गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख .... 1.15 फीसदी लोगों की नजर है कमजोर


 एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख 





1.15 फीसदी लोगों की नजर है कमजोर
80 फीस दी लोगों में दूर की जा सकती है नेत्र की परेशानी

 
कुमार संजय। लखनऊ

 एसी में जो लोग लंबे समय तक रहते है उनकी आंख सूख सकती है। आंख में आंसू कम होने पर काली पुतली सूख जाती है जिससे रोशनी कम हो सकती है। इसे ड्राई आई कहते हैं। एसी में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में ड्राई आई की परेशानी दूसरे लोगों की तुलना में अधिक देखी गयी है। एसी में रहने वाले लोगों को यदि किसी तरह की परेशानी हो रही है तो वह विशेषज्ञ से सलाह लें। कृत्रिम आंसू आने लगा है जिससे आंख का सूखा पन दूर कर किया जा सकता है। विश्व दृष्टि दिवस के मौके पर संजय गांधी पीजीआई के नेत्र रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर विकास कनौजिया के मुताबिक

  प्रदेश में सौ मे से 1.15 लोग की नजर कमजोर है। कारण मोतिया बिंद, ग्लूकोमा, रीफेलेक्शन(नजर कमजोर), काला मोमितया , सर्जिकल कंपलीकेशन है। विशेषज्ञों का कहना है कि 80 फीसदी मामले में अंधपन को दूर किया जा सकता है। बर्शेते उनको सही समय पर सही इलाज मिल जाए। कहते है कि 73 फीसदी ममलों में मोतियाबिंद, 9 फीसदी मामलों में रीफलेक्शन, 8 फीसदी मामलों में ग्लूकोमा, दो फीसदी मामलों में सर्जिकल कंपलीकेशन के कारण रोशनी की परेशानी होती है। 





 एक हजार में से एक बच्चे की नजर कमजोर 

पीजीआई के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर आलोक कुमार के मुताबिक
भारत में एक हजार मे से 0.8 फीसदी बच्चों की नजर कमजोर है। इन्हें साफ दिखायी नहीं देता है। बच्चों को यदि देखने में परेशानी है तो आंख की जांच करानी चाहिए। 


कभी मत डाले आंख में यह दवा 
आंख में लाली आने पर अपने मन से कभी आई ड्राप नहीं डालना चाहिए। प्रो.विकास कनौजिया के मुताबिक आंख में एलर्जी होने पर आंख लाल हो जाती है। जलन होता है देखा गया है कि कई लोग अपने मन से आंख में दवा डाल लेते हैं। आंख में प्रिडलीसिलोन, डेक्सामेथासोन और वेटनसांल युक्त दवा कभी भी बिना डाक्टरी सलाह के लिए नहीं डालना चाहिए। 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

विश्व सेरीब्रल पल्सी जागरूकता दिवसःप्रसव में कभी न चलाएं अपनी मर्जी


 


विश्व सेरीब्रल पल्सी जागरूकता दिवस 



प्रसव में कभी न चलाएं अपनी मर्जी

प्रसव में देरी बढ़ा देती है सेरीब्रल पल्सी की 10 गुना आशंका

पांच सौ जंम लेने वाले में से एक में होती है सीपी की आशंका

कुमार संजय । लखनऊ

 

प्रसव के लिए जैसे ही स्त्री रोग विशेषज्ञ आपरेशन की सलाह देती है तो परिजन तुरंत सोच लेते है कि पैसे के लिए आपरेशन करने को कह रही है हो भी सकता है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। संजय गांधी पीजीआई के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डा. रूचिका टंडन कहती है कि   प्रसव के लिए जब भी स्त्री रोग विशेषज्ञ आपरेशन के लिए कहे तो इसे टालना शिशु के मानसिकशारीरिकबौद्धधिक विकलांगता का कारण हो सकता है। प्रसव में देरी होने पर सेरीब्रल पल्सी होने की आशंका दस गुना तक बढ़ जाती है। जब शिशु जंम लेता है तो वह तुरंत रोता है इससे उसका फेफड़ा फैलता है और शिशु आक्सीजन ग्रहण करता है। रक्त में आक्सीजन मिल कर (अक्सी हीमोग्लोबीन) पूरे शरीर और दिमाग में जाता है। जंम के तुंरत बाद दिमाग में आक्सजीन की कमी से दिमाग में न्यूरान डैमेज हो जाते हैं।  इस परेशानी को सेरीब्रल पल्सी(सीपी) कहते हैं। विश्व सेरीब्रल जागरूकता दिवस ( 6 अक्टूबर) के मौके पर विशेषज्ञों का कहना है कि जंम के समय अक्सीजन के कमी के अलावा शिशु के जंम लेने के बाद निमोनिया, दिमागी संक्रमण के कारण मैनेजाइटिस भी  कारण है। जागरूकता की कमी से विश्व में हर 5 सौ लाइव बर्थ में एक में इस परेशानी की आशंका होती है।

 

दो तरह की होती है सेरीब्रल पल्सी

 फ्लपी इंफेट सिंड्रोम और स्पास्टिक इनफेंट सिंड्रोम दो तरह की सेरीब्रल पल्सी होती है। फ्लपी इंफेट में शरीर की मासपेशियों में कमज़ोरी रहती है जिसके वजह से बच्चा चलनेबोलने सहित कई में लाचार होता है। स्पास्टिक में मांसपेशियाँ कड़ी हो जाती है। दोनों ही स्थित बच्चों को जीवन भर के विकलांग बना सकती है।


कुछ हद तक सुधर सकती है लाइफ


विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान कहते है कि सेरीब्रल पल्सी के कुछ बच्चों का दिमाग तो ठीक होता है लेकिन शरीर के अंगों पर कुप्रभाव होता है। केवल लिंब में समस्या होती है ऐसी बच्चों की क्वालटी आफ लाइफ कुछ हद ठीक की जा सकती है। इसके लिए वेक्लोफेनटाइजेनिड एंटी स्पाज्म दवा दी जाती है जो स्पास्टिक इंफेंट सिंड्रोम में कारगर होती है। इसके साथ फीजियोथिरेपी की अहम भूमिका है। संस्थान में इन बच्चों के केयर पर विशेष ध्यान दिया जाता है। हमारे पास हर सप्ताह पांच से आठ बच्चे इस बीमारी के साथ आते हैं। 


हाई रिस्क प्रिगनेंशी में बरते सावधानी


गायनकोलाजिस्ट एसोसिएशन की सदस्य स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. मेनका सिंह कहती है कि सेरीब्रल पल्सी युक्त शिशु का जंम रोकने के लिए हाई रिस्क प्रिगनेंशी वाली महिलाओं को विशेष देख -रेख में रखने की जरूरत है। यदि हाई बीपीडायबटीजसिफलो पेल्विक डिसप्रपोशन( शिशु का सिर बड़ा और योनि द्वार छोटा) के अलावा स्वत:गर्भपातप्रीमेच्योर बर्थ की हिस्ट्री है तो यह हाई रिस्क प्रिगनेंशी में आता है। 

यह करें सरीब्रल पल्सी युक्त जंम रोकने का उपाय

गर्भधारण करने के बाद स्त्री रोग विशेषज्ञ से लेते रहे सलाह

-हर तीन महीने पर अल्ट्रासाउंड परीक्षण कराएं

प्रसव वहीं पर कराए जहां पर बाल रोग विशेषज्ञ की हो उपलब्धता

शिशु को पूरा कराएं टीका करण

-स्त्री रोग विशेषज्ञ के सलाह के अनुसार ही कराएं प्रसव

 

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

लाक डाउन... किडनी के 28.2 फीसदी मरीजों की छूटी डायलसिस

 देश का पहला शोध जिसमें हुआ खुलासा 



 

 

किडनी के 28.2 फीसदी मरीजों की छूटी  डायलसिस

2.74 फीसदी मरीजों को इमरजेंसी में करानी पड़ी डायलसिस

 

कुमार संजय। लखनऊ

किडनी मरीजों को जिंदा रहने के लिए डायलसिस ही एक सहारा खास तौर पर जब तक कि किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो जाता है। लाक डाउन के कारण यातायात प्रतिबंधित होने के साथ देश भर के 28.2 फीसदी मरीजों की तय समय पर डायलसिस नहीं पायी जिसके कारण स्थित बिगडने पर 2.74 फीसदी में इमरजेंसी में डायलसिस करनी पडी। 4.13 फीसदी मरीजों ने डायलसिस के लिए संपर्क करना भी खत्म कर दिया। डायलसिस न होने के कारण स्थित बिगडने के कारण 0.36 फीसदी मरीजों की मौत हो गयी। प्रथम लाक डाउन जो 24 मार्च को तीन सप्ताह के लागू हुआ उस दौरान किडनी मरीजों को डायलसिस की क्या स्थित रही और उनके डायलसिस पर लाक डाउन का कितना प्रभाव पडा जानने के लिए देश भर 14 संस्थान के विशेषज्ञो ने शोध किया। शोध में आठ सरकारी जिसमें पीजीआई लखनऊ, पीजीआई चंडीगढ़ , एम्स दिल्ली, गवर्नमेंट मेडिकल कालेज मद्रास सहित 11 कारपोरेट अस्पताल में किडनी डायलसिस के लिए आने वाले मरीजों पर शोध किया तो पता चला कि इन सेंटर लाक डाउन के पहले तक 2517 मरीजों की डायलसिस होती थी जो घट कर 2404 हो गयी।

द एडवर्स इफेक्ट आफ कोविद पैनडमैकि आन द केयर आफ पेशेंट विथ किडनी डिजीज इन इंडिया शोध को किडनी इंटरनेशनल रीपोर्ट ने स्वीकार किया है।   

पहले लाक डाउन में केवल दो किडनी ट्रांसप्लांट

सरकारी अस्पताल में 47.5 फीसदी और निजि अस्पताल में 18.83 फीसदी डायलसिस की कमी पहले तीन सप्ताह के डायलसिस में आयी। इसके साथ देखा गया कि किडनी ट्रांसप्लांट इन 14 सेंटरों में महीने में 33 के आस-पास होती थी जो लाक डाउन के दौरान घट कर केवल दो रह गयी।

 

कोविद जांच की सुविधा के साथ बढ़ रही डायलसिस

शोध के मुख्य गुर्दा रोग विशेषज्ञ एवं संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. नरायन प्रसाद ने शोध पत्र में कहा कि भरतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने गाइड लाइन के अनुसार कोविद जांच के बाद डायलिस की बात कही गयी । पहले जांच की सविधा कम थी लेकिन जांच की सुविधा बढने के साथ डायलसिस की संख्या बढ़ती गयी। कोविद पिजिटिव मरीजों के राजधानी कोविद अस्पताल में डायलसिस के साथ पूरी देख-रेख की व्यवस्था है।

 

15 डाक्टर भी हुए क्वरटाइन

देश के इन 14 सेंटर पर 221 गुर्दा रोग विशेषज्ञ है जिसमें 134 सरकारी और 87 कारपोरेट अस्पताल में कोविद मरीजों के सपंर्क में आने के कारण इन सेंटर के 15 डाक्टर को क्वरटाइन होना पडा जिससे वर्क फोर्स में भी कमी आयी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

पीजीआईःपांच विभाग ने मिलकर गर्भवती के पेट से निकल 10 किलो का ट्यूमर



पांच विभाग ने मिलकर गर्भवती के पेट से निकल 10 किलो का ट्यूमर

 

 29 वर्षीय उन्नाव निवासी महिला संजय गांधी पीजीआई

के सामान्य अस्पताल में

   स्त्री रोग विशेषज्ञ की ओपीडी में पेट की सूजन के कारण आई थी। वह अपने स्थानीय चिकित्सक से परामर्श कर चुकी थी।  बताया गया था कि उसको प्रेगनेंसी के साथ-साथ पेट में बहुत बड़ी गांठ है ।इस कारण से यह गंभीर मामला है और इसका इलाज पीजीआई में ही संभव था। मरीज को  ओपीडी में देखा पाया कि मरीज को दो-तीन महीने की प्रेगनेंसी के साथ-साथ पेट में बहुत बड़ा टयूमर था जो बचेदानी पर भी दबाव डाल रहा था ।गांठ में कैंसर भी हो सकता था  और यदि गांठ को  सर्जरी द्वारा निकाला नहीं जाता  तो गर्भपात की संभावना भी हो सकती थी।ऐसी स्थिति में जांच कराने पर रेडिएशन के कारण कर में पल रहे बच्चे में विकृति की संभावना भी हो सकती थी।  इस विषय पर मरीज और उनके परिजनों से बातचीत की गई और इलाज के लिए उन्हें  गर्भपात की भी सलाह दी गई, किंतु रोगी की प्रथम प्रेगनेंसी होने के कारण वह किसी भी कीमत पर इस बच्चे को बचाना चाहती थी। उन्होंने  टीम पर पूरी आस्था जताई और टीम ने भी मरीज और मरीज के परिवार वालों को सारे खतरों से आगाह करते हुए इलाज करने के लिए तैयार किया, जिसमें गर्भपात की संभावना भी शामिल थी ।   रेडियोलाजी विभाग, गैस्ट्रो सर्जरी विभाग और जेंटिक्स

विभाग के चिकित्सकों से संपर्क कर आपस में सहमति कर  डायग्नोसिस चयनित की गई और ऑपरेशन की तैयारी की गई क्योंकि क्योंकि टयूमर के साथ प्रेगनेंसी को नियंत्रित करना एक बहुत मुश्किल काम था। इस ऑपरेशन के लिए एनेस्थेसिया  महत्वपूर्ण था  । ट्यूमर निकालने में गैस्ट्रो सर्जरी के सीनियर डाक्टर रजनीश कुमार सिंह और उनकी टीम ने महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की।   पूरी टीम मरीज की प्रेगनेंसी को बचाते हुए ट्यूमर  निकालने में सफल रहे।  यह ट्यूमर लगभग 30 × 35 सेंटीमीटर और 10.4 किलो का था।ऑपरेशन के पश्चात मरीज की जेनेटिक काउंसलिंग और प्रेगनेंसी अल्ट्रासाउंड भी किया गया जिसमें बच्चे का विकास सामान्य पाया गया। आज मरीज एसजीपीजीआई की विशेषज्ञों की टीम का धन्यवाद करते हुए गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ अपने घर जाने को तैयार है। 

डॉ दीपा कपूर,

डॉ अंजू रानी सीनियर गाइनेकोलॉजिस्ट

डॉ  रजनीश कुमार सिंह गैस्ट्रो सर्जन

 डॉ रुचि कंसलटेंट एनएसथीसिया

 गणेश सीनियर रेजिडेट  एनेस्थिसिया

 शिवकुमारी एवं स्नेहलता स्टाफ नर्स ने महत्वपुर्ण भूमिका निभाया।


गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

कोरोना ने कमजोर दिया दिल पीजीआइ ने किया मज़बूत


 कोरोना ने कमजोर दिया दिल पीजीआइ ने किया  मज़बूत

दिल की मासपेशियों को भी कमजोर कर सकता है कोरोना




कुमार संजय़ । लखनऊ

 

कोरोना वायरस केवल फेफडे को ही नहीं दिल को भी गिरफ्त में ले सकता है। सांस लेने में परेशानी हो रही है और रक्त दाब कम हो रहा है तो यह संकेत है कि वायरस दिल के प्रभावित कर रहा है ऐसे लोगों को समय पर इलाज से  दिल को बचा तक जिंदगी पर खतरे को टाला जा सकता है। संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञ, कार्डियोलाजी सोसाइटी आफ इंडिया के उपाध्यक्ष , यूपी चैप्टर आफ कार्डियोलाजी सोसाइटी आफ इंडिया के अध्यक्ष  प्रो. सत्येंद्र तिवारी विश्व हृदय दिवस पर यह जानकारी देते हुए बताया कि कोरोना काल में  पांच ऐसे मरीजों को समय पर इलाज देकर जिंदगी पर खतरे को टालने में सफलता हासिल किया है। प्रो.तिवारी के मुताबिक कोरोना वायरस मुख्यतः फेफड़े  पर प्रहार करता है लेकिन हमारे पहले के ऐसे मरीज जिनमें एंजियोप्लास्टी हो चुकी थी बिल्कुल सामान्य थे लेकिन सांस फूलने की परेशानी के साथ रक्त दाब में कमी की परेशानी के कारण ई ओपीडी में फोन किया तो पहले तो लगा कि कोरोना के कारण ऐसा होगा कुछ दवाएँ बताया लेकिन मरीज को फायदा नहीं हुआ तो मरीज को यहां आने को कहा तो देखा कोरोना वायरस दिल की मासपेशियों को कमजोर कर दिया था जिसके कारण दिल की पंपिंग शक्ति कम हो गयी थी। इसके कारण रक्त प्रवाह पूरी तरह शरीर में नहीं हो रहा था । रक्त दाब कम होने का भी कारण साबित हो रहा था । मरीज को बाई पैप पर डालने के साथ ही विशेष दवाओं से दिल की मासपेशियों को ताकत देने के साथ स्थित में सुधार होने लगा ।

 

सामान्य लोगों का दिल भी प्रभावित कर सकता है कोरोना

 

 

प्रो.तिवारी का कहना है कि सामान्य लोगों के दिल को भी कोरोना प्रभावित कर सकता है। दिल में वायरस का प्रकोप होने के बाद मायोकार्डाटिस हो जाती है । इससे दिल की मासपेशियां कमजोर हो जाती है । सांस लेने में परेशानी होती है।  दिल के परेशानी होने पर कई बार वेंटीलेटर पर लेने के साथ ही दिल मास पेशियों को मजबूत करने की दवाएं देकर स्टेबिल किया जाता है।

 

क्या करें दिल के मरीज

- कोरोना से बचने के लिए एहतियात बरते

 

-चिन्ता के अहसास से बचने के लिए सांस लेने और मेडिटेशन का अभ्यास करें।

 

-अगर  बुखार जैसे लक्षण (शरीर का तापमान 37.8° सेल्सियस या ज्यादा) खांसी या सीने में संक्रमण है तो आपको खुद को अलग रखना चाहिए।

 

-हृदय के लिए अपनी नियमित दवाएँ लेते रहें। अगर ब्लड प्रेशर की दवा लेते हैं तो उसे भी लेना न भूलें। हार्ट अटैक या स्ट्रोक रोकने के लिए यह सब जरूरी है।




विश्व हृदय दिवस आज

थीमः दिल को मजबूत करने के लिए करें दिल का इस्तेमाल

दिल मजबूत तो कोरोना से होगा मजबूती से मुकाबला

 

कुमार संजय। लखनऊ

दिल आप का मजबूत है तो आप का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। कोरोना का संक्रमण हो बी गया तो आप वायरस पर जीत हासिल कर लेंगे लेकिन यदि दिल मजबूत नहीं है तो कोरोना आप की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। इसी लिए विश्व हृदय दिवस पर वर्ड हार्ट फाउडेंशन ने इस साल का थीम दिया है ...यूज हर्ट टू बीट कार्डियोवेस्कुलर डिजीज यानि दिल की बीमारी से बचने के लिए दिल इस्तेमाल करें। संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सत्येंद्र तिवारी और प्रो.सुदीप कुमार कहते है कि दिल का इतना इस्तेमाल करें दिल की तेजी से धड़के।  रक्त वाहिका में रक्त का प्रवाह तेजी से हो जिससे रक्त वाहिकाओं में रूकावट की आशका कम हो। toविशेषज्ञ कहते है कि 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग जिन्हें कॉरोनरी हार्ट डिजीज या हाइपरटेंशन है उन्हें कोविड-19 से संक्रमित होने की आशंका ज्यादा है। ऐसे मरीज जिनके हृदय की स्थिति कमजोर है जैसे हार्ट फेलियर या एरिथमिया उनमें वायरल संक्रमण के लक्षण सामने आने की आशंका ज्यादा रहती है। दूसरे लोगों के मुकाबले ऐसे लोगों को संक्रमण होगा तो ज्यादा गंभीर भी होता है। इस लिए दिल को ठीक रखना बहुत जरूरी है।

 

ऐसे करें दिल को मजबूत

-शरीर का वजन नियंत्रण में हैतो इससे कोलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित रहता हैग्लूकोज और ब्लडप्रेशर का स्तर ठीक रखता है. थोड़ा प्रोटीनपूरा अनाज और ताजा फल खाएं. इंस्टेंट का लेबल लगा हुआ या पैक्ड फूड आपके किचन में नहीं होना चाहिए. यहां तक कि बोतलबंद ड्रिंक्सजंक फूड और नमकीन से भी दूर रहें.

 

 

- थोड़ा पसीना बहाएं। हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट सामान्य व्यायाम करना चाहिए। हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट सामान्य व्यायाम करना चाहिए। हृदय रोग के खतरे को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले तीन कारकों- ब्लडप्रेशरकोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज के खतरे को कम करने के लिए तेज चलना भी दौड़ने के जितना ही अच्छा होता है।

 

- धूम्रपान न करें क्योंकि धूम्रपान करने वालों में धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा हृदय रोग होने का तीन गुना खतरा होता है। स्मोकर्स के ग्रुप में रहते हैंतो हृदय रोग होने की संभावना 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.

 

- अपनी फैमिली ट्री के बारे में जानें । वर्ल्ड हार्ट फेडेरेशन का कहना है कि अगर फर्स्ट डिग्री मेल रिलेटिव (पिता या भाई) में से किसी को 55 साल की उम्र से पहले हार्ट अटैक आया है या फिर आपके फर्स्ट डिग्री फिमेल रिलेटिव में से किसी को 65 साल की उम्र से पहले हार्ट अटैक आया हैतो आपको हृदय रोग होने का खतरा बहुत अधिक होता है।  माता-पिता 55 साल से कम उम्र में हृदय रोग से प्रभावित रहे हैंतो आपको दिल की बीमारियां होने की आशंका दूसरे लोगों से 50 प्रतिशत ज्यादा होती है। .

- तनाव कम करें। तनाव सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण नहीं बनता है. लेकिन अचानक अत्यधिक तनाव कभी-कभी कार्डियोमियोपैथी (ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम) का कारण बन सकता हैजो हार्ट अटैक के बहुत करीब होता है। तनाव को कम करें तथा सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण बनने वाले ब्लडप्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें.

 

- जानें अपनी सेहत का हाल।  अपने लिपिड प्रोफाइलब्लड शुगर लेवलब्लड प्रेशर लेवल की जांच कराते रहें. अपने फिजिकल चेकअप के माध्यम से आप यह जान सकते हैं कि कहीं आप हृदय संबंधी रोग की ओर तो नहीं बढ़ रहे।

 

 

 

 



शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

दारोगाजी तनाव ग्रस्त तभी तो बिगड़ जाते है बोल

 

दारोगाजी तनाव ग्रस्त तभी तो बिगड़ जाते है बोल


 


इंसपेक्टरमें तनाव का स्कोर मिला सबसे अधिक सिपाही कम लेते है टेंशन


 


पुलिस कर्मियों में तनाव की स्थित जानने के लिए हुआ शोध


 


कुमारसंजय। लखनऊ


 


वर्दी में दारोगा जी का रूतबा देख कर उनकी दिमागी हालत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है लेकिन हकीक़त है कुछ अलग है सामाजिक दबाव, अधिकारियों का दबाव, ड्यूटी का दबाव,परिवार का दबाव सहित कई कारण है जो  दारोगाजी दिमाग का दही बना देते है। मानसिक दबाव के कारण वह तनाव ग्रस्त रहते है जिसका प्रभाव कई बार उनके व्यवहार में दिखने में लगता है। लखनऊ, वाराणसी, मेरठ, रायबरेली,गाजीपुर और नोयडा जिलों में तैनात दारोगा( इंसपेक्टर) , पुलिस अधिकारी( सीओ,डिप्टीएसपी, एसपी) और सिपाही में तनाव का स्तर जानने के लिए शोध वैज्ञानिकों ने शोध किया तो पता चला कि इन तीनों में से सबसे अधिक तनाव का स्कोर इंसपेक्टर में मिला देखा गया कि तनाव का स्कोर इंसपेक्टर में तनाव का  स्कोर 39.89 मिला।


दूसरे नंबर पर तनाव का स्कोर पुलिस अधिकारियों में देखा गया ।इनमें तनाव का स्कोर 37.03 मिला।  सबसे कम तनाव का स्कोर सिपाही में मिला। इनमें 36.0 स्कोर मिला।    शोध वैज्ञानिकों ने शोध पत्र में कहा है कि पुलिस बल में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के तनाव के स्तर को कम करने के विशेष योजना की जरूरत है। विशेषज्ञों के मुताबिक सात से अधिक स्कोर होने पर अधिक तनाव माना जाता है।


 


 कैसे हुआ शोध


 


किंi जार्ज मेडिकल विवि के मानसिक रोग विभाग की डा. श्वेता सिंह, डा. बंदना गुप्ता . डा.दिव्या शर्मा और लखनऊ विवि के डा. प्रेम चंद्र मिश्रा ने  ए स्टडी आफः स्ट्रेस,कोपिंग, सोशल सपोर्ट एंड मेंटल हेल्थ इन पुलिस पर्सनल आफ उत्तर प्रदेश विषय को लेकर शोध किया ।  इंसपेक्टर, आफीसर और सिपाही पद पर तैनात सौ-सौ लोगों लोगों में तनाव का स्तरजनाने के लिए विशेष रूप से तैयार प्रश्न पत्र( क्वैसचनायर)  इनके जानकारी हासिल करने के बाद हर प्रश्न पर स्कोर के आधार पर तनाव का स्कोर का आकलन किया। इस शोध को हाल में ही इंडियन जर्नल आफ आक्यूपेशनल एंडइनवारमेंटल मेडिसिन ने स्वीकार किया है।     


 


तनाव जानने के लिए कुछ इस तरह के सवाल पर अंक दिए गए जिसके आधार पर स्कोर का आकलन किया गया


 


-   ड्यूटी के दौरान चोट की आशंका


-   सामाजिक जीवन कैसा


-   परिवार और दोस्तों को कितना समय दे पाते है


-   समय पर भोजन


-   थकान


-   समाज से नकारात्मक कमेंट


-   सामाजिक जीवन में बाध्यता


-   अपने स्वास्थ्य के लिए समय


-   ड्यूटी के कारण शारीरिक परेशानी


-   कार्य के अवधि


-   रात में अकेले कार्य


-   ओवर टाइम


-   ड्यूटी से जुडी अन्य गतिविध जैसे कोर्ट, सामाजिक क्रियाशीलता


-   पेपर वर्क


-   परिवार और दोस्तों को हमारे काम को लेकर परेशानी की समझ


-   हमेशा ड्यूटी पर है यह सोच

बुधवार, 23 सितंबर 2020

पूरी जिंदगी वायरस से लोहा लेने वाले प्रो. ढोल को वायरस ने दिया मात - कोरोना संक्रमण के कारण हुई मौत

 






पूरी जिंदगी वायरस से लोहा लेने वाले प्रो. ढोल को वायरस ने दिया मात

कोरोना संक्रमण के कारण हुई मौत

 

 

पूरी जिंदगी वायरस से लोहा लेने वाले संजय गांधी पीजीआइ के माइक्रोबायलोजिस्ट रहे प्रो. टीएन ढोल को वायरस ने ही हरा दिया। वह कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए एक सितंबर के संस्थान के कोरोना अस्पताल में भर्ती हुए थे तमाम प्रयास के बाद हालत बिगड़ती गयी । बीती देर रात उनकी मौत हो गयी है। प्रो. ढोल पोलियो, जपानी इंसेफेलाइटिस, स्वाइन फ्लू वायरस के जांच की तकनीक को स्थापित करने के साथ ही इसका विस्तार किया। पोलियों उन्मूलन के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ हाथ मिलाया जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। ऊत्तर भारत का एक मात्र सेंटर पीजीआइ बना जहां पर पोलियो के जांच के नमूने आते है। पोलियो उन्मूनल के लिए 1998 में प्रोजेक्ट शुरू किया जो आज भी जारी है। इसके आलावा जेई वायरस के जांच की सुविधा स्थापित करने के साथ विस्तार किया। प्रो. ढोल संस्थान की नींव के साथ 1988 में बतौर सहायक प्रोफेसर ज्वाइन किया शुरू से उहोंने वायरोलाजी( वायरस ) पर काम करना शुरू किया अभी हाल में वह रिटायर हुए थे। सौ से अधिक शोध छात्रों के गाइड रहे। 389 शोध पत्र उनके इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल में स्वीकार हुए जिससे तमाम शोध छात्र आज उनके शोध पत्र को बतौर रिफरेंश कोट करते हैं। उनके शोध छात्र डा. धर्मवीर सिंह कहते है कि स्वाइन फ्लू की जांच तकनीक स्थापित किया जिसके अनुभव के आधार पर हम लोग आज कोरोना की जांच बिना किसी रूकावट के कर रहे हैं। प्रो. ढोल को उत्तर भारत में वायरोलाजी शुरू करने का श्रेय जाता है। प्रो. ढोल के निधन पर विभाग की प्रमुख प्रो. उज्जवला घोषाल कहती है कि वह मेरे टीचर रहे है यह माइक्रोबायलोजी चिकित्सा विज्ञान के लिए बडी क्षति है।

पीजीआईःउत्तर भारत की पहली लेप्रोस्कोपिक पैरा थायरायड ग्लैंड सर्जरी





 पीजीआइ

 

कोरोना काल में हुई उत्तर भारत की पहली लेप्रोस्कोपिक पैरा थायरायड ग्लैंड सर्जरी

 

अभी तक सभी अस्पतालों में होती रही है ओपेन सर्जरी जिससे गले पर पड़ता है निशान

 

लड़कियों ओपेन सर्जरी के बाद छिपाना पड़ता था गला

 

 

संजय गांधी पीजीआइ उत्तर भारत का पहला अस्पताल हो जिसने पहली बार  पैरा थायरायड ग्रंथि की सर्जरी दूरबीन तकनीक से करने में सफलता हासिल की है। इस तकनीक से  गले पर निशान नहीं पड़ता साथ ही मरीज को चार –पाच दिन में छुट्टी मिल जाती है। इस तकनीक को डाक्टरी भाषा में  बाइलेटरल एक्सीलो –ब्रेस्ट एप्रोच इंडोस्कोपिक पैरा थायरडक्टमी( बाबा) कहते हैं।  कश्मीर की रहने वाली याशमीन यहां इस सर्जरी के लिए केवल इसी लिए आयी कि जिससे उनके गले पर निशान न पडे। इस सर्जरी को आंजाम देने वाले इंडोक्रान सर्जन प्रो. ज्ञान चंद का दवा है कि उत्तर भारत के किसी भी अस्पताल में पैरा थायरायड ग्लैंड की लोप्रोस्कोपिक सर्जरी नही होती है सभी सेंटर ओपन सर्जरी ही करते है। इस केस को वह मेडिकल जर्नल में भी बतौर केस रखेंगे। परिजन कई जगह कोशिश किए लेकिन लेप्रोस्कोपिक सर्जरी तकनीक से करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ तो परिजनों ने पता लगाया कि लखनऊ पीजीआई में प्रो.ज्ञान चंद से सलाह लिया जाए। प्रो. ज्ञान ने इस चुनौती को स्वीकार कर पूरी योजना तैयार की लेकिन तमाम परीक्षण के बाद सर्जरी की डेट भी तय हो गयी लेकिन लाक डाउन के कारण यह लोग नहीं आ पाए। लाक डाउन खुलने के बाद यह लोग संपर्क किए जिसके बाद 14 सितंबर को भर्ती कर सर्जरी की गयी 22 सितंबर को छुट्टी दे दी गयी।

 

 

क्या होती है परेशानी

 

पैराथायराइड ग्रंथि  मसूर के दाने के आकार की चार छोटी-छोटी ग्रंथियों का समूह हैजिनमें से प्राय: दो-दो थाइरॉइड ग्रंथि पिछली सतह में स्थित रहती है। यह रक्त में कैल्शियम की अधिकता और कमी का नियन्त्रण इसी के द्वारा सम्पादित होता है। इस में ट्यूमर होने पर कैल्शियम को हड्डी से खीचने लगता है। 26 वर्षीय यासमीन के किडनी में कई स्टोन थे तो डाक्टर कैल्शियम के स्तर का परीक्षण कराया जो पता चला कि इसका स्तर भी बढ़ा है। जांच से पता चला कि पैरा थायरायड ग्लैंड ट्यूमर के कारण इस हारमोन का स्तर बढ़ गया जो हड्डी से कैल्शियम को अवशोषित कर रहा है।

 

याशमीन नहीं हुई ओपेन सर्जरी के लिए तैयार

 

 शल्य चिकित्सा के लिए  याशमीन और उनके पिता बसीर दिल्ली के एक बड़े अस्पताल गये थे जहाँ उन्हें बताया गया कि गले पर कट लगा कर ट्यूमर निगाल देंगे जिसपर 26 वर्षीया याशमीन जिनकी हाल ही में शादी हुई है वह राज़ी नहीं हुईं। उनके पिता बसीर स्वयं श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर हैं उन्होंने अपनी बेटी को ऑपरेशन के बाद गले पर आने वाले निशान से बचाने की मंशा से अपने कई डॉक्टर मित्रों से सम्पर्क किया।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

पीजीआई वेंटीलेटर पर आए सुरक्षित गए घर 15 दिन वेंटीलेटर पर किया जीवन से संघर्ष फिर मिला जीवन


 वेंटीलेटर पर आए सुरक्षित गए घर

15 दिन वेंटीलेटर पर किया जीवन से संघर्ष फिर मिला जीवन


  निजि अस्पताल से भेजे गए थे पीजीआई

दिल को किया दुरुस्त और कोरोना से दिलायी मुक्ति

 

60 वर्षीय हसीब राजधानी के ही एक निजि अस्पताल में भर्ती थे उनके सीने में लगातार दर्द की परेशानी हो रही है लेकिन दर्द से निजात नहीं मिल रहा था। इस बीच उन्हे दिल का दौरा भी पडा। इस परेशानी के इलाज के लिए निजि अस्पताल में ही एंजियोप्लास्टी हुई लेकिन एंजियो प्लास्टी के सांस लेने में परेशानी होने लगी। इस बीच यह कोरोना पाजिटिव भी थे स्थिति गंभीर होने पर निजि अस्पाल ने इन्हें वेंटीलेटर पर रख दिया। घर वाले इनको लेकर पीजीआई कोरोना अस्पताल लाए तो स्थिति को देखते हुए आईसीयू में भर्ती कर इलाज की दिशा तय की गयी। इमरजेंसी मेडिसिन के प्रो. तन्मय घटक ने बताया कि इनका इलाज संस्थान के सात विशेषज्ञों की देख रेख में इलाज शुरू किया गया। 27 अगस्त को  को यह कोरोना अस्पताल के इमरजेंसी में भर्ती किए गए थे लेकिन 29 तारिख को इन्हे कार्डियक एरेस्ट( दिल ने एक दम से काम करना बंद कर दिया) हो गया । आईसीयू में मौजूद डा. जय और डा. आनंद  ने सीपीआऱ(कार्डियक पल्मोनरी री सक्शेन ) कर दोबारा दिल को गति को शुरू करने में सफलता हासिल की।  दिल की मांस पेशियों की शक्ति काफी कम हो गयी थी। कार्डियोलाजी विभाग के प्रो. सुदीप कुमार और आईसीयू एक्सपर्ट प्रो. पुनीत गोयल की देख –रेख में सांस लेने में परेशानी के कारण का पता करने के साथ दिल की परेशानी का इलाज किया जिसमें सफलता मिली। दस सितंबर को इन्हे अस्पताल से छुट्टी दे गयी।  





इन विशेषज्ञों ने दिया सलाह  

 नेफ्रोलाजी विभाग की प्रो. अनुपमा कौल  , हिमैटोलाजी विभाग के प्रो. अशुंल गुप्ता, पल्मोनरी मेडिसिन के प्रो. आलोक नाथ , सीसीएम के विशेषज्ञों ने कई स्तर पर सलाह देकर मरीज को ठीक करने में मदद किया। इस सफलता पर निदेशक प्रो.आरके धीमन ने टीम को बधाई दी

पीजीआइ देश का पहला संस्थान 24 घंटे में 6241 मरीजों में हुई कोरोना की जांच


 पीजीआइ देश का पहला संस्थान 24 घंटे में 6241 मरीजों में हुई कोरोना की जांच

 

24 घंटे सात दिन चल रही है जांच 7 जिलों की जांच का जिम्मा

 

 

संजय गांधी पीजीआइ का माइक्रोबायलोजी विभाग देश का पहला संस्थान हो गया है जहां पर कोरोना की जांच 24 घंटे में 6 हजार 241 मरीजों में किया गया। विभाग की प्रमुख प्रो. उज्वला घोषाल ने बताया कि गुरूवार की भोर में 3 बजे यह रिकार्ड हम लोगों ने कायम किया जिसके लिए 24 घंटे जांच में लगे लगभग 50, शोध छात्र, लैब टेक्नोलाजिस्ट, प्रयोगशाला सहायक सहति अन्य की अहम भूमिका है। यह संस्थान और विभाग के लिए बडी उपलब्धि है। 24 घंटे सात दिन लैब में जांच का काम चल रहा है । शिफ्ट में ड्यूटी लगी है। हम लोग रीयल टाइम पीसीआऱ से तकनीक से जांच के यह रिकार्ड बनाने में कामयाब हुए। आठ घंटे की ड्यूटी लगायी जाती है जिसमें जांच में लगे लोग अपनी जिंदगी खतरे में डाल कर काम करते है सीधे वायरस से सामना करते है। सभी लोग पीपीई किट सहित तमाम एहतियात बरतते है फिर भी संक्रमण हो ही जाती है। इस समय हम लोग संस्थान में आने वाली लोगों के आलावा जौनपुर, संतकबीर नगर, उन्नाव, आजमगढ़, प्रतापगढ़, सीतापुर , लखीमपुर खीरी के जिलों के मरीजों की जांच कर रहे हैं। इस मेहनत और सफलता के लिए टीम के सगस्यों के प्रति प्रो. उज्वला ने आभार प्रकट किया कहा कि अभी लड़ाई लंबी है ऐसे ही लडाई जारी रखनी है। बिना कोरोना जांच के किसी भी मरीज का आगे इलाज संभव नहीं है ऐसे में जल्दी रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी है।    

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

पुरूषों को अधिक सता रहा है कोरोना --पीजीआइ निदेशक ने प्रेस वार्ता

 

पीजीआई


पुरूषों को अधिक सता रहा है कोरोना

पीजीआइ निदेशक ने प्रेस वार्ता कर दी जानकारी



पुरूष कोरोना संक्रमण के कारण महिलाओं के मुकाबले अधिक गंभीर हुए। संजय गांधी पीजीआइ के राजधानी कोविड अस्पताल में भर्ती होने होने वाले मरीजों के आंकडे इसी तथ्य की गवाही देते है। संस्थान के निदेशक प्रो. आरके धीमन आन-लाइन प्रेस वार्ता के जरिए संस्थान में कोरोना मरीजों के देख-भाल, इलाज की सफलता सहति तमाम जानकारी देते हुए बताया कि अभी तक 824 कोरोना संक्रमित मरीजों को भर्ती किया गया जिसमें से 71 फीसदी पुरूष और 29 फीसदी महिलाएं थी। इससे साबित होता है कि पुरूषों में कोरोना का संक्रमण महिलाओं के मुकाबले अधिक गंभीर हो रहा है। संस्थान के कोविद अस्पताल में कोरोना संक्रमण के कारण परेशानी होने पर भर्ती के लिए प्रदेश भर से मरीज भेजे जाते है। संस्थान दो सौ बेड आईसीयू के है जिसमें गंभीर मरीजों को भर्ती किया जाता है। इस समय 164 मरीज भर्ती है। 660 मरीजों मे से 573 मरीज ठीक होकर घर जा चुके है। 87 मरीजों की मत्यु हुई जो 13 फीसदी दर है। हम लोगों ने आठ महीने के बच्चे को ठीक करके भेजा है तो 90 और 83 साल के बुजुर्ग मरीजों को भी ठीक करते भेजने में सफलता हासिल की है। किडनी के खराबी वाले मरीजों के लिए डायलसिस की सुविधा भी की गयी है रोज 10 से 12 मरीजों की डायलसिस कोरोना अस्पताल में की जा रही है। अगस्त से 500 से अधिक किडनी खराबी मरीजों की डायलसिस कर चुके है। निदेशक ने बताया कि वह लगातार प्रदेश के मेडिकल कालेजों सहित अन्य स्टाफ, डाक्टर के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम चला रहे है।

24 घंटे  सुविधा

प्रो.धीमन ने बताया कि संस्थान लगभग एक लाख 94 हजार लोगों में कोरोना संक्रमण की जांच पीसीआऱ तकनीक से कर चुका है। इसके अलावा टू नेट से 4 हजार से अधिक मरीजों में जांच की जा चुकी है। 24 घंटे लैब चलती है जहां पर सभी जांचे हो रही है।  खास तौर भर्ती मरीजों के लिए बडी सहूलियत है। 24 घंटे एचआरएफ फार्मेसी भी काम कर रही है। मरीजों के खाना उनकी सेहत के आधार पर देने की व्यवस्था की गयी है। जिसमें डायटीशियन और इडोक्राइनोलाजिस्ट मिल कर पोषण की जरूरत पर ध्यान देते है

बढती गयी इलाज की सफलता दर

अप्रैल- 67 फीसदी

मई- 91

जून-78.5

जुलाई-89

अगस्त- 87

बुधवार, 9 सितंबर 2020

पीजाआइ आउट सोर्स कर्मचारियों को नियमित तैनाती में मिले प्राथमिकता -- कर्मचारी महासंघ



 पीजाआइ आउट सोर्स कर्मचारियों को नियमित तैनाती में मिले प्राथमिकता  

कर्मचारी महासंघ ने निदेशक को सौपा ज्ञापन कहा करोना योद्धाओं को इससे मिलेगा सम्मान




संजय गांधी पीजीआइ कर्मचारी महासंघ ने संस्थान प्रशासन को ज्ञापन देकर मांग किया है कि संस्थान में आउट सोर्सिंग पर तैनात कर्मचारियों को नियमित तैनाती में प्रथम वरीयता दी जाए ।  अध्यक्ष जितेंद्र यादव  , महामंत्री धर्मेश कुमार ने कहा है कि संस्थान में कई संवर्ग में आउट सोर्सिंग में काम कर रहे है। कोरोना काल में अपने जीवन की बाजी लगा कर नर्सेज, लैब, एक्स-रे टेक्नीशियन, डाटा इंट्री, पेशेंट हेल्पर काम कर रहे है। कोविद अस्पताल में सबकी ड्यूटी लग रही है यह लोग नियमित कर्मचारियों की तरह पूरी तल्लीनता से सेवा कर रहे है ऐसे में इनके त्यग और श्रम का मेहनत मिलना चाहिए। नर्सिग एसोसिएशन की अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने मांग की है कि नर्सेज को एम्स के समान मानदेय दिया जाए।  एनआरएचम में सीएचओ को 30 हजार मिल रहा है जबकि संस्थान की नर्सेज अति विशिष्ट सेवा दे रही है और मानदेय 16 हजार मिल रहा है। महासंघ के मांग का समर्थन करते हुए कहा कि आउट सोर्सिग हटा कर सीधे संस्थान संविदा पर रखें और इनको नियमित करने का काम करें यही करोना योद्धाओं के प्रति सच्चा सम्मान होगा। महासंघ के पदाधिकारियों का कहना है कि आउट सोर्सिंग पर तैनात कर्मचारी को नियमित करने से इनके अनुभव का लाभ संस्थान को मिलेगा । पैरा मेडिकल स्टाफ तीन –चार साल से काम कर रहा है जिससे इनमें अपने क्षेत्र की दक्षता आ गयी है इसका फायदा संस्थान को मिलना चाहिए।

सोमवार, 7 सितंबर 2020

पीजीआई में कोरोना संक्रमित मायस्थीनिया ग्रेविस मरीज की बचाई जान

 

पीजीआई में कोरोना संक्रमित मायस्थीनिया  ग्रेविस मरीज की बचाई जान

6 विभाग के विशेषज्ञों ने मिलकर तय की इलाज़ रणनीति

 मएस्थेनिया ग्रविश से ग्रस्त दुर्गेश नंदिनी को संजय गांधी पीजीआई में कोरोना संक्रमण के कारण 29 जुलाई को भर्ती किया गया संस्थान के 6 विभाग के विशेषज्ञों ने मिलकर मरीज की जिंदगी बचाने में सफलता हासिल की है l स्थिति खराब होने पर आईसीयू में भर्ती किया गया सांस लेने में परेशानी के कारण ऑक्सीजन थेरेपी पर रखा गया उसके बाद भी  स्वशन तंत्र कमजोर होता जा रहा था जिसके कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा और हाई ऑक्सीजन का की मात्रा देनी पड़ी ।मरीज को बचाने के लिए स्पेशल थेरेपी इंट्रावेनस इम्मयून ग्लोबिन प्लाज्मा थेरेपी रेमिडिसवीर के अलावा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवाएं दी गई ।दुर्गेश नंदिनी के इलाज में न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर विमल पालीवाल, एनेस्थेशिया विभाग के एक्सपर्ट प्रोफेसर पुनीत गोयल, डॉक्टर प्रतीक हेमेटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अंशुल गुप्ता , इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एविल लारेंस और ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के प्रोफेसर अनुपम वर्मा ने मिलकर इलाज की दिशा तय की इमरजेंसी मेडिसिन के डॉ तन्मय घटक ने बताया कि कोरोना निगेटिव होने के बाद 30 अगस्त को न्यूरो वार्ड में मरीज को शिफ्ट कर दिया गया है



मायस्थीनिया ग्रेविस क्या है?

मायस्थीनिया ग्रेविस एक तरह की कमजोरी होती है। जो हमारे नियंत्रण में रहने वाली मासंपेशियों में होने वाली थकान को दर्शाती है।

मायस्थीनिया ग्रेविस हमारी नसों और मांसपेशियों के बीच स्थापित सामान्य तालमेल में आई बाधा के कारण होती है।

मायस्थीनिया ग्रेविस के लिए वैसे तो कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, परंतु उपचार की मदद से आप इसके संकेतों और लक्षणों से राहत पा सकते हैं, जैसे कि हाथ या पैर की मांसपेशियों की कमजोरी, दोहरी दृष्टि और पलकों के खुलने और झुकने में नियंत्रण न होना। इसके अलावा बोलने, चबाने, निगलने व श्वास लेने में होने वाली कठिनाइयों से राहत पा सकते हैं।

हालांकि मायस्थीनिया ग्रेविस की समस्या किसी भी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर सकती है, यह 40 से कम उम्र की महिलाओं व 60 से अधिक उम्र के पुरुषों में होना आम बात है।