में स्ट्रोक का कारण उच्च रक्तचाप और 17 फीसदी लोगों में कोलेस्ट्राल का बड़ा स्तर होता है। स्मोकिंग और एल्कोहल भी स्ट्रोक का बड़ा कारण है।

क्या है इस्केमिक स्ट्रोक 
 इस्केमिक स्ट्रोक में एक दम से दिमाग की रक्त वाहिका में रूकावट होती है जिसके कारण रक्त प्रवाह बाधित होता है।  हिमैरेजिक स्ट्रोक में रक्त वाहिका फट जाती है जिससे दिमाग में रक्त स्राव होने लगता है ।  यह दो तरह का होता है इंट्रासेरीब्रल और आर्टरीयल ब्लीडिंग। इस्केमिक और हिमैरेजिक दोनों स्ट्रोक में दिमाग के प्रभावित करता है जिसके कारण लकवा सहित कई परेशानी होती है।

नसीब वालों को ही मिल पाता
इन मरीजों के लिए आज भी इलाज का गोल्डेन टाइम स्ट्रोक पड़ने के पहले चार घंटे है लेकिन हाल यह है कि एक  फीसदी से कम लोगों को ही चार घंटे के अंदर इलाज नसीब हो पाता है। कुछ लोग बाद ही दम तोड़ देते हैं लेकिन जो बच पाते उनमें से एक तिहाई तो हमेसा के लिए विकलांग हो जाते हैं। शरीर का कोई अंग बेकार हो जाता है। 

क्या है ब्रेन स्ट्रोक
शरीर के सारे अंगों की तरह दिमाग में भी रक्त की आपूर्ति दिल करता है। दिमाग के खून पहुचाने वाली मुख्य नली कैरोटेड आर्टरी या दिमाग के अंदर किसी सूक्ष्म नली में रूकावट होने पर रक्त की पूर्ति के  लिए दिल और अधिक शक्ति लगाता है। कई बार नस फट जाती है जिससे दिमाग में रक्त स्राव होने लगता है। दिमाग के जिस भाग में रक्तस्राव होता है उससे नियंत्रित होने वाले अंग की कार्य प्रणाली प्रभावित होती है। साथ ही दूसरे अंगों पर भी प्रभाव पड़ता है।  

जाडें मे रक्त दाब पर रखें विशेष नजर

विशेषज्ञों ने बताया कि जाडें के मौसम में ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है जिसके कारण हिमैरजिक स्ट्रोक की अाशंका बढ़ जाती है इसलिए जांडे में बीपी का सही मानिटरिंग कर दवा के डोज में बदलाव जरूरी है।  इसके साथ बी12 और फोलिक एसिड की रक्त में स्तर की जांच करा कर इसकी पूर्ति को लिए दवा या दूसरे उपाय करना चाहिए देखा गया है कि इसकी कमी से इस्केमिक स्ट्रोक की अाशंका बढ़ जाती है।    

कम हो सकता है इससे ब्रेन स्ट्रोक
-उच्च रक्त चाप, शुगर और कोलेस्ट्राल के बढ़े स्तर को नियंत्रित रखे
- रेगुलर एक्साइज
- मोटापे पर नियंत्रण
- कम मात्रा में एल्कोहल और सिगरेट का सेवन करें न करें तो अच्छा
यह परेशानी तो सावधान
- चेहरा एक तरफ लटके
- एक हाथ में बल न लगना
- बोलने में लड़खड़ाहट
-सिर में तेज दर्द
- एक दम से देखने में एक या दोनों आख में परेशानी
एक दम से चक्कर 





मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

नान क्लीनिकल को बना दिया डीएम जेनटिक्स का छात्र

नान क्लीनिकल को बना दिया डीएम जेनटिक्स का छात्र 

पीजीआइ ने जताया एतराज कहा संभव नहीं है इनसे मरीजों का मैनेजमेंट

नान क्लीनिकल करेंगे कैसे इलाज 



जागरण संवाददाता। लखनऊ

संजय गांधी पीजीआइ के जेनटिक्स विभाग में डीएम इन क्लीनिकल जेनटिक्स के लिए भी तक एमडी बाल रोग, प्रसूती या मेडिसिन को प्रवेश मिलता रहा है ।  इस बार नीट के जरिए एमडी फिजियोलाजी, एनाटमी जैसे नान क्लीनिकल विषय से एमडी करने वालों को चयनति कर डीएम क्लीनिकल जेनटिक्स का छात्र बना दिया। विभाग का कहना है कि इस विशेषज्ञता में प्रवेश के लिए एमसीअाई ने अहर्ता के लिए एमडी बाल रोग, प्रसूती , मेडिसिन या अन्य लिख दिया जिसके कारण नान क्लीनिकल को प्रवेश मिल गया। नान क्लीनिकल से एमडी करने वाले लोग मरीजों को मैनेज नहीं करते है यह केवल टीचिंग विशेषज्ञता है। इनसे मरीजों को कैसे मैनेज कराया जा सकता है । विभाग के कहना है कि हमने एमसीआइ से इस पर एतराज जताया है लेकिन अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया। विभाग के संकाय सदस्यों का कहना है कि हमारे विभाग में कई बार गंभीर बच्चे, महिलाएं अाती है जिन्हे सही समय पर सही इलाज दे कर मैनेज करना होता है जो एमडी एनाटमी, पैथोलाजी, माइक्रोबायलोजी किया होगा वह मरीज को कैसे मैनेज करेगा। दूसरी तरफ नान क्लीनिकल विषय से डीएम क्लीनिकल जेनटिक्स में प्रवेश लेने वाले छात्रों की क्या गल्ती है जो अहर्ता दी गयी थी उसे पूरा किया है

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

इंसेफेलाइिटस से निपटने के लिए मच्छर से नहीं निपट रही है सरकार

इंसेफेलाइिटस से निपटने के लिए मच्छर से नहीं निपट रही है सरकार

इंसेफेलाइिटस का मुख्य कारण है मच्छर

मल्टी एप्रोच से निपटना संभव



कुमार संजय । लखनऊ

इंसेफेलाइिटस से निपटने के लिए मुख्य कारण मच्छर से निपटने का इंतजाम न होने के कारण सारे उपाय मशनल टीका करण, इलाज की व्यवस्था सब बेकार साबित हो रही है। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज(एनवीबीडीसी)  के आंकडे गवाही दे रहे है कि इंसेफेलाइिटस से निपटने के इंतजाम सफल साबित नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जेई का सबसे बडा कारण मच्छर है जिससे निपटने के लिए पूर्वाचल में खास योजना की जरूरत है। पूर्वाचल मच्छरों का गढ़ है। सूक्ष्म जीव वैज्ञानिक कहते है कि जेई से निपटने के लिए मल्टी एप्रोच सिस्टम की जरूरत है। इसमें सबसे पहले मच्छर को खत्म करने के लिए सघन फागिंग, टीककरण के साथ जागरूकता की जरूरत है। नेशनल वेक्टर वार्न डिजीज कंट्रोल का कहना है कि  जेई, मलेरिया सहित तमाम बीमारियों का कारण  मच्छर है जिसमें  सवार होकर वायरस मनुष्य में पहुंच कर बीमार करते हैं। हकीकत यह है कि  संतकबीर नगर, बस्ती , गोरखुपर, कुशीनगर . देवरिया सहित अन्य पूर्वांचल के जिलों के   हर गली , मुहल्ले और गांव में मच्छरों का डेरा है। तमाम सरकारी उपाय के बाद मच्छर खत्म या कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल के मुताबिक  लाखो लोग डेंगू, मलेरिया,इंसेफेलाइटिस के चपेट में आ रहे है जितने लोग इन बीमारियों की चपेट में आते है उनमें से एक से दो फीसदी लोग असमय मौत के शिकार हो जाते है। इंसेफेलाइटिस जो लोग बच जाते है उनमें से 10 फीसदी लोग दूसरी शारीरिक परेशानी से पूरे जिदंगी लड़ते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के साथ हम सबको मच्छर से बचने और उन्हें पलने , बढ़ने से रोकने के लिए उपाय करना होगा।  एनवीबीडीसी मच्छर के कारण होने वाली बीमारियों के आंकड़े हर प्रदेश से एकत्र करता है । यह सरकारी आंकड़े भी कम नहीं है लेकिन हकीकत में प्रकोप कहीं अधिक है। 

हकीकत..नहीं हुअा अाज तक नाथ नगर व्लाक के लुतुही गांव में फागिंग

संतकबीर नगर के सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षक प्रो. दिग्विजय नाथ पाण्डेय , इसी जिले के नाथ नगर ब्लाक के लुतुही गांव के रहने वाले डा. एनडी द्वेदी ने फोन पर बताया कि हम लोगों के यहां अाज तक मच्छर से निपटने के लिए छिडकाव नहीं हुअा। सफाई कर्मचारी तैनात है लेकिन गांव पूरा जंगल हो गया है। हम लोगों के गांव में मच्छर नहीं मच्छरा हो गए है जो काट लें तो फफोला पड़ जाता है। कई बार शिकायत के बाद भी अाज तक छिड़काव नहीं हुअा


मच्छर नियंत्रण से लाखों की कम हो सकती है परेशानी 

संजय गांधी पीजीआइ के  माइक्रोबायलोजिस्ट प्रो. उज्जवला घोषाल कहती है कि   केवल सफाई और मच्छर मारने के उपाय पर ध्यान दिया जाए तो देश के लाखों लोगों को परेशानी से बचाया जा सकता है। मच्छर की तीन प्रजातियां अधिक परेशान कर रही है।
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एनाफलीज: अंडे से मच्छर बनने में 6 से 10 दिन का समय लगता है। मादा मच्छर खून पीने के बाद 60 से 150 अंडे देती है। यह प्रजाति मलेरिया के लिए जिम्मेदार है।

क्यूलेक्स: यह प्रजाति ठहरे पानी में पलता है। अमूमन रात, घर के अंदर और बाहर कहीं भी काट सकता है। यह मच्छर इंसेफेलाइटिस के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

एडीज: यह मच्छर दिन के समय अधिक सक्रिय रहता है। साफ पानी में यह पलता है। इसका अंडा 6 से 8 दिन में मच्छर बन जाता है। यह मच्छर चिकनगुनिया और डेंगू के लिए जिम्मेदार है। 



वर्ष     एई के मामले    मृत्यु   जेई के मामले   मृत्यु
2010        3540        494     325        59
 2011        3492       579     224         27
2012         3484        557      139        23
2013         3096       609      281         47
2014         3329       627      191        34
2015        2894        479      351        42
2016       3919        621        410       73
2017       3077      367        372         10

  


बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

संजय गांधी पीजीआइ के प्रो.एसके याचा और प्रो.केएन प्रसाद को मिला अाईसीएमअार एवार्ड


दोनों के काम पर नजर.....



परजीवी बन सकता है मिर्गी का कारण
माइक्रोबायलोजी विभाग के: प्रो. के एन प्रसाद को आईसीएमआर का बीके एकत ओरेशन एवार्ड

 न्यूरोलाजिकल बीमारी न्यूरोसिस्टीसारकोसिस (एनसीसी) पर लंबे समय से काम कर रहे हैं। हेल्कोवेक्टर पायलोरी और पेट कैंसर के बीच संबंध। एंटी बायोटिक रजिस्टेंस , ब्रेन एब्सेस के कारण का पता लगाने के लिए लंबे समय से काम कर रहे हैं। न्यूरोसिस्टीसारकोसिस के बारे में बताया कि  इस बीमारी पर प्रो. प्रसाद ने देखा सूअर पालन का काम करने वाले लोगों में इस बीमारी की आशंका सामान्य लोगों के मुकाबले अधिक होती है। प्रो. प्रसाद ने इस व्यवसाय में लगे 595 लोगों में इस बीमारी का अध्ययन किया तो पाया कि इस व्यवसाय में लगे 15 फीसदी लोगों में एनसीसी बीमारी थी। इस बीमारी का टीनिया सोलियम( फीता कृम) है। यह खाने के रास्ते पेट से जाकर वहां पर अंडे देता है। अंडे रक्त प्रवाह के जरिए दिमाग में चले जाते हैं। इसकी वजह से व्यक्ति को मिर्गी का दौरा पड़ता है। इस अध्ययन के बाद प्रो. प्रसाद ने मालीक्यूलर लेवल पर बदलाव और जीन से संबंध पर कम किया। बीमारी को पकड़ने के लिए  डीटीआई मैट्रिक्स में बदलाव पर रेडियोलाजी विभाग के साथ मिल कर काम किया। इसके अलावा प्रो. प्रसाद ने गुलेन बैरी सिंड्रोम पर काफी काम किया है। इनके तीन सौ से अधिक रिसर्च पेपर हैं। प्रो. प्रसाद ने बताया कि मीट का मांस खूब पका कर ही खाना चाहिए। हरी सब्जी को खूब धो कर ही पकना चाहिए। बरसात के मौसम में फीता कृम के अंडे सब्जी में चिपक में जाते है जिसे खाने से यह बीमारी हो सकती है।



प्रो.एसके याचा को आईसीएमआर का एमएन सेन ओरेशन एवार्ड

देश में पहले बाल पेट रोग विभाग स्थापित करने वाले संजय गांधी पीजीआइ के पिडियाट्रिक गैस्ट्रो इंट्रोलाजी के प्रमुख प्रो.एसके याचा ने पहली बार सिलिएक डिजीज के जांच , बचाव , जागरूकता के तमाम पहलुओं पर काम किया इसके साथ इनके नाम इंटरनेशनल उपलब्धियां है।
वर्ष 2005 में देस का पहला पिडियाट्रिक गैस्ट्रोइंट्रोलाजी विभाग संस्थान में स्थापित हुआ आज भी यह देश का अकेला विभाग जहां पर बच्चों के पेट संबंधी परेशानी का सभी इलाज होता है। हम एक दिन के बच्चे का भी इंडोस्कोप करते है। हम देश के लिए बाल पेट रोग विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं। हर साल तो डीएम और चार से पांच पीडीसीसी तैयार कर रहे हैं। देश में 40 फीसदी बच्चों के पेट में परेशानी होती है इसमें 60फीसदी लिवर, 30 फीसदी में आंत की परेशानी होती है। बाल पेट रोग विभाग की विशेषज्ञता के आभाव में तमाम बच्चों का जीवन खतरे में रहता था। उपलब्धियां

-सात बुक चैप्टर - द गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम , हिपैटिक डिसआर्डर, ग्लोबल विलेज आफ सिलिएक डिजीज, निय़ोनेटल क्लोइओस्टेसिस, मैनजमेंट आफ एक्यूट गैस्ट्रोइंटेसटाइन ब्लीडिंग सहित अन्य विषयों पर विश्वस्तीर किताबों में छपा है।
-80 से अधिक रिसर्च पेपर( बच्चों की पेट की बीमारी के कारण और इलाज के नए तरीके पर आधारित नई खोज शामिल है। 
- 16 बेस्ट पेपर एवार्ड ( सारे रिसर्च पेपर इंडियन एकेडमी आफ पिडियाट्रिक, इंडियन एसोसिएशन आफ पिडियाट्रिक गैस्ट्रोइंट्रोलाजी, एसियन स्पेस्फिक स्टडी आफ लिवर सहित कई अन्य एसोसिएशन के बैठक में प्रस्तुत किया गया।

- इंडियन एसोसिएशन आफ गैस्ट्रोइंट्रोलाजिस्ट, इंडियन एसोसिएशन आफ पिडियाट्रिक सहित कई संगठनों के सदस्य एवं पदाधिकारी
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अस्पताल प्रबंधक संभालेंगे मेडिकल कालेजों की कमान



पीजीआइ में  हेल्थ केयर एक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डिवलपमेंट 


अस्पताल प्रबंधक संभालेंगे मेडिकल कालेजों की कमान

सरकार ने मान लिया कि मरीज देखने वाले डाक्टर नहीं चला सकते अस्पताल

सभी मेडिकल कालेजों में खुलेगा अस्पताल प्रशासन विभाग

जागरण संवाददाता। लखनऊ

गोरखपुर की घटना के बाद सरकार ने मान लिया कि मरीज  देखने वाले डाक्टर सही तरीके से अस्पताल नहीं चला सकते है। अस्पताल चलाने के लिए अस्पताल प्रबंधन या प्रशासन में दक्षता हासिल लोगों की जरूरत है। इसी के मद्देनजर सभी मेडिकल कालेजों में अस्पताल प्रशासन विभाग खोलने का फैसला लिया है। संजय गांधी पीजीआइ में हेल्थ केयर एक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डिवलपमेंट प्रोग्राम में कमेटी  के सदस्य और संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग  प्रो.राजेश हर्ष वर्धन ने बताया कि अस्पताल के सही संचालन के हेल्थ मैनजमेंट की जरूरत होती है अभी तक एमएस, सीएमएस ही अस्पताल के प्रबंधन का संचालन एवं प्रबंधन का काम देखते है इन्हे खरीद , लीगल मैटर, मानव संसाधन प्रबंधन की जानकारी कम  होती है। अब इनके साथ अस्पताल मैनेजर तैनात होंगे जो अस्पताल प्रबंधन में दक्ष होंगे। यह व्यवस्था स्वास्थय विभाग तो अपना लिया लेकिन चिकित्सा शिक्षा विभाग अब इसे अपनाने जा रहा है। प्रो. हर्ष वर्धन ने बताया कि अभी हम लोग नेशनल हेल्थ मिशन के सहयोग से जिलों में तैनात सीएमअो, एडीशनल सीएमअो अादि को चरण वद्ध तरीके से अस्पताल प्रबंधन का हुनर सिखाया जा रहा है जिसमें व्यवहार, मानसिक सोच, कानून, बात-चीत का तरीका , संसाधन का अधिकतम इस्तेमाल जैसे 30 विषयों के बारे में जानकारी दी जा रही है। वर्कशाप में एसकेआईएमएस जम्मू के प्रो. फारूख जान सहित कई लोग जानकारी दे रहे हैं। 

50 फीसदी उपकरणों का नहीं हो रहा है इस्तेमाल

प्रो. हर्ष  वर्धन ने कहा कि सही मैनेजमेंट  न होने के कारण अस्पतालों में 50  फीसदी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। मशीन खरीद ली जाती है कुछ दिन चलती है फिर खराब होने के बाद कबाड में डाल जाती है। मशीन को ठीक कर चलाने के लिए वार्षिक मेंनटीनेश सिस्टम ही नही है। कई बार बिना जरूरत के भी मशीने खरीद ली जाती है। इसी तरह 16 फीसदी कर्मचारी मैनेजमेंट के अभाव में बिल्कुल काम नहीं करते है केवल 68  फीसदी कर्मचारी जितना काम दिया जाता है उतना ही करते है। 16 फीसदी कर्मचारी बहुत अच्छा काम करते है सिस्टम होना चाहिए कि सभी से काम लिया जा सके। 

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

......तो दिल के और भी है दुश्मन



......तो दिल के और भी है दुश्मन

रूम्टायड अर्थराइटस, डिप्रेशन और सोराइसिस भी बना सकता है दिल को बीमार


कुमार संजय। लखनऊ
दिल की बीमारियों से मरने वालों की संख्या सबसे अधिक है। अब लोग हृदय रोगों के बढ़ने के खतरों से वाकिफ भी होने लगे हैं। हाई ब्लड प्रेशर, असक्रियता, मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान के कारणों से हृदय रोगों और उम्र से पहले मौत का खतरा बढ़ता जा रहा है।  इन कारणों के बारे में तो लोगों को जानकारी है लेकिन कुछ बीमारियों की वजह से दिल बीमार हो सकता है। संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सुदीप कुमार  ने कई और कारणों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यदि यह परेशानी है तो इन्हें दिल की प्रति अधिक सचेत रहने की जरूरत है। इन बीमारियों की वजह से भी हृदय रोगों के होने की आशंका और बढ़ जाती है।

रूम्टॉयड आर्थराइटिस : संजय गांधी पीजीआइ के क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट प्रो. विकास अग्रवाल के मुताबिक यह एक अाटो इम्यून डिजीज है जिससे शरीर के जोडों के खिलाफ एंटीबाडी बनने लगती है।  जोडों में पीडा दायक सूजन की स्थिति पैदा होती है। जोड़ों में असामान्यता और कड़ापन, खासकर उंगलियों, कलाइयों, पैरों और एड़ियों में। इससे बीमारी से ग्रस्त लोगों में दिल की बीमारी का खतरा चार गुना तक बढ़ जाता है।

गाउट : प्रो. विकास के मुताबिक  यूरिक एसिड के मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी के कारण  पैरों की छोटी हड्डियों में सूजन और दर्द की परेशानी होती है। बढा यूरिक एसिड हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ाने का काम करते हैं।  स्तर को नियंत्रित करने और सही समय पर हृदय रोगों की पहचान व इलाज दिल को बचाया जा सकता है।


सोरायसिस : प्रो.विकास अग्रवाल के मुताबिक यह भी अाटो इम्यून डिजीज है जिसमें  लाल, खुजली वाली छिलकेदार त्वचा केवल ऊपरी रूप में नहीं होती है।  सोरायसिस त्वचा में गहराई तक फैले होने के साथ-साथ हृदय रोग, स्ट्रोक और अन्य ब्लड वेसल्स डिसीज जैसी समस्याएं भी इसके कारण हो सकती हैं। आमतौर पर यह देखा गया है कि सोरायसिस की समस्या अत्यधिक गंभीर होने पर हार्ट फेल्यिर का खतरा बढ़ जाता है। 

किडनी से जुड़ी बीमारियां : संजय गांधी पीजीआइ के नेफ्रोलाजिस्ट प्रो.नारायन प्रसाद के मुताबिक क्रॉनिक किडनी डिसीज के कारण हृदय रोगों का खतरा स्वस्थ्य किडनी वालों की तुलना में दोगुना बढ़ जाता है। उनमें से अधिकांश की मृत्यु किडनी फेल्यिर के पहले ही हो जाती है। किडनी से जुड़ी बीमारियों के आखिरी स्टेज पर पहुंच चुके लोगों में 20 से 30 गुना अधिक कार्डियोवेस्कुलर डिसीज के होने का खतरा बढ़ जाता है। कई बार किडनी से जुड़ी बीमारियों के गंभीर ना होने पर भी हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा दोगुना हो जाता है।


डायबिटीज : संजय गांधी पीजीआइ के इंडोक्राइनोलाजिस्ट प्रो, सुशील गुप्ता के मुताबिक हृदय रोगों का खतरा उन लोगों में चार गुना तक बढ़ जाता है जिन्हें डायबिटीज की समस्या होती है। डायबिटीज से ग्रसित व्यक्ति को हार्ट अटैक के कारण होने वाला दर्द डायबिटिक न्यूरोपैथी के कारण महसूस नहीं होता और उनमें साइलेंट हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है। जिसकी वजह से समस्या का पता लगाने और उसका इलाज कराने में देर होती है। इनके अत्यधिक वजन बढ़नेहाई ब्लड प्रेशरबैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होने और गुड कोलेस्ट्रॉल की कम होने की आशंका भी बढ़ जाती है और दिल के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। 

डिप्रेशन : मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञ प्रो.एसके कार के मुताबिक हृदय रोग डिप्रेशनएंग्जाइटी जैसी चीजों से और अधिक पोषित होते हैं। डिप्रेशन ना केवल हृदय रोगों के खतरे को बढ़ाता है बल्कि हार्ट अटैक या स्ट्रोक के बाद स्वास्थ्य लाभ हो रहे लोगों में प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है। इस समस्या से जूझ रहे लोगों की लाइफस्टाइल भी अनहेल्दी हो जाती हैधूम्रपान करने लगते हैंअसक्रिय हो जाते हैं और वजन भी बढ़ जाता है। जिन लोगों में हृदय रोग की पहचान हुई है उन्हें डिप्रेशन के लक्षणों की भी पहचान करानी चाहिए। 


गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

टीबी एमडीआर मरीजों को मिलेगी जीवन की खुराक

टीबी एमडीआर मरीजों को मिलेगी जीवन की खुराक

हर साल 80 से 90 हजार मरीजों में हो रहा है टीबी एमडीआर
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दी दवा को मान्यता



कुमार संजय। लखनऊ

बिगडी हुई टीबी के इलाज के लिए नई दवा अब जल्दी भारत में उपलब्ध होगी। नई दवा तो बन कर तीन साल पहले तैयार हो गयी थी लेकिन क्लीनिकल ट्रायल सहित तामम सुरक्षा के मानकों पर खरी उतरने के बाद इस दवा के इस्तेमाल पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी देशों से इसे राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण प्रोग्राम में शामिल करने को कहा है। संजय गांधी पीजीआइ को पल्मोनरी मेडिसिन के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ कहते है कि बेडाक्विलिन   और  डेला मेनि़ड नई दवा है तो एमडीआर ( मल्टी ड्रग रजिस्टेंस) के मामलों में काफी कारगर साबित हो रही है। तमाम शोध अध्ययन इस दवा को लेकर हो चुके है जिसमें 50 मिली ग्राम दिन में दो बार रूटीन दवा के साथ देने पर बलगम में बैक्टीरिया की कमी काफी हद तक देखने को मिली है। अभी यह दवा भारत में आम मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं है। क्लीनिकल ट्रायल देश में कुछ सेंटर पर मरीजों में हुआ है जिसके परिणाम इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल में आ चुके है। अब भारत सरकार ने भी इस दवा को भारत में उपलब्ध कराने की अनुमति दे दी है जिससे काफी राहत मिलेगी। प्रो. आलोक ने बताया कि भारत में हर साल 80 से 90 हजार मामले नए एमडीआर के आते है जिसमें इलाज काफी कठिन होता है। इस दवा को रूटीन दवा एथेमब्यूटाल, आइसोनिआजिड, पायरा जिनामाइड , रिफाम्पसीन के साथ दी जाती है देखा गया है कि दो महीने इस दवा के डेलामेनिड देने से बलगम में बैक्टीरिया की कमी या खात्मा 44 फीसदी तक मिला। 6 महीने दवा देने पर मौत की दर भी कम मिली। 

कैसे काम करती है यह दवा
यह दवा बैक्टीरिया के सेल वाल ( आवरण) में बनने वाले मायकोलिक एसिड के उत्पादन को कम करती है जिससे बैक्टीरिया कम जोर होकर मर जाता है और अपनी संख्या नहीं बढा पाता है। 

कई देशों में हो रहा है नियमित  इस्तेमाल

टीबी की नयी दवा  ह्यबेडाक्विलिन और  डेलामेनिड आ गयी है। कई मनकों पर परीक्षण के बाद  इस्तेमाल की मजूरी मिल चुकी है।  परीक्षण के दौरान दोनों ही दवाएं बेहद कारगर पायी गयीं.  हालांकि, बेडाक्विलिन का इस्तेमाल 70 देशों ने किया, लेकिन इसका नियमित  इस्तेमाल महज छह देश (फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जॉर्जिया, आर्मेनिया,  बेलारूस और स्वाजीलैंड) ही करते हैं




क्या है टीबी
 
टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) यानी क्षय रोग माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया द्वारा होता है, जो अक्सर इनसान के फेफड़े को अपनी चपेट में लेता है. टीबी का इलाज मुमकिन है और इससे पूरी तरह बचा जा सकता है. 
 
कैसे फैलता है
 
टीबी हवा के जरिये एक आदमी से दूसरे आदमी तक फैलता है. फेफड़े की टीबी का मरीज जब खांसता या छींकता है या फिर थूकता है, तो इससे टीबी के जर्म्स हवा में फैल जाते हैं. किसी दूसरे इनसान के शरीर में सांस के जरिये जब वह हवा उसके भीतर जाती है, तो उसके भी इसकी चपेट में आने का जोखिम पैदा होता है. 
 
शऱीर में सोता रहता है बैक्टीरिया

 दुनियाभर में करीब एक-तिहाई लोगों में टीबी सुप्तावस्था में है. यानी ये लोग टीबी बैक्टीरिया से संक्रमित हो चुके हैं, लेकिन ये इस बीमारी की चपेट में नहीं हैं और दूसरों तक इसे फैला नहीं सकते हैं. 
 
आरंभिक स्टेज में इलाज से नियंत्रित होगी टीबी 
 
विकासशील  देशों में आम तौर पर ज्यादातर लोग टीबी की बीमारी से पूरी तरह ग्रसित होने  के बाद ही इसका इलाज कराते हैं। आरंभिक अवस्था  में इसका इलाज किया जाये तो यह ज्यादा कारगर साबित होगा।  इसके उच्च जोखिम वाले देशों में भी आरंभिक  अवस्था में इसकी जांच पर जोर नहीं दिया जाता है, जबकि ऐसा करके  ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को बचाया जा सकता है.

यूपीपीपीजीआइएफ ने मेडिकल संस्थानों में सातवें वेतन अायोग की मांग

यूपीपीपीजीआइएफ ने मेडिकल संस्थानों में सातवें वेतन अायोग की मांग

कर्मचारी महासंघ ने पीजीआइ के निमयमावली 2011 में बदलाव के लिए राज्यपाल से गुहार




जागरणसंवाददाता। लखनऊ

उत्तर प्रदेश पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल इंस्टीट्यूट अाल इंपलाइज फडरेशन( यूपीपीजीआईएफ) की अध्यक्ष सावित्री सिंह और महामंत्री प्रदीप गंगवार ने राम मनोहर लोहिया संस्थान, मेडिकल विवि और सेफई संस्थआन में सतवें वेतन अायोग को लागू करने की मांग की है। मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में कहा कि प्रदेश के सभी विभागों में सतवां वेतन अायोग लागू हो चुका है लेकिन इन संस्थानों में अाज तक लागू नहीं किया गया जिससे कर्मचारियों में निराशा है। दूसरी तरफ कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह संयोजक मदन मुरारी ने राज्यपाल को पत्र भेज कर कहा है कि सं स्थान की नियमावली में 2011 में जो बदलाव हुअा है उसे तुरंत समाप्त कराया जाए। संस्थान में पुरानी व्यवस्था बहाल की जाए। इस नियमावली में कहा गया था कि संस्थान के कर्मचारियों और अधिकारियों एम्स दिल्ली की तरह सुविधाएं मिलेंगी लेकिन लागू करने से पहले संस्थान को शासन ने अनुमोदन लेना होगा इस नियम की वजह से संस्थान में कर्मचारियों अौर अधिकारियों को एम्स की भांति वेतन अौर भत्ते नहीं मिल पा रहे हैं।

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

मोबाइल मेडिकल वैन रखेगी सेहत का ख्याल --50.3 महिलाअों में अायरन की कमी


50.3 महिलाअों में अायरन की कमी

मोबाइल मेडिकल वैन रखेगी सेहत का ख्याल 
महिला स्वस्थ्य तो परिवार स्वस्थ्य थीम पर होगा काम
जागरण संवाददाता। लखनऊ   


महिलाअों और बच्चों के सेहत सुधारने के लिए मोबाइल मेडिकल वैन तय समय और तय दिन खास जगह उपलब्ध रहेगी। अाशा हेल्थ वर्कर और मोबाइल मेडिकल वैन के बीच सामाजस्य रहेगा । उस समय अाशा मरीज को लेकर वहां पहुंचेगी वही पर उनका इलाज किया जाएगा। जरूरत पडने पर मरीज को पीएचसी में शिफ्ट किया जाएगा। इसके लिए मोबाइल मेडिकल वैन की संख्या बढाने जा रहे है। यह बात बुधवार को संजय गांधी पीजीआइ में  महिलाअों एवं बच्चों में पोषण की स्थित पर कार्यशाल में चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्री सिदार्थ नाथ सिंह  ने कही। कहा कि प्रदेश के चालिस जिलों पर सर्वे के बाद जो रिपोर्ट पीजीआइ और ग्लोबल एलाइंस फाऱ इंप्रूव्ड न्यूट्रिशन( गेन)  तैयार की इससे गंभीरता से लगू करने पर काम होगा। कहा कि पीएचसी और सीएचसी को मजबूत करने के लिए लगातार काम हो रहा है। 6 महीने में दो हजार से अधिक एलोपैथ और दो हजार अायुश चिकित्सकों की तैनाती की गयी है। कार्यशाला की मुख्य अतिथि महिला एवं बाल विकास मंत्री प्रो.रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि महिलाएं स्वस्थ्य तो परिवार स्वस्थ्य इस बात को समझना पडेगा। महिलाएं दिन -रात परिवार के लिए काम करती है लेकिन अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देती है। हमारे पास सिस्टम है इसे मजबूत करना है। अागन बाडी के जरिए गर्भवती महिला और बच्चों के पोषण पर ध्यान दिया जा रहा है। इसका दायरा बढाना है। इस मौके पर निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा कि अभी तक हमारे पास कोई स्टडी नहीं थी जिससे सही जानकारी मिले। हम लोगों ने शोध कर देखा कि महिलाओं और बच्चों में पोषण की कमी है जिसके कारण बच्चों की लंबाई कम हो रही है। कार्यशाला में एडीशनल डायरेक्टर जयंत नारलीकर, सीएमएस प्रो. अमित अग्रवाल, एनएचएम के अालोक कुमार सहित कई लोग उपस्थित रहे। 


पीजीआइ के माली क्यूलर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो.मदन मोहन गोडबोले और गेन की प्रो. ल्यूनेट ने बताया कि शोध रिपोर्ट प्रदेश के चालिस गांव में 18 से 49 अायु वर्ग की 1238 महिला और 6 से पांच साल के 1238 बच्चों पर शोध के बाद तैयार की गयी है। शोध के दौरान इन बच्चों के रक्त में तमाम विटामिन और पोषक तत्वों का स्तर देखने के साथ ही उसके शरीर के बार और लंबाई का भी अध्ययन किया गया जिसमें यह हकीकत सामने अायी..   
- 36.4 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार
- 50.3 फीसदी महिलाअों में अायरन की कमी
- 28.7 फीसदी में विटामिन डी की कमी
- 50.7  फीसदी में जिंक की कमी
- 40.8 फीसदी महिलाअों में विटामिन ए की कमी
- 17.2 फीसदी में विटामिन बी 12 की कमी
- 55.8 फीसदी बच्चे एनीमिया के शिकार
- 34.0 फीसदी बच्चे के शरीर का भार कम
- 20.3  फीसदी बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम
- 14.8 फीसदी महिलाएं अोवर वेट
- 4.0 फीसदी मोटापे का शिकार

लंदन की तर्ज पर होगा पीजीआइ की इमरजेंसी और ट्रामा में इलाज

लंदन की तर्ज पर होगा पीजीआइ की इमरजेंसी और ट्रामा में इलाज


यूके और पीजीआइ में हुअा करार

मुख्यमंत्री से मिली यूके की टीम
जागरणसंवाददाता। लखनऊ



संजय गांधी पीजीआइ के इमरजेंसी और ट्रामा सेंटर पर लंदन की तर्ज पर इलाज मिलेगा। संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने चेलसिया एंड वेस्टमिनिस्टर हास्पिटल एनएचएस लंदन से करार किया है जिसमें लंदन का यह अस्पताल संस्थान के इमरजेंसी मेडिसिन और ट्रामा सेंटर के डाक्टरों को अपने यहां इलाज की बारीकियां सिखाएगा। लंदन के इस अस्पताल के विशेषज्ञ डा. शशांक पाटिल, डा. गैरी डेविस, डा.कीथ लोवरिज . डा. राबर्ट हाडगकिस मंगलवार को संस्थान में निदेशक प्रो.राकेश कपूर , प्रो.संदीप साहू, डीन प्रो. राजन सक्सेना, प्रो.अमिता अग्रवाल ने पूरी योजना पर चर्चा के बाद प्रेस वार्ता में बताया कि इमरजेंसी मेडिसिन भारत में कही विभाग नहीं है  । इस विभाग की स्थापना पहली बार पीजीआइ में हुआ है। संस्थान लगभग दो सौ बेड इस विभाग में स्थापित करेगा जिसमें पेट, दिमाग, दिल सहित अन्य इमरजेंसी होने पर इलाज की व्यवस्था तुरंत उपलब्ध कराने का उद्देश्य है। इमरजेंसी मैनेडमेंट और ट्रामा मेनजमेंट में ट्रेनिंग के लिए संस्थान के डाक्टटर वहां जाएगा। इससे इलाज का स्तर इंटरनेशनल लेवल को होगा।  प्रो. कपूर ने बताया की यूके की टीम के साथ हमने मुख्यमंत्री योगी अादित्य नाथ से भी मुलाकात कर योजना के बारे में जानकारी दी। यूके टीम के अगुवा डा.शसांक ने कहा कि वह प्रदेश के दूसरे मेडिकल कालेजों के साथ भी मिल कर काम करेंगे।