मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

लक्षण से लगेगा कितनी है वेंटीलेटर की जरूरत ----आप खुद लगा सकते है कितनी गंभीर है परेशानी

 


कोरोना संक्रमित के लक्षण से लगेगा कितनी है वेंटीलेटर की जरूरत

 

 

 

1653 कोरोना संक्रमित मरीजों पर शोध के आधार मिला यह संकेत

 

 

 

 

 

कुमार संजय़ । लखनऊ

 

 

 

कोरोना संक्रमित किस मरीज को वेंटीलेटर की जरूरत पड़ सकती है इसका अंदाजा अब लक्षण के आधार पर लगना संभव होगा। विशेषज्ञों ने देखा है कि  फ्लू की तरह लक्षण( सिर दर्द, सुंगध में कमी, मांसपेशियों में दर्द, कफ , गले में खरास, सीने में दर्द) की परेशानी लेकिन बुखार नहीं है तो इन संक्रमित मरीजों में वेंटीलेटर की जरूरत काफी कम पड़ती है। इन लक्षणों वाले केवल 1.5 फीसदी  मरीजों वेंटीलेटर या आक्सीजन सपोर्ट की जरूर पड़ती है।  ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के शोध सिम्पटम कल्सटर इन कोविड -19 ए पोटेंशियल क्लीनिकल प्रिडिक्शन ट्यूल फ्रमा द कोविड सिम्पटम स्टडी एप के हवाला देते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि इन लक्षण के आधार पर मरीजों को विशेष एहतियात बरतने की जरूरत है। विज्ञानियों ने कोरोना पीड़ितों को उनके लक्षणों के मुताबिक, अलग-अलग 6 ग्रुप में रखकर शोध किया  लक्षणों के आधार पर बताया इन्हें वेंटिलेटर की कितनी जरूरत पड़ेगी। अगर लक्षणों के आधार पर इस बात को समझ लें तो मरीज की हालत नाजुक होने से रोका जा सकता है। शोध कोरोना संक्रमित 1653 मरीजों पर किया गया है। गंभीर स्तर तीन और पेट , सांस लेने में परेशानी( सिर दर्द, सुगंध और भूख में कमीष कफ, बुखार, गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान , कंफ्यूजन, मांस पेशियों में दर्द, सांस लेने में परेशानी, डायरिया, पेट में दर्द) के मरीजों में सबसे अधिक वेंटीलेटर की जरूरत पड़ी। संजय गांधी पीजीआइ के आईसीयू एक्सपर्ट प्रो. जिया हाशिम और डा. अनिल गंगवार कहते है कि लक्षण पर नजर रखना बहुत जरूरी है यदि लंभीर लेवन थ्री के लक्षण है तो ट्रीट मेंट की विशेष प्लानिंग की जरूरत होती है। 

 

 

यह 6 लक्षण वर्ग के मरीज

 

1.     फ्लू के लक्षण लेकिन बुखार नही( सिर दर्द, सुगंध में कमी, मासपेशियों में दर्द, कफ, गले में खरास, सीने में दर्द )

 

2.     फ्लू के लक्षण और साथ में बुखार( सिर दर्द, सुगंध में कमी, गले में खरास, भूख में कमी)

 

3.     पेट की परेशानी( सिर दर्द, सुगंध में कमी, भूख में कमी, डायरिया, गले में खरास, चेस्ट पेन लेकिन कफ नहीं)

 

4.     गंभीर स्तर एक और थकना( सिर दर्द, सुगंध में कमी, कफ , फीवर,सीने में दर्द, थकान

 

5.     गंभीर स्तर दो और कंफ्यूजन( सिर दर्द, भूख में कमी, सुगंध में कमी, कफ, बुखार,गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान, मासपेशियों में दर्द, कंफ्यूजन

 

6.     गंभीर स्तर तीन और पेट , सांस लेने में परेशानी( सिर दर्द, सुगंध और भूख में कमीष कफ, बुखार, गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान , कंफ्यूजन, मांस पेशियों में दर्द, सांस लेने में परेशानी, डायरिया, पेट में दर्द)

 

 

 

 

 

 

 

ग्रुप 1 : इस ग्रुप में रहे मरीजों में अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट से जुड़े लक्षण दिखे। जैसे लगातार खांसी और शरीर का दर्द। इस ग्रुप में से सिर्फ 1.5% मरीजों को ही वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। 16% मरीजों को एक या उससे ज्यादा बार ही अस्पताल जाने की नौबत आई।

 

 

 

ग्रुप 2: यह ग्रुप मरीजों को भी अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट यानी की सांस की नली के ऊपरी हिस्से में तकलीफ थी लेकिन उन्हें बुखार आता था और खानापान भी सामान्य नहीं था। ऐसे 4.4% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरुरत पड़ी थी और 17.5% लोगों को अस्पताल जाना पड़ा था।

 

ग्रुप 3: इस ग्रुप में मरीजों को अन्य लक्षणों के साथ साथ डायरिया जैसी गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी की पेट की बीमारी देखी गई थी। ऐसे 3.7% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरुरत लगी थी और 24% मरीजों को कम से कम एक बार अस्पताल इलाज के लिए जाना पड़ा था।

 

ग्रुप 4: अधिक थकावट, सीने में लगातार दर्द और खांसी जैसे लक्षण मरीजों में दिखे थे। 8.6% मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी जबकि 23.6% लोगों को एक या उससे ज्यादा बार अस्पताल जाना पड़ा।

 

ग्रुप 5: इस ग्रुप में घबराहट, अधिक थकावट और खाना खाने की इच्छा न करने जैसे लक्षण थे। इस ग्रुप के 9.9% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। 24.6% मरीजों को अस्पताल जाना पड़ा।

 

ग्रुप 6: सांस चढ़ना, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, थकावट और पेट की बीमारी जैसे लक्षण इस ग्रुप के मरीजों में देखे गए। इस ग्रुप के लगभग 20% मरीजों को आर्टिफिशियल ब्रीदिंग सपोर्ट लेने की जरूरत पड़ी जब की 45.5% लोगों को अस्पताल इलाज के लिए जाना पड़ा

 

 

 

 

 

पहले पांच दिन रखनी है नजर

 

पहले पांच दिन में दिखते लक्षणों और उम्र पर नजर रखी जाए तो बताया जा सकता है कि मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ेगी या नहीं।

मानसिक रोग की दवा करेगी करोना का काट - कोशिका के अंदर वायरस नहीं बढा पाता है अपनी संख्या

 


मानसिक रोग की दवा करेगी करोना का काट

 

कोशिका के अंदर वायरस नहीं बढा पाता है अपनी संख्या

 

कुमार संजय। लखनऊ

 

एक तरह का मानसिक रोग बायपोलर डिसआर्डर के इलाज के लिए दी जाने वाली दवा एब्सेलीन अब कोरोना संक्रमित मरीजों को राहत दिलाएगी। इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो गया है। साइंस एडवांस मेडिकल जर्नल ने इस दवा के बारे में शोध रिपोर्ट में बताया है कि विज्ञानियों ने  अत्याधुनिक कंप्यूटर सिमुलेशन का इस्तेमाल किया तो उन्हें पता चला कि एब्सेलेन दवा कोरोनावायरस को मेजबान कोशिकाओं( होस्ट सेल) को बढ़ने से रोकने में कारगर है।  कोरोनावायरस के मुख्य प्रोटीन एमप्रो की जांच सबसे पहले की गई। शोधकर्ताओं की इस जांच में पता चला एमप्रो कोरोनावायरस के जेनेटिक मैटीरियल से प्रोटीन बनाने की क्षमता को सुविधाजनक बनाता है। इस तरह से कोरोनावायरस मेजबान सेल में अपनी प्रतिकृति(कापी) का निर्माण करता है। यह दवा सेल में वायरस के संख्या (कापी ) बढने से रोकता है।

 

शोध वैज्ञानिकों ने एसपीआई-1005 ट्रीटमेंट इन माडरेट कोविड-19 पेशेंट के नाम से क्लीनिकल ट्रायल फाइल किया है जिसे स्वीकार किया गया है।  देखा कि  एब्सेलीन  दवा एमप्रो के खिलाफ अपना असर प्रभावी तरीके से दिखा रही है। एब्सेलेन दवा  में कई गुण मौजूद होते हैं जैसे एंटीवायरल, जीवाणुनाशक, एंटीऑक्सीडेटिव, एंटी-इंफ्लेमेटरी, सेल-सुरक्षात्मक गुण आदि। संजय गांधी पीजीआई के कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे है प्रो.ज्ञान चंद कहते है कि इस दवा के आने से इलाज का एक विकल्प और मौजूद होगा जिससे मरीजों को काफी राहत मिलेगी।

 

इंसानों पर भी पॉजिटिव असर दिखा

 

एब्सेलेन दवा का इस्तेमाल कई बीमारियों को ठीक करने के लिए किया जाता है। खासकर, बायपोलर डिसऑर्डर एवं सुनाई न देने पर इसे मरीजों को दिया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस दवा पर कई क्लिनिकल ट्रायल किए गए हैं, जिससे साबित हुआ है कि इंसानों में इसका इस्तेमाल करना सुरक्षित है।

 

 

 

इन दवाओं से हो रहा है कोरोना का इलाज

 

फिलहाल, गंभीर रूप से कोविड-19 संक्रमित मरीजों का इलाज  रेमडेसिवीर दवा से किया जा रहा है। इस दवा का इस्तेमाल इबोला के मरीजों पर किया जाता है, जो एक एंटीवायरल दवा है। हालांकि, यह दवा इबोला के मरीजों पर कारगर साबित नहीं हुई थी, लेकिन कोरोना मरीज़ों पर इसके पॉजिटिव रिजल्ट ही सामने आए हैं।  ब्लड प्लाज्मा, डेक्सामेथासोन दवा से भी कोरोना के मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

प्रो. सुनील प्रधान डाक्टर आफ साइंस से हुए सम्मानित

 





प्रो. सुनील प्रधान डाक्टर आफ साइंस से हुए सम्मानित

 

न्यूरोलाजी के क्षेत्र में कार्य के लिए मिली उपाधि

  

 

लकवामिग्रीदिमाग की टीबीपार्किंसनब्रेन स्ट्रोक के सटीक इलाज के साथ कई नई तकनीक स्थापित करने वाले पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख व पद्मश्री डॉ. सुनील प्रधान हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विवि ने डाक्टर आफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया है। इससे रानी दुर्गावती विवि जबलपुर ने ने भी इस उपाधि से सम्मानित किया था। यह उपाधि प्रो. प्रधान को उनके विशेष शोध और सेवा के लिए दिया गया है। प्रो. प्रधान ने मांस पेशियों की बीमारी के इलाज के लिए तकनीक इजाद की। जिसे प्रधान साइन के नाम जाना जाता है। इसके अलावा हाल में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के हाथ-पैर में जान डालने का नई तकनीक विकसित की है। इसे करेक्टेड एसिस्सटेड सिंक्रोनाइज्ड पियारोडिक (कैस्प) थेरेपी नाम दिया है। बिजनौर जिले में वर्ष 1957 में जन्मे डॉ. सुनील प्रधान ने केजीएमयू से एमबीबीएसएमडी और डीएम की पढ़ाई की। डॉ. प्रधान ने 1989 में पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग में बतौर ज्वाइन किया। डॉ. प्रधान को वर्ष 2014 में पद्मश्री के अलावा शांति स्वरूप भटनागरआईसीएमआरआरोग्य भारती सम्मान,विज्ञान रत्न व विज्ञान गौरव समेत दो दर्जन से अधिक सम्मान पा चुके हैं। डॉ. प्रधान ने 200 से अधिक शोध पत्र एवं पुस्तकें लिखी हैं

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

पीजीआइ में स्थापित हुई प्रैक्रियाज ट्यूमर की सर्जरी के लिए विपल लेप्रोस्कोपिक तकनीक


 

 

निकाला पैक्रियाज का कैंसर इस दौरान पास स्थित चार अंगों को भी किया दुरुस्त

 

पीजीआइ में स्थापित हुई प्रैक्रियाज ट्यूमर की सर्जरी के लिए विपल लेप्रोस्कोपिक तकनीक

 

 


 

संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के सहायक प्रोफेसर डा. अशोक कुमार द्तीय ने संस्थान में लेप्रोस्कोपिक विपल( पैंक्रीएटोकोड्यूडेनेक्टमी) तकनीक से प्रैक्रियाज कैंसर की सर्जरी की तकनीक स्थापित करने में सफलता हासिल की है। गोपाल गंज बिहार के रहने वाले  64 वर्षीय मुहम्द अली पैक्रियाज में ट्यूमर की परेशानी से ग्रस्त थे जिनमें विपल तकनीक से सर्जरी कर ट्यूमर के निकाला गया। डा. अशोक कुमार के मुताबिक 9 अक्टूबर को सर्जरी की गयी । इनकी हालत में तेजी से सुधार हो रहा है। वह चल फिर रहे है। यह सर्जरी फिलहाल ओपेन तकनीक से की जाती है लेकिन हमने विपल लेप्रोस्कोप तकनीक से करने का फैसला लिया जिसके लिए योजना तैयार करने के साथ टीम को तैयार किया। पैक्रियाज का ट्यूमर निकालने के समय उसके आस –पास स्थित छोटी आंत, आमाशय, पित्त की नली के भी भाग को निकलना होता है क्योंकि कैंसर सेल के उसमें होने की आशंका रहती है। इसके बाद सभी अगों को वापस जोड़ना होता है जो काफी जटिल प्रक्रिया है। अंगो को जोडने के बाद जरा सी चूक होने पर अंदर स्राव होने की आशंका रहती है जो पूरी सर्जरी को फेल कर सकता है।   

      डा. अशोक का दावा है कि संस्थान में इस तकनीक से पहली बार सर्जरी की गयी है जिसका फायदा आगे इस तरह के मरीजों को मिलेगा। यह तकनीक देश के गिने चुने संस्थान में ही उपलब्ध है। ओपन विधि से २०-२५ सेंटीमीटर  के चीरे की जरूरत होती हैऔर ऑपरेशन में ९-१० घंटे का समय लगता है। इसके साथ ही जटिलता की आशंका रहती है।

 

कौशल की होती है इस तरह की सर्जरी में जरूरत

   

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में  कौशल की जरूरत होती है। इस सर्जरी में  कम टिश्यू इंजुरी और कम खीच - तान कि वजह से ब्लड लॉस कम होता है।  रिकवरी जल्दी होती है साथ घाव से संबंधित कॉम्प्लिकेशन कम होते हैं और मरीज जल्द डिस्चार्ज हो जाता है।  ऑपरेशन करने से पहले ट्रेनिंग और कई सालों अथक प्रयासों की जरूर होतीऔर शुरूआत में दूसरे कम जटिल ऑपरेशन से शुरुआत करनी होती है।

 

 

   

ई ओपीडी से मिली मंजिल

 ई ओपीडी में फोन किया जिसके बाद लक्षण के आधार पर कुछ जांच लोकल कारने को कहा गया जिसके बाद मरीज को यहां बुलाया गया। पहले होल्डिंग एरिया में भर्ती कर बाकी जांचे करायी गयी जिसके बाद लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट में शिफ्ट कर सर्जरी की प्लानिंग की गयी।    

         

 

इन लोगों की मेहनत से मिला मुकाम

मुख्य ऑपरेटिंग सर्जन एसोसिएट प्रोफेसर  डा. अशोक कुमार द्तीय के साथ उनके सीनियर रेजिडेंट डा निशांतडा सोमनाथडा नलिनीडा किरन के साथ एनस्थीसिया टीम डा. प्रतीकडा. सुरुचि , डा. फरजाना, डा. प्रत्यूष , सिस्टर दीपमाला, सिस्टर प्रियंका सहयोग से यह सफल हो पाया। 

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

विश्व अर्थराइटिस दिवस आज 60 फीसदी जोड़ों में खराबी के साथ आते हैं एसजीपीजीआई


 विश्व अर्थराइटिस दिवस आज

60 फीसदी जोड़ों में खराबी के साथ आते हैं एसजीपीजीआई

90 फीसदी अर्थराइटिस मरीज भटकने के बाद जाते हैं विशेषज्ञ के पास

लखनऊ।  कुमार संजय

रूहमैटायड अर्थराइटिस( गठिया) के परेशानी 90 फीसदी मरीज हड्डी के डाक्टर के पास पहले इलाज के लिए जाते हैं। एक डाक्टर के पास फायदा न होने पर कई डॉक्टरों को  अजमाने के बाद वह किसी रूहमैटोलाजिस्ट के पास जाते हैं। इतने में काफी देर हो चुकी होती है। संजय गांधी पीजीआई में आने वाले 60 फीसदी मरीज  जोड़ो में विकृति के साथ आते हैं। जब जोड़ खराब हो चुका होता है तब ऐसे में जोड़ को दोबारा ठीक करना संभव नहीं रहता है।  यह समझना होगा कि अर्थराइटिस एक आटोइम्यून डिजीज है जिसका सही इलाज क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट या रूहमैटोलाजिस्ट ही कर सकता है। विश्व अर्थराइटिस दिवस (12 अक्टूबर ) के मौके पर विशेषज्ञों पर कहना है कि सही समय पर सही इलाज मिल जाए जोड़ो को काफी हद तक बचाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के प्रो.विकास अग्रवाल और प्रो.दुर्गा प्रसन्ना के मुताबिक अर्थराइटिस कई तरह की होती है लेकिन सबसे अधिक कामन रूहमैटायड अर्थराइटिस और बच्चों में होने वाले जूविनाइल रूहमैटायड अर्थराइटिस है। इस परेशानी से एक दो फीसदी लोग परेशान है। महिलाओं में यह परेशानी पुरूषों के मुकाबले अधिक होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवा के मरीज का मूवमेंट इलाज में अहम रोल अदा करता है। इसी लिए इस साल का थीम है मूव टू इंप्रूव यानि बीमारी को ठीक करने के लिए चलें। इस बीमारी से प्रभावित लोगों को हर सप्ताह 150 मिनट या इससे अधिक मध्यम दर्जे का एरोबिक(हल्का) व्यायाम करना चाहिए। मांस पेशियों को मजबूती देने वाली कसरत सप्ताह में दो बार करनी चाहिए। इलाज के लिए डिजीज माडीफाइड दवाएं दी जाती है।

बीमारी का टोकरा बना देती है अर्थराइटिस

रूहमैटायड अर्थराइटिस से का सही समय पर सही इलाज न मिलने पर इस बीमारी से ग्रस्त 15 से 20 फीसदी लोगों में आंखत्वचादिल फेफड़ाकिडनी,  न्यूरोलाजिकल और लिवर की परेशानी हो सकती है। इसके अलावा एनीमिालिम्फोमा और दूसरे तरह के हिमैटोलाजिकल परेशानी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आटोइम्यू डिजीज है जो शरीर के दूसरे अंगों के खिलाफ एंटीबाडी बना कर डैमज कर सकता है।

क्या है आटोइम्यून डिजीज

शरीर का इम्यून सिस्मटम शरीर के बीमारीबैक्टीरिया व वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए एंटीबाजी बनाता है। इस सिस्टम में खराबी आने पर सिस्टम शरीर के अंगों को दुश्मन मान कर उसके खिलाफ एंटीबाडी बनाने लगता है। जिस अंग के खिलाफ एंटीबाडी बनती है वह अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है।

 

तीन नई दवाएं जगा रही है नई उम्मीद

अर्थराइटिस के इलाज के लिए तीन दवाएं तैयार हो गयी है जो मरीजों को कोफी राहत पहुंचा सकती है। एंटी इंटर ल्यूरीन 6 रिसेप्टर एंटीबाडी, फास्फोडाइज स्ट्रेज 4 इनहैबिटर दवा मिथोट्रिक्सेट दवा के फेल होने पर काम करती है देखा गया है कि 30 से 40 फीसदी मरीजों में मिथोट्रिक्सेट काम नहीं करता है। जैनुस एसोसिएटेड काइनेज इंहैबिटर दाव की मिथोट्रिक्सेट के कारगर न होने पर प्रभावी है।

 

यह परेशानी तो अर्थराइटिस की आशंका

6 सप्ताह से अधिक शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द और सूजन की परेशानी हो तो रूहमैटोलाजिस्ट या क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट से सलाह लेना चाहिए।

शुरुआती दौर में स्तन कैंसर का 100 % इलाज संभव



शुरुआती दौर में स्तन कैंसर का 100 % इलाज संभव

स्तन कैंसर जागरूकता माह 


 यदि किसी भी महिला को स्तन के आकर में परिवर्तन लग रहा है। कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि हो रही। स्तन के आसपास गांठ प्रतीत हो रही है। तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। क्योंकि यह स्तन कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। पीजीआई के ब्रेस्ट और इंडोक्राइन सर्जन प्रो. गौरव अग्रवाल बताते हैं कि यदि स्तन कैंसर का पता शुरुआती दौर में चल जाय तो इसका 100 फीसदी इलाज सभंव है। पीजीआई में स्तन कैंसर जागरूकता माह के तहत आयोजित वेबिनार में रेडियोथेरेपी विभाग के प्रमुख डॉ. पुनीता लाल, डायटीशियन निरुपमा सिंह ने विचार रखे। 


30 फीसदी में स्तन कैंसर 

महिलाओं में हर प्रकार के कैंसर में 30 % स्तन कैंसर होता है। जिनके घर में कोई महिला स्तन कैंसर से पीड़ित है, तो उसके घर की लड़कियों और महिलाओं में इसके होने की अधिक आशंका रहती है। मासिक धर्म का पहले होना, हार्मोनल गर्भनिरोधक दवाएं, एक्सरे, सिटी स्कैन के संपर्क में आने से इसकी आशंका अधिक रहती है।

 पांच तरीक़े से इलाज संभव डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि स्तन कैंसर इलाज के पांच उपाय हैं। इसमें ऑपरेशन, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, हार्मोन थिरेपी और बायोलाजिकल विधि है। 

 बचाव -स्तन कैंसर के प्रति हर उम्र की युवतियों और महिलाओं में जागरूकता -20 साल से ऊपर की युवती औऱ महिलाओं को खुद से स्तन की जांच करें। देखे की स्तन के आकार में बदलाव, गांठ आदि दिखने पर डॉक्टर की परामर्श लें -40 से ऊपर की महिलाओ को साल में डॉक्टर से स्तन की जांच करानी चाहिए।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख .... 1.15 फीसदी लोगों की नजर है कमजोर


 एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख 





1.15 फीसदी लोगों की नजर है कमजोर
80 फीस दी लोगों में दूर की जा सकती है नेत्र की परेशानी

 
कुमार संजय। लखनऊ

 एसी में जो लोग लंबे समय तक रहते है उनकी आंख सूख सकती है। आंख में आंसू कम होने पर काली पुतली सूख जाती है जिससे रोशनी कम हो सकती है। इसे ड्राई आई कहते हैं। एसी में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में ड्राई आई की परेशानी दूसरे लोगों की तुलना में अधिक देखी गयी है। एसी में रहने वाले लोगों को यदि किसी तरह की परेशानी हो रही है तो वह विशेषज्ञ से सलाह लें। कृत्रिम आंसू आने लगा है जिससे आंख का सूखा पन दूर कर किया जा सकता है। विश्व दृष्टि दिवस के मौके पर संजय गांधी पीजीआई के नेत्र रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर विकास कनौजिया के मुताबिक

  प्रदेश में सौ मे से 1.15 लोग की नजर कमजोर है। कारण मोतिया बिंद, ग्लूकोमा, रीफेलेक्शन(नजर कमजोर), काला मोमितया , सर्जिकल कंपलीकेशन है। विशेषज्ञों का कहना है कि 80 फीसदी मामले में अंधपन को दूर किया जा सकता है। बर्शेते उनको सही समय पर सही इलाज मिल जाए। कहते है कि 73 फीसदी ममलों में मोतियाबिंद, 9 फीसदी मामलों में रीफलेक्शन, 8 फीसदी मामलों में ग्लूकोमा, दो फीसदी मामलों में सर्जिकल कंपलीकेशन के कारण रोशनी की परेशानी होती है। 





 एक हजार में से एक बच्चे की नजर कमजोर 

पीजीआई के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर आलोक कुमार के मुताबिक
भारत में एक हजार मे से 0.8 फीसदी बच्चों की नजर कमजोर है। इन्हें साफ दिखायी नहीं देता है। बच्चों को यदि देखने में परेशानी है तो आंख की जांच करानी चाहिए। 


कभी मत डाले आंख में यह दवा 
आंख में लाली आने पर अपने मन से कभी आई ड्राप नहीं डालना चाहिए। प्रो.विकास कनौजिया के मुताबिक आंख में एलर्जी होने पर आंख लाल हो जाती है। जलन होता है देखा गया है कि कई लोग अपने मन से आंख में दवा डाल लेते हैं। आंख में प्रिडलीसिलोन, डेक्सामेथासोन और वेटनसांल युक्त दवा कभी भी बिना डाक्टरी सलाह के लिए नहीं डालना चाहिए। 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

विश्व सेरीब्रल पल्सी जागरूकता दिवसःप्रसव में कभी न चलाएं अपनी मर्जी


 


विश्व सेरीब्रल पल्सी जागरूकता दिवस 



प्रसव में कभी न चलाएं अपनी मर्जी

प्रसव में देरी बढ़ा देती है सेरीब्रल पल्सी की 10 गुना आशंका

पांच सौ जंम लेने वाले में से एक में होती है सीपी की आशंका

कुमार संजय । लखनऊ

 

प्रसव के लिए जैसे ही स्त्री रोग विशेषज्ञ आपरेशन की सलाह देती है तो परिजन तुरंत सोच लेते है कि पैसे के लिए आपरेशन करने को कह रही है हो भी सकता है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। संजय गांधी पीजीआई के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डा. रूचिका टंडन कहती है कि   प्रसव के लिए जब भी स्त्री रोग विशेषज्ञ आपरेशन के लिए कहे तो इसे टालना शिशु के मानसिकशारीरिकबौद्धधिक विकलांगता का कारण हो सकता है। प्रसव में देरी होने पर सेरीब्रल पल्सी होने की आशंका दस गुना तक बढ़ जाती है। जब शिशु जंम लेता है तो वह तुरंत रोता है इससे उसका फेफड़ा फैलता है और शिशु आक्सीजन ग्रहण करता है। रक्त में आक्सीजन मिल कर (अक्सी हीमोग्लोबीन) पूरे शरीर और दिमाग में जाता है। जंम के तुंरत बाद दिमाग में आक्सजीन की कमी से दिमाग में न्यूरान डैमेज हो जाते हैं।  इस परेशानी को सेरीब्रल पल्सी(सीपी) कहते हैं। विश्व सेरीब्रल जागरूकता दिवस ( 6 अक्टूबर) के मौके पर विशेषज्ञों का कहना है कि जंम के समय अक्सीजन के कमी के अलावा शिशु के जंम लेने के बाद निमोनिया, दिमागी संक्रमण के कारण मैनेजाइटिस भी  कारण है। जागरूकता की कमी से विश्व में हर 5 सौ लाइव बर्थ में एक में इस परेशानी की आशंका होती है।

 

दो तरह की होती है सेरीब्रल पल्सी

 फ्लपी इंफेट सिंड्रोम और स्पास्टिक इनफेंट सिंड्रोम दो तरह की सेरीब्रल पल्सी होती है। फ्लपी इंफेट में शरीर की मासपेशियों में कमज़ोरी रहती है जिसके वजह से बच्चा चलनेबोलने सहित कई में लाचार होता है। स्पास्टिक में मांसपेशियाँ कड़ी हो जाती है। दोनों ही स्थित बच्चों को जीवन भर के विकलांग बना सकती है।


कुछ हद तक सुधर सकती है लाइफ


विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान कहते है कि सेरीब्रल पल्सी के कुछ बच्चों का दिमाग तो ठीक होता है लेकिन शरीर के अंगों पर कुप्रभाव होता है। केवल लिंब में समस्या होती है ऐसी बच्चों की क्वालटी आफ लाइफ कुछ हद ठीक की जा सकती है। इसके लिए वेक्लोफेनटाइजेनिड एंटी स्पाज्म दवा दी जाती है जो स्पास्टिक इंफेंट सिंड्रोम में कारगर होती है। इसके साथ फीजियोथिरेपी की अहम भूमिका है। संस्थान में इन बच्चों के केयर पर विशेष ध्यान दिया जाता है। हमारे पास हर सप्ताह पांच से आठ बच्चे इस बीमारी के साथ आते हैं। 


हाई रिस्क प्रिगनेंशी में बरते सावधानी


गायनकोलाजिस्ट एसोसिएशन की सदस्य स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. मेनका सिंह कहती है कि सेरीब्रल पल्सी युक्त शिशु का जंम रोकने के लिए हाई रिस्क प्रिगनेंशी वाली महिलाओं को विशेष देख -रेख में रखने की जरूरत है। यदि हाई बीपीडायबटीजसिफलो पेल्विक डिसप्रपोशन( शिशु का सिर बड़ा और योनि द्वार छोटा) के अलावा स्वत:गर्भपातप्रीमेच्योर बर्थ की हिस्ट्री है तो यह हाई रिस्क प्रिगनेंशी में आता है। 

यह करें सरीब्रल पल्सी युक्त जंम रोकने का उपाय

गर्भधारण करने के बाद स्त्री रोग विशेषज्ञ से लेते रहे सलाह

-हर तीन महीने पर अल्ट्रासाउंड परीक्षण कराएं

प्रसव वहीं पर कराए जहां पर बाल रोग विशेषज्ञ की हो उपलब्धता

शिशु को पूरा कराएं टीका करण

-स्त्री रोग विशेषज्ञ के सलाह के अनुसार ही कराएं प्रसव

 

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

लाक डाउन... किडनी के 28.2 फीसदी मरीजों की छूटी डायलसिस

 देश का पहला शोध जिसमें हुआ खुलासा 



 

 

किडनी के 28.2 फीसदी मरीजों की छूटी  डायलसिस

2.74 फीसदी मरीजों को इमरजेंसी में करानी पड़ी डायलसिस

 

कुमार संजय। लखनऊ

किडनी मरीजों को जिंदा रहने के लिए डायलसिस ही एक सहारा खास तौर पर जब तक कि किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो जाता है। लाक डाउन के कारण यातायात प्रतिबंधित होने के साथ देश भर के 28.2 फीसदी मरीजों की तय समय पर डायलसिस नहीं पायी जिसके कारण स्थित बिगडने पर 2.74 फीसदी में इमरजेंसी में डायलसिस करनी पडी। 4.13 फीसदी मरीजों ने डायलसिस के लिए संपर्क करना भी खत्म कर दिया। डायलसिस न होने के कारण स्थित बिगडने के कारण 0.36 फीसदी मरीजों की मौत हो गयी। प्रथम लाक डाउन जो 24 मार्च को तीन सप्ताह के लागू हुआ उस दौरान किडनी मरीजों को डायलसिस की क्या स्थित रही और उनके डायलसिस पर लाक डाउन का कितना प्रभाव पडा जानने के लिए देश भर 14 संस्थान के विशेषज्ञो ने शोध किया। शोध में आठ सरकारी जिसमें पीजीआई लखनऊ, पीजीआई चंडीगढ़ , एम्स दिल्ली, गवर्नमेंट मेडिकल कालेज मद्रास सहित 11 कारपोरेट अस्पताल में किडनी डायलसिस के लिए आने वाले मरीजों पर शोध किया तो पता चला कि इन सेंटर लाक डाउन के पहले तक 2517 मरीजों की डायलसिस होती थी जो घट कर 2404 हो गयी।

द एडवर्स इफेक्ट आफ कोविद पैनडमैकि आन द केयर आफ पेशेंट विथ किडनी डिजीज इन इंडिया शोध को किडनी इंटरनेशनल रीपोर्ट ने स्वीकार किया है।   

पहले लाक डाउन में केवल दो किडनी ट्रांसप्लांट

सरकारी अस्पताल में 47.5 फीसदी और निजि अस्पताल में 18.83 फीसदी डायलसिस की कमी पहले तीन सप्ताह के डायलसिस में आयी। इसके साथ देखा गया कि किडनी ट्रांसप्लांट इन 14 सेंटरों में महीने में 33 के आस-पास होती थी जो लाक डाउन के दौरान घट कर केवल दो रह गयी।

 

कोविद जांच की सुविधा के साथ बढ़ रही डायलसिस

शोध के मुख्य गुर्दा रोग विशेषज्ञ एवं संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. नरायन प्रसाद ने शोध पत्र में कहा कि भरतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने गाइड लाइन के अनुसार कोविद जांच के बाद डायलिस की बात कही गयी । पहले जांच की सविधा कम थी लेकिन जांच की सुविधा बढने के साथ डायलसिस की संख्या बढ़ती गयी। कोविद पिजिटिव मरीजों के राजधानी कोविद अस्पताल में डायलसिस के साथ पूरी देख-रेख की व्यवस्था है।

 

15 डाक्टर भी हुए क्वरटाइन

देश के इन 14 सेंटर पर 221 गुर्दा रोग विशेषज्ञ है जिसमें 134 सरकारी और 87 कारपोरेट अस्पताल में कोविद मरीजों के सपंर्क में आने के कारण इन सेंटर के 15 डाक्टर को क्वरटाइन होना पडा जिससे वर्क फोर्स में भी कमी आयी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

पीजीआईःपांच विभाग ने मिलकर गर्भवती के पेट से निकल 10 किलो का ट्यूमर



पांच विभाग ने मिलकर गर्भवती के पेट से निकल 10 किलो का ट्यूमर

 

 29 वर्षीय उन्नाव निवासी महिला संजय गांधी पीजीआई

के सामान्य अस्पताल में

   स्त्री रोग विशेषज्ञ की ओपीडी में पेट की सूजन के कारण आई थी। वह अपने स्थानीय चिकित्सक से परामर्श कर चुकी थी।  बताया गया था कि उसको प्रेगनेंसी के साथ-साथ पेट में बहुत बड़ी गांठ है ।इस कारण से यह गंभीर मामला है और इसका इलाज पीजीआई में ही संभव था। मरीज को  ओपीडी में देखा पाया कि मरीज को दो-तीन महीने की प्रेगनेंसी के साथ-साथ पेट में बहुत बड़ा टयूमर था जो बचेदानी पर भी दबाव डाल रहा था ।गांठ में कैंसर भी हो सकता था  और यदि गांठ को  सर्जरी द्वारा निकाला नहीं जाता  तो गर्भपात की संभावना भी हो सकती थी।ऐसी स्थिति में जांच कराने पर रेडिएशन के कारण कर में पल रहे बच्चे में विकृति की संभावना भी हो सकती थी।  इस विषय पर मरीज और उनके परिजनों से बातचीत की गई और इलाज के लिए उन्हें  गर्भपात की भी सलाह दी गई, किंतु रोगी की प्रथम प्रेगनेंसी होने के कारण वह किसी भी कीमत पर इस बच्चे को बचाना चाहती थी। उन्होंने  टीम पर पूरी आस्था जताई और टीम ने भी मरीज और मरीज के परिवार वालों को सारे खतरों से आगाह करते हुए इलाज करने के लिए तैयार किया, जिसमें गर्भपात की संभावना भी शामिल थी ।   रेडियोलाजी विभाग, गैस्ट्रो सर्जरी विभाग और जेंटिक्स

विभाग के चिकित्सकों से संपर्क कर आपस में सहमति कर  डायग्नोसिस चयनित की गई और ऑपरेशन की तैयारी की गई क्योंकि क्योंकि टयूमर के साथ प्रेगनेंसी को नियंत्रित करना एक बहुत मुश्किल काम था। इस ऑपरेशन के लिए एनेस्थेसिया  महत्वपूर्ण था  । ट्यूमर निकालने में गैस्ट्रो सर्जरी के सीनियर डाक्टर रजनीश कुमार सिंह और उनकी टीम ने महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की।   पूरी टीम मरीज की प्रेगनेंसी को बचाते हुए ट्यूमर  निकालने में सफल रहे।  यह ट्यूमर लगभग 30 × 35 सेंटीमीटर और 10.4 किलो का था।ऑपरेशन के पश्चात मरीज की जेनेटिक काउंसलिंग और प्रेगनेंसी अल्ट्रासाउंड भी किया गया जिसमें बच्चे का विकास सामान्य पाया गया। आज मरीज एसजीपीजीआई की विशेषज्ञों की टीम का धन्यवाद करते हुए गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ अपने घर जाने को तैयार है। 

डॉ दीपा कपूर,

डॉ अंजू रानी सीनियर गाइनेकोलॉजिस्ट

डॉ  रजनीश कुमार सिंह गैस्ट्रो सर्जन

 डॉ रुचि कंसलटेंट एनएसथीसिया

 गणेश सीनियर रेजिडेट  एनेस्थिसिया

 शिवकुमारी एवं स्नेहलता स्टाफ नर्स ने महत्वपुर्ण भूमिका निभाया।


गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

कोरोना ने कमजोर दिया दिल पीजीआइ ने किया मज़बूत


 कोरोना ने कमजोर दिया दिल पीजीआइ ने किया  मज़बूत

दिल की मासपेशियों को भी कमजोर कर सकता है कोरोना




कुमार संजय़ । लखनऊ

 

कोरोना वायरस केवल फेफडे को ही नहीं दिल को भी गिरफ्त में ले सकता है। सांस लेने में परेशानी हो रही है और रक्त दाब कम हो रहा है तो यह संकेत है कि वायरस दिल के प्रभावित कर रहा है ऐसे लोगों को समय पर इलाज से  दिल को बचा तक जिंदगी पर खतरे को टाला जा सकता है। संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञ, कार्डियोलाजी सोसाइटी आफ इंडिया के उपाध्यक्ष , यूपी चैप्टर आफ कार्डियोलाजी सोसाइटी आफ इंडिया के अध्यक्ष  प्रो. सत्येंद्र तिवारी विश्व हृदय दिवस पर यह जानकारी देते हुए बताया कि कोरोना काल में  पांच ऐसे मरीजों को समय पर इलाज देकर जिंदगी पर खतरे को टालने में सफलता हासिल किया है। प्रो.तिवारी के मुताबिक कोरोना वायरस मुख्यतः फेफड़े  पर प्रहार करता है लेकिन हमारे पहले के ऐसे मरीज जिनमें एंजियोप्लास्टी हो चुकी थी बिल्कुल सामान्य थे लेकिन सांस फूलने की परेशानी के साथ रक्त दाब में कमी की परेशानी के कारण ई ओपीडी में फोन किया तो पहले तो लगा कि कोरोना के कारण ऐसा होगा कुछ दवाएँ बताया लेकिन मरीज को फायदा नहीं हुआ तो मरीज को यहां आने को कहा तो देखा कोरोना वायरस दिल की मासपेशियों को कमजोर कर दिया था जिसके कारण दिल की पंपिंग शक्ति कम हो गयी थी। इसके कारण रक्त प्रवाह पूरी तरह शरीर में नहीं हो रहा था । रक्त दाब कम होने का भी कारण साबित हो रहा था । मरीज को बाई पैप पर डालने के साथ ही विशेष दवाओं से दिल की मासपेशियों को ताकत देने के साथ स्थित में सुधार होने लगा ।

 

सामान्य लोगों का दिल भी प्रभावित कर सकता है कोरोना

 

 

प्रो.तिवारी का कहना है कि सामान्य लोगों के दिल को भी कोरोना प्रभावित कर सकता है। दिल में वायरस का प्रकोप होने के बाद मायोकार्डाटिस हो जाती है । इससे दिल की मासपेशियां कमजोर हो जाती है । सांस लेने में परेशानी होती है।  दिल के परेशानी होने पर कई बार वेंटीलेटर पर लेने के साथ ही दिल मास पेशियों को मजबूत करने की दवाएं देकर स्टेबिल किया जाता है।

 

क्या करें दिल के मरीज

- कोरोना से बचने के लिए एहतियात बरते

 

-चिन्ता के अहसास से बचने के लिए सांस लेने और मेडिटेशन का अभ्यास करें।

 

-अगर  बुखार जैसे लक्षण (शरीर का तापमान 37.8° सेल्सियस या ज्यादा) खांसी या सीने में संक्रमण है तो आपको खुद को अलग रखना चाहिए।

 

-हृदय के लिए अपनी नियमित दवाएँ लेते रहें। अगर ब्लड प्रेशर की दवा लेते हैं तो उसे भी लेना न भूलें। हार्ट अटैक या स्ट्रोक रोकने के लिए यह सब जरूरी है।




विश्व हृदय दिवस आज

थीमः दिल को मजबूत करने के लिए करें दिल का इस्तेमाल

दिल मजबूत तो कोरोना से होगा मजबूती से मुकाबला

 

कुमार संजय। लखनऊ

दिल आप का मजबूत है तो आप का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। कोरोना का संक्रमण हो बी गया तो आप वायरस पर जीत हासिल कर लेंगे लेकिन यदि दिल मजबूत नहीं है तो कोरोना आप की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। इसी लिए विश्व हृदय दिवस पर वर्ड हार्ट फाउडेंशन ने इस साल का थीम दिया है ...यूज हर्ट टू बीट कार्डियोवेस्कुलर डिजीज यानि दिल की बीमारी से बचने के लिए दिल इस्तेमाल करें। संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सत्येंद्र तिवारी और प्रो.सुदीप कुमार कहते है कि दिल का इतना इस्तेमाल करें दिल की तेजी से धड़के।  रक्त वाहिका में रक्त का प्रवाह तेजी से हो जिससे रक्त वाहिकाओं में रूकावट की आशका कम हो। toविशेषज्ञ कहते है कि 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग जिन्हें कॉरोनरी हार्ट डिजीज या हाइपरटेंशन है उन्हें कोविड-19 से संक्रमित होने की आशंका ज्यादा है। ऐसे मरीज जिनके हृदय की स्थिति कमजोर है जैसे हार्ट फेलियर या एरिथमिया उनमें वायरल संक्रमण के लक्षण सामने आने की आशंका ज्यादा रहती है। दूसरे लोगों के मुकाबले ऐसे लोगों को संक्रमण होगा तो ज्यादा गंभीर भी होता है। इस लिए दिल को ठीक रखना बहुत जरूरी है।

 

ऐसे करें दिल को मजबूत

-शरीर का वजन नियंत्रण में हैतो इससे कोलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित रहता हैग्लूकोज और ब्लडप्रेशर का स्तर ठीक रखता है. थोड़ा प्रोटीनपूरा अनाज और ताजा फल खाएं. इंस्टेंट का लेबल लगा हुआ या पैक्ड फूड आपके किचन में नहीं होना चाहिए. यहां तक कि बोतलबंद ड्रिंक्सजंक फूड और नमकीन से भी दूर रहें.

 

 

- थोड़ा पसीना बहाएं। हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट सामान्य व्यायाम करना चाहिए। हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट सामान्य व्यायाम करना चाहिए। हृदय रोग के खतरे को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले तीन कारकों- ब्लडप्रेशरकोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज के खतरे को कम करने के लिए तेज चलना भी दौड़ने के जितना ही अच्छा होता है।

 

- धूम्रपान न करें क्योंकि धूम्रपान करने वालों में धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा हृदय रोग होने का तीन गुना खतरा होता है। स्मोकर्स के ग्रुप में रहते हैंतो हृदय रोग होने की संभावना 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.

 

- अपनी फैमिली ट्री के बारे में जानें । वर्ल्ड हार्ट फेडेरेशन का कहना है कि अगर फर्स्ट डिग्री मेल रिलेटिव (पिता या भाई) में से किसी को 55 साल की उम्र से पहले हार्ट अटैक आया है या फिर आपके फर्स्ट डिग्री फिमेल रिलेटिव में से किसी को 65 साल की उम्र से पहले हार्ट अटैक आया हैतो आपको हृदय रोग होने का खतरा बहुत अधिक होता है।  माता-पिता 55 साल से कम उम्र में हृदय रोग से प्रभावित रहे हैंतो आपको दिल की बीमारियां होने की आशंका दूसरे लोगों से 50 प्रतिशत ज्यादा होती है। .

- तनाव कम करें। तनाव सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण नहीं बनता है. लेकिन अचानक अत्यधिक तनाव कभी-कभी कार्डियोमियोपैथी (ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम) का कारण बन सकता हैजो हार्ट अटैक के बहुत करीब होता है। तनाव को कम करें तथा सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण बनने वाले ब्लडप्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें.

 

- जानें अपनी सेहत का हाल।  अपने लिपिड प्रोफाइलब्लड शुगर लेवलब्लड प्रेशर लेवल की जांच कराते रहें. अपने फिजिकल चेकअप के माध्यम से आप यह जान सकते हैं कि कहीं आप हृदय संबंधी रोग की ओर तो नहीं बढ़ रहे।