मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

धैर्य और जज्बे के अस्त्र से कोरोना पर वार--कोराना योद्धा इंदु लता

धैर्य और जज्बे के अस्त्र से कोरोना पर वार



 जूनियर नर्स देखती हैं इनमें मां का चेहरामहसूस कराया मैं हूं न
स्वाइन फ्लू के बाद अब कोरोना के मरीजों की देखभाल में लगीं

कोरोना का कहर शुरू हुआ तो फिर जुट गईं वार्ड प्रबंधन में

कोरोना वार्ड में बनी रहती है संक्रमण की आशंका


स्वाइन फ्लू का प्रकोप आया तो नया वार्ड शुरू कराने के साथ भर्ती मरीजों की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली। कोरोना का कहर शुरू हुआ तो फिर वार्ड प्रबंधन में जुट गईं। उम्र 55 वर्ष है, पर युवा स्वास्थ्यकर्मियों की अगुवाई करती हैं। कोरोना वार्ड में संक्रमण की आशंका बनी रहती है, लेकिन धैर्य के साथ जज्बे के अस्त्र से वायरस पर वार कर रही हैं। कहती हैं, मैं डर गई तो फिर युवा नर्सो को साहस कौन देगा। फिर तो कोरोना के मरीजों का इलाज पर संकट आ जाएगा।

संजय गांधी पीजीआइ की वरिष्ठ नर्स (डीएनएस) इंदु लता कोरोना के योद्धाओं में से एक हैं। वह कोरोना वार्ड में इन दिनों नई नर्सो के साथ मिल कर काम कर रही हैं। मरीजों के इलाज के साथ नर्सो के अंदर का भय भी मिटा रही हैं। नई नर्से उनमें मां का चेहरा देखती हैं। उन्होंने हर मौके पर मां की तरह आगे बढ़कर उनका नेतृत्व भी किया। जूनियरों को हमेशा हिम्मत बंधाया कि मैं हूं न..। कोरोना वार्ड में ड्यूटी के लिए सीएनओ कालिब सोलंकी के साथ मिल कर पूरी योजना तैयार किया। सारे नर्सो की काउंसिलिंग किया। उन्हें बताया कि कैसे अपने को बचाते हुए मरीज की सेवा करना है। वार्ड में कोरोना के मरीज भर्ती हो रहे हैं। पहला बैच ड्यूटी कर बाहर आ गया। सब कुछ ठीक चलने पर सबने ईश्वर के प्रति आभार प्रकट किया। इनके साथ काम करने वाले मलखान सिंह, रूपा सिंह, चंदन यादव, सीमा मिश्र, ओम प्रकाश, पूनम, बबलू कहते हैं कि टीम लीडर के जरिए ही लड़ाई जीती जाती है। मैडम हम लोगों के साथ हमेशा खड़ी मिलती हैं।


घर पर एकांतवास

इंदु ड्यूटी के बाद जब वह घर जाती हैं घर में खुद अलग कमरे में रहती हैं। कहती हैं, क्योंकि डर लगा रहता है कि कहीं वे संक्रमित हुईं तो बच्चों में भी संक्रमण हो सकता है।


रूलाता सिस्टम , मुस्कराती सिस्टर...नर्सेज की स्थित बदतर






डब्ल्यूएचओ ने नर्सेज को समर्पित किया विश्व स्वास्थ्य दिवस
निजी और सरकारी संस्थानों में आउट सोर्स की हालत दयनीय
विश्व स्वास्थ्य दिवस आज



कुमार संजय
नसोर्ं की तारीफ भले ही ‘धरती पर फरिश्ते’ के रूप में की जाती हो लेकिन इनकी पेशेवर जिंदगी दयनीय है। खासकर निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में और सरकारी संस्थानों में आउटसोर्स पर काम कर रहीं नर्सो के लिए काफी दिक्कते हैं। कम वेतन मिलता है और खराब स्थिति में काम करना पड़ता है। हड़ताल एवं आंदोलनों से उनकी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। अध्ययन करने वाले नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर वुमेन डेवलपमेंट स्टडीज की जूनियर फेलो श्रीलेखा नायर ने कहा कि नसोर्ं के सामने आर्थिक, मौखिक एवं शारीरिक उत्पीड़न एक बड़ी समस्या बना हुआ है। उन्हें न सिर्फ डॉक्टरों और प्रबंधन, बल्कि सहकर्मियों के र्दुव्‍यवहार का भी सामना करना पड़ता है। सात अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस को नर्सेज के नाम समर्पित किया है। कहा गया है कि रुकें और थैंक्स बोलें.। एक बड़े संस्थान में काम करने वाली एक आउटसोर्स नर्स कहती हैं कि 16 हजार में कैसे गुजारा करते हैं यह हम ही जानते हैं।
ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन के पदाधिकारी डॉ. अजय सिंह कहते है कि निजी अस्पतालों में तो प्रबंधन नसोर्ं का शोषण करता है। नसोर्ं और प्रबंधन के बीच लगभग गुलाम एवं मालिक जैसे रिश्ते होते हैं। निजी क्षेत्र में नसोर्ं को मिलने वाले कम वेतन का जिR करते हुए उन्होंने कहा कि उनमें से अधिकतर ने चार से छह लाख रुपये का शैक्षिक ऋ ण लेकर अपनी पढ़ाई की होती है। उनके द्वारा चुकाई जाने वाली न्यूनतम किस्त करीब छह हजार से 10 हजार रुपये होगी, जबकि उन्हें तनख्वाह के रूप में पांच से लेकर 15 रुपये तक ही मिल पाते हैं।खराब स्थिति होने के बावजूद उनमें से अधिकतर नौकरी से चिपकी रहती हैं, क्योंकि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता। मूविंग विद द टाइम्स-जेंडर, स्टेटस एंड माइग्रेशन ऑफ नर्सेज इन इंडिया प्रकाशित करने वाली श्रीलेखा ने कहा, नसोर्ं को केवल उनके वरिष्ठ ही नहीं, बल्कि मरीजों के संबंधी भी मौखिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, जैसा कि अखबारों में छपता है, कुछ मामलों में उनका शारीरिक शोषण भी किया जाता है।
कहीं नहीं होता नाम
अध्ययन में कहा गया है कि मरीजों की जान बचाने के मामले में नर्सो के योगदान की बहुत सी कहानियां हैं, लेकिन उनके योगदान पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह सच है कि महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी कार्यों में भाग लेने वाले डॉक्टरों का हर जगह नाम होता है, लेकिन नसोर्ं के नाम का रिकॉर्ड में कभी कोई उल्लेख तक नहीं होता।

ऐसे होता है शोषण
नर्सेज नेता कहती है कि नसोर्ं के शोषण का एक और तरीका यह है कि अस्पताल प्रबंधन नसोर्ं के प्रमाण पत्रों को जब्त कर लेते हैं। अध्ययन के अनुसार ठेकेदार और निजी अस्पतालों में नसोर्ं के साथ अन्य तरह की धोखाधड़ी भी की जाती है। उनका वेतन कागजों में कुछ और दर्शाया जाता है, जबकि हकीकत में उन्हें इससे कम पैसे दिए जाते हैं।

रेलवे-एम्स की तरह हो आउट सोर्स नर्सेज को वेतन
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष जेएन तिवारी कहते है कि नर्सेज के वेतन रेलवे और एम्स के तरह प्रदेश में होना चाहिए। रेलवे में संविदा नर्सेज का वेतन 44 हजार है जबकि प्रदेश में आउट सोर्स नर्सेज का वेतन 15 से 17 हजार है। इससे लड़कियों का मनोबल गिरता है। बीच में ठेकेदार की जरूरत नहीं है। पांच साल काम करते रहने वाली नर्सेज को परमानेंट किया जाए, जिससे लड़कियों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिले।

49 के लाक डाउन से बनेगी बात रूकेगा कोरोना का संचार






कुमार संजय ’ लखनऊ
लॉकडाउन 14 अप्रैल तक है, जिससे वायरस का प्रसार थमा है, लेकिन इसके बाद एहतियात नहीं बरता गया तो देश में 13 मई तक 6,000 केस सामने आ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन एकदम से खत्म करने से संक्रमण की आशंका बढ़ जाएगी। एसोसिएशन आफ पैथोलाजिस्ट एंड माइक्रोबायलोजिस्ट के अध्यक्ष डॉ.पीके गुप्ता सेंटर फॉर मैथमेटिकल साइंसेज, यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के राजेश सिंह और आर. आदिकारी के शोध का हवाला देते हुए कहते हैं कि हॉट स्पाट एरिया को विशेष रूप से चिह्न्ति कर वहां पर लाकडाउन कब खत्म करना है, इस पर काम करना पड़ेगा। बीच में पांच-दिन के ब्रेक के साथ दो या तीन लॉकडाउन या एक साथ ही 49 दिवसीय लॉकडाउन किया जा सकता है, जिससे वायरस का संचार रुकेगा। यह आकलन इन लोगों ने देश की सामाजिक संपर्क संरचना के आधार पर किया है। यह भी कहा है कि अगर किसी एक एरिया में वायरस केंद्रित है तो वहां विशेष उपाय की जरूरत है। इस तरह के फैसलों के लिए हमें अच्छी मैपिंग की जरूरत है।
उठाया जा सकता है फायदा : लॉकडाउन के दौरान, स्वास्थ्य अधिकारी पर्याप्त अस्पतालों, हेल्थकेयर स्टाफ, महत्वपूर्ण देखभाल बेड और वेंटिलेटर के साथ खुद को तैयार कर सकते हैं ताकि आने वाली मांग को पूरा किया जा सके।

यह है आधार
लॉकडाउन खत्म होने के बाद घर परिवार में बाहर से आने वाले का संपर्क बढ़ेगा। कार्यस्थल पर 30 या 40 लोगों से बातचीत करेंगे, मुलाकात होगी। अमेरिका स्थित सेंटर फॉर डिसीज डायनामिक्स इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी द्वारा एक स्वतंत्र विश्लेषण ने स्थानीय लॉकडाउन की आवश्यकता पर जोर दिया था। कहा था कि हल्के, मध्यम या गंभीर लक्षणों वाले को यह समझना होगा वायरस कितनी दूर फैल सकता है।

रखनी होगी नजर
शोधकर्ताओं का मानना है कि जब तक कोरोनोवायरस के खिलाफ टीके उपलब्ध नहीं होते हैं, तब तक संRमण की संख्या को बहुत तेजी से बढ़ने और स्वास्थ्य सेवा को रोकने के लिए देशों को समय-समय पर सामाजिक-दूरगामीउपायों को लागू करने की आवश्यकता होगी।

संभव है लॉक डाउन खत्म होने के बाद लोग हो जाएं लापरवाह
कैंब्रिज में गणित के शोधकर्ता ने कहा है कि हमारे मॉडल ने हर संभव परिणाम देखा और हमने हर बार दोबारा संक्रमण की आशंका को ध्यान में रख कर मॉडल तैयार किए है । डॉ. पीके गुप्ता कहते है लॉकडाउन के बाद की स्थिति देखने के बाद ही दो बारा स्थित का आकलन कर स्थानीयकृत लॉकडाउन पर सलाह दी जा सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लॉकडाउन वायरस को दबाए रखता है। लॉकडाउन के बाद संभव है कि संक्रमण का फैलाव बढ़ जाए।

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

एंटी एजिंग दवाएं लगा सकती है कोरोना पर ब्रेक

एंटी एजिंग दवाएं लगा सकती है कोरोना पर ब्रेक 

इलाज और बचाव में कारगर साबित हो सकता है सेल को मराने से बचाने वाली और एंटी एजिंग दवाएं
कुमार संजय। लखनऊ

कोरोना के संक्रमण से बचाव और इलाज के लिए शोध वैज्ञानिक दिन-रात काम कर रहे है तमाम बाते इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल के जरिए दुनिया के सामने ला कर लोगों को उम्मीद की किरण दिखा रहे है। वैज्ञानिकों ने कहा कि एंटी एजिंग और सेल को मरने से बचाने वाली(सेनोलाइटिक्स) दवाएं कोरोना से लडाई में बडा हथियार साबित हो सकती है। क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट डा. स्कंध शुक्ला ने इंटरनेशऩल मेडिकल जर्नल एजिंग ने अपने कोविद 19 एंड क्रोनोलाजिकल एजिंगः सीनोलायटिक्स एंड अदर एंटीएजिंग ड्रग फार दी ट्रीटमेंट एंड प्रिवेंशन आफ कोरोना वायरस इंफेक्शन शोध का हवाला देते हुए कहते है कि  बचाव और इलाज  के लिए इन दवाओं के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है।  विशेषज्ञों का कहना है कि कोविद 19( सार्स कोवी -2) सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम और मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम परिवार का एक नया उभरता हुआ वायरस है। देखा गया है कि कोविद 19 अधिक आय़ु वाले रोगियों में काफी अधिक मृत्यु दर दर्शाता है। यह इस सवाल का जवाब देता है कि कोविद संक्रमण और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के बीच एक कार्यात्मक संबंध है। कोविद 19  के लिए दो रिसेप्टर्स है जो महत्वपूर्ण रोल प्ले कर रहे है ।  एक सीडी26 है और दूसरा एसीई-2 (एंजियोटेंसिन-परिवर्तित एंजाइम 2) है। दिलचस्प बात यह है कि सीडी 26 और एंजियोटेंसिन सिस्टम दोनों ही उम्र बढ़ने संबंध दिखाते है। इसी तरहकोविद-19 संक्रमण के उपचार के लिए दो प्रस्तावित चिकित्सीय अज़िथ्रोमाइसिन और क्वेरसेटिन हैंदोनों महत्वपूर्ण सेनेटोलिटिक गतिविधि यानि बुढापे के सेल को मराते हैं। इसके अलावाक्लोरोक्वीन-संबंधित बीटा-गैलेक्टोसिडेस बुढापे के मार्कर है। अन्य एंटी-एजिंग ड्रग्स पर भी विचार किया जाना चाहिएजैसे कि रैपामाइसिन और डॉक्सीसाइक्लिनक्योंकि वे प्रोटीन संश्लेषण के अवरोधक के रूप में व्यवहार करते हैं,और कोशिकाओं को उच्च स्तर की सूजन वाले साइटोकिन्सइम्यून मॉड्यूलेटरग्रोथ फैक्टर और प्रोटीज़ का स्राव होता है को रोकते है   और वायरल प्रति कृति( संख्या बढने से रोकतेहैं। दोनों को अवरुद्ध करते हैं।

वायरस नहीं बढा पाता है अपनी संख्या 

विशेषज्ञों का कहना है कि कोविद 19  बीमारी के खिलाफ लड़ाई में इस परिकल्पना का परीक्षण करना चाहिए कि वायरस के संचरण को रोकने में सेनेटोलिक्स( सेल को मराने वाले) और अन्य एंटी-एजिंग दवाओं की एक प्रमुख भूमिका हो सकती हैसाथ ही इसके उपचार में सहायता भी। सेनोलाइटिक और एंटी-एजिंग थेरप्यूटिक्स मौजूदा एफडीए-अनुमोदित ड्रग्स हैंजिनमें उत्कृष्ट सुरक्षा प्रोफाइल हैंऔर यह ड्रग पुन: उपयोग के प्रयासों के लिए आसानी से उपलब्ध होगा। एज़िथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लिन दोनों आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है जो वायरल प्रतिकृति और आईएल -6 उत्पादन को रोकते हैं।  हम एंटीबायोटिक दवाओं के इस सामान्य वर्ग पर विचार कर सकते हैं जो  उपचार और रोकथाम दौरान होने वाले साइड इफेक्ट को  सेलुलर प्रोटीन संश्लेषण को  रोक  कर कम करते हैं।

करोना के योद्धा -डा.धर्मवीर सिंह वीडियो काल ही है बच्चे का चेहरे देखने का सहारा

करोना के योद्धा -डा.धर्मवीर सिंह

वीडियो काल ही है बच्चे का चेहरे देखने का सहारा
विदेश न जाकर देश में रह सेवा को बनाया साधन
कुमार संजय़। लखनऊ   


संजय गांधी पीजीआइ माइक्रोबायलोजी विभाग के डा.धर्मवीर सिंह को घर से छोड़े कई दिन हो गए है। वीडियो काल ही एक साल के बच्चे का चेहरा देखने का सहारा है। पत्नी से फोन पर हाल चाल हो जाताहै। वह कोरोना मरीजों की जांच  में लगे है ।जांच करने के साथ बायोसेफ्टी पर उनकी विशेष जिम्मेदारी है ताकि कही से वायरस लीक हो कर किसी को बीमार न कर दें। इससे पहले वह स्वाइन फ्लू की जांच में लगे रहे । उससमय पीएचडी कर रहे थे लेकिन वह पढाई के साथ स्वाइ फ्लू जांच में पूरा काम किया। पीएचडी पूरी करने के बाद चाहते तो विदेश में पीडीएफ मिल जाता लेकिन उऩ्होंने देश सेवा को साधन बनाया । डा.धर्मवीर ने संस्थान के माइक्रोबायलोजी विभाग में पीडीएफ ज्वाइन किया वह जपानी इंसेफेलाइटस पर काम कर रहे है लेकिन देश पर कोरोना की आपदा आने के बाद अपने को जांच के लिए आगे किया। जांच शुरू हुई तो काम था लेकिन अब धीरे-धीरे नमूनों की संख्या बढ़ रही है। इससे 24 घंटे यहीं रहना पड़ता जब थक जाते तो एक आध घंटे आराम करने के लिए गेस्ट हाउस चले जाते है। विशेषज्ञों का कहना है कि जांच के दौरान सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि वायरस को सीधे हैंडिल करते है। नाक या गले से जो खुरचन ली जाती है उससे आरएनए को अलग किया जाता है। उस आरएनए की संख्या पीसीआऱ तकनीक से बढा कर उसमें कोरोना का स्ट्रेन देखते है इस दौरान जा सी चूक संक्रमण के घेरे में ले सकती है।  इसी तरह स्वाइन फ्लू की जांच में भी काफी रिस्क था जिससे काफी अनुभव हुआ। प्रो. उज्वला घोषाल के निर्देशन में सीनियर लैब टेक्नोलाजिस्ट वीके मिश्रा के साथ कोरोना जांच को आंजाम देने में लगे हैं।

पीपीई किट का ट्रेनिंग भी दिया
दूसरे संस्थान में जांच में लगे लोगों को सुरक्षा किट पहनने के साथ ही जांच का तरीका  के आलावा तमाम हेल्प दे रहे है।   

रविवार, 5 अप्रैल 2020

कोरोना के योद्धा –डा. स्कंद शुक्ला क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट एंड रूमैटोलाजिस्ट आसान भाषा में बता रहै है कोरोना फैक्ट

कोरोना के योद्धा डा. स्कंद शुक्ला



क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट एंड रूमैटोलाजिस्ट आसान भाषा में बता रहै है  कोरोना फैक्ट  

इस जीवन में आप अकेले नहीं बस इन बातों का करें पालन

लक्षण नहीं फिर भी बनाएं रखें शारीरिक दूरी

कुमार संजय। लखनऊ
मैं जानता हूँ कि अनेक लोगों के लिए लाक डाउन का  यह जीवन में नाटकीय परिवर्तन ला रही घड़ी है। मेरा परिवार भिन्न नहीं है : मेरी बेटी का स्कूल भी बन्द है और वह घर से ही अपनी ऑनलाइन क्लासें ले रही है। इस कठिन समय में अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना ज़रूरी है। यह आपको केवल दीर्घकालीन मदद ही नहीं देगाकोविड-19 से संक्रमित होने पर उससे लड़ने में भी आपकी मदद करेगा।
पहली बात - स्वस्थ और पौष्टिक भोजन करें। इससे आपका प्रतिरक्षा-तन्त्र सशक्त रहेगा।
दूसरी बात - मदिरापन कम-से-कम करें और शर्करा-युक्त पेयों के सेवन से दूरी बनाएँ।
तीसरी बात-धूमपान न करें। धूमपान के कारण कोविड-19 संक्रमण और गम्भीर रूप ले सकता है।
चौथी बात - कसरत नियमित करते रहें। वयस्क आधे घण्टे और बच्चे एक घण्टे के लिए। घर से काम कर रहे हैं तब भी एक ही मुद्रा में लगातार काम न करें। हर आधे घंटे में तीन मिनट का ब्रेक लेते रहें।
पाँचवीं बात-अपने मानसिक स्वास्थ्य का भी ख़्याल रखें। ऐसे समय में तनाव भय और भ्रम स्वाभाविक हैं। अपने करीबियों से बातें करते रहें विश्वास ऐसे समय में मददगार है। आसपास के लोगों की मदद करें जितनी भी सम्भव हो। पड़ोसियों परिवार मित्रों सभी की। याद रखिए : सहानुभूति एक औषधि है।
संगीत सुनें किताबें पढ़ें खेल खेलें। ज़्यादा समाचार न देखें और न सुनें : इससे आपकी अकुलाहट बढ़ सकती है। विश्वसनीय सूत्रों से केवल एक बार..दो बार...बस
  
-जितने लोग सार्स-सीओवी से संक्रमित हैं उनमें से सभी को लक्षण न हैं और न होंगे। उनमें से लगभग चौथाई ऐसे हो सकते हैं जिनके भीतर यह विषाणु है और जो दूसरों को यह विषाणु दे तो सकते हैं किन्तु वे स्वयं लक्षणहीन हैं। लक्षणहीन किन्तु संक्रमित लोग हैं। इनके कारण इनके शरीर से विषाणु दूसरे में पहुँच सकता है और उसे रोगग्रस्त कर सकता है। लक्षणहीन विषाणुधारक यानी एसिम्पटोमैटिक कैरियर वे लोग हैं जिन्हें पहचानना सबसे टेढ़ी खीर है। इनके कारण ही कोविड 19 से लड़ने में सर्वाधिक मुश्किल आ रही है। चूँकि इन लोगों में संक्रमण के बावजूद कोई लक्षण नहीं हैं इसलिए ज़ाहिर है कि ये डॉक्टरों तक नहीं पहुँचते। अस्पतालों में जाँच बहुधा उन्हीं की हो रही है जो मामूली अथवा गम्भीर लक्षणों से ग्रस्त हैं।
-परिवर्तनशीलता ( वेरिएबलिटी ) मनुष्य ( जानकर ) नहीं पैदा करता। वह अनायास ही अपने व अन्य के जीवन को नवीन परिस्थियों के सामने प्रस्तुत कर देता है और प्रकृति इनमें परिवर्तन ले आती है।

आज दुनिया कोविड-19 पैंडेमिक से जूझ रही है जिसका कारण एक कोरोना-विषाणु है। इसका नामकरण सार्स-सीओवी किया गया है ( क्योंकि सार्स-सीओवी नामक एक पुराने विषाणु से इसे अलग नाम दिया जा सके )। सार्स-सीओवी व इस जैसे तमाम कोरोना-विषाणुओं के पास डीएनए नहीं होता अपने कैप्सिड नामक प्रोटीन के खोलों के भीतर ये आरएनए का एक टुकड़ा धारण करते हैं।  ऐसी ही तमाम जानकारी संजय गांधी पीजीआइ के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग एन्यूमिनाई डीम इन क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट एंड रूमैटोलाजिस्ट डा. स्कंध शुक्ला सोशल मीडिया ( फेस बुक) वाल से इस समय कोरोना के बारे में तमाम जानकारी जटिल साइंस को आसान हिंदी में दे रहे है। डा.शुक्ला दस साल से अधिक समय से तमाम बीमारियों , डिजीज कंटीशन और उपचार के विकल्प के बारे में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। डा.शुक्ला कहते है कि इस समय कोरोना के बारे में लोगों को जागरूक कर रहे हैं क्योंकि लोगों को बडी बडी साइंस के बाते समझ में नहीं आती है। आसान शब्दों में बताने से लोगों को जानकारी होगी। बचाव के उपाय करेंगे। कहते है कि कोरोना का कोई वैक्सीन नहीं है शारीरिक दूरी और एकांत वास ही वैक्सीन है।  पांच हजार फालोअर है और इनके दी जानाकारी को तमाम लोग शेयर करते हैं। 

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

10 से 12 दिन में 90 फीसदी संक्रमित मरीज कह रहे है कोरोना को ना






90 फीसदी कोरोना संक्रमित मरीज के 10से 12 दिन में हो जाते है निगेटिव
गले और नाक में वायरस के उपस्थिति पर आती है कोरोना की रिपोर्ट
ठीक होने के बाद भी आ सकती है कोरोना पाजिटिव रिपोर्ट
कुमार संजय। लखनऊ
कोरोना वायरस से संक्रमित 90 फीसदी लोगों में दस से 12 दिन मे जाच रिपोर्ट निगेटिव हो जाती है । बाकी लोगों में कुछ लंबा समय लग सकता है। हर व्यक्ति के शरीर की मालीक्युलर संरचना अलग होती है इस लिए कुछ लोगों में लंबा समय लग सकता है। यदि 10 से 12 दिन में रिपोर्ट निगेटिव नहीं आ रही है तो इसको लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। कुछदिन में अपने आप निगेटिव आ जाएगी। रैपिड टेस्ट में लक्षण खत्म होनेके बाद लंबे समय़ तक रिपोर्ट पाजिटिव आ सकती है।    
 इंडियन एसोसिएशनआफ माइक्रोबायलोजिस्ट सदस्य डा.विनीता खरे के मुताबिक माइल्ड पाजिटिव लोगों में आरएनए वायरल लोड कम रहता है देखा गया है कि इनमें 10 से 12दिन में मालीक्युलर कोरोना जांच रिपोर्ट निगेटिव हो जाती है लेकिन अधिक वायरल लोड के मरीजों में थोड़ा लंबा समय लगता है लेकिन परेशाऩी मरीज में काफी कम हो जाती है। डा. विनीता कहती है अभी हम लोगों के पास इस तरह के कम मामले है लेकिन इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल में दूसरे देशों में शोध पत्र के आधारा पर सारी जानकारी एकत्र कर रहे है।

लांसेट जर्नल के एक शोध में 76 मरीजों पर हुए शोध के आधार पर कहा जा सकताहै 90 फीसदी मरीजों में जांच रिपोर्ट10 से 12 दिनमें निगेटिव हो जाती है यानि नाक और गले में वायरस खत्महो जाताहै।देखा गया है कि नए संक्रमित कोविद 19 मरीज में  जितना अधिक वायरल लोड होता है लक्षण भी उतने गंभीर होते है। देखा गया कि गंभीर मामलों में वायरल लोड 60 गुना माइल्ड( हल्के) केस के मुकाबले अधिक होता है। देखा गया कि 10 से 12 दिन में माइल्ड और गंभीर केस के 90 फीसदी मामले निगेटिव हो जाते है।
वायरल लोड के आधार पर होती है प्लानिंग
यह भी देखा गया कि अधिक वायरल लोड वाले मरीजों में दूसरी परेशानियां जैसेदिल,किडनी,फेफडे की परेशानी अधिक होताहै इनको आइसीयू की भी जरूरतपड़ सकत है। डा.विनीता का कहना है कि वायरल लोड के आधार पर आगे इलाज की प्लानिंग में काफी मदद मिल सकती है।   

पीजीआइ के डा.अजय शुक्ला सोशल मीडिया के जरिए जगा रहे है कोरोना के खिलाफ अलख

करोना के योद्धा

पीजीआइ के डा.अजय शुक्ला सोशल मीडिया के जरिए जगा रहे है कोरोना के खिलाफ अलख
कोरोना मरीजों की कर रहे देख रेख
कोरोना से लड़ने के लिए एक परिवार की तरह करना होगा सामना
कुमार संजय। लखनऊ
-अनजाने में हुई गलती का भी परिणाम आप को भुगतना पड़ता है ।इसलिए कोरोना की बीमारी को हलके में लेने की गलती ना करें
व्याघ्रबुद्धया विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ।
न तिष्ठति भिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम्॥
बाघ समझकर (उसे मारने के लिए) छोड़ा गया बाण यह जान लेने पर कि यह बाघ नहीं गाय है’, रुकता नहीं और वेगपूर्वक लक्ष्य वेध करता ही है
-          हमारे शरीर में रहने वाले 300 ख़रब से ज़्यादा जीवाणु और अन्य सूक्ष्म जीव और उनके आनुवंशिक पदार्थ (हमारे हर एक जीन की तुलना में २००-३०० जीवाणु जीन है) रहते हैं।ईश्वर नें विश्व में जीवन को बड़ा अद्भुत बनाया है।यह जीवों को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी ज़िंदा रखता है और बढ़ाता है।
ऐसी ही तमाम जानकारी और जागरूकता भरे लेख संजय गांधी पीजीआइ में डाक्ट्रेट आफ मेडिसिन की पढाई कर डा. अजय शुक्ला   य: पश्यति स पश्यति के नाम शोध फेस बुक पर पेज पर दे रहे हैं। इसी  नाम से ब्लाग जिसके जरिए बीमारियों के बारे में तमाम  जानकारी और जागरूकता फैलाना का काम कर रहे है। इनकी ड्यूटी भी कोरोना मरीजों के देख भाल में लगी है। कोरोना के बारे में कई जानकारी दे रहे है। वह लिखते है कि  चिकित्साकर्मी ,पुलिस ,मीडिया,सफ़ाई कर्मी आदि कोरोना वॉरीअर हैं ,लेकिन कोरोना बैरियर कौन हैं। किसी भी महामारी से लड़ने में सबसे बड़ी बाधा उसके पीछे का विज्ञान नही,बल्कि उसके पीछे का समाज शास्त्र है । हम कोरोना ग्रसित लोगों पर कलंक लगाते गए तो लोग बिमारी छुपाएँगे,जिससे ज़्यादा लोगों को संक्रमण का ख़तरा होगा।कई लोग समजिक बहिष्कार के डर से भी अपनी बीमारियों को छुपाएँगे । इस लिए  इनकों सामने आने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। ग़लत या अधूरी खबरों से भ्रम एवं भय का वातावरण ना बनाए।लोगों को जागरूक करे,उनका उत्साह बढ़ाए । लड़ाई लम्बी चलेगी हमें सारे भेदों को भूल कर एक परिवार की तरह ही लड़ना होगा।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

भाप से उड़ जाएगा कोरोना का खौफ



हैंड हाइजन के साथ अब रिस्पेरटरी हाइजिन से कोरोना पर ब्रेक
फेफड़े के श्वास नलियों में बढ़ता है रक्त प्रवाह
कुमार संजय। लखनऊ
हैंड हाइजिन के साथ ही ऱिस्पेरटरी हाइजिन को भी रूटीन में शामिल करने की सलाह विशेषज्ञ दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगले तीन सप्ताह हमारे लिए मह्तवपूर्ण है। आज के बाद 14 दिन में संक्रमित मामलों के सामनेआने की काफी आशंका है इस लिए सभी को दोनों हाइजन पर ध्यान देने की जरूरत है। इससे कोई नुकसान भी नहीं होगा। सुबह शाम गरम पानी के भाप से बफारा फेफड़े के संक्रमण से बचने का कारगार उपाय है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन लखनऊ के वरिष्ठ सदस्य डा.पीके गुप्ता कहा कि विशेष रूप से हमें व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान देने की जरूरत है। हाथों की साबुन से सफाई 20 सेकंड तक करनी चाहिएसाथ ही श्वसन तंत्र को प्रभावित करने वाले वायरस जिसमें कोरोना संक्रमण भी आता हैंसे बचाव के लिए अपने ऊपरी श्वास की नलियों तथा नाक के रास्ते को गरम पानी की भाप से सफाई करते रहना चाहिए। खाँसीबंद नाक और बलगम जमा होने पर यह उसे खोलता है।  स्वस्थ व्यक्ति को भी इस मौसम में 2 बार 3 से 5 मिनट भाप लेनी चाहिए जो फेफड़े के श्वास नलियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ा कर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और हमें संक्रमण से हमें बचाता है।

कैसे ले भाप
  
सादे पानी की भाप के साथ  विक्ससंतरे और नींबू के छिलकेलहसुनटी-ट्री ऑइलअदरकनीम की पत्तियों जैसी हर्ब्स का उपयोग कर भाप ले सकते हैं। यह  ऐंटिमाइक्रोबियल होती हैं इसलिए  ये वायरस को किल करने में भी असरकारी हो सकती हैं।
श्वसन तंत्र होता है साफ  
स्टीम हमारी नाक और गले में जाकर वहां जमा म्यूकस (जिससे कफ बनता है) को पतला करती है। इससे हमें सांस लेने में आसान होती है और हम काफी राहत महसूस करते हैं। जुकाम के वक्त भाप लेने से इसलिए राहत मिलती है क्योंकि ठीक प्रकार से सांस ना ले पाने के कारण हमारे शरीर में ऑक्सीजन उतनी मात्रा में नहीं पहुंच पातीजितनी मात्रा हमारे शरीर को चाहिए होती है। इस कारण शरीर में भारीपन और ऊर्जा की कमी का अहसास होता है।  भाप लेने का बाद श्वांस की नलियां खुल जाती है और ऑक्सीजन शरीर में जाने लगता है तो हमें राहत मिलती है।
बचाव नहीं तो हर्ज भी नहीं

संजय गांधी पीजीआइ के विशेषज्ञ कहते है कि हम लोग वार्ड में मरीजों को भाप लेने के लिए कहेते है इससे फायदा न भी हो तो कोई नुकसान भी नहीं है। कोरोना से बचाव के लिए सभी को भाप लेनी चाहिए। इस कारण कई लोग दिन में 2 से 3 बार भाप ले रहे हैं। साथ ही सामान्य से अधिक समय तक भाप ले रहे हैं।
हल्का गर्म लें भाप
कोरोना वायरस अधिक तापमान में मर जाता हैइस विश्वास के कारण लोग बहुत तेज तापमान पर और बहुत देर तक भाप ले रहे हैंजो कि शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। खासतौर पर हमारे फेफड़ों के लिए। क्योंकि हमारे लंग्स शरीर में किसी गुब्बारे की तरह रिऐक्ट करते हैंजो सांस लेने पर फूल जाते हैं और छोड़ने पर सिकुड़ जाते हैं। ये सॉफ्ट टिश्यू से बने होते हैं।
चेहरे और गले में दिक्कत
अधिक तापमान पर भाप लेने से हमारे चेहरे की त्वचा झुलस सकती है। साथ ही हमारे गले में अंदर की त्वचा के टिश्यूज बर्न हो सकते हैंजिस कारण गले में सूजन की दिक्कत हो सकती है। इस कारण खाना खाने और सांस लेने में दिक्कत हो सकती हैजिसका असर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर सकता है। यानी जिस उद्देश्य के लिए हम भाप ले रहे थेउसका उल्टा असर भी हो सकता है।
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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

आधे घंटे और दो बूंद खून से लगेगा कोराना संक्रमण के आशंका का पता



आधे घंटे और दो बूंद खून से लगेगा कोराना संक्रमण के आशंका का पता
आईसीएमआर ने जारी जांच करने वाले किट की
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कुमार संजय। लखनऊ
कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका का पता लगना आसान हो जाएगा। भारतीयचिकित्सा अनुसंधान परिषद ने आधे घंटे और दो बूंद खून या प्लाज्मा में  संक्रमण की आशंका बताने वाले 12 तरह   के किट को हां कहा है। रैपिड जांच की उन किट की लिस्टजारी है जो एफडीए या नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलाजी पुणे से जांच में सही पायी गयी है।इससे आशंका का पता जल्दी लगने से पाजिटिव व्यक्ति इनको एकांत वास में रख कर आगे संक्रमण के फैलाव में मदद मिलेगी । इन रैपिड टेस्ट को नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलाजी ने कई मानकों पर जांचने के बाद जांच के तरीके और उपयोगितापर सहमित जातायी है। इसके बाद आईसीएमआर ने भी इसे मरीजों में इस्तेमाल की सहमति दी है। वायरस के संक्रमित होने सात से आठ बाद जांच कर संक्रमणका  पता लगाया जा सकेगा।  जांच पाजिटिव आ सकती है। संक्रमण खत्म होनेके बाद भी काफी दिन तक पाजिटिव जांच रिपोर्ट आ सकती है जब कि कोई लक्षण नहीं होगा। बताया गया है कि रैपिड तकनीक से पाजिटिव आने पर साबित होगा कि कोरोना वायरस से एक्सपोजर हुआ है। इनमें आगे पुष्टिके लिए विशेष जांच कराने की जरूरत होगी। निगेटिव होनो पर साहित होगा कि कोरोना का संक्रमणनहीं है।
 अभी ऐसे होती है जांच
अभी पीसीआऱ तकनीक से जांच में  नाक और गले से  स्वाब( खुरचन) का नमूना लियाजाता है उसमें से आरएनए वायरस को अलग  पीसीआऱ(पाली मराइज चेन रिएक्सन ) तकनीक से संख्या बढ़ा कर   देखा जाताहै उसमें कोराना वायरस का  बैंड देखा जाताहै। यह जटिलप्रक्रियाहै

विशेष जांच की जरूरत होगी कम

इंडियन एसोसिएशन की माइक्रोबायोलाजिस्ट की सदस्य और  डा. विनीता खरे कहती है कि इससे आरटीपीसीआर तकनीक से कोरोना संक्रमण जांच कराने वाले मरीजों की संख्या में कमी आएगा। यह जटिल और मंहगी जांच है ।   रैपिड टेस्ट पाजिटिव आता है तो आगे केवल पुष्टि के लिए पीसीआऱ तकनीक से जांच की जरूरत होगी। लोड कम होनेसे संसाधन का इस्तेमाल सही दिशा में होगा।