गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

पीजीआइ में होगी दो गुना अधिक दिल की सर्जरी - दिल की सर्जरी के लिए मिल रहा है 2026 का डेट

पीजीआइ में होगी दो गुना अधिक  दिल की सर्जरी 


दिल की सर्जरी के लिए मिल रहा है 2026 का डेट
किडनी ट्रासप्लांट  सप्ताह में 10 से 15 करने की योजना
 


सब कुछ प्लानिंग के अनुसार चलता रहा तो संजय गांधी पीजीआइ में दिल की सर्जरी के लिए दो से तीन साल का इंतजार नहीं करना पडेगा। हर साल संस्थान में 860 मरीजों में दिल की सर्जरी होती जिसे 2019 के अंत तक बढा 15 सौ करने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। इस समय संस्थान के सीवीटीएस विभाग की एक यूनिट में सर्जरी के 2026 की डेट मिल रही है एेसे में जो इंतजार नहीं कर सकते है वह कारपोरेट अस्पतालों में चार से पांच लाख खर्च कर सर्जरी कराते हैं। संस्थान में 1.5 लाख में सर्जरी का खर्च अाता है। मरीजों को तमाम परेशानी से बचाने के लिए सीवीटीएस आईसीयू की संख्या बढा कर 26 की जा रही है इस समय केवल 12 हैं।  एक अोटी भी बढायी जा रही है। संस्थान के 35 वें स्थापना दिवस समारोह (14 दिसंबर) के मौके पर निदेशक प्रो.राकेश कपूर, डीन प्रो.एसके मिश्रा, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो.अमित अग्रवाल और कार्डियक सर्जन प्रो.एसके अग्रवाल ने अागे योजनाअों और बीते चार साल में उपलब्धियो का खाका रखते हुए बताया कि सर्जरी के तुरंत बाद आईसीयू की जरूरत होती है जहां वह स्वास्थ्य लाभ लेता है। सर्जरी की संख्या बढने के साथ दिल की सर्जरी की वेटिंग कम होगी। इसी तरह किडनी ट्रांसप्लांट के लिए 1.5 साल की वेटिंग है नए रीनल ट्रांसप्लांट सेंटर बनने के बाद वेटिंग कम होगी। अभी सप्ताह में तीन से चार किडनी ट्रांसप्लांट हो रहा है नया सेंटर बनने के बाद सप्ताह में 10 से 15 ट्रांसप्लांट होगा। ट्रामा सेंटर को 60 से 2 सौ बेड करने की योजना पर काम हो रहा है। समारोह में मेंदाता अस्पताल के अध्यक्ष पदम श्री डा. नरेश त्रेहन स्थापना दिवस व्य़ाख्यान देंगे।  

क्या है उपलब्धियां
-मेडिटल टेक्नोलाजी कालेज जो 15 साल से पेंडिग था
- 24 हावर लैब जहां इमरजेंसी में दो घंटे में जांच रिपोर्ट
-क्रिटिकल केयर मेडिसिन में 10 बेड बढा
- मरीजों को शुद्ध पानी के लिए सेंट्रल आरअो प्लांट
-नियोनेटोलाजी का विस्तार
-न्यू अोपीडी और न्यू लाइब्रेरी सात साल से पेंडिंग था 
-रिसर्च पेपर की गुणव्ता में देश में नंबर वन और देश टांप 10 मेडिकल संस्थान में स्थान
- लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट क्रियाशील हुअा जो चार साल से बंद पडा था


फैक्ट फीगर...  
- साल में नए मरीज- 10919
-फालोअप मरीज- 459032
- भर्ती- 56509
- बडी सर्जरी- 13987
-संकाय सदस्यों की संख्या- 252
- पैरामेडिकल स्टाफ( नर्सेज और टेक्नोलाजिस्ट)- लगभग 2000
- सपोर्टिग स्टाफ- लगभग तीन हजार 

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

पीजीआइ में मिलेगी नई दर पर दवा और सर्जिकल आइमटम

पीजीआइ में मिलेगी नई दर पर दवा और सर्जिकल आइमटम


मई 2019 तक लागू हो जाएगी नई दर

मरीजों को 40 से 80 फीसदी कम दर पर मिलेगी दवा और सर्जिकल आइटम


संजय गांधी पीजीआइ नई दर पर दवा और सर्जिकल आइमट( स्टंट, केथैटर सहित अन्य)  उपलब्ध कराएगा। हास्पिटल रिवालविंग फंड के चेयरमैन एवं नेफ्रोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. अमित गुप्ता एवं प्रभारी आरए यादव ने बताया कि दवा और सर्जिकल आइमटम मरीजों को कम कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए कई कंपनियों से करार हुअा था जो अप्रैल 2019 में खत्म हो रहा है। इस बीच नई टेंडर प्रक्रिया चल रही है जो तय समय में पूरी कर मई से  लागू कर दी जाएगी। ऩए करार में कुछ की कीमत कम तो कुछ बढ़ सकती है। संस्थान तीन साल के लिए करार करता है। स्पष्ट किया जिस तरह पहले कीमत से 40 से 80 फीसदी कम कीमत पर दवा और सर्जिकल आइटम पर उपलब्ध कराया जाता है यह जारी रहेगा। एचआरएप की स्थापना का उद्देश्य ही यही है। बताया कि संस्थान में 10 हजार दवाएं और सर्जिकल आइटम की खरीद के लिए कंपनियों से सीधे करार होता है। क्या दवा और सर्जिकल आइमटम लेना है संबंधित विभाग के संकाय सदस्य फाइनल करते है जिसकी संस्तुति के बाद खरीद के लिए करार होता है

रविवार, 2 दिसंबर 2018

आईसीटीसी ने एड्स ग्रस्त लोगों के जिंदगी में भरी रोशनी...ए्डस के बाद भी जी रहे है अच्छी जिंदगी


घुप्प अंधेरे से आहिस्ता-आहिस्ता रोशनी में आई जिंदगी
 हंसी-खुशी सामान्य जीवन जी रहा था तो किसी ने शादी के बाद के कई ख्वाब संजोकर रखे थे। अचानक उनकी जिंदगी में एचआईवी संक्रमण यानी एड्स ने दस्तक दे दी। एड्स की जानकारी मिलते ही मानो जिंदगी में बिल्कुल अंधेरा हो गया। अब जिंदगी चार दिन की बची है, ऐसी सोच में दिन कटने लगे। जिन अपनों के साथ सुनहरे जीवन को जीने का ख्वाब संजोया था, वह सब बिखरता हुआ दिखने लगा। ख्वाब के समंदर में आंसू, घुटन और तमाम ख्वाहिशों का गला घुटता दिख रहा था। कई लोगों ने जिंदगी समाप्त करने की कोशिश की तो कई ने इसे संवारने की। ऐसे एचआईवी संक्रमित लोगों ने जब एआरटी और आईसीटीसी सेंटर की ओर रुख किया तो उनमें जीवन जीने की तमन्ना जाग उठी और आज वह हंसी-खुशी जीवन जी रहे हैं।
केस दो- राजधानी की ही एक 23 वर्ष की शादीशुदा लड़की को गर्भावस्था के दौरान जांच होने पर पता चला कि वह एचआईवी संक्रमित है। इस बात का पता चलते ही लड़की ने जीवन को समाप्त करने की ठानी। पर, घर पहुंची और दो-तीन दिन तक गर्भ में बढ़ रहे बच्चे के बारे में सोचा। एआरटी सेंटर व निजी संस्था के पास पहुंची। काउंसलिंग की गई। लड़की की सार्थकता को देखते हुए उसने जल्द ही ठान लिया कि वह बच्चा जनेगी और उसे मुकाम दिलाएगी। इसके लिए वह जीवन में जो भी संघर्ष होंगे उसे करेगी। आखिरकार उसने बेटी को जन्म दिया। हालांकि बच्ची भी एचआईवी संक्रमित ही है। लड़की ने निजी संस्था में काम शुरू किया और आज वह बेटी संग बेहतर जिंदगी जी रही है। .
केस एक- करीब तीन वर्ष पूर्व ऑपरेशन के दौरान लखनऊ की एक शादीशुदा युवती (26) को पता चला कि उसे एड्स है। पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। ऐसे में उसने दो-तीन और जगह पर जांच कराई। सभी जगह एचआईवी पॉजिटिव रिपोर्ट मिलने पर वह सहम गई। आखिरकार समाज से लड़ने की हिम्मत खो चुकी इस युवती ने छत से कूदकर खुदकुशी की कोशिश की। पैर टूटा, शरीर में कई जगह चोट लगी। यही नहीं कुछ दिन बाद फिर से खुद को धारदार हथियार से चोटिल कर लिया। पर, इस बार भी जान बच गई। आखिरकार पति को पूरा मामला पता चला। उसने युवती को धिक्कारने या छोड़ने के बजाए उसका साथ दिया। वह पत्नी को लेकर अस्पताल पहुंचा और काउंसलिंग के बाद आज युवती खुलेमन से जीवन जी रही है। .


यह मत सोचें कि अब जीवन नहीं बचा : एचआईवी संक्रमण के बारे में जानकारी होने पर लोग यह कतई न सोंचें की अब आगे जीवन नहीं बचा है और जीने से कुछ नहीं होगा। ऐसा सोचने के बजाय लोग यह ठान लें कि वह अब जीवन को और बेहतर तरीके से सबके साथ जिएंगे। तभी से उनके जीवन में आने वाली सारी कठिनाइयां दूर हो जाएंगी। बस हिम्मत मत हारिए और जिंदगी का डटकर सामना करिए। नियमित दवाओं का इस्तेमाल करें तो आप सेहतमंद जीवन जी सकते हैं।.
हारे नहीं, एड्स से करें सामना : ज्यादातर लोगों को लक्षण के आधार पर लंबे समय बाद ही पता चला पाता है कि उन्हें एड्स है। कई लोगों को किसी प्रकार के ऑपरेशन या गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले होने वाली जांचों से पता चलता है कि वह एचआईवी संक्रमित हैं। उससे पहले वह बेहतर तरीके से जीवन जी रहे होते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वह ऐसा कतई न सोंचे कि उनकी जिंदगी समाप्त हो गई है। उन्हें आगे बढ़कर एचआईवी का सामना और इलाज करना चाहिए, जो कि पूरी तरह से नि:शुल्क है।
कैसे फैलता है एचआईवी
' एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध स्थापित करने पर .
' एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने से .
' संक्रमित सुई के प्रयोग से .
' एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिला
फैक्ट ....
. 'यूपी के एआरटी सेंटरों में 1,38,786 लोग एचआईवी पंजीकृत हैं।
' यूपी में एआरटी के 38 सेंटर संचालित हैं। .


स्मार्ट फोन बना सकता है दिल का मरीज

स्मार्ट फोन बना सकता है दिल का मरीज
देर तक जागने से डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा
अगर आप भी देर रात अपने स्मार्टफोन लैपटॉप या टीवी से चिपके रहते हैं, तो सावधान हो जाएं। एक नए अध्ययन में पता चला है कि रात में उल्लू' की तरह जागने वालों में दिल की बीमारी और डायबिटीज का खतरा ज्यादा होता है। .
शोधकर्ताओं ने पाया कि देर तक जागने वाले लोगों का खानपान ज्यादा खराब रहता है। इंसानी शरीर 24 घंटे के चक्र पर चलता है, जो जैविक घड़ी से नियंत्रित होता है। यह आतंरिक घड़ी हमारे शरीर के कई कामों को नियमित करती है। मसलन यह बताती है कि आपको कब खाना है, कब सोना और कब जागना है। यह आंतरिक घड़ी प्राकृतिक प्राथमिकता के आधार पर यह जल्दी उठने और जल्दी सोने की दिशा में काम करती है। .
शोधकर्ताओं ने अध्ययनों की समीक्षा के बाद पाया कि देर रात तक जगने वाले लोगों में दिल की बीमारी और टाइप 2 डायबिटीज की समस्या ज्यादा थी। जो लोग रात में देर से सोते हैं, उनके गैर पौष्टिक डाइट के अपनाने की आशंका ज्यादा होती है। ये लोग शराब, चीनी, चाय-कॉफी और फास्ट फूड ज्यादा खाते हैं। जबकि जल्दी उठने वाले लोगों में ऐसा कम देखने को मिलता है। दिन में देर से खाने का संबंध टाइप-2 डायबिटिज के जोखिम से भी पाया गया क्योंकि शरीर के अंदर की घड़ी शरीर को ऊर्जा देने के लिए ग्लूकोज को रास्ता देती है। ग्लूकोज का स्तर प्राकृतिक तरीके से दिनभर नीचे गिरता है और रात में वह बिल्कुल निचले स्तर पर पहुंच जाता है। .
रात में जगने वाले लोग अक्सर बिस्तर पर जाने से पहले तक खाते हैं, इसलिए उनके ग्लूकोज का स्तर उस समय भी बढ़ा रहता है, जब वे सोने जाते हैं। इससे मेटाबॉलिज्म पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और शरीर सामान्य जैविक चक्र प्रक्रिया का पालन नहीं कर पाता है। ऐसे लोग दिन में कम बार खाना खाते हैं, लेकिन मात्रा ज्यादा लेते हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि क्यों देर तक जगने वालों की सेहत को खतरा रहता है। .
 देर रात तक जगने वाले लोगों का खानपान भी गड़बड़ाया रहता है.
शोध के मुताबिक देर से सोने वाले लोगों के खानपान का समय भी गड़बड़ा जाता है। देर से सोने की वजह से वे उठते भी देर से हैं, जिससे सुबह के नाश्ते का समय निकल जाता है और वे दिन में देर से खाना खाते हैं। उनके खानपान में अनाज, सब्जी और फलों की मात्रा भी कम होती है। .
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86.5 फीसदी मानसिक रोगी नहीं पा रहे है इलाज- मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञों ने 3508 लोगो पर किया शोध


 86.5 फीसदी मानसिक रोगी नहीं पा रहे है इलाज
       मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञों ने 3508 लोगो पर किया शोध
         6.08 फीसदी मानसिक रोग से ग्रस्त
महिलाओं के मुकाबले पुरूष अधिक है मानसिक रोग के शिकार
        कुमार संजय। लखनऊ
        मानसिक ( साइकेट्रिक) बीमारी से ग्रस्त केवल 13.5 फीसदी लोग ही इलाज पा रहे हैं।  86.5 फीसदी मानसिक रोगी इलाज नहीं पा रहे हैं। प्रदेश में 6.08 फीसदी लोग मानसिक बीमारी के चपेट में है। इस तथ्य का खुलासा किंग जार्ज मेडिकल विवि के मानसिक रोग विशेषज्ञों ने 3508 लोगों पर शोध के बाद किया है।  मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. एसके कार की अगुवाई में शामिल डा. ईशा शर्मा, डा.विवेक अग्रवाल, डा. शिवेंद्र कुमार सिंह , डा. प्रोनोब कुमार दलाल, डा. अमित सिंह, डा. जी गोपीकृष्ना, डा. गिरीश एन राव ने प्रिवलेंश एंड पैटर्न अफ मेंटल इलनेस इन उत्तर प्रदेश पर शोध किया जिसे एसियन जर्नल आफ साइकेट्रिक ने स्वीकार किया है। शोध पत्र में कहा गया है कि मानसिक बीमारी के इलाज के लिए नई सिरे से योजना बना कर काम करना होगा। मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों में से 0.93 फीसदी में आत्महत्या की प्रकृति देखी गयी है। सही समय पर इलाज दे कर इन्हें बचाया जा सकता है। मानसिक रोगों में मुख्य रूप से टुबैको और एल्कोहल यूज डिसआर्डर, स्क्रिजिफ्रेनिया, मूड डिसआर्डर, बायोपोलर , डिप्रेशन, फोबिक एनेक्जाइटी, पैनिक डिसआर्डर, सोशन फोबिया, आब्सेसिव कपलसिव डिसअर्डर, मिर्गी, स्ट्रेस एंड एडजेस्टमेंट सहित कई है। रिपोर्ट के मुताबिक पुरूषों में मानसिक रोग की परेशानी महिलाओं के मुकाबले थोडा अधिक है देखा गया है कि 6.51 फीसदी पुरूष एवं 5.63 फीसदी महिलाएं मानिसक रोग की शिकार है। ग्रामीण क्षेत्र के 5.17, शहरी 5.30 जबकि मेंट्रो अर्बन( महानागर) में रहने वाले 13.72 फीसदी किसी न किसी मानसिक रोग के चपेट में है।

वैवाहिक स्थित                 मानिसक रोग प्रतिशत
कुंवारे
4.36
विवाहित
6.57
विधवा, तलाक शुदा, अलग रह रहे
11.50


उम्र            मानसिक रोग प्रतिशत
18–29
3.83
30–39
6.89
40–49
9.30
50–59
8.02
60 से अधिक
7.06



बुधवार, 28 नवंबर 2018

मीठी गोली बच्चों में दांत निकलने के दौरान परेशानी करेगा छूमंतर




मीठी गोली बच्चों में दांत निकलने के दौरान परेशानी करेगा छूमंतर
11 हजार से अधिक बच्चो पर शोध के बाद स्थापित हुआ तथ्य
उत्तर प्रदेश सहित देश के कई सेंटर पर हुआ शोध   
कुमार संजय। लखनऊ

बच्चों में दांत निकलने के समय से 80 से 90 फीसदी बच्चों में बुखार, डायरिया, जुखाम की परेशानी होती है। कई बार यह परेशानी बच्चों को कमजोर कर देती है। इस परेशानी को कम करने में होम्योपैथी की मीठी गोली काफी कारगर सबित हुई है। यह  होम्योपैथी से जुडे एक दर्जन से अधिक विशेषज्ञों ने उत्तर  प्रदेश सहित देश के कई शहरों में 11 हजार से अधिक बच्चों पर शोध के बाद साबित किया है। इस शोध होम्योपैथः जर्नल आफ द फैकल्टी आफ होम्योपैथ ने स्वीकार किया है। शोध रिपोर्ट के मुताबिक आशा हेल्थ वर्कर को ट्रेंड करने के बाद होम्योपैथ की 6 दवाओं का किट दिया। यह शोध में शामिल 6 माह से एक साल के बच्चों को  जुखाम, बुखार , डायरिया होने पर दवाएं दी तो देखा कि दांत निकलते समय इनमें परेशानी काफी कम हुई। रिपोर्ट मे बताया गया है कि कैलकेरिया फास्पोरीकम 6एक्स 6 माह से एक साल लागातार दिया गया बाकी 5 दवाएं फेरम फास्फोरीकम3एक्स, मैग्नीशियम फास्फोरीकम 6एक्स, वेलोडोना30सी, कामोमिला30सी और पोडोफाइलम30सी परेशानी के समय दिया गया। बच्चों को लगातार एक साल फालो किया गया।
यह हुए शोध में शामिल
सेंट्रल काउंसिल फार रिसर्च इन होम्योपैथी दिल्ली से डा. दिव्या तनेता, डा. अऩिल खुराना, डा. अनिल, डा. राज के मनचंदा, डा. रेनू मित्तल, डा. श्वेता सिंह, डा. मीरा शर्मा, रीजनल रिसर्च इंस्टीट्यूट आसामा से डा.सरवजीत सरकार, होम्योपैथी ड्रग रिसर्च सेंटर लखनऊ से डा. अरूण कुमार गुप्ता, रीजनल रिसर्च इंस्टीट्यूट महाराष्ट्रा से डा. रिचा पंत , डा. रमेश बावास्कर, ड्रग प्रूविंग रिसर्च इंस्चीच्यूट भुवनेशवर से डा. अमूल्य रतन साहू, रीजनल रिसर्च इंस्टीट्यूट पुरी से डा. उमाकांत, डा. सत्य श्री पटनायक, डा.तपन, डीपी रस्तोगी सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट नोयडा से डा. श्रुति सहगल, डा. उदय और क्लीनिकल ट्रायल यूनिट फाऱ होम्योपैथी गोरखपुर से डा. आलोक कुमार उपाध्याय ने यह तथ्य स्थापित किया।   

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

पीजीआई में अब कम होगी सर्जरी टलने की आशंका- बढेगा पोस्ट अपरेटिव यूनिट में 10 बेड




पीजीआई में अब कम होगी सर्जरी टलने की आशंका
जनवरी तक बढ़ जाएगा पोस्ट अपरेटिव यूनिट में 10 बेड

संजय गांधी पीजीआई में होने 10 से 15 फीसदी सर्जरी पोस्ट आपरेटिव यूनिट में बेड न होने के कारण टल जाती है। इस दर को कम करने के लिए संस्थान पोस्ट आपरेटिव यूनिट में दस बढाया जा रहा है। एनेस्थेसिया विशेषज्ञ  एवं पोस्ट आफ यूनिट के प्रभारी  प्रो.एस पी अंबेश के मुताबिक सर्जरी के बाद ओटी से मरीज को जीवन रक्षक उपकरणों से लैस पोस्ट आफ में मरीज को शिफ्ट किया जाता है। पोस्ट आफ में बेड न होने पर कई बार मरीज ओटी में ही दो से तीन घंटे रहते है जिसके कारण आगली प्लान सर्जरी टल जाती है। इस परेशानी को कम करने के लिए दस बेड बढा रहे हैं। यह पुराने पोस्ट आफ से लगे हुए एरिया में बढाया जा रहा है। जनवरी 2019 के लास्ट तक यह बेड क्रियाशील हो जाएंगे। अभी हमारे पास 18 बेड है जिसमें से आठ आईसीयू के बेड है। 10 बेड बढने के पोस्ट आफ के 4 बेड और आईसीयू के 6 बेड बढ़ जाएंगे। पोस्ट आफ आईसीयू में सर्जरी के बाद गंभीर मरीज को रखा जाता है।

शुरू हो गया पीएमएसवाई ब्लाक का पोस्ट आफ
प्रो.अंबेश ने बताया कि रेजीडेंट डाक्टर की कमी के कारण दो महीने से पीएमएसवाई ब्लाक का पोस्ट आफ बंद था जिसे शुरू कर दिया गया है। यहां पर पांच बेड जहां पर पिडियाट्रिक सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी सहित अन्य विभाग के मरीज सर्जरी के बाद देख-रेख के लिए रखें जाते हैं।

पीजीआई फैकल्टी फोरम का चुनाव न होने से रोष

संजय गांधी पीजीआई फैकल्टी फोरम का चुनाव न होने से संस्थान के संकाय सदस्यों में रोष है। सीएमएस प्रो.अमित अग्रवाल, प्रो.एसके अग्रवाल, प्रो.एसपी अंबेश, प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. गौरंग मजूमदार सहित कई संकाय सदस्यों ने कहा कि चुनाव के दो साल हो गए है । इस फोरम के पदाधिकारियों का कार्यकाल खत्म हो चुका है एसे मे तुरंत चुनाव करा कर नई कार्यकारणी का गठ होना चाहिए। संकाय सदस्यों ने कहा कि हम लोग इसके लिए फैकल्टी फोरम के पदाधिकारियों को मेल भी कर चुके हैं।  

रविवार, 25 नवंबर 2018

पीजीआई में नर्सेज के व्यवहार की होगी परख-85 फीसदी लोग करते है नर्सेज के व्यवहार की शिकायत



पीजीआई में नर्सेज के व्यवहार की होगी परख



व्यवहार में सुधार के लिए चार स्टेप में चलेगी कार्यशाला
85 फीसदी लोग करते है नर्सेज के व्यवहार की शिकायत

साफ्ट स्किल डेवलेपमेंट प्रोगाम


 शोधों में देखा गया है कि 85 से 90 फीसदी मरीज की शिकायत नर्सेज के व्यवहार को लेकर रहती है। इसे दूर करने के लिए साफ्ट स्किल डेवलेपमेंट प्रोग्राम संस्थान ने शुरू किया है । चार चरणों में तमाम टिप्स देने के बाद गोपनीय तरीके से इनके व्यवहार को परखा जाएगा । जरूरत पडने पर पर्सनल काउंसलिंग भी की जाएगी। अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश हर्ष वर्धन , एलबीएस मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की निदेशक डा. तृप्ति बर्थवाल, डा.रेड्डीज फाउंडेशन फार हेल्थ एजूकेशन के साइकोलाजिस्ट डा. राजेश पटेल और डा. विनय कुमार ने टिप्स देते हुए कहा कि 90 फीसदी बीमारी पर ध्यान दिया है जबकि इलाज मरीज का होता है। हर मरीज की मनोदशा अलग होती है। इनकी मनोदशा पर ध्यान दिया जाए तो इलाज का असर अधिक होगा। हर मरीज के यदि नर्सेज अपना शब्द जोड़ ले तो नर्से के व्यवहार में बदलाव स्वतः आ जाएगा। विशेषज्ञों ने कहा कि खुद के स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए व्यायाम, योगा शामिल करें। सुनने की क्षमता, सहानभूति रखें। मरीज और तीमारदार के लिए अस्पताल पहला या दूसरा अनुभव रहता यह ध्यान  रखें तभी उनसे अाप सहानभूति रख सकेंगे। 
  
सुबह उठना सबसे बडी चुनोती

कार्यशाला के दौरान हुए सर्वे में 80 फीसदी नर्सेज ने कहा कि सुबह उठना सबसे बडी चुनौती और टाइम पर ड्यूटी पर पहुंचना है। विशेषज्ञों ने बताया कि टाइम मैनेजमेंट यानि 10 बजे खुद और बच्चे को सुला दें तो सुबह अपने अाप 6 बजे उठ जाएगी तो घर के काम के साथ मार्निंग ड्यूटी पर टाइम से होगी। 

गुस्सा हम अपने से कमजोर पर निकालते है
विशेषज्ञों ने कहा कि काम का प्रेशर है इस लिए गुस्सा है दो मिनत आंख बंद करके सोचें कि बिना इस काम हम क्या खुश रहेंगे जबाब मिल जाएगा। गुस्सा हम अपने से कमजोर को दिखाते है हर मरीज और तीमारदार को अपने से मजबूत मानें और उन्हें एक ग्राहक मान कर व्यवहार करें ।  

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

पीजीआई विश्व का पहला संस्थान जिसने स्थापित किया बायो मार्कर जो करेगा बैक्टीरियल इंफेक्शन का खुलासा

पीजीआई विश्व का पहला संस्थान जिसने स्थापित किया बायो मार्कर जो करेगा बैक्टीरियल इंफेक्शन का खुलासा


इंफेक्शन के 6 से 7 घंटे बाद हो जाएगा बैक्टीरियल इंफेक्शन का खुलासा
प्रो-कैल्शीटोनिन ही था एक मात्र जांच जिसमें 30 से 40 फीसदी में नहीं लगता है इंफेक्शन का सही पता

कुमार संजय। लखनऊ

संजय गांधी पीजीआई विश्व का पहला संस्थान है जिसने एेसा बायो मार्कर स्थापित किया है जो इंफेक्शन के कारण का खुलासा दो घंटे में कर देगा। मुख्य शोध कर्ता क्लीनिकल इण्यूनोलाजी विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल के इस खोझ को विश्व स्तर पर स्वीकार किया गया है। प्रो. विकास ने बताया कि बुखार होने के कई कारण होते है जिसमें बैक्टीरिया, वायरस और आटो इम्यून डिजीजी मुख्य कारण है। इंफेक्शन का कारण पता कर जल्दी इलाज शुरू करने से जल्दी आराम मिलता है। बैक्टीरियल इंफेक्शन पता करने के लिए सीडी 64 मार्कर स्थापित किया है। इस मार्कर का सौ से अधिक मरीजों पर परीक्षण के बाद आम मरीजों के लिए जल्दी उपलब्ध होगा। संस्थान की इंवेसटीगेशन कमेटी  ने इसे पास कर दिया है। जांच का शुल्क लगभग 6 सौ तय किया है। प्रो.विकास अग्रवाल के मुताबिक यह जांच फ्लो साइटोमेटरी तकनीक से की जाती है जिसमें केवल दो घंटे का समय लगता है। बुखार होने का बैक्टीरियल कारण होने पर तुरंत एंटीबायोटिक शुरू कर गंभीरता को बढने से रोक सकते हैं। पहले केवल प्रो-कैल्सीटोनिन ही जांच विकल्प था जिससे 30 से 40 फीसदी में सटीक जानकारी नहीं मिल पाती थी। सीडी 64 बैक्टीरियल इंफेक्शन होने पर 90 से 100 फीसदी न्यूट्रोफिल में एक्सप्रेशन होता है।

वेस्कुलाइिटस और एसएलई में भी जांच है कारगर
प्रो.विकास के मुताबिक वेस्कुलाइिटस और एसएलई होने पर बुखार मुख्य लक्षण है । यह आटो इम्यून डिजीज है जिसमें इलाज के लिए इम्यूनो सप्रेसिव दवाएं दी जाती है। कई बार इलाज के बाद भी दोबारा बुखार होता है। तब बुखार का कारण बीमारी है या इंफेक्शन पता करना कठिन होता है। एेसे में सीडी 64 जांच से पुष्टि की जाती है।  इसी अाधार लाइन आफ ट्रीटमेंट तय किया जाता है। इस बीमारी में इस मार्कर की  उपयोगिता के लिए शोध किया जिसे जर्नल आफ क्लीनिकल इम्यूनोलाजी में स्वीकार किया है। शोध में डा. सजल अजमानी, हर्षित  सिंह, सौऱभ चतुर्वेदी, डा. मोहित कुमार राय, डा. अविनाश  जैन, डा. डीपी मिश्रा, प्रो, विकास अग्रवाल और प्रो.अारएन मिश्रा शामिल रहे।