मंगलवार, 16 जून 2020

अवसाद की घंटी न करें अनसुना...दिमाग का केमिकल लोचा है डिप्रेशन

दिमाग का केमिकल लोचा है डिप्रेशन, हिम्मत से हो सकता है मुकबला  

हर 6 वें में संभव है अवसाद लेकिन कर सकते है मुकाबला
ब्रेन के न्यूरो ट्रांसमीटर में होता है बदलाव 



कुमार संजय। लखनऊ

हर व्यक्ति कभी ना कभी मानसिक रूप से बीमार महसूस करता है।लगभग हर छठे व्यक्ति को गंभीर प्रकार का डिप्रेशन जीवन में कभी ना कभी होता है। हर २० में से एक डिप्रेशन का शिकार व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता  है और इनमे से अधिकांश ने अपने किसी करीबी से या डॉक्टर से एक महीने के अंदर अपने अवसाद के बारे में बात भी की होती है। इसको समझ नही पाते या हलके में लेते हैं। संजय गांधी पीजीआइ के अंतःस्रावी ग्रंथि विभाग( इंडोक्राइनोलाजी ) के डा. अजय शुक्ला के मुताबिक अवसाद का सबसे बडा कारण केमिकल लोचा है। मस्तिष्क के तनाव को नियंत्रित करने की प्रक्रिया गड़बड़  हो जाती है, जिसका कारण अवसाद के मरीज़ों के मस्तिष्क  के तंत्रिका तन्तुओं (न्यूरॉन ) के कनेक्शन और ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर में हुए कई बदलाव होते हैं।शरीर के अंदर के विघटनकारी तंत्र ज़्यादा सक्रिय हो जाते हैं कोशिका के लेवल तक तनाव बढ़ता जाता है और शरीर की ताक़तें अपने ही ख़िलाफ़ काम करने लगती हैं हार्मोन जैसे की कार्टिसोला , टीएसएच आदि के लेवल भी प्रभावित होते हैं।  डिप्रेशन की दवाएँ ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर आदि में नियंत्रण करती हैं।  इन बदलावों को पुनः परिवर्तन करने में समय लगता है इसीलिए ज़्यादातर दवाइयों का असर कुछ महीनों के बाद ही आता है। इन दवाओं के साथ योग ध्यान काफ़ी  मददगार होता है







जरूरी है भरोसा

किंग जार्ज मेडिकल विवि के डा.एसके कार कहते है कि अवसाद में सबसे ज़रूरी है साथ का भरोसा,हमें सामने वाले व्यक्ति को बिना जज किए पूरी तरह से सुनना चाहिए और उसे हर हाल में साथ देने का भरोसा दिलाना चाहिए,चाहे वो कितनी भी बड़ी गलती या समस्या क्यों ना हो।इसके साथ जल्द से जल्द मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए और उसका उपचार करना चाहिए जैसे डाइअबीटीज़ या ब्लड प्रेशर की बीमारी में हम करते हैं वैसे ही। आत्म हत्या के विचार अगर किसी व्यक्ति को आ रहें हो तो उसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।



यह है लक्षण



अच्छी खबर से मन कुछ दिनो के लिए अत्यधिक खुश हो जाता है खबर मिलते ही हम राजाओं की तरह अपने गले की स्वर्ण माला आदि बाँटना चाहते हैं सबको मिठाई खिलाते हैं सबसे मिलते हैं पर इस प्रकार का मूड अगर एक हफ़्ते से ज़्यादा रहे तो इस अति राग(अत्यधिक ख़ुशी का विचार और अत्यधिक ऊर्जा) को उन्माद (मेनिआ ) कहते हैं। अधिकांश लोगों में यह बिना किसी बाहरी कारण के होता है।इसी प्रकार बुरी खबर सून कर दुखी होना स्वाभाविक है पर अगर दो हफ़्ते से ज़्यादा के अति-द्वेष(बुरा दुखी  होने का विचार) का विचार हमें ज़्यादातर समय आए तो यह अवसाद (डिप्रेशन) हो सकता है ।

ऐसे अवसाद से पा सकते है छुटकारा

डा. अजय शुक्ला के मुताबिक हम नकारात्मक को सकारात्मक बदलावों में बदल सकते हैं कैसे


• ध्यान भटकाना -जैसे अगर मन दुखी हो या ग़ुस्से में  तो उल्टी गिनती गिने,या कुछ खेलने जाएँ,कुछ दोस्तों से फ़ोन में बाद करें आदि।

• प्राणायाम -नियमित प्राणायाम के द्वारा ब्रेन में हुए बदलाव,उन्माद अवसाद क्रोध आदि को बहुत कम कर देते हैं।(यह एक बड़ा विषय है इस पर फिर कभी)

• नियमित व्यायाम,आचार आहार विचार विहार का संतुलन

• आता माझी सटकली- “मेरा दिमाग खराब हो रहा है  या मैं आपे से बाहर हो रहा हूँ।ऐसी परिस्थितियों को पहचाने और अपना व्यवहार बदले।जब भी ऐसा ख़्याल आए रुकें जो आप करना चाह रहें हैं उसे दो दिन के लिए पोस्ट्पोन करें।दो दिन बाद पुनः सोचें क्या आज आप वही करना चाह रहें हैं।ऐसा करके आप आवेश में आकर की गई ज़्यादातर दुर्घटनाओं को रोक पाएँगे।

• हमसफ़र – बच्चे को पोरा भरोसा होता है की उसके माता पिता सर्व शक्तिमान है और उसकी सारी समस्याओं का उत्तर उनके पास है पर जैसे जैसे वो  बड़ा होता है वैसे वैसे उसका ये भ्रम टूटता जाता है।सत्य यह की हमें शक्तिमान नही पूरे भरोशे वाला इंसान चाहिए जो हमें जज ना करे सिर्फ़ समझे सुने। हम सब को कोई ना कोई हमसफ़र,साथी,चाहिए होता है ।इसलिए परिवार और मित्रों के साथ समय बिताए और अपने दुःख सुख बाँटें।अकेलापन अधिकांश लोगों(अगर आप योगी नही है तो) को अवसाद की तरफ़ ले जाता है,इससे बचना चाहिए।

• सही मनोदृष्टि- दुनिया को अपने दुखों का कारण मानना बंद करें।जीवन का सत्य समझे की दुःख और सुख संसार का नियम है और आनंद चित्त का स्वाभाविक निरंतर स्वभाव है जिसे सतचितानंद कहते हैं  ,जिसकी प्राप्ति योगमार्ग से होती है

• गंभीर होने की बीमारी – ज़्यादा गंभीर होना अपने आप में बीमारी है रोज़ सामान्य बातों में हंसे लोगों से मज़ाक़ करें सुने,ये सब  हमारे मन को हल्का करता है

सोमवार, 15 जून 2020

मरीजों को कोरोना से उबार रही कोक में मिली कैंसर की दवा


-मरीजों को कोरोना से उबार रही कोक में मिली कैंसर की दवा



-

ब्लड कैंसर की दवा ने संक्रमित मरीजों में दिए राहत के संकेत,





- बीटीके अवरोधक रसायन फेफड़े को बचाने में कामयाब

- शरीर केे खराब इम्यून सिस्टम को दुरुस्त करने में मददगार



कुमार संजय़, लखनऊ

कोरोना संक्रमित मरीजों को बचाने के लिए पूरी दुनिया में चल रही कवायद के बीच नए शोध से उम्मीद की किरण फूटी है। खास तरह के  ब्लड कैंसर के इलाज के लिए दी जाने वाली  दवा कोक में मिलाकर देने से कोरोना संक्रमित मरीजों को उबारना संभव हो पाया है। रक्त (ब्लड) कैंसर के इलाज में दी जाने वाली दवा कैल्क्विंस ( रसायनिक नाम) से उन मरीजों को राहत मिली है, जिनमें ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो गया था । उन्हें ऑक्सीजन थेरेपी पर रखा गया था। ऐसे कुछ मरीज वेंटीलेटर तक पर थे। इलाज की नए कारगर तरीके पर काम  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआइएच) नेे भी किया, जिसका नेतृत्व नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (एनसीआइ) में सेंटर फॉर कैंसर रिसर्च ने किया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड संक्रामक रोग (एनआईईडी), अमेरिकी रक्षा विभाग के वाल्टर रीड नेशनल मिलिट्री मेडिकल सेंटर के वैज्ञानिक व चार अन्य अस्पताल भी शोध में शामिल रहे। इस शोध को संजय गांधी पीजीआइ, लखनऊ से भी साझा किया गया है।

चिकित्सा विज्ञानियों ने कैंसर की दवा से कोरोना पीड़ितों को इलाज शुरू किया तो देखा कि कोविड- 19 से संक्रमित उन मरीजों को काफी राहत मिली जो ऑक्सीजन थेरेपी पर थे। कोका कोला में मिलाकर दी गई कैंसर की दवाई का असर ऐसा हुआ कि उनमें 72.2 फीसदी रूम एयर वेंटीलेशन पर आ गए और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। जो मरीज वेंटीलेटर पर थे, उनमें 50 फीसदी का वेंटीलेटर हट गया। यह दवा सभी को 10 से 14 दिन तक दी गई और ऑक्सीजन स्तर बढने का क्रम एक से तीन दिन में ही दिखने लगा। इस शोध की जानकारी साइंस इम्यूनोलाजी ने इनहैबिशन ऑफ ब्रुटन टायरोसिन काइनेस इन पेशेंट विथ सीवियर कोविद-19 विषय के नाम से साझा की है। अब वैज्ञानिक दूसरे स्टेज की नतीजे तलाशने में जुट गए हैं।



बड़े काम का बीटीके अवरोधक

संजय गांधी पीजीआइ में क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट प्रो. विकास अग्रवाल कहते है कि शोध रिपोर्ट में बताया गया नुस्खा कोरना संक्रमित मरीजों के लिए काफी कारगर है। इस रसायन के देने से मरीजों में काफी अच्छा परिणाम मिला है। दवा के  बहुत कम दुष्प्रभाव हैं। दवा का जेनेरिक नाम एकलाबरुटिनीब है, जिसमें  कैल्क्विंस नाम के यौगिक का संस्करण है। यह एक ब्रूटनस  टायरोसिन काइनेस (बीटीके) अवरोधक है, जो सफेद रक्त बी कोशिकाओं को प्रभावशाली बनाकर प्रोटीन बनने से रोकता है। यह अवरोधक कोविद-19 रोगियों की कमजोर इम्युनिटी को ठीक करता है।




ऐसे दी दवा की डोज

मरीजों को रोजाना सौ मिली ग्राम दवा दी जाती है। कोका कोला के साथ कैप्सूल में पाउडर मिलाया, जो पहले दवा को घोलने में कारगर रही। इसके बाद इस कॉम्बिनेशन को नासोगास्ट्रिक ट्यूब से होकर गुजारा गया। कार्बोनेशन को कम करने के लिए तीन बार सोडा मिलाने के बाद डाइट कोक के साथ दवा को मिलाया, जिससे दवा को एयरोसोल में बदलने की क्षमता है ।






बुधवार, 10 जून 2020

जब दिल बोले हां...तभी कोरोना से बचाव और इलाज के लिए हाइड्राक्सी क्लोरोक्वीन---पीजीआई सहित देश के 13 संस्थान ने मिल कर किया शोध








कोरोना से बचाव व इलाज के लिए एचसीक्यू देने पहले हार्ट बीट पर रखनी होगी नजर

क्लोक्वीन बिना डाक्टरी सलाह के लेने से दिल पर पड़ सकता है भारी
इस्तेमाल से पहले ईसीजी जरूरी

क्लोरोक्वीन के इस्तेमाल पर पर  गाइड लाइन





कुमार संजय। लखनऊ

कोरोना से बचाव और इलाज के लिए हाइड्राक्सी क्लोरोक्वीन दवा का इस्तेमाल खूब हो रहा है। क्लोक्वीन के इस्तेमाल के लिए देशी गाइड लाइन इंडियन हार्ट रिदम सोसायटी ने जारी की है। इस दवा के इस्तेमाल से दिल के परेशानी की आशंका रहती है। बचाव या इलाज के लिए इस दवा को देने से पहले ईसीजी डांट की सिफारिश करते हुए कहा गया है कि क्यूटीएस( हार्ट रेट बीट प्रति मिनट) 500 मिली सेकेंड से कम है तो इस दवा को देने से परेशानी की आशंका कम होगी। सामान्य तौर पर पुरूष में 460 और महिला में क्यूटीसी 460 मिली सेंकेंड होता है।  पांच सौ तक खतरा है लेकिन पांच से अधिक क्यूटीसी होने पर इलाज और बचाव मे क्लोरोक्वीन दवा देने के बाद विशेष देख –भाल की जरूरत पर बल दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि  आईसीएमआर ने भी बचाव और इलाज के लिए इस दवा की संस्तुति की है।  एचसीक्यू का उपयोग बिना डाक्टरी सलाह के नहीं लेना चाहिए। सामान्य लोग बचाव के लिए इस दवा का इस्तेमाल कतई न करें। इस दवा को लेने से पहले से ईसीजी जांच किया जाना चाहिए। दूर दराज जहां पर ईसीजी मशीन की सुविधा नहीं है वहां पर स्मार्टफोन आधारित पॉकेट ईसीजी उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है।  इससे मौजूदा स्थिति में स्वास्थ्य देखभाल संसाधनों की बचत हो सकती है । एचसीक्यू के संभावित लाभकारी प्रभावों के लिए यह दवा से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं को रोकने में मदद कर सकती है।



देश के 11 संस्थान के विशेषज्ञों ने किया शोध

कार्डियो वेस्कुलर रिस्क आफ हाइड्रोक्लोकोक्वीन इन ट्रीटमेंट एंड प्रोफाइलएक्सिस आफ कोविद -19 पेशेंट विशय पर संजय गांधी पीजीआई के प्रो. आदित्य कपूर , मद्रास मेडिकल कालेज के डा. उलहास, मैक्स दिल्ली से डा.विनीता अरोरा, स्टरलिंग हास्पिटल अहमदाबाद से डा. अजय गुप्ता, फोर्टीस दिल्ली से डा. अर्पणा डा. अनिल सक्सेना , केईएम मुंबई से डा. आशीष  सहित देश के अन्य संस्थान हृदय रोग विशेषज्ञों के रिपोर्ट को इँडियन पेसिंग इलेक्ट्रोफिजियोलाजी जर्नल ने स्वीकार किया है।

बाई पास सर्जरी में भी दिल रहेगा मजबूत--पीजीआई ने खोजी री लोड स्टेटिन तकनीक






री लोड स्टेटिन बाई पास के दौरान रखेगा दिल को मजबूत

सर्जरी के दौरान दिल को न हो नुकसान खोजा नया नुस्खा

सर्जरी के सात दिन पहले दिया 40 मिली ग्राम स्टेटिन कम हुआ दिल को नुकसान

कुमार संजय। लखनऊ  



संजय गांधी पीजीआइ के विशेषज्ञों ने बाई पास सर्जरी को सुरक्षित बनाने के नया नुस्खा खोज निकाला है। इस नए नुस्खे में विशेषज्ञों ने बताया है कि बाई पास सर्जरी के एक सप्ताह पहले से मरीजों को 40 मिली स्टेटिन देने से दिल को कम नुकसान होता है। इस तथ्य की साबित करने के लिए विशेषज्ञों ने सौ बाई पास के मरीजों पर शोध किया जिसमें एक वर्ग को सर्जरी के एक सप्ताह पहले से 40 मिली ग्राम स्टेटिन दिया गया देखा कि जिन में यह नुस्खा दिया गया उनमें दिल के घात या इंजरी देने वाले एंजाइम का स्तर कम रहा था वेंटीलेटर सपोर्ट की जरूरत कम पडी। विशेषज्ञों ने यह भी साबित किया कि इनमें बाई पास के इन मरीजों में ब्लड प्रेशर बढाने वाली दवा की जरूरत कम पडी। विशेषज्ञों का कहना है कि दिल की बाई पास सर्जरी में दिल की मांसपेशियों की इंजरी होती है जिससे दिल की मजबूती थोड़ी कम होती है इस कमजोरी को कम करने में रीलोड स्टेटिन तकनीक कारगर साबित हो सकती है। इससे मरीज का भर्ती होना का खर्च कम होने  के साथ रिस्क फैक्टर कम होगा।



 कैसे हुआ शोध

विशेषज्ञों के मुताबिक दिल के बाई  पास  सौ मरीजों को एक सप्ताह पहले 40  मिली ग्राम स्टेटिन दिया गया। सर्जरी के आठ, 24 और 48  घंटे बाद कार्डियक इंजरी बायोमार्कर ट्रोपोनिन, सीके-एमबी और बीएनपी एंजाइम की परीक्षण किया गया तो देखा कि ट्रोपोनिन री लोड वर्ग में 37.96 घंटा प्रति एमएल था जबकि सामान्य वर्ग में 70.12 था। सीके-एमबी( क्रिएटनिन काइनेज मसल-ब्रेन  229.64 था जबकि सामान्य  में वर्ग  347.04नैनो ग्राम। बीएनपी( बी टाइप नाट्रीयरेटिक पेप्टाइड) री लोड वर्ग में 5257.56 और सामान्य वर्ग में  15606.68 पिको ग्राम घंटा प्रति एमएल देखा गया। ब्लड प्रेशर कम करने की दवाएं देने का समय री लोड वर्ग में औसतन 22.9 और सामान्य वर्ग में 31.26 घंटा इसके साथ वेंटीलेटर पर रखने का समय री रोड वर्ग में औसत 16.94 और सामान्य वर्ग में 23.8 घंटा देखा गया।





संस्थान के तीन विभाग के विशेषज्ञों ने मिल हासिल की कामयाबी

कार्डियोलाजी विभाग के डा. अतुल कौशिक, प्रो.आदित्य कपूर, डा.अर्चना सिन्हा, डा.श्रीधर कश्यप, प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो.सुदीप कुमार, प्रो. नवीन गर्ग और प्रो.सत्येंद्र तिवारी, सीवीटीएस विभाग के प्रो.एसके आग्रवाल, प्रो.शांतनु पाण्डेय, प्रो. गौरंग मजुमदार और कार्डियक एनेस्थेसिया विभाग  प्रो.प्रभात तिवारी के इस शोध को एनल्स आफ कार्डियक एनेस्थेसिया इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल ने स्वीकार किया है। विशेषज्ञों ने स्टेटिन री लोड बीफोर आफ पंप कार्नरी आर्टरी बाईपास ग्राफ्ट इफेक्ट- आऩ बायोमार्कर रीलीज काइनटिक्स 

रविवार, 7 जून 2020

जरा संभल कर बैक्टीरिया की है आपके खाने पर नजर विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर विशेष






दूषित खाद्य पदार्थ से नौ मे से एक होते है बीमार



सही तरीके से भोजन न रखने के कारण पहनते है बैक्टीरिया और वायरस



कुमार संजय। लखनऊ







दूषित भोजन से 13.2 फीसदी लोग प्रभावित होते है। सबसे बडे कारण के रूप में बैक्टीरिया का संक्रमण है। विश्वस्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में  44 से ज्यादा लोग हर मिनट दूषित खाने की वजह से बीमार होते हैं।   विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस (7 जून)  के मौके पर  संजय गांधी पीजीआइ की पोषण विशेषज्ञ डा.अर्चना सिन्हा और डा.रीता आनंद कहती है कि खराब खाने की वजह में बैक्टीरिया, वायरस और रासायन बडे कारण है।  दूषित खाना खाने की वजह से डायरिया की बीमारी सबसे अधिक होती है। सेलमोनेला, कंपाइलो वेक्टर, ई कोलाई सिहत अन्य  बैक्टीरिया है जिससे संक्रमण होता है।  डायबिटीज जैसीबीमारी खाने की वजह से ही है।  खाना दूषित है तो आपको हार्ट से लेकर मोटापा जैसी परेशानी होने का खतरा हमेशा बनारहता है। इस पर ध्यान न दिया गया तो नौ में से एक व्यक्ति में इससे परेशानी होगी।




बैक्टीरिया है सबसे बडा कारण

इंटरनेशनल जर्नल आफ फूड साइंस एंड न्यूट्रिशन के मुताबिक भोजन 66 फीसदी मामलों में बैक्टीरिया, 26 फीसदी मामलो में रसायन, 4 फीसदी मामलों में वायरस और 4 फीसदी मामलों में पैरासाइट( परजीवी) के कारण दूषित होता है। 

 



पैक फूड से खतरा



परंपरागत भारतीय खानपान के स्थान पर आधुनिक और पाश्चात्य शैली पर आधारित रेडी-टू-ईट, पैकेज्ड  या डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, जंक फूड और फास्ट फूड के सेवन से हमारे शरीर में हानिकारक तत्वों की वृद्धि होती है।











घर का खाना सबसे बहेतर



पोषण विशेषज्ञा डा. शिल्पी पाण्डेय के मुताबिक जीवन शैली और काम के तनाव के कारण युवा घर पर निर्मितखाद्य पदार्थके सेवन की बजाय मार्केट में उपलब्ध रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थों का सेवन कर भोजन संबंधी आवश्यकताओंकी पूर्ति करते हैं।होटल और टिफिन वाले भोजन में पौष्टिकता की बजाय स्वाद पर बल दिया जाता है। इसीलिए स्वाद औरफैशन के चक्कर में खाद्य पदार्थों के निर्माण में टेस्ट मेकर, हानिकारक रसायनों, सिंथेटिक कलर, वसा, शुगर, ट्रांस फैटआदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।







यह करें नहीं होगी फूड प्वाइजनिंग



-घर में साफ-सफाई के साथ खाना बनाएं और खाएं,  क्योंकि बाहर के खाने में गंदगी और इंफेक्शन का खतरा हमेशा बनारहता है.







-बाजार में मिलने वाले चमकदार और रंगीन खाद्य पदार्थों का सेवन कम से कम करें







-फल और सब्जियों को हमेशा ठीक से धोकर खाएं







-स्टीकर वाले फलों का उपयोग करने से बचें.







-हेल्द के लिए जरूरी पोषक तत्व देने वाले खाद्य पदार्थों को भोजन में शामि करें







-अपने खाने को पॉलिथिन या अखबार में लपेटकर न रखें. प्लास्टिक के बर्तन में गरम भोजन न रखें







-4 से 6 घंटे पहले बने भोजन का उपयोग करने से बचें







-फल और सब्जियों का उपयोग करते समय सड़े-गले फलों को न खाएं

- पैक आइटम लेते से उस पर एक्सपाइरी देखे











 भोजन में दिखें यह  बदलाव तो खाने से बचें







-भोजन का रंग बदलना- अगर आप सब्ज़ियों को फ्रिज़ में दो हफ्तों से अधिक समय तक रखते हैं और आपको किसी सब्ज़ीका रंग बदलता दिखे तो समझ जाइए वह खाने लायक नहीं है।







खाने में बुलबुले उठना- सूप या करी पकाते समय उसमें बुलबुले उठते हैं लेकिन इसके अलावा अगर फ्रिज से निकालने केबाद आपके खाने में बुलबुले उठे हुए दिखायी दें तो उसे न खाएं। बुलबुलों का मतलब यही है कि आपके खाने मेंबैक्टेरिया पनपने लगा है।



 फल-सब्ज़ियां नरम हो जाना- खाने से पहले देख लें कि आपके फल या सब्ज़ियां








शुक्रवार, 5 जून 2020

60 फीसदी लोगों को नहीं लगता कोरोना से डर...मानते हो जाएंगे ठीक






60 फीसदी कोरोना को लेकर मजबूत मानते है कि कोरोना से संक्रमित हुए तो भी हो जाएंगे ठीक
72 फीसदी लोग जानते है कोरोना से बचने का तरीका
50 फीसदी लोग कोरोना से है बेचैन
कुमार संजय़। लखनऊ
कोरोना से लड़ने की जानकारी के मामले में प्रदेश के लोग काफी जागरूक है। 60 फीसदी लोग मानते है कि कोरोना से संक्रमित होने पर वह ठीक हो जाएंगे। 72 फीसदी लोग जानते है कि कोरोना से बचने के लिए सेनेटाइजर, हाथ का धुलना और दस्ताने के इस्तेमाल जरूरी है लेकिन इसके साथ ही देखा गया है कि 50 फीसदी लोग कोरोना से बेचेन हो रहे है। देखा गया कि 80 फीसदी लोगों को मेंटल केयर की जरूरत है। विशेषज्ञों ने 662 लोगों पर शोध के बाद किया है। इसमें से  51.2 फीसदी महिलाएं और 48.6 फीसदी पुरूष शामिल हुए। शोध में उत्तर प्रदेश के आलावा , उडीसा, हरियाणा सहित अन्य प्रदेश के लोग शामिल हुए। 29.5 फीसदी को पता है कि कोरोना संक्रमण कैसे फैलता है। 56 फीसदी ने पालतू जानवर से फैलता है नकार दिया। 97 फीसदी को पता है लगातार हाथ धुलने से संक्रमण के फैलाव को रोका जा सकता है। 18.2 फीसदी को पता है कि बुखार संक्रमण का मुख्य लक्षण है।
ऐसे हुआ शोध
किंग जार्ज मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा.एसके कार के अगुवाई में स्टडी आफ नालेज , एटटीट्यूड, एनेक्साइटी एंड परसिवड मेंटल हेल्थ केयर इन इंडियन पापुलेशन ड्यूरिंग कोविद-19 पैनडेमिक विषय़ पर शोध हुआ जिसमें डा.देवलीना राय, डा. सर्वोदय त्रिपाठी. डा. निवेदिता शर्मा, डा.सुधीर कुमार वर्मा, डा.विकास कुशल शामिल हुए जिसे एसियन जर्नल आफ साइकेट्रिक ने स्वीकार किया।     



किनमें हो रही है बेचैनी

- बेचैनी और तनाव उन लोगों में बढ़ रहा है जो घर से बाहर निकल रहे हैं।
-ऑफिस जाना शुरू किया है, जो सामान की खरीदारी करने बाजार जा रहे हैं।
- आस-पास कोई पॉजिटिव मरीज मिल जाता है
--   बुजुर्गों में देखे जा रहे हैं, जो परेशान होकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।
- पेरेंट्स शामिल हैं, जिनके लिए सबसे बड़ी चिंता बच्चे हैं।
- कुछ समय के लिए ही सही बच्चे पार्क में जा रहे हैं तो वे क्या छू रहे, किससे बात कर रहे हैं, वापस आने पर कहीं वो संक्रमण लेकर नहीं आ रहे हैं। ऐसे मामले पेरेंट्स का तनाव बढ़ा रहे हैं।


ऐसे करें बचाव
-खुद का ध्यान निगेटिव खबरों से डायवर्ट करें। देश में 80 फीसदी कोरोना के मरीज बिना दवा के ठीक हो रहे हैं। दिनभर टीवी पर सिर्फ इसे ही देखते न रहें।

- रोजाना एक घंटा योग, एक्सरसाइज या मेडिटेशन करें। दिमाग को रिलैक्स होने दें। शरीर में ऑक्सीजन का लेवल बढ़ाएंगे तो खुद दिनभर तरोताजा पाएंगे।
- मामूली सर्दी-खांसी आने पर लोग बेचैन हो जाते हैं। ऐसे में हर बदलाव को वह शक की नजर से देखते हैं। इससे बचने के जरूरत है।
- कोरोना अब जीवन का हिस्सा बन गया है, लेकिन डरना नहीं है। जैसे मलेरिया और फ्लू जैसी बीमारियों से निपटने के लिए हम सावधानी अपनाते हैं। वैसे ही कोरोना के लिए भी करना है।

- इन दिनों सरकार ने टेलीमेडिसिन की सुविधा शुरू की है। चाहें तो सरकारी मदद या अपने डॉक्टर को फोन पर हालात बताकर सलाह ले सकते है। साइकोथैरेपी और दवाओं से इलाज किया जा सकता है।

गुरुवार, 4 जून 2020

मलिन बस्ती के 33 फीसदी किशोर-किशोरियां मानसिक रोग के शिकार

मलिन बस्ती के 590 किशोर और किशोरियों पर हुआ शोध



राजधानी के 33 फीसदी किशोऱ मानसिक परेशानी के शिकार
मानसिक परेशानी के कारण भटकते है किशोर
कुमार संजय। लखनऊ

राजधानी के मलिन बस्ती में रहने वाले  किशोर और किशोरियां    मानिसक रोग के शिकार है। इस तथ्य का खुलासा हाल में ही मानसिक रोग विशेषज्ञों ने राजधानी के मलिन बस्ती में रहने वाले   लगभग 590 किशोरों पर करने के बाद किया है। शोध में उन्ही किशोरों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता ने शोध में भाग लेने के लिए सहमति दी थी। देखा गया कि  33 किशोर जो मानसिक विकार के गंभीर स्तर से पीड़ित पाए गए। इस अध्ययन के परिणामों से पता चलता है कि 12-15 वर्ष की आयु के किशोरों में 16-19 वर्ष के किशोरों की तुलना में अधिक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं थीं। किशोरियों में  गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित होने की अधिक मिली।   यह पाया गया कि उम्र, लिंग, शिक्षा, जाति, घरेलू आर्थिक स्थिति, धर्म मानसिक स्वास्थ्य समस्या से महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है। शोध वैज्ञानिकों का कहना है कि  सरकार को किशोरों के बेहतर स्वास्थ्य परिणामों के लिए इन मलिन बस्तियों में किशोरों की अनुकूल स्वास्थ्य सेवाओं (नैदानिक, मानसिक, पोषण सहित) की एक विस्तृत प्लानिंग की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक परेशानी के कारण कई बार किशोर और किशोरियां गलत रास्ते पर चले जाते है जो कई तरह की सामाजिक परेशानी के कारण होते हैं। प्रिवलेंस एंड प्रिडिक्टरस आफ मेंटल हेल्थ डिसआर्डर एमंग द एडोलीसेंट लिविंग इन द स्लम आफ लखनऊ शीर्षक से शोध हुआ।इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फार पापुलेशन साइंस मुंबई के डा. सतीश कुमार चौहान और इसी संस्थान के डिपार्टमेंट आफ पापुलेशन पालसी एंड प्रोग्राम विभाग के डा.मुरली धर के शोध कम्युनिटि मेंटर हेल्थ मेडिकल जर्नल ने स्वीकार किया है।


क्या है मानसिक स्वास्थ्य

-मानसिक स्‍वास्‍थ्य से तात्‍पर्य भावनात्‍मक, मानसिक तथा सामाजिक संपन्‍नता है। किसी व्‍यक्‍ति का मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य वह किस प्रकार सोचता है, महसूस करता है या व्‍यवहार करता है को प्रभावित करता है ।  अस्‍वस्‍थ मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का व्‍यक्‍ति के व्‍यवहार संबंधों तथा व्‍यावसायिक कैरियर पर भी भारी प्रभाव पड़ता है।

क्या है लक्षण
असामान्‍य विचारों, भावनाओं, व्‍यवहार और दूसरों के साथ संबंधों  के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य का पता लगता है। स्‍किजोफ्रेनिया, अवसाद, बौद्धिक विकलांगता एवं नशीली दवाओं के दुरूपयोग के कारण हैं। 

बिना सीना खोले लगाया दिल में वाल्व --- यूपी में कोविद काल के दौरान पहला ट्रांसकैथेटर हार्ट वाल्व इंप्लांट

बिना सीना खोले लगाया दिल में वाल्व
यूपी में कोविद काल के दौरान पहला ट्रांसकैथेटर हार्ट वाल्व इंप्लांट
 64 की उम्र में संभव नहीं थी अोपेने सर्जरी

बिना सीना खोले संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञों ने दिल के वाल्व लगाने में सपलता हासिल की है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना समय के दौरान दिल के वाल्व की यह प्रदेश की पहली सर्जरी है। कार्डियक इंटरवेंशनल तकनीक से बिना ओपेन हार्ट सर्जरी ट्रांसकैथेटर एरोटिक वाल्व रोपण किया गया।कोविद निगेटिव रजनीश 64 वर्षीय पुरूष  में एरोटिव वाल्व और दिल के मुख्य आउटलेट वाल्व के बीच रूकावट थी जिसके कारण दिल पर दबाव और बाएं वेंट्रिकल के पंपिग चेम्बर  में परेशानी हो गयी थी।  पंपिंग चैंबर की इस परेशानी कारण रोगी सांस की तकलीफ के साथ गंभीर रूप से परेशानी थी। ऐसे लोगों में  वाल्व को बदलने के लिए सामान्य मानक तरीका  ओपन हार्ट सर्जरी के जोखिमों को बर्दाश्त करने में सक्षम थे। विशेषज्ञों ने बताया कि ट्रांसकैथेटर वाल्व रोपण एक नई तकनीक है और 2016 में पहली बार कार्डियालाजी विभाग के  प्रो. पीके गोयल ने स्थापित किया था। तब से लगभग 25 ऐसी प्रक्रियाएं की जा चुकी हैं। प्रक्रिया पैर की बड़ी धमनी(आर्टरी) में बने बोर होल के माध्यम लगभग 3 सेमी व्यास का  वाल्व दिल में वाल्व के खराबी वाले  सही स्थान पर पहुंचा कर रोपित किया जाता है। प्रक्रिया में लोकर एनेस्थेसिया दी जाती है। इस तकनीक को प्रो. पीके गोयल और  प्रोफेसर रूपाली खन्ना ने आंजाम दिया। यह प्रक्रिया इस गंभीर रोगी के लिए एक वास्तविक जीवन रक्षक थी जिसे उसके गंभीर लक्षणों के कारण 3 सप्ताह से अधिक समय तक भर्ती रखा गया था।  इसमें बीस लाख का खर्च आया।