सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

हेड एंड नेक कैंसर के मरीजों में 20 फीसदी होता है इलाज के आलावा खर्च - पेलेटिव केयर आयुष्मान भारत पैकेज में हुआ शामिल

  

 


 

पीजीआई की शोध रिपोर्ट 

हेड एंड नेक कैंसर के मरीजों में 20 फीसदी होता है इलाज के आलावा खर्च

 

 पेलेटिव केयर आयुष्मान भारत पैकेज में हुआ शामिल

 

पीजीआई ने खर्च पर शोध कर भेजा था प्रस्ताव

 

कुमार संजय। लखनऊ

 

इलाज में खर्च में जितना खर्च होता उसका 20 फीसदी खर्च मरीज के रहने. खाने,किराए में खर्च होता है ।  तीमारदार का खर्च इसमें शामिल नही हैं।  इस तथ्य का खुलासा संजय गांधी  स्नातकोत्तर आर्युविज्ञान संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग ने हेड एंड नेक कैंसर के पैलेटिव केयर पर रहने वाले मरीजों पर शोध के बाद किया है। लाइलाज कैंसर के मरीज जिंदगी बिना दर्द के बीत सके, इसके लिए पैलेटिव केयर दिया जाता है। इसमें  नर्सिगं, सर्जिकल, मेडिकल, मोटीवेशनल केयर दिया जाता है। इन मरीजों पर खर्च का अकलन करने के लिए विभाग ने शोध किया जिससे आष्युमान कार्ड धारक मरीजों को पैलेटिव केयर के लिए भी सहायता मिल सके। इलाज के आलावा अन्य खर्च को भी शामिल पैकेज में किया जाए। शोध के निष्कर्ष को विभाग ने आयुष्मान मंत्रालय को भेजा,  जिसके बाद हाल में आयुष्मान से मिलने वाले इलाज के पैकेज में पैलेटिव केयर को भी शामिल किया गया। मुख्य शोध कर्ता एवं विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश हर्ष वर्धन ने शोध का खुलासा करते हुए बताया कि हमने हेड एंड नेक कैंसर के पचास मरीजों पर शोध किया देखा कि इनके इलाज में लगभग 2044  रूपया खर्च होता है जबकि 518 रूपया अन्य खर्च होते हैं। अन्य खर्च इलाज के कुल खर्च का 20 फीसदी होता है। आयुष्मान कार्ड धारक की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती ऐसे में अन्य खर्च भी इनके लिए भारी पड़ता है। आशंका रहती है कि  अन्य खर्च के आभाव मे वह इलाज बीच में छोड़ दें। शोध के बाद हम लोगों ने अन्य खर्च को भी पैकेज में शामिल करने की सिफारिश किया है।

 

 

 

इन्होंने किया शोध

 

अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रो. राजेश हर्षवर्धन, डा. तन्वी अरोड़ा. डा. सौरभ सिंह एवं रेडियोथेरिपे विभाग से  प्रो. पुनीता लाल ने  कास्ट एनालसिस आन टोटल कास्ट इंक्युरर्ड पाकेट एक्सपेंनडीचर एंड शोसल कास्ट ड्यूरिंग पैलेटिव केयर इन केस आफ हेड एंड नेक कैंसर एट गवर्नमेंट रीजनल कैंसर सेंटर इन नार्थ इंडिया विषय पर शोध किया जिसे इंडियन जर्नल आफ पैलेटिव केयर ने स्वीकार किया। इस शोध पत्र को हाल में भुवनेश्वर में सेफ एंड सस्टेबिल हास्पिटल विषय़ पर आयोजित नेशनल सेमीनार में दूसरा पुरस्कार मिला।

 

 

 

कैंसर का हर तीसरा हेड एंड नेक 

 

 भारत में सिर और गर्दन के कैंसर का अधिक बोझ है हर तीसरे  पुरुष हैं। सिर का बहुमत 60से 80 फीसदी है। भारत में, कैंसर के सभी मामलों में से एक तिहाई सिर और गर्दन का कैंसर है जो विकसित दुनिया में 4-5 फीसदी की तुलना में अधिक है। कैंसर के उपचार के लिए बहुविषयक( मल्टी स्पेशिएल्टी) की आवश्यकता होती है।

लिवर भी नार्मल हुआ और सुमन ने दिया स्वस्थ शिशु को जन्म - हाई रिस्क प्रेगनेंसी मैनेज कर भरा मां का आंचल

 


लिवर भी नार्मल हुआ और सुमन ने दिया स्वस्थ शिशु को जन्म

हाई रिस्क प्रेगनेंसी  मैनेज कर भरा मां का आंचल

  गर्भस्थ शिशु में एक ही किडनी से परेशान,  तभी महिला का  बढ़ गया  लिवर एंजाइम

गर्भस्थ शिशु एक ही किडनी काम लायक तो भी पा सकते है लंबी और अच्छी जिंदगी

 

कुमार संजय। लखनऊ

संत कबीर नगर के कोल्हूगाड़ा ग्राम की रहने वाली  30 वर्षीय सुमन ने गर्भ धारण किया । खुशी का माहौल था।  परीक्षण के लिए डॉक्टर के पास गई तो पता चला कि गर्भस्थ शिशु में केवल एक ही किडनी है। कई डॉक्टरों ने कहा कि इस संतान को जन्म नहीं देना चाहिए। राजधानी के एक डाक्टर ने परीक्षण के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान भेज दिया। मैटरनल एंड रीप्रोडक्टिव विभाग की प्रमुख प्रो.मंदाकिनी प्रधान, प्रो.नीता सिंह , प्रो.संगीता  लगातार पांच महीने तक गर्भस्थ शिशु पर नजर रखा। हर महीने विशेष अल्ट्रासाउंड परीक्षण( टीफा) कर किडनी पर नजर रखा। देखा एक किडनी ठीक है । खराब किडनी से  शिशु के विकास या अन्य किसी तरह की परेशानी नहीं है। इस शिशु को जन्म दिया जा सकता है।  एक किडनी के साथ भी शिशु लंबी और अच्छी जिंदगी पाते हैं।

खडी हो गई दूसरी परेशानी

इस दौरान सुमन में लिवर प्रोफाइल के मार्कर( बाइल एसिड) बढ़ गया। डॉक्टरों ने सलाह दिया कि बच्चे को एबार्ड कर तुरंत लिवर का इलाज कराएं।  लिवर फेल्योर हो सकता है। गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डा. आकाश माथुर के पास गए तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा कुछ महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान होता है । एसआरएच में सलाह लें।   प्रो. मंदाकिनी के पास पहुंची तो उन्होंने इस परेशानी की पुष्टि के बाद भर्ती कर लिया। लिवर प्रोफाइल को नियंत्रित करने के साथ कहा कि जब लगेगा इसकी वजह से शिशु और मां पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तब कोई निर्णय लूंगी। सुमन लगातार 1.5 महीने भर्ती रही जिसके बाद सुमन ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया।

 

 

पीडियाट्रिक सर्जरी में शिशु का चलेगा फालोअप

शिशु के एक ही किडनी है स्वस्थ है इस लिए पीडियाट्रिक सर्जरी में लगातार फालोअप चलेगा। सर्जरी विभाग प्रो. विजय उपाध्याय का कहना है कि कार्यहीन किडनी से स्वास्थ्य किडनी या शिशु के स्वास्थ्य पर कोई कुप्रभाव पड़ेगा तो खराब किडनी को निकलने की जरूरत पड़ सकती है।  

 

वर्जन

से हाई रिस्क प्रिगनेंशी का केस था। तमाम लोगों को एक ही किडनी होती जिसका उन्हें पता ही नहीं होता। एक किडनी वाले शिशु को एबार्ड करने की सलाह देते है  यदि एक किडनी काम रही है तो ऐसे शिशु को जन्म दिया जा सकता है। लंबी और अच्छी जिंदगी पाते है। अब तक 30 से अधिक ऐसे शिशु को जंम दिला चुकी हूं । यह अब 8 से 12 साल आयु के हो गए है।  ....प्रो.मंदाकिनी प्रधान प्रमुख एसआरएच विभाग एसजीपीजीआई 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

अब ट्यूमर पर कौन सी टारगेट थेरेपी होगी कारगर पहले लगेगा पता

 




अब  ट्यूमर पर कौन सी टारगेट थेरेपी होगी कारगर पहले लगेगा पता   

कैंसर विहीन पिट्यूरी ग्लैंड का ट्यूमर बार-बार करता है परेशान


अब पिट्यूटरी ग्लैंड के ट्यूमर से बार-बार सामना नहीं करना पड़ेगा। हिस्टोपैथोलाजिस्ट ट्यूमर की जांच कर पहले ही बता देंगे कि कौन सी टारगेट थिरेपी किस मरीज पर कारगर होगी। संजय गांधी स्नातकोत्तर आर्यविज्ञान संस्थान के हिस्टोपैथोलाजिस्ट सुपर सब स्पेशिएल्टी विभाग द्वारा डायगनोस्टिक अपडेट ऐंड मालीक्यूलर एडवांस इन इंडोक्राइन आर्गन विषय़ पर आयोजित सेमीनार में चंडीगढ़ पीजीआई के पैथोजाली विभाग के प्रमुख प्रो. बिशन रडोत्रा ने बताया कि ब्रेन ट्यूमर का ट्यूमर का 10 फीसदी ट्यूमर पिट्यूटरी ग्लैंड का होता है। इसमें केवल एक से दो फीसदी ही कैंसर युक्त ट्यूमर होते है। बिना कैंसर वाले ट्यूमर के निकालने के बाद भी बार-बार ट्यूमर बढ़ता रहता है जिसके कारण कारण मरीज को ऑपरेशन कराना पड़ता है। कैंसर विहीन ट्यूमर बार-बार न हो इसके लिए टारगेट थिरेपी दी जाती है जो मोनोक्लोनल एंटी बाडी होती है। यह थेरेपी किसमें कितनी कारगर होगी यह जानने के लिए हम लोगों ने ट्यूमर में ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर देख कर बता देते है कि कौन की दवा कारगर होगी। ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर देखने के इम्यूनो हिस्टोकमेस्ट्री तकनीक ही इस्तेमाल की जाती है। इसमें सेल के रिसेप्टर को देखते है।

20 फीसदी लोगों में दोबारा नहीं हुआ ट्यूमर

 

प्रो. रडोत्रा ने बताया कि हम लोगों ने इस तकनीक से पहले से दवा के प्रभाव का पता लगा कर न्यूरो सर्जन को बताया तो देखा कि 20 से 25 फीसदी लोगों में दोबारा ट्यूमर नहीं हुआ । 30 से 50 फीसदी में दोबारा ट्यूमर होने का समय बढ़ गया।  

 

 

अब मॉलिक्यूलर जांच से छिपे थायराइड कैंसर का लगेगा पता

 

संजय गांधी पीजीआई के हिस्टो पैथोलाजिस्ट प्रो. मनोज जैन ने बताया कि फाइन निडिल एस्पिरेशन तकनीक से थायराइड कैंसर का पता लगाते है लेकिन देखा गया है कि 30 से 40 फीसदी मामले में ऐसे कैंसर का पता नहीं लग पाता है। मॉलिक्यूलर परीक्षण के जरिए ऐसे छिपे कैंसर का भी पता लगना संभव हो गया है। हम लोग ग्रंथि से डीएनए अलग कर उसका पीसीआर तकनीक से जीन देखते है। अलग -अलग कैंसर में अलग जगह पर  जीन में म्यूटेशन होता है जिसे देख कर कैंसर के प्रकार और कैंसर का पता लगाते हैं।

इंसुलिन प्रतिरोध ग्रस्त महिला भी अब बन सकती है मां -इंसुलिन प्रतिरोध नहीं भरने दे रहा है गोद

 


 जागरण विशेष

इंसुलिन प्रतिरोध ग्रस्त महिला भी अब बन सकती है मां  

 

 -इंसुलिन प्रतिरोध नहीं भरने दे रहा है गोद

 

-20.5 फीसदी इंसुलिन प्रतिरोध के कारण नहीं कर पा रही है गर्भधारण

-    क्लोमिफेन साइट्रेट साबित हो रहा है मददगार

 

कुमार संजय। लखनऊ

हर महिला मां बनना चाहती है । मां न बन पाने की पीछे 20.5 फीसदी  इंसुलिन प्रतिरोध कारण साबित हो रहा है। इनके मां बनने में खास रसायन क्लोमिफेन साइट्रेट मदद कर सकता है। इन महिलाओं ओव्यूलेशन इंडक्शन की प्रक्रिया में मोनोफोलिकुलर( एक फालीक्यूल)  की आशंका रहती है। इन महिलाओं में सामान्य महिलाओं की  तुलना में गर्भ धारण करने की संभावना कम होती है। इंसुलिन प्रतिरोध का सीधा संबंध मोटापे से है। विशेषज्ञों ने देखा है कि इन महिलाओं में क्लोमिफेन साइट्रेट के जरिए फालीक्यूल की संख्या बढ़ाने के बाद इंट्रा यूट्राइन इंसीमेशन तकनीक से  गर्भधारण कराने पर  सफलता मिल सकती है। यह  रसायन खास हार्मोन की मात्रा में वृद्धि करता है जो परिपक्व अंडे (ओव्यूलेशन) के विकास और रिलीज में मदद करता है।  इस नुस्खे से   6 फीसदी महिलाएं गर्भधारण करने में सफल रही है।

 विशेषज्ञों ने 120 उन महिलाओं पर शोध किया जो चार साल से मां बनने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थी लेकिन एक बार भी गर्भवती नहीं हो पायी। शोध में देखा गया इनमें 20.5 फीसदी में इंसुलिन प्रतिरोध की समस्या थी।

 

क्या है इंसुलिन प्रतिरोध

 

हाइपरिन्सुलिनमिया इंसुलिन प्रतिरोध के कारण होता है। इसमें रक्त में इंसुलिन की मात्रा बढ़ जाती है।  एक ऐसी स्थिति जिसमें  शरीर इंसुलिन के प्रभावों के लिए अच्छी तरह से प्रतिक्रिया नहीं करता है। अग्न्याशय अधिक इंसुलिन बनाकर क्षतिपूर्ति करने की कोशिश करता है। यह तब होता है जब पैंक्रियाज रक्त शर्करा को सामान्य रखने के लिए  बड़ी मात्रा में इंसुलिन को स्रावित करके क्षतिपूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है।

 

क्या है फालीक्यूल

 

हर महीने एक न एक ओवरी में से एक एग रिलीज होता है, जो कि फैलोपियन ट्यूब में मौजूद स्‍पर्म के साथ मिलकर फर्टिलाइज हो जाता है और महिला गर्भधारण कर लेती है। एग का साइज बहुत छोटा होता  है। पानी से भरी जिस थैली में एग होता है, उस थैली को फॉलिकल कहा जाता है।  हर महीने पीरियड के बाद छोटे-छोटे फॉलिकल बनने शुरू हो जाते हैं लेकिन कुछ समय के बाद एक या दो ही फॉलिकल ऐसे होते हैं जिनका साइज बढ़ जाता है उन्हें डोमिनेंट फॉलिकल कहा जाता है।

 

इन्होंने किया शोध

 

किंग जार्ज मेडिकल विवि के प्रसूती एवं स्त्री रोग विभाग की डा. रुचि कर्नाटक, डा. अंजू अग्रवाल, डा.  मोना आसनानी, डा.  रेनू सिंह ने द इफेक्ट आफ इंसुलिन रजिसटेंस आन ओव्ल्यूशन इंडक्शन विथ क्लोमीफेन साइट्रेस इन नान पीसीओसी वोमेन विषय़ पर शोध किया जिसे इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल क्यूरस ने स्वीकार किया है।  

 वर्जन

 इंसुलिन प्रतिरोध मोटापे, पीसीओएस और टाइप 2

 मधुमेह से जुड़ा हुआ है। प्रतिरोध 

ओव्यूलेशन की विफलता  और अंडों की

 

देरी से परिपक्वता का कारण बनता है जिससे 

बांझपन 

होता है

 

। इंसुलिन प्रतिरोध के कारण लगभग 40-50 प्रतिशत 


महिलाएं गर्भ धारण में असमर्थ होती हैं

 

 

 

प्रो इंदु लता साहू एम आर एच विभाग संजय गांधी

 पीजीआई


बुधवार, 14 सितंबर 2022

पीजीआई में हुई देश की पहली खाने की नली में कैंसर की विशेष तकनीक से सर्जरी

 


पीजीआई में हुई देश की पहली खाने की नली में कैंसर की  विशेष तकनीक से सर्जरी

दो बार जिंदगी पर मंडराया खतरा लेकिन मौत मुंह से खीच लाए पीजीआई विशेषज्ञों के हाथ


नई खाने की नली में निष्क्रिय रहने वाली रक्त वाहिका से सुनिश्चित किया रक्त प्रवाह  

पैक्रिएटाइटिस के सर्जरी के 10 साल बाद खाने की नली में हुआ कैंसर  

सर्जरी का दिया नाम थोरेको लेप्रोस्कोपिक मैकियान प्रोसीजर विथ अनयूजुअल आर्टरी  


 

तीस वर्षीय शाहजहांपुर निवासी  वर्षीय साजिद का पैंक्रियाज ने पहले धोखा दिया । बडी सर्जरी हुई जिंदगी बची। दस साल बाद खाने का कौर निगलना मुश्किल हो गया। भाग कर संजय गांधी पीजीआई आए तो पता चला कि खाने की नली में कैंसर हो गया है। लगा कि अब तो जिंदगी का अंत हो गया लेकिन संस्थान के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों देश में पहली बार खास तकनीक का इस्तेमाल कर  एक बार फिर सर्जरी करने का फैसला लिया। सर्जरी सफल रही है । इस सर्जरी को थोरेको लेप्रोस्कोपिक मैकियान प्रोसीजर विथ अनयूजुअल आर्टरी  नाम दिया है। इस तरह की सर्जरी फिलहाल देश में रिपोर्ट नहीं है। इस सर्जरी को विशेषज्ञ जर्नल के जरिए दुनिया के सामने रखेंगे। साजिद खाना खाने लगे है। विशेषज्ञों ने बताया कि यह जटिल सर्जरी थी क्योंकि पहले क्रॉनिक पैंक्रिएटाइटिस के इलाज के लिए इनकी सर्जरी की गयी जिसमें पैंक्रियाज की  नली को छोटी आंत से जोडा गया। इस दौरान आमाशय को रक्त देने वाली  नली को निष्क्रिय कर दिया गया था। अब दूसरी सर्जरी  खाने की नली में कैंसर का इलाज बड़ी चुनौती थी । सबसे पहले हम लोगों ने कीमोथेरेपी के जरिए खाने में नली में स्थिति गांठ को छोटा किया। खाने की नली को हटाया। नई खाने की नली को बनाने के लिए आमाशय को खींच कर नली के रूप में बनाया। नई नली को गले में जोडा।

 

 

 

निष्क्रिय आर्टरी के जरिए नई खाने की नली को मिला रक्त

 

सबसे बड़ी समस्या थी कि नई बनी खाने की नली में रक्त प्रवाह कैसे सुनिश्चित किया जाए क्योंकि बिना रक्त प्रवाह के नली काम नहीं करेंगी।देखा कि आमाशय में एक नली होती है जो निष्क्रिय रहती है इसे राइट गैस्ट्रिक आर्टरी कहते है बहुत पतली होती है। इससे रक्त प्रवाह की स्थिति जानने के लिए डाई डाल कर ट्रेस किया गया। देखा गया कि रक्त प्रवाह हो रहा है। इस आर्टरी से रक्त प्रवाह सुनिश्चित नई खाने में नली में किया गया।

 

इन्होने किया सर्जरी

मुख्य सर्जन प्रो. अशोक कुमार( द्वितीय) , सहायक प्रो.  नलिनीकांत , डा. रवींद्र, डा. साई कृष्णा, मुख्य एनेस्थीसिया विशेषज्ञ प्रो. संजय क्यूबा , डा. प्रज्ञा, डा. प्रतिभा, नर्सिंग आफीसर सुशीला, स्वीटी, नित्या, संतोष और अनिता

सोमवार, 29 अगस्त 2022

सांस की नली फंसी गोली निकाल कर बचायी जिंदगी - नहीं करनी पड़ी ओपेन सर्जरी मुंह से निकल गई गोली

 


 

 

सांस की नली फंसी गोली निकाल कर बचायी जिंदगी

नहीं करनी पड़ी ओपेन सर्जरी मुंह से निकल गई गोली

सांस की नली को किया रिपेयर

रिजिड ब्रोन्कोस्कोपी के जरिए संभव हुई यह प्रक्रिया

 

   


 20 वर्षीय युवक को  गोली लगने के कारण संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में गंभीर अवस्था में लाया गया। परीक्षण के बाद पता लगा कि गोली सांस की नली में ट्रेकिया में फंसी थी जिसके कारण सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी। गोली पीठ के निचले हिस्से से निकल कर छाती में जा लगी थी और वायुमार्ग ( ट्रेकिया) को भेद कर उसमे फंस गई थी।  इससे आसपास के क्षेत्र में हवा का रिसाव होने लगा जिससे मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ के मुताबिक ट्रामा सेंटर में

  ट्रामा सर्जरी विभाग के डाक्टर अमित कुमार सिंह की देखरेख में भर्ती किया गया। हमारे विभाग के डा. अजमल सहित अन्य ने  प्रारंभिक ब्रोन्कोस्कोपिक मूल्यांकन के बाद, मरीज की सामान्य एनेस्थेसिया के अंतर्गत मुंह के माध्यम से रिजिड  ब्रोन्कोस्कोपी की गयी और फोरसेप का उपयोग करके गोली को निकाल दिया गया । इसके बाद, वायुमार्ग की दीवार में लगभग 2 सेमी  को कवर करने के लिए एक सिलिकॉन स्टेंट लगाया गया। स्थिति में सुधार होने लगा जिसके बाद सचेत स्थिति में आईसीयू में स्थानांतरित कर दिया गया । इस प्रक्रिया द्वारा बिना किसी सर्जिकल चीरे के छाती से गोली निकालने के लिए एक प्रमुख शल्य प्रक्रिया को टाला जा सका। मरीज अभी ट्रामा सेंटर के आईसीयू में स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहा है।इस प्रक्रिया में  एनेस्थेसिया विभाग की डाक्टर रुचि वर्मा व रेडियोलाजी विभाग के डाक्टर जफर नियाज का विशेष योगदान रहा।

रविवार, 28 अगस्त 2022

एक्यूट पैक्रिएटाइिटस का मिला दुश्मन : पित्ताशय स्टोन और शराब पैंक्रियाज का दुश्मन

 


एक्यूट पैक्रिएटाइिटस का मिला दुश्मन

पित्ताशय स्टोन और शराब पैंक्रियाज का दुश्मन

मोटापा भी बढ़ा रहा है खतरा

पहली बार हुई इस बीमारी के कारण और रिस्क फैक्टर पर शोध




एक्यूट पैक्रिएटाइटस के कारण का पता लगाने में विशेषज्ञों ने कामयाबी हासिल की है। इस परेशानी से ग्रस्त 120 लोगों पर शोध के बाद देखा गया कि मोटापा, अधिक संख्या( हेमेटोक्रिट) में लाल रक्त कणिकाएं और सी रिएक्टिव प्रोटीन का बढ़ा स्तर परेशानी की आशंका को बढ़ाता है। अल्कोहल और पित्ताशय में स्टोन इस परेशानी का सबसे बड़ा कारण सामने आया है। इस परेशानी से बचने के लिए पित्ताशय स्टोन का सही समय पर इलाज कराना चाहिए। शराब के सेवन नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही रिस्क फैक्टर में मोटापे पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। यह परेशानी 14 से 60 आयु वर्ग के बीच किसी को हो सकती है। सबसे अधिक 41 से 60 आयु वर्ग के बीच देखी गयी है। 50 फीसदी लोगों में सीवियर एक्यूट पेनक्रिएटाइटिस  परेशानी होती है। सही समय पर सही मैनेजमेंट न होने पर मल्टी ऑर्गन फेल्योर की स्थिति आ सकती है। इस शोध को विश्व स्तर पर स्वीकार करते हुए एनल आफ अफ्रीकन मेडिसिन जर्नल ने स्वीकार किया है। इस परेशानी में पेट में तेज दर्द, उल्टी, मचली की परेशानी होती है। पुरुषों में यह परेशानी महिलाओं से अधिक देखी गयी है।

इन्होंने ने किया शोध

किंग जार्ज मेडिकल विवि के मेडिसिन विभाग के डा.एमएल पटेल, डा. वीरेंद्र आतम, डा. हरीश भारती, जियाट्रिक मेडिसिन के डा. राधेश्याम, गायनोकोलॉजी से डा.रेखा सचान और रेडियोलॉजी विभाग के डा. अनित परिहार में यह शोध किया ।


किसमें कितना

पुरुष- 73.73 फीसदी

महिला- 26.66 फीसदी

कारण

अल्कोहल- 70.8 फीसदी

पित्ताशय में पथरी-20.8 फीसदी

अज्ञात कारण- 4.1 फीसदी

रिस्क फैक्टर

बॉडी मास इंडेक्स- 25 से अधिक

हेमाटोक्रिट- 44 फीसदी से अधिक

सी रिएक्टिव प्रोटीन- 150 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक


किस उम्र में परेशानी

14 से 40- 31.66 फीसदी

41 से 60- 51.66

60 से अधिक- 16.66

 

क्या है एक्यूट पैक्रिएटाइटस

एक्यूट पेनक्रिएटाइटिस  (तीव्र अग्नाशयशोथ) एक ऐसी स्थिति है जहां अग्न्याशय( पैंक्रियाज) में  थोड़े समय के लिए सूजन हो जाता है । अग्न्याशय (पैंक्रियाज) पेट के पीछे स्थित एक छोटा अंग है, जो पाचन में मदद करता है। तीव्र अग्नाशयशोथ वाले अधिकांश लोग लगभग एक सप्ताह के भीतर  बेहतर महसूस करने लगते हैं। इस दौरान दर्द निवारक दवाएं दी जाती है। कई बार पैंक्रियाज से निकलने वाली डक्ट में रुकावट होती है जिसे दूर दिया जाता है। पेनक्रिएटाइटिस की स्थिति में एमाइलेज और लाइपेज एंजाइम  का स्तर रक्त में बढ़ जाता है।   कुछ भी खाने या पीने से दर्द बढ़ जाता है।

सोमवार, 22 अगस्त 2022

निकला त्वचा और टेंडन  सही कर दिया पंजा

 निकला त्वचा और टेंडन  सही कर दिया पंजा





सांप ने काटा बना घाव और बंद हो गई उंगली की गति

 

25 वर्षीय सुमिता को सांप ने काट लिया । एंटी स्नेक इंजेक्शन लगने के बाद उसकी जान तो बच गयी लेकिन कलाई के निचले हिस्से में घाव हो गया तो बढ़ता ही जा रहा था। तमाम इलाज के बाद भी घाव ठीक नहीं हो रहा था। इसके साथ ही ऊंगलिया भी चलनी बंद हो गयी। घर वाले इनको लेकर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के प्लास्टिक सर्जरी विभाग में लेकर आए तो विभाग के प्रमुख प्रो. राजीव अग्रवाल ने देखा तो पतला चला  कि सांप के जहर से घाव के साथ ऊंगलियों को गति देने वाले टेंडन भी क्षति ग्रस्त हो गए है। त्वचा के ठीक नीचे टेंडन होता हैत्वचा के ठीक नीचे टेंडन होता है। त्वचा के क्षति ग्रस्त होने पर टेंडन की आशंका काफी हद तक रहती है। विशेष ड्रेसिंग से पहले घाव को ठीक किया। रेडियल आर्टरी फोर आर्म फ्लैप के जरिए टेंडन को ठीक किया। प्रो. राजीव के मुताबिक पहले सूखे टेंडन को निकाल फिर फोर आर्म( कलाई और कुहनी के बीच ) से त्वचा और टेंडन लेकर धाव के वाले हिस्से में रोपित किया। अब उंगलियां मुडने लगी है। घाव पूरी तरह ठीक हो गया है। प्रो. राजीव ने बताया कि 5 अगस्त 2022 को एक 25 साल कि युवती जिसको सांप ने काटा हुआ था ओ0पी0डी0 में दिखाने आयी थी


यह बिहार के एक छोटे से गाँव मीनापूर, जिला - मुजफ्फरपूर कि रहने वाली है। इसने बताया 24 जुलाई 2022 कि रात को जब वह सो रही थी, तब सांप ने दायें हाथ पर डस लिया। डसने के तुरंत बाद हाथ मे  अत्यधिक दर्द,सूजन और जलन हो गयी। आस-पास के त्वचा के रंग मे  भी बदलाव आ गया, और साथ हीं साथ बुखार,उल्टी,सिर दर्द एवं कंपकपी लगने लगी। उसके बाद उसके मुहं से झाग निकलने लगा और वो बेहोश हो गयी। घर पर उसका प्राथमिक इलाज जो भी उपलब्ध था उसे किया गया एवं घर के लोग  ने हाथ के उपर के हिस्से पर कस के कपड़ा बांध दिया। पी0एस0सी0 से उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां पर एन्टीवेनम दिया गया । एन्टीवेनम देने के बाद होश आ गया। इसके कुछ दिनों के बाद रोगी सर्पदंश से ठीक हो गयी, लेकिन उसके हाथ का घाव बढता गया। उंगलिया चलनी बंद हो गयी थी। निश्चेतना विशेषज्ञ प्रो. संजय कुमार और प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डा. भूपेश ने विशेष योगदान रहा।    

सांप काटे तो क्या करें क्या न करें

- तुरंत डॉक्टर को फोन करें एवं अस्पताल ले जाने कि तैयारी करें।

-. रोगी को जमीन पर आराम की अवस्था में  लेटा दें।

- सांप काटने के घाव को पानी एवं साबुन से धोयें।

- अंगुठी,घडी़,चूड़ी इत्यादी पहने हो तो उसे निकाल दें।

- कटे वाले भाग को स्थिर रखे  एवं ज्यादा चलायें नही, और

एक खपची बांध दें।

-. टूनिकेट(रक्त बंद ना लगाएं) - डसे हुए हिस्से के आगे या ऊपर कोई

कपड़ा या रस्सी ना बांध ।

- सर्पदंश के घाव को चाकू से ना काटें।

- सर्पदंश के घाव को मुंह से ना चूसें

-. सर्पदंश के रोगी को दर्द निवारक दवा भी ना दें।

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

विशेष एंजियोप्लास्टी तकनीक से पीजीआई ने दिल को किया दुरूस्त -ओसीटी और इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग के जरिए मुख्य धमनी की दूर की गई रुकावट

 विशेष एंजियोप्लास्टी तकनीक से पीजीआई ने दिल को किया दुरूस्त  

 


ओसीटी और इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग के जरिए मुख्य धमनी की दूर की गई रुकावट

 



एक 60 वर्षीय पुरुष के मुख्य धमनी में दो जगह रुकावट को दूर करने में कामयाबी संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञों ने हासिल की है। इस जटिल कोरोनरी इंटरवेंशन तकनीक का सजीव प्रसारण भी कार्डियोलॉजी इंडिया साउथ एशिया के अधिवेशन में किया गया। इसका आयोजन हैदराबाद में किया गया हो रहा था। 60 वर्षीय पुरुष मुख्य कोरोनरी धमनी के लेफ्ट एंटीरियर डिसेंडिंग और सीएक्स आर्टरीज में  में ब्लॉकेज थी। इस रुकावट को दूर करने में विभाग के प्रमुख  प्रो.  आदित्य कपूर, प्रो सत्येंद्र तिवारी, प्रो सुदीप कुमार, प्रो. रूपाली खन्ना प्रो.  अंकित साहू शामिल थे। विशेषज्ञों ने बताया कि  नवीनतम कोरोनरी इमेजिंग का मार्गदर्शन लेते हुए एक कोरोनरी एंजियोप्लास्टी की गई। इस केस में  इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग और ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी का उपयोग किया गया।

इन इमेजिंग तकनीक  उपयोग से कोरोनरी एनाटॉमी, प्लाक संरचना और कोरोनरी वैस्कुलर को चित्रित करने में मदद मिलती है जो साधारण कोरोनरी एंजियोग्राफी द्वारा नहीं देखे जाते हैं।प्रो सत्येंद्र तिवारी ने बताया कि इस मरीज में रणनीति तय हो जाने के बाद पहले सीएक्स आर्टरी  में स्टेंट डालकर ठीक किया गया। इसके बाद मुख्य धमनी यानी लेफ्ट मेंन  कोरोनरी धमनी में स्टेंट डाले गए।

 

कैसा स्टंट होगा कारगर पहले लगता है पता

 

 प्रो सुदीप कुमार ने बताया कि प्लानिंग  ऐसे मामलों में सफलता की कुंजी है क्योकि अक्सर ऐसे मामले  में कोरोनरी धमनियों में कई वायर और बैलून डालने पड़ते है । डॉ रूपाली खन्ना ने कहा कि इन स्थितियों में आईवीयूएस या ओसीटी का उपयोग करके इमेजिंग न केवल आवश्यक है,  अपितु स्टेंट आकार को समझने के लिए अनिवार्य भी है।

 

नई इमेजिंग तकनीक से मिलती सफलता का लगता है पता

 प्रो. अंकित साहू ने बताया कि इमेजिंग  से पता चलता है कि  क्या स्टेंट अच्छी तरह से लगाया गया और कोरोनरी धमनी की दीवार पर पर सही से फूल गया की नहीं। ओसीटी द्वारा एक अंतिम इमेजिंग विश्लेषण किया गया था ताकि स्टेंट के सारे डायमेंशन और मेजरमेंट लिए जा सकते हैं। 

 

रविवार, 31 जुलाई 2022

हाइड्रोसेफलस का आधुनिक तकनीक से हुआ पहली बार पीजीआई में इलाज-पहली बार हाइड्रोसेफलस ग्रस्त में लगा प्रोग्राम्ड शंट

 




नया शंट नियंत्रित रखेगा दिमाग में पानी

हाइड्रोसेफलस का आधुनिक तकनीक से हुआ पहली बार पीजीआई में इलाज

अब दोबारा बिना सर्जरी नियंत्रित किया जाएगा दिमाग में पानी

पहली बार  हाइड्रोसेफलस ग्रस्त में लगा प्रोग्राम्ड शंट

 


 

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के न्यूरो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों ने पहली बार   हाइड्रोसेफलस  से ग्रस्त मरीज में प्रोग्राम्ड शंट रोपित किया है। 55 वर्षीय प्रमोद में यह शंट लगाया गया है। इस शंट की खासियत है कि दिमाग पानी की मात्रा नियंत्रित करने के लिए दोबारा ओपेन सर्जरी नहीं करनी पड़ेगी । इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स के जरिए बाहर से पानी की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकेगा। शंट रोपित करने वाले न्यूरो सर्जन प्रो. वेद प्रकाश, प्रो. अरुण श्रीवास्तव एवं विभाग के प्रमुख प्रो. राजकुमार ने बताया कि संस्थान में इस तरह का शंट पहली बार रोपित किया गया। मरीज के हालत में काफी सुधार है। विशेषज्ञों ने बताया कि दिमाग में 24 घंटे में 600 मिलीलीटर पानी बनता है लेकिन दिमाग में केवल 120 से 125 मिलीलीटर ही रहता है बाकी पानी खून के जरिए निकल जाता है। कई बार पानी की अतिरिक्त मात्रा दिमाग से नहीं निकल पाता है जिसके कारण कई तरह की परेशानी होती है। इस परेशानी को दूर करने के लिए दिमाग में शंट लगाया जाता है तो अतिरिक्त पानी को पेट में निकाल देता है। सामान्य शंट( छाबड़ा शंट) जो अब तक लगते रहे है इसमें पानी की मात्रा अधिक या कम हो सकती है दिमाग में । इस परेशानी को दूर करने के लिए दोबारा सर्जरी की जरूरत पड़ती है । प्रोग्राम्ड शंट में पानी की मात्रा को प्रोग्राम डिवाइस के जरिए शंट के चेंबर को एडजस्ट किया जाता है जिससे पानी की मात्रा जरूरत के अनुसार दिमाग में रखा जाता है। यह मरीज पार्किंसंस की आशंका के साथ न्यूरोलॉजी में आए थे लेकिन बीमारी दूसरी निकली।

 

  

 

 क्या होता है शंट

 

शंट एक ट्यूब बहुत ही पतला ट्यूब होता है जिसे दिमाग के निलय से पेट में जोडा जाता है। इससे दिमाग का अतिरिक्त पानी( सीएसएफ) पेट में निकल जाता है।

 

 

 

क्या है हाइड्रोसेफलस

 

 हाइड्रोसेफलस में  दिमाग के  वेंट्रिकल्स (गुहाओं) में तरल पदार्थ के तय मात्रा से अधिक बनना होता है। अत्यधिक तरल पदार्थ गुहाओं के आकार को बढ़ाता है और मस्तिष्क पर अत्यधिक दबाव डालता है। सेरेब्रोस्पाइनल तरल पदार्थ के रूप में जाना जाने वाला द्रव रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में बहता है। अत्यधिक सेरेब्रोस्पाइनल तरल पदार्थ का दबाव मस्तिष्क के ऊतकों को नष्ट करता है और मस्तिष्क में गंभीर हानि का कारण बनता है।

 

 

 

नार्मल प्रेशर हाइड्रोसेफलस में यह होती है परेशानी

 

-   याददाश्त में कमी होती है जो बढ़ती जाती है

 

-   पेशाब और मल पर नियंत्रण खत्म का कम हो जाता है

 

-   चलने की गति कम हो जाती है, पैर में भारीपन आ जाता है

 

शनिवार, 16 जुलाई 2022

हिंदू मुस्लिम भाई भाई जीन में मिली समानता

 हिंदू मुस्लिम भाई -भाई 

प्रदेश के मुसलमानों की जीन हिंदुओं से नहीं है अलग

विश्व के तीन संस्थानों ने २४ सौ लोगों के जीन स्टडी के बाद किया खुलासा

प्रदेश के हिंदु और मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं। अमूमन सामाजिक सौहार्द के लिए लगाये जाने वाले नारे को विज्ञानियों ने  लखनऊ, बरेली , कानपुर , रामपुर के २४ सौ  मुसलामानों और हिंदुओं पर अनुवांशिकी शोध  के बाद सही साबित किया है। विज्ञानियों ने देखा है कि  प्रदेश के  शिया,  सुन्नी  मुसलमान और हिंदओं के जीन में  कोई अंतर नहीं है।  इतना ही नहीं विज्ञानियों ने  तुलनात्मक अध्ययन भारतीय हिंदुओं, अरब देशों, सेंट्रल एशिया, नार्थ ईस्ट अफ्रीकी देशों के मुसलमानों के जीन के बीच किया तो पाया कि भारतीय मुसलमानों के जीन भारतीय हिंदुओं से पूरी तरह मेल खाते हैं। इनके जीन विदेशी  मुसलमानों से मेल नहीं खाते हैं। कहने का मतलब है कि भारतीय खास तौर पर प्रदेश के मुसलमान की जड़े यहीं है न कि किसी दूसरे मुल्क से जुड़ी है। इनके जीन में काफी समानता हिंदुओं  से है न कि अरब या किसी दूसरे देश के लोगों से मिलती है। इस तथ्य का खुलासा डिर्पाटमेंट आफ बायोलाजिकल साइंस फ्लोरिडा इंटरनेशनल विवि के डा. एमसी टेरास, डेयान रोवाल्ड , रेने जे हेरेरा, डिपार्टमेंट आफ जेनटिक्स यूनिवर्सटी डि विगो स्पेन के डा. जेवियर आर ल्यूस एवं संजय गांधी पीजीआई के अनुवांशिकी रोग विभाग की प्रो.सुरक्षा अग्रवाल एवं डा. फैजल खान ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के जीन पर लंबे शोध के बाद किया है। इनके शोध को अमेरिकन जर्नल आफ फिजिकल एंथ्रोपालजी ने भी स्वीकार किया।

प्रो. सुरक्षा अग्रवाल के मुताबिक  मुसलमानों के साथ ब्राह्मण, कायस्थ, खत्री, वैश्य, चतुर्वेदी, भार्गव और अनसूचित जाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों के जीन का तुलनात्मक अध्ययन किया तो पाया इन सभी जातियों के जीन आपस में एक होने के साथ ही मुसलमान के जीन से भी मिलते हैं।  hamaresehatkhabar.blogspot.com