बुधवार, 9 नवंबर 2022

भेष बदल कर आया डेंगू वायरस कर रहा अधिक परेशान

 भेष बदल कर आया डेंगू वायरस कर रहा अधिक परेशान



डेन टू सबटाइप   पीजीआई के अध्ययन में खुलासा

  तेजी से घटता है प्लेटलेट बढ़ती है ब्लीडिंग की आशंका


इस बार का डेंगू पिछले सालों के मुकाबले अधिक खतरनाक है। संजय गांधी पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो. उज्जवला घोषाल के मुताबिक हमने डेंगू वायरस के प्रकार को लेकर अध्ययन किया तो पाया कि इस साल डेन -2 सब सबटाइप सबसे अधिक लोगों को संक्रमित कर रहा है। इसके साथ डेन -3 सब टाइप भी पाया गया है। वायरोलाजी लैब के प्रभारी डा. अतुल गर्ग के मुताबिक हर साल डेंगू का सब टाइप बदलता रहता है। पिछले साल डेन -3 सब टाइप संक्रमित कर रहा था । डेन -2 सब टाइप हेमोरेजिक फीवर और शांक सिंड्रोम की आशंका को बढाता है। इस लिए सचेत रहने की जरूरत है।   विशेषज्ञों के मुताबिक  रोगी को पहले दो दिनों तक बुखार रहता है। तीसरे दिन बुखार उतर जाता है। रोगी स्वयं को स्वस्थ समझता है। इसके बाद अचानक मरीज के प्लेटलेट्स कम होने लगते हैं। डेंगू में प्लेटलेट काउंट 10,000 से कम होना चिंता का विषय है, लेकिन डी2 में 40,000 से कम प्लेटलेट काउंट पर सचेत रहने की जरूरत है।  युवा डेंगू की चपेट में आ रहे हैं। 21 से 50 साल के आयु वर्ग में मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है।  पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक है।

 

 

 

 

सामान्य डेंगू बुखार के लक्षण

-  तेज बुखार, - सिर, मांसपेशियों और जोड़ों दर्द,  कमजोरी, भूख न लगना,  जी मिचलाना, उल्टी , शरीर पर लाल-गुलाबी दाने

 

डेंगू हिमोरेजिक फीवर

 

- नाक और मसूड़ों ,  शौच या उल्टी में खून आना ,  त्वचा पर छोटे-छोटे गहरे नीले-काले निशान

 

डेंगू शॉक सिंड्रोम के लक्षण

- बेचैन होना,तेज बुखार के बावजूद उसकी त्वचा की ठंडक, धीरे-धीरे बेहोश होना, नब्ज कभी-कभी तेज और धीमी होना

 

 

 डेंगू की रोकथाम और उपचार

-ऐसे कपड़े पहने जो पूरे शरीर को ढक सके

-      मच्छर क्रीम, स्प्रे, तरल आदि का प्रयोग करें

 

क्या खाएं 

- ताजे फल, जूस, अंकुरित अनाज, दलिया, दूध, दाल का पानी , अधिक से अधिक पानी 

 

छोटी आंत में अधिक बैक्टीरिया का कारण बन सकता है एनीमिया और बी12 की कमी

 छोटी आंत में अधिक बैक्टीरिया का कारण बन सकता है एनीमिया और बी12 की कमी


 पीजीआई के प्रो. घोषाल ने एशिया के देशों लिए  बनाई गाइड लाइन में नए कारण और इलाज का बताया तरीका

 उम्र बढ़ने के साथ बढ़ सकती है सीबो की आशंका

 

एनीमिया और बी 12 विटामिन की कमी के कारण पेट की परेशानी हो सकती है। हीमोग्लोबिन एवं विटामिन बी 12 की कमी के कारण छोटी आंत में बैक्टीरिया अधिक संख्या में पैदा हो जाते है जिसे स्माल इंटेस्टाइन बैक्टीरिया ओवर ग्रोथ( सीबो) कहते है। इस नए कारण का पता संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के गैस्ट्रो एन्ट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो.यूसी घोषाल ने लगाया है। इस तथ्य को प्रो. घोषाल ने इंडियन न्यूरो गैस्ट्रोएंट्रॉलजी एंड मोटैलिटी एसोसिएशन( एशिया पेसिफिक रीजन) ने  एशिया के देशों के लिए  सीबो के इलाज और बीमारी को पता करने के लिए गाइडलाइन में शामिल किया है। सीबो अधिक उम्र के लोगों में अधिक होता है और स्वस्थ लोगों में कम होता है।  इस प्रस्ताव पर एशियन कंट्री के 84 फीसदी विशेषज्ञों ने सहमति जतायी। इसके कारण पर लंबी चर्चा हुई । प्रो. घोषाल के मुताबिक डायबटीज, कम सरीम एलब्यूनिन, पैक्रिएटाइटिस,सीलिएक डिजीज, आईबीएस, आटो इम्यून डिजीज, क्रॉनिक लिवर डिजीज सहित अन्य कारण है ।   एनीमिया और विटामिन बी 12 की कमी भी एक कारण है। इस नए तथ्य से एशिया के देशों के पेट रोग विशेषज्ञों का सीबो का कारण पता करने में सफलता कर इलाज में मदद मिलेगी। इलाज के लिए खास एंटीबायोटिक को भी हाइड लाइन में शामिल किया गया है। यह कई तरह से सुरक्षित और प्रभावी है।  इस खोज को इंडियन जर्नल आफ गैस्ट्रोइंट्रोलाजी ने भी  स्वीकार किया है।  


 

जीएचबीटी जांच से पकड़ में आती है परेशानी

  

प्रो. घोषाल के मुताबिक सीबो का पता करने के लिए आंत से द्रव लेकर उसका कल्चर जांच करना गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता रहा है लेकिन 30 फीसदी गट ( आंत) के पानी में उपस्थित बैक्टीरिया का कल्चर संभव नहीं होता है ऐसे में ग्लूकोज हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट(जीएचबीटी) और लैक्टूलोज हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट(एलएचबीटी) जिसमें किसी भी सूई की जरूरत नहीं होती है टेस्ट अधिक सफल माना जा रहा है। गाइड लाइन में बताया गया है कि  हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट अच्छा है। लैक्टूलोज हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट में गलत पॉजिटिव रिपोर्ट की आशंका अधिक है।     

 

आईबीएस और सीबो का बीच है रिश्ता

प्रो. घोषाल के मुताबिक देखा गया है कि आईबीएस( इरिटेबल बावेल सिंड्रोम और सीबी को बीच रिश्ता है। आईबीएस के 40 फीसदी मरीजों में ब्रेथ टेस्ट पॉजिटिव मिला है। 19 फीसदी में आंत के पानी के कल्चर में बैक्टीरियल ग्रोथ मिला है।

 

सीबो में यह होती है परेशानी

प्रो. घोषाल के मुताबिक सीबो की परेशानी के साथ विभाग में आने में कुल मरीजों में 50 से 60 फीसदी होते है। इस परेशानी में   छोटी आंत में बैक्टीरिया की संख्या अधिक हो जाता है।  पेट में गैस और मालीक्यूल बनते है। इसके कारण गैस बनने, पेट फूलने, बार मल द्वार से हवा निकलने, पाचन में कमी, भूख में कमी, पेट दर्द की परेशानी शुरुआती दौर में होती है। एडवांस स्टेज में शरीर के भार में कमी, विटामिन और मिनरल की कमी, एनीमिया, न्यूरोपैथी की परेशानी हो सकती है।  

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

खोजा लिवर सिरोरिस की परेशानी कम करने का हल तो किसी ने बताया एसएलई में कैसे कम करें परेशानी 2022 दीक्षांत समारोह में मिला डा. रोहित, डा. रूद्रा, डा. पारिजात और डा. तंबोली को ऐवार्ड

 




प्रो.एसआर नायक आउट स्टैंडिंग रिसर्च इनवेंस्टीगेटर एवार्ड- डा. रोहित सिन्हा

ऑटोफैगी से संभव होगा डायबिटीज का इलाज

डायबिटीज , एक्यूट किडनी इंजरी, वायरल बीमारियों के इलाज का नया तरीका खोजने में कामयाबी हासिल किया है। इस तकनीक में आटोफैगी की प्रक्रिया तेज या बढा कर इन बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। इस शोध से विश्व के वैज्ञानिकों को नई दवा खोजने का रास्ता साफ होगा। शरीर में फैगोसाइट्स होते है जो खराब कोशिकाओं को नष्ट करते है इसे ऑटोफैगी कहते है। रैट और माउस में दवा के जरिए आटोफैगी प्रक्रिया शुरू कर बीमारी पर प्रभाव देखा तो पता चला कि यह प्रक्रिया बढ़ने के साथ एक्यूट किडनी इंजरी कम हुई, शुगर का लेवल नियंत्रित हुआ। इस शोध को स्टेम सेल रिसर्च और मॉलिक्यूलर एंड मेटाबोलिज्म इंटरनेशनल जर्नल में स्थान मिला है।   

 

 

प्रो. आरके शर्मा बेस्ट डीएम स्टूडेंट एवार्ड- डा. रूद्रपन चटर्जी

एसएलई मरीजों में वैक्सीनेशन से काफी फायदा

 

सिस्टमिक ल्यूपस एथ्रोमेटस( एसएलई) एक आटो इम्यून डिजीज है । इसमें शरीर के कई अंग प्रभावित हो जाते है। इनमें कई तरह के संक्रमण की आशंका रहती जिसके कारण कई तरह की परेशानी होती है। बार-बार भर्ती होना पड़ता है। कई बार स्थिति गंभीर हो जाती है। देखा कि इनमें यदि बीमारी का पता लगते ही न्यूमोकोकल वैक्सीन दिया जाए तो ब्रेन और फेफड़े से संक्रमण की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है। हमने 1350 मरीजों का पहले चरण में शोध किया दूसरे चरण में अभी तक 40 मरीजों पर किया है। संस्थान का क्लीनिक इम्यूनोलॉजी विभाग इन बीमारियों के इलाज के लिए देश का बेस्ट सेंटर है। इस शोध को विश्व स्तर रखने की तैयारी है। इसके अलावा एग्जाम में  अधिक अंक, एवार्ड भी मिला है जिसके आधार पर यह सम्मान मिला है।

 

 

प्रो.एसएस अग्रवाल एक्सीलेंस इन रिसर्च एवार्ड- डा. पारिजात राम त्रिपाठी

 

कार्टीसोन का स्तर बढ़ा कर संभव होगा लिवर डिजीज की गंभीरता कम करना

 

लिवर सिरोसिस या गंभीर लीवर की दूसरी बीमारियों से ग्रस्त बच्चों 50 फीसदी से अधिक बच्चों में एड्रिन ग्रंथि की कार्य प्रणाली प्रभावित हो जाती है जिसके कारण इन बच्चों में बार-बार संक्रमण, भर्ती होने के साथ ही जीवन पर खतरा रहता है। एड्रिनल ग्रंथि कार्टीसोल सहित अन्य हार्मोन का स्राव करता है जो बीमारी से लड़ने में मदद करता है। संक्रमण को रोकता है। इस शोध के बाद आगे ऐसी दवा के खोज का रास्ता मिलेगा जो इन बच्चों के एड्रिनल ग्रंथि को प्रभावित होने से बचा सके। ऐसा संभव होने पर इन बच्चों की जिंदगी लंबी होने के साथ ही संक्रमण से बचाव संभव होगा। डा. पारिजात पूर्वांचल के पहले पीडियाट्रिक गैस्ट्रोइंटेरोलाजिस्ट है। बताया कि इस शोध को विश्व स्तरीय अमेरिकन मेडिकल जर्नल ने स्वीकार भी किया । 


बेस्ट एमसीएच स्टूडेंट एवार्ड डा. तंबोली जैन इकबाल

बिना सर्जरी संभव है मांसपेशियों को मजबूत करना

 

बोटॉक्स थेरेपी के जरिए हाइपर एक्टिव ब्लैडर की परेशानी दूर किया जा सकता है। हमने देखा कि पेशाब की रुकावट के मरीजों में एमआरआई, ईएमजी परीक्षण किया तो पता चला कि मूत्राशय की मांसपेशियां कमजोर हो गई है। मांसपेशियों में फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया धीमा हो जाता है जिसके कारण पेशाब में रुकावट की परेशानी हो रही है। इन मामलों में हमने बोटॉक्स इंजेक्ट किया तो देखा कि मांसपेशियों में ताकत आ गई। बिना सर्जरी के इलाज संभव हो पाया।


उत्कृष्ट शोध वैज्ञानिकों पीजीआई के पहले के आठ को दोबारा मिला स्थान - प्रो. आरके धीमान ,प्रो यूसी घोषाल और प्रो. नरायन प्रसाद को दोबोरा मिला स्थान

 उत्कृष्ट शोध वैज्ञानिकों की सूची में  पीजीआई  के पहले के आठ को दोबारा मिला स्थान प्रो. दुर्गा से मिला स्थान




प्रो. आरके धीमान ,प्रो यूसी घोषाल और प्रो. नरायन प्रसाद को दोबोरा मिला स्थान

स्टैनफोर्ड की सूची में संस्थान के सूची चार नए  चिकित्सीय शोध वैज्ञानिक शामिल

 


चिकित्सा के साथ-साथ शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए संजय गांधी पीजीआई  के 13 शिक्षकों ने कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की ओर से जारी दुनिया के शीर्ष 2 फ़ीसदी वैज्ञानिकों की सूची में स्थान हासिल किया है।  विश्व के शीर्ष दो फीसदी वैज्ञानिकों में भारत के कुल 3352 शोधकर्ता है।  स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी हर साल विश्व के 2 फीसदी शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची जारी करती है।  इसमें हर क्षेत्र के शोधकर्ताओं को शामिल किया गया है। पिछले वर्ष की सूची में शामिल सेवानिवृत्त प्रो. राकेश गुप्ता, प्रो. सरिता अग्रवाल, प्रो. गौरव अग्रवाल और डा. आलोक को जगह नहीं मिला है। इस साल की सूची में नए शोध विज्ञानी क्लीनिकल इम्यूलोजाजी के  प्रो. दुर्गा प्रसन्ना मिश्रा,सीसीएम डा. मोहन , बायोस्टेटिक्स विभाग  डा. प्रभाकर मिश्रा और नेफ्रोलॉजी विभाग से  सेवानिवृत्त डा. राम देवी शामिल की गई है।

  

इन चिकित्सकों ने बढ़ाया संस्थान का गौरव :

संजय गांधी पीजीआई के निदेशक और हेप्टोलॉजी  विभाग के अध्यक्ष डॉ  राधा कृष्ण धीमान, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो. उदय चंद्र घोषाल, नेफ्रोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो.  नारायण प्रसाद, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के प्रोफेसर और वर्तमान में जिपमर पुडुचेरी के डायरेक्टर प्रो. राकेश अग्रवाल, पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो.उज्जवल पोद्दार,   एंडोक्रिनोलॉजी के  डॉ  रोहित सिन्हा,  न्यूरोलॉजी की प्रो. जयंती कालिता,  न्यूरोलॉजी के सेवानिवृत्त प्रो. यूके मिश्रा, गैस्ट्रो सर्जरी  के सेवानिवृत्त प्रो. विनय कपूर पिछले वर्ष की सूची में शामिल थे।   पीजीआई के 13 शिक्षकों के नाम आने पर संस्थान के निदेशक प्रोफेसर राधा के धीमन ने खुशी जाहिर करते हुए चयनित शिक्षकों के साथ-साथ संस्थान को भी बधाई दी है. प्रोफेसर धीमान जो खुद ही इन दो प्रतिशत में शामिल है।

स्तन में कोई गांठ तो ना करें नजरअंदाज

 



वॉक-ए-थॉन का आयोजन

स्तन में कोई गांठ तो ना करें नजरअंदाज



स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता बढ़ाने 
 के लिए वॉक ए थान का आयोजन किया गया।
 शुरुआती पहचान और स्तन कैंसर से जुड़े लक्षण और जागरूकता  किया गया बताया गया कि स्तन की किसी भी गांठ को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए। इस वर्ष के स्तन कैंसर जागरूकता माह के  वॉक-ए-थॉन का आयोजन किया, जहाँ 250 से अधिक  पंजीकरण हुए, जबकि 200 लोगों ने वॉक में भाग लिया था। इन प्रतिभागियों में छात्र, कर्मचारी, फैकल्टी और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य शामिल थे। वॉक का संचालन संस्थान के  निदेशक प्रोफेसर आरके धीमन और चिकित्सा अधीक्षक  प्रोफेसर गौरव अग्रवाल ने किया।  प्रतिभागियों ने गुलाबी टी-शर्ट/टोपी के साथ हाथों में तख्तियां लेकर स्तन स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने और स्तन कैंसर के शुरुआती निदान के लिए स्क्रीनिंग के महत्व को प्रदर्शित कर रहे थे। , जो अब वैश्विक स्तर पर महिलाओं में सबसे अधिक निदान किया जाने वाला कैंसर है।  प्रो आर के धीमन ने जागरूकता अभियान पर जोर दिया और युवाओं और कर्मचारियों की भागीदारी की सराहना की। चिकित्सा अधीक्षक प्रो गौरव अग्रवाल ने स्तन स्वास्थ्य कार्यक्रम  टीम के सदस्यों का अभिनंदन किया।  पीजीआई और केजीएमयू के कर्मचारियों के बीच एक क्रिकेट मैच भी आयोजित किया। 

सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

हेड एंड नेक कैंसर के मरीजों में 20 फीसदी होता है इलाज के आलावा खर्च - पेलेटिव केयर आयुष्मान भारत पैकेज में हुआ शामिल

  

 


 

पीजीआई की शोध रिपोर्ट 

हेड एंड नेक कैंसर के मरीजों में 20 फीसदी होता है इलाज के आलावा खर्च

 

 पेलेटिव केयर आयुष्मान भारत पैकेज में हुआ शामिल

 

पीजीआई ने खर्च पर शोध कर भेजा था प्रस्ताव

 

कुमार संजय। लखनऊ

 

इलाज में खर्च में जितना खर्च होता उसका 20 फीसदी खर्च मरीज के रहने. खाने,किराए में खर्च होता है ।  तीमारदार का खर्च इसमें शामिल नही हैं।  इस तथ्य का खुलासा संजय गांधी  स्नातकोत्तर आर्युविज्ञान संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग ने हेड एंड नेक कैंसर के पैलेटिव केयर पर रहने वाले मरीजों पर शोध के बाद किया है। लाइलाज कैंसर के मरीज जिंदगी बिना दर्द के बीत सके, इसके लिए पैलेटिव केयर दिया जाता है। इसमें  नर्सिगं, सर्जिकल, मेडिकल, मोटीवेशनल केयर दिया जाता है। इन मरीजों पर खर्च का अकलन करने के लिए विभाग ने शोध किया जिससे आष्युमान कार्ड धारक मरीजों को पैलेटिव केयर के लिए भी सहायता मिल सके। इलाज के आलावा अन्य खर्च को भी शामिल पैकेज में किया जाए। शोध के निष्कर्ष को विभाग ने आयुष्मान मंत्रालय को भेजा,  जिसके बाद हाल में आयुष्मान से मिलने वाले इलाज के पैकेज में पैलेटिव केयर को भी शामिल किया गया। मुख्य शोध कर्ता एवं विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश हर्ष वर्धन ने शोध का खुलासा करते हुए बताया कि हमने हेड एंड नेक कैंसर के पचास मरीजों पर शोध किया देखा कि इनके इलाज में लगभग 2044  रूपया खर्च होता है जबकि 518 रूपया अन्य खर्च होते हैं। अन्य खर्च इलाज के कुल खर्च का 20 फीसदी होता है। आयुष्मान कार्ड धारक की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती ऐसे में अन्य खर्च भी इनके लिए भारी पड़ता है। आशंका रहती है कि  अन्य खर्च के आभाव मे वह इलाज बीच में छोड़ दें। शोध के बाद हम लोगों ने अन्य खर्च को भी पैकेज में शामिल करने की सिफारिश किया है।

 

 

 

इन्होंने किया शोध

 

अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रो. राजेश हर्षवर्धन, डा. तन्वी अरोड़ा. डा. सौरभ सिंह एवं रेडियोथेरिपे विभाग से  प्रो. पुनीता लाल ने  कास्ट एनालसिस आन टोटल कास्ट इंक्युरर्ड पाकेट एक्सपेंनडीचर एंड शोसल कास्ट ड्यूरिंग पैलेटिव केयर इन केस आफ हेड एंड नेक कैंसर एट गवर्नमेंट रीजनल कैंसर सेंटर इन नार्थ इंडिया विषय पर शोध किया जिसे इंडियन जर्नल आफ पैलेटिव केयर ने स्वीकार किया। इस शोध पत्र को हाल में भुवनेश्वर में सेफ एंड सस्टेबिल हास्पिटल विषय़ पर आयोजित नेशनल सेमीनार में दूसरा पुरस्कार मिला।

 

 

 

कैंसर का हर तीसरा हेड एंड नेक 

 

 भारत में सिर और गर्दन के कैंसर का अधिक बोझ है हर तीसरे  पुरुष हैं। सिर का बहुमत 60से 80 फीसदी है। भारत में, कैंसर के सभी मामलों में से एक तिहाई सिर और गर्दन का कैंसर है जो विकसित दुनिया में 4-5 फीसदी की तुलना में अधिक है। कैंसर के उपचार के लिए बहुविषयक( मल्टी स्पेशिएल्टी) की आवश्यकता होती है।

लिवर भी नार्मल हुआ और सुमन ने दिया स्वस्थ शिशु को जन्म - हाई रिस्क प्रेगनेंसी मैनेज कर भरा मां का आंचल

 


लिवर भी नार्मल हुआ और सुमन ने दिया स्वस्थ शिशु को जन्म

हाई रिस्क प्रेगनेंसी  मैनेज कर भरा मां का आंचल

  गर्भस्थ शिशु में एक ही किडनी से परेशान,  तभी महिला का  बढ़ गया  लिवर एंजाइम

गर्भस्थ शिशु एक ही किडनी काम लायक तो भी पा सकते है लंबी और अच्छी जिंदगी

 

कुमार संजय। लखनऊ

संत कबीर नगर के कोल्हूगाड़ा ग्राम की रहने वाली  30 वर्षीय सुमन ने गर्भ धारण किया । खुशी का माहौल था।  परीक्षण के लिए डॉक्टर के पास गई तो पता चला कि गर्भस्थ शिशु में केवल एक ही किडनी है। कई डॉक्टरों ने कहा कि इस संतान को जन्म नहीं देना चाहिए। राजधानी के एक डाक्टर ने परीक्षण के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान भेज दिया। मैटरनल एंड रीप्रोडक्टिव विभाग की प्रमुख प्रो.मंदाकिनी प्रधान, प्रो.नीता सिंह , प्रो.संगीता  लगातार पांच महीने तक गर्भस्थ शिशु पर नजर रखा। हर महीने विशेष अल्ट्रासाउंड परीक्षण( टीफा) कर किडनी पर नजर रखा। देखा एक किडनी ठीक है । खराब किडनी से  शिशु के विकास या अन्य किसी तरह की परेशानी नहीं है। इस शिशु को जन्म दिया जा सकता है।  एक किडनी के साथ भी शिशु लंबी और अच्छी जिंदगी पाते हैं।

खडी हो गई दूसरी परेशानी

इस दौरान सुमन में लिवर प्रोफाइल के मार्कर( बाइल एसिड) बढ़ गया। डॉक्टरों ने सलाह दिया कि बच्चे को एबार्ड कर तुरंत लिवर का इलाज कराएं।  लिवर फेल्योर हो सकता है। गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डा. आकाश माथुर के पास गए तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा कुछ महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान होता है । एसआरएच में सलाह लें।   प्रो. मंदाकिनी के पास पहुंची तो उन्होंने इस परेशानी की पुष्टि के बाद भर्ती कर लिया। लिवर प्रोफाइल को नियंत्रित करने के साथ कहा कि जब लगेगा इसकी वजह से शिशु और मां पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तब कोई निर्णय लूंगी। सुमन लगातार 1.5 महीने भर्ती रही जिसके बाद सुमन ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया।

 

 

पीडियाट्रिक सर्जरी में शिशु का चलेगा फालोअप

शिशु के एक ही किडनी है स्वस्थ है इस लिए पीडियाट्रिक सर्जरी में लगातार फालोअप चलेगा। सर्जरी विभाग प्रो. विजय उपाध्याय का कहना है कि कार्यहीन किडनी से स्वास्थ्य किडनी या शिशु के स्वास्थ्य पर कोई कुप्रभाव पड़ेगा तो खराब किडनी को निकलने की जरूरत पड़ सकती है।  

 

वर्जन

से हाई रिस्क प्रिगनेंशी का केस था। तमाम लोगों को एक ही किडनी होती जिसका उन्हें पता ही नहीं होता। एक किडनी वाले शिशु को एबार्ड करने की सलाह देते है  यदि एक किडनी काम रही है तो ऐसे शिशु को जन्म दिया जा सकता है। लंबी और अच्छी जिंदगी पाते है। अब तक 30 से अधिक ऐसे शिशु को जंम दिला चुकी हूं । यह अब 8 से 12 साल आयु के हो गए है।  ....प्रो.मंदाकिनी प्रधान प्रमुख एसआरएच विभाग एसजीपीजीआई 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

अब ट्यूमर पर कौन सी टारगेट थेरेपी होगी कारगर पहले लगेगा पता

 




अब  ट्यूमर पर कौन सी टारगेट थेरेपी होगी कारगर पहले लगेगा पता   

कैंसर विहीन पिट्यूरी ग्लैंड का ट्यूमर बार-बार करता है परेशान


अब पिट्यूटरी ग्लैंड के ट्यूमर से बार-बार सामना नहीं करना पड़ेगा। हिस्टोपैथोलाजिस्ट ट्यूमर की जांच कर पहले ही बता देंगे कि कौन सी टारगेट थिरेपी किस मरीज पर कारगर होगी। संजय गांधी स्नातकोत्तर आर्यविज्ञान संस्थान के हिस्टोपैथोलाजिस्ट सुपर सब स्पेशिएल्टी विभाग द्वारा डायगनोस्टिक अपडेट ऐंड मालीक्यूलर एडवांस इन इंडोक्राइन आर्गन विषय़ पर आयोजित सेमीनार में चंडीगढ़ पीजीआई के पैथोजाली विभाग के प्रमुख प्रो. बिशन रडोत्रा ने बताया कि ब्रेन ट्यूमर का ट्यूमर का 10 फीसदी ट्यूमर पिट्यूटरी ग्लैंड का होता है। इसमें केवल एक से दो फीसदी ही कैंसर युक्त ट्यूमर होते है। बिना कैंसर वाले ट्यूमर के निकालने के बाद भी बार-बार ट्यूमर बढ़ता रहता है जिसके कारण कारण मरीज को ऑपरेशन कराना पड़ता है। कैंसर विहीन ट्यूमर बार-बार न हो इसके लिए टारगेट थिरेपी दी जाती है जो मोनोक्लोनल एंटी बाडी होती है। यह थेरेपी किसमें कितनी कारगर होगी यह जानने के लिए हम लोगों ने ट्यूमर में ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर देख कर बता देते है कि कौन की दवा कारगर होगी। ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर देखने के इम्यूनो हिस्टोकमेस्ट्री तकनीक ही इस्तेमाल की जाती है। इसमें सेल के रिसेप्टर को देखते है।

20 फीसदी लोगों में दोबारा नहीं हुआ ट्यूमर

 

प्रो. रडोत्रा ने बताया कि हम लोगों ने इस तकनीक से पहले से दवा के प्रभाव का पता लगा कर न्यूरो सर्जन को बताया तो देखा कि 20 से 25 फीसदी लोगों में दोबारा ट्यूमर नहीं हुआ । 30 से 50 फीसदी में दोबारा ट्यूमर होने का समय बढ़ गया।  

 

 

अब मॉलिक्यूलर जांच से छिपे थायराइड कैंसर का लगेगा पता

 

संजय गांधी पीजीआई के हिस्टो पैथोलाजिस्ट प्रो. मनोज जैन ने बताया कि फाइन निडिल एस्पिरेशन तकनीक से थायराइड कैंसर का पता लगाते है लेकिन देखा गया है कि 30 से 40 फीसदी मामले में ऐसे कैंसर का पता नहीं लग पाता है। मॉलिक्यूलर परीक्षण के जरिए ऐसे छिपे कैंसर का भी पता लगना संभव हो गया है। हम लोग ग्रंथि से डीएनए अलग कर उसका पीसीआर तकनीक से जीन देखते है। अलग -अलग कैंसर में अलग जगह पर  जीन में म्यूटेशन होता है जिसे देख कर कैंसर के प्रकार और कैंसर का पता लगाते हैं।

इंसुलिन प्रतिरोध ग्रस्त महिला भी अब बन सकती है मां -इंसुलिन प्रतिरोध नहीं भरने दे रहा है गोद

 


 जागरण विशेष

इंसुलिन प्रतिरोध ग्रस्त महिला भी अब बन सकती है मां  

 

 -इंसुलिन प्रतिरोध नहीं भरने दे रहा है गोद

 

-20.5 फीसदी इंसुलिन प्रतिरोध के कारण नहीं कर पा रही है गर्भधारण

-    क्लोमिफेन साइट्रेट साबित हो रहा है मददगार

 

कुमार संजय। लखनऊ

हर महिला मां बनना चाहती है । मां न बन पाने की पीछे 20.5 फीसदी  इंसुलिन प्रतिरोध कारण साबित हो रहा है। इनके मां बनने में खास रसायन क्लोमिफेन साइट्रेट मदद कर सकता है। इन महिलाओं ओव्यूलेशन इंडक्शन की प्रक्रिया में मोनोफोलिकुलर( एक फालीक्यूल)  की आशंका रहती है। इन महिलाओं में सामान्य महिलाओं की  तुलना में गर्भ धारण करने की संभावना कम होती है। इंसुलिन प्रतिरोध का सीधा संबंध मोटापे से है। विशेषज्ञों ने देखा है कि इन महिलाओं में क्लोमिफेन साइट्रेट के जरिए फालीक्यूल की संख्या बढ़ाने के बाद इंट्रा यूट्राइन इंसीमेशन तकनीक से  गर्भधारण कराने पर  सफलता मिल सकती है। यह  रसायन खास हार्मोन की मात्रा में वृद्धि करता है जो परिपक्व अंडे (ओव्यूलेशन) के विकास और रिलीज में मदद करता है।  इस नुस्खे से   6 फीसदी महिलाएं गर्भधारण करने में सफल रही है।

 विशेषज्ञों ने 120 उन महिलाओं पर शोध किया जो चार साल से मां बनने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थी लेकिन एक बार भी गर्भवती नहीं हो पायी। शोध में देखा गया इनमें 20.5 फीसदी में इंसुलिन प्रतिरोध की समस्या थी।

 

क्या है इंसुलिन प्रतिरोध

 

हाइपरिन्सुलिनमिया इंसुलिन प्रतिरोध के कारण होता है। इसमें रक्त में इंसुलिन की मात्रा बढ़ जाती है।  एक ऐसी स्थिति जिसमें  शरीर इंसुलिन के प्रभावों के लिए अच्छी तरह से प्रतिक्रिया नहीं करता है। अग्न्याशय अधिक इंसुलिन बनाकर क्षतिपूर्ति करने की कोशिश करता है। यह तब होता है जब पैंक्रियाज रक्त शर्करा को सामान्य रखने के लिए  बड़ी मात्रा में इंसुलिन को स्रावित करके क्षतिपूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है।

 

क्या है फालीक्यूल

 

हर महीने एक न एक ओवरी में से एक एग रिलीज होता है, जो कि फैलोपियन ट्यूब में मौजूद स्‍पर्म के साथ मिलकर फर्टिलाइज हो जाता है और महिला गर्भधारण कर लेती है। एग का साइज बहुत छोटा होता  है। पानी से भरी जिस थैली में एग होता है, उस थैली को फॉलिकल कहा जाता है।  हर महीने पीरियड के बाद छोटे-छोटे फॉलिकल बनने शुरू हो जाते हैं लेकिन कुछ समय के बाद एक या दो ही फॉलिकल ऐसे होते हैं जिनका साइज बढ़ जाता है उन्हें डोमिनेंट फॉलिकल कहा जाता है।

 

इन्होंने किया शोध

 

किंग जार्ज मेडिकल विवि के प्रसूती एवं स्त्री रोग विभाग की डा. रुचि कर्नाटक, डा. अंजू अग्रवाल, डा.  मोना आसनानी, डा.  रेनू सिंह ने द इफेक्ट आफ इंसुलिन रजिसटेंस आन ओव्ल्यूशन इंडक्शन विथ क्लोमीफेन साइट्रेस इन नान पीसीओसी वोमेन विषय़ पर शोध किया जिसे इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल क्यूरस ने स्वीकार किया है।  

 वर्जन

 इंसुलिन प्रतिरोध मोटापे, पीसीओएस और टाइप 2

 मधुमेह से जुड़ा हुआ है। प्रतिरोध 

ओव्यूलेशन की विफलता  और अंडों की

 

देरी से परिपक्वता का कारण बनता है जिससे 

बांझपन 

होता है

 

। इंसुलिन प्रतिरोध के कारण लगभग 40-50 प्रतिशत 


महिलाएं गर्भ धारण में असमर्थ होती हैं

 

 

 

प्रो इंदु लता साहू एम आर एच विभाग संजय गांधी

 पीजीआई


बुधवार, 14 सितंबर 2022

पीजीआई में हुई देश की पहली खाने की नली में कैंसर की विशेष तकनीक से सर्जरी

 


पीजीआई में हुई देश की पहली खाने की नली में कैंसर की  विशेष तकनीक से सर्जरी

दो बार जिंदगी पर मंडराया खतरा लेकिन मौत मुंह से खीच लाए पीजीआई विशेषज्ञों के हाथ


नई खाने की नली में निष्क्रिय रहने वाली रक्त वाहिका से सुनिश्चित किया रक्त प्रवाह  

पैक्रिएटाइटिस के सर्जरी के 10 साल बाद खाने की नली में हुआ कैंसर  

सर्जरी का दिया नाम थोरेको लेप्रोस्कोपिक मैकियान प्रोसीजर विथ अनयूजुअल आर्टरी  


 

तीस वर्षीय शाहजहांपुर निवासी  वर्षीय साजिद का पैंक्रियाज ने पहले धोखा दिया । बडी सर्जरी हुई जिंदगी बची। दस साल बाद खाने का कौर निगलना मुश्किल हो गया। भाग कर संजय गांधी पीजीआई आए तो पता चला कि खाने की नली में कैंसर हो गया है। लगा कि अब तो जिंदगी का अंत हो गया लेकिन संस्थान के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों देश में पहली बार खास तकनीक का इस्तेमाल कर  एक बार फिर सर्जरी करने का फैसला लिया। सर्जरी सफल रही है । इस सर्जरी को थोरेको लेप्रोस्कोपिक मैकियान प्रोसीजर विथ अनयूजुअल आर्टरी  नाम दिया है। इस तरह की सर्जरी फिलहाल देश में रिपोर्ट नहीं है। इस सर्जरी को विशेषज्ञ जर्नल के जरिए दुनिया के सामने रखेंगे। साजिद खाना खाने लगे है। विशेषज्ञों ने बताया कि यह जटिल सर्जरी थी क्योंकि पहले क्रॉनिक पैंक्रिएटाइटिस के इलाज के लिए इनकी सर्जरी की गयी जिसमें पैंक्रियाज की  नली को छोटी आंत से जोडा गया। इस दौरान आमाशय को रक्त देने वाली  नली को निष्क्रिय कर दिया गया था। अब दूसरी सर्जरी  खाने की नली में कैंसर का इलाज बड़ी चुनौती थी । सबसे पहले हम लोगों ने कीमोथेरेपी के जरिए खाने में नली में स्थिति गांठ को छोटा किया। खाने की नली को हटाया। नई खाने की नली को बनाने के लिए आमाशय को खींच कर नली के रूप में बनाया। नई नली को गले में जोडा।

 

 

 

निष्क्रिय आर्टरी के जरिए नई खाने की नली को मिला रक्त

 

सबसे बड़ी समस्या थी कि नई बनी खाने की नली में रक्त प्रवाह कैसे सुनिश्चित किया जाए क्योंकि बिना रक्त प्रवाह के नली काम नहीं करेंगी।देखा कि आमाशय में एक नली होती है जो निष्क्रिय रहती है इसे राइट गैस्ट्रिक आर्टरी कहते है बहुत पतली होती है। इससे रक्त प्रवाह की स्थिति जानने के लिए डाई डाल कर ट्रेस किया गया। देखा गया कि रक्त प्रवाह हो रहा है। इस आर्टरी से रक्त प्रवाह सुनिश्चित नई खाने में नली में किया गया।

 

इन्होने किया सर्जरी

मुख्य सर्जन प्रो. अशोक कुमार( द्वितीय) , सहायक प्रो.  नलिनीकांत , डा. रवींद्र, डा. साई कृष्णा, मुख्य एनेस्थीसिया विशेषज्ञ प्रो. संजय क्यूबा , डा. प्रज्ञा, डा. प्रतिभा, नर्सिंग आफीसर सुशीला, स्वीटी, नित्या, संतोष और अनिता