शनिवार, 6 जनवरी 2018

95 साल की उम्र में भी रोटी के लिए जारी है जद्दोजहद

साभार हिंदी डाकिया  


95 साल के एक बुजुर्ग हैं। जूतों के डॉक्टर। बिल्कुल फिट। हां, आंखें कुछ कमजोर जरूर है। सब उन्हें मोची बाबा के नाम से बुलाते हैं। लड़खड़ाती जबान में वो अपना नाम बताते हैं, पर उसे समझना मुश्किल है। उदयगंज में रहते हैं। एक कोठरी में, छोटी सी। अपनी बुढ़िया और बेटी के साथ। बुढ़िया, जो हमेशा बीमार रहती हैं और बेटी, जिसकी शादी रुपयों की वजह से नहीं हो पा रही है। एक बेटा भी था, पर इलाज नहीं मिलने से उसकी मौत हो गयी।



मोची बाबा..रोजाना सुबह 8 बजते ही साइकिल के सहारे टुकुर-टुकुर योजना भवन पहुंचते हैं। झोला उतारते हैं। बोरी बिछाते हैं। पॉलिश, ब्रश, धागे..और दुकान सजकर तैयार। गठरी बनकर बैठ जाते हैं। घुटने मुंह को लगने लगते हैं। उसके बीच मुंह दबाकर जूतों को पॉलिश, सिलाई और रगड़ाई करते हैं। हाथ काम में और दिमाग घर की परेशानियों में व्यस्त रहता है। कुछ पूछो तो बताते हैं, उमर बीत गई जूतों की मरम्मत में। गवर्नरों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक के जूते चमका चुका हूं। 



बाबा बताते हैं, नगर निगम वाले कभी-कभी सामान उठा ले जाते हैं। साइकिल के सहारे नगर निगम दफ्तर चला जाता हूं। साहब के हाथ-पैर जोड़कर सामान वापस ले आता हूं। पॉलिश से लेकर सिलाई तक से जो आमदनी होती है, उससे जैसे-तैसे गुजर बसर हो जाती है। कभी पैसा मांगता नहीं, पर साहब लोग बहुत कुछ दे देते हैं।






By- नीरज अंबुज

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

किसी के जीवन में न हो अंधियारा -शुभम सोती फाउंडेशन

किसी के जीवन में न हो अंधियारा -शुभम सोती फाउंडेशन


शुभम सोती फाउंडेशन के  अध्यक्ष आशुतोष सोती ने कहा कि जिस तरह सात साल पूर्व जुलाई 2010 में उनके जीवन में अंधियारा हो गया था वह किसी अन्य की जिंदगी में न हो। सिर पर हेलमेट न होने के कारण बेटे की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। इतना कहते हुए उनका गला रूंध गया और उसके आगे कुछ बोलने में असमर्थ थे। पास में खड़ी आशुतोष की बहन मुक्ता शर्मा और बेटी अनायका सोती की भी अांख भर अायी। संदेश दिया कि हेलमेट अवश्य लगाएं-सिर सुरक्षित सब सुरक्षित, शराब पीकर वाहन न चलाएं। रॉन्ग साइड न चलें आदि स्लोगन खें भर आईं।सड़क सुरक्षा का संदेश देते हुए बुलेट से भारत भ्रमण कर चुके यूपी 32 बुलेटियर्स ग्रुप के अतुल मिश्र कहते हैं कि बाइक अधिक रफ्तार में कतई न चलाएं। अक्सर सड़क हादसे पांच से 10 मिनट की लेट लतीफी को कवर करने में जान चली जाती है।

29.35 फीसदी बच्चों के अांख में मिली कोई न कोई परेशानी

29.35 फीसदी स्कूली बच्चों के अांख में मिली कोई न कोई परेशानी



48 सौ  बच्चों के अांख के परीक्षण के बाद मिली जानकारी

ग्रमीण क्षेत्र के बच्चों के बच्चो में शहरी के मुूकाबले अधिक है अांख की परेशानी
 कुमार संजय। लखनऊ
बच्चों की अांख की परेशानी दिन -ब-दिन बढ़ती जा रही है इन परेशानियों का समय से इलाज न होने पर इनमें रोशनी जाने की आशंका रहती है।  इंडियन जर्नल अाफ अाप्थेमोलाजी ने अपने रिपोर्ट में बताया है कि प्रदेश के  29.35 फीसदी बच्चों के अांख में कोई न कोई परेशानी है जिसका इलाज समय पर संभव है। सबसे अधिक परेशानी पांच से दस साल के उम्र के बच्चों में देखी गयी है । रिपोर्ट में कहा गया है कि अांख की परेशानी से ग्रस्त बच्चों में से 11 से 15 अायु वर्ग के 35.5 फीसदी बच्चों के अांख में परेशानी मिली जबकि पांच से 10 अायु वर्ग के 22.73 बच्चों के अांख में परेशानी मिली। विशेषज्ञों ने 4838 स्कूली बच्चों में अांख की परेशानी का अध्यन किया जिसमें धुंधला दिखने, नजदीक देखने, पलकों में सूजन, विटामिन ए की कमी, एल्रजी, एक अाख में जंम से रोशनी की कमी सहित कई परेशानी देखने को मिली। देखा गया कि स्क्रीनिंग में शामिल कुल बच्चों मे से 1420 बच्चों( 29.35 फीसदी) के अांख में किसी न किसी तरह की परेशानी देखने को मिली। देखा गया कि लड़के और लडकियों में अांख की परेशानी लगभग बराबर देखने को मिली। रिपोर्ट के मुूताबिक अांख की परेशानी ग्रामीण क्षेत्र के 30.5 फीसदी और शहरी क्षेत्र के 28.65 फीसदी बच्चो में परेशानी देखने को मिली। विटामिन ए की कमी ग्रामीण क्षेत्र के 3.03 और शहरी क्षेत्र के 1.15 फीसदी बच्चों में देखने को मिली। यह शोध शंकर नेत्रालय चेन्नई के डा. वीर सिंह के अगुवाई में सुभारती मेडिकल कालेज के डा.केपीएस मलिक, डा.वीके मलिक , डा. कीर्ती जैन ने किया। 

किस में मिली कौन सी परेशानी फीसदी

रीफरेक्टिव इरर( धुंधला दिखना) - 17.36
कनवरजेंश इन सफीएंसी( नजदीक का कम दिखना)- 2.79
वेलीफराइिटस( पलकों में सूजन) -2.11
विटामिन ए की कमी- 2.09
एलर्जी - 1.92
बैक्टीरियन कंजेक्टेवाइिटस- 0.95
एम्बीलायोपिया( जंम से एक अांख में कम रोशनी)- 0.41 
स्कुंयट(भेंगा) - 0.27


20 की  उम्र के पहले 30 फीसदी की नजर कमजोर
संजय गांधी पीजीआई के नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. अालोक कुमार का कहना है कि विटामिन ए की कमी को पूरा कर अांख को बचाया जा सकता है । ग्रामीण क्षेत्र में पोषण की कमी भी बडा कारण है। डा. अालोक का कहना है कि शोध रिपोर्ट के मुूताबिक  एक हजार में से 4.9  बच्चों में अांख की परेशानी है और एक हजार में से 0.62 बच्चों में अंधता की परेशानी है । देखा गया है कि बीस साल की उम्र से पहले 30 फीसदी बच्चों की नजर कमजोर हो जाती है केवल स्कूल स्क्रीनिंग प्रोग्राम को सही तरीके से लागू कर समय पर इलाज दिया जाए तो काफी बच्चों की रोशनी बचायी जा सकती है 


बुधवार, 3 जनवरी 2018

महिलाओं में बढ़ा कश का शौक, यूपी में हर छठी महिला को धूम्रपान की लत

महिलाओं में बढ़ा कश का शौक, यूपी में हर छठी महिला को धूम्रपान की लत

--महिलाओं में बढ़ा कश का शौक, यूपी में हर छठी महिला को धूम्रपान की लत
इसमें तंबाकू जनित उत्पादों का प्रयोग करने वाले पुरुषों का औसत 52.1 फीसद रहा।...

चकाचौंध भरा परिवेश युवतियों व महिलाओं के जीवन पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। बदलती जीवन शैली में शौकिया धूमपान का शुरू हुआ सिलसिला लत में तब्दील हो रहा है। स्थिति यह है कि यूपी की हर छठी महिला धूमपान कर रही है। यह पर्दाफाश 15 वर्ष से अधिक वयस्कों पर हुए सर्वेक्षण से हुआ।
ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (गेट्स) 2016-17 की फैक्ट शीट चौंकाने वाली वाले तथ्य सामने अाएं है।

गेट्स-2 सर्वे की रिपोर्ट में 15 वर्ष से अधिक लोगों को शामिल किया गया था। केंद्रीय परिवार कल्याण विभाग, डब्लूएचओ व टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई द्वारा मल्टी स्टेज सैंपल डिजाइन तैयार किया गया। इसमें देश भर से कुल 74,037 लोगों को व यूपी से 1,685 पुरुष व 1,779 महिलाओं को शामिल किया गया।

इसमें पाया गया कि वर्ष 2009-10 में हुए सर्वे से धूमपान करने वालों की संख्या यूपी में बढ़ी है। इसमें तंबाकू जनित उत्पादों का प्रयोग करने वाले पुरुषों का औसत 52.1 फीसद रहा। वहीं महिलाओं का औसत 17.7 फीसद रहा। सुलभा ने कहा कि रिपोर्ट के मुताबिक हर छठी महिला तंबाकू का किसी न किसी फार्म में सेवन कर रही है। कई महिलाएं जहां मजदूरी करने वाली गुटखा, खैनी, बीड़ी का सेवन कर रही हैं। वहीं कई शौकिया सिगरेट व गुटखा शुरू करने के बाद लती हो गईं।

वयस्कों में गुटखा-खैनी का चलन बढ़ा
रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2009-10 में वयस्कों में जहां तंबाकू उत्पाद सेवन का औसत 33.9 था, वहीं 2016-17 में बढ़कर 35.5 फीसद हो गया। हालांकि इसमें धुआं वाले उत्पादों को औसत 14.9 फीसद से घटकर 13.5 फीसद रह गया, वहीं गुटखा, खैनी, पान-मसला का सेवन करने वाले वयस्क 25.3 फीसद से बढ़कर 29.4 फीसद हो गए।

उत्पादों के प्रचार में भी वृद्धि
धूमपान उत्पादों के प्रचार-प्रसार में भी काफी वृद्धि हुई है। इसमें वर्ष 2009-10 में जहां उत्पादों के प्रचार का औसत 10.3 रहा, वहीं अब बढ़कर 16.3 हो गया।

तंबाकू सेवन के आंकड़ों पर एक नजर
पुरुष महिलाएं शहरी ग्रामीण
52.1 17.7 26.6 38.5

यूपी 12वें नंबर पर
तंबाकू उत्पादों के सेवन करने वालों में यूपी 12वें नंबर पर है। कुल औसत की बात करें तो त्रिपुरा में 64.5 फीसद लोग तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। वहीं मिजोरम में 58.7 व यूपी 12वें ़ नंबर पर हैं, यहां कुल 35.5 फीसद लोग तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं।

20 फीसद लोग सुबह उठकर करते सेवन
तंबाकू की लत ऐसी है कि 20 फीसद लोग सुबह आंख खोलते ही पांच मिनट में सेवन करते हैं। वह तंबाकू उत्पादों को सेवन करने के बाद ही फ्रेश होने जाते हैं।

फिर से बनेगा प्लान
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि तंबाकू सेवन करने वाला का आकड़ा बढऩा चिंताजनक है। ऐसे में इस पर अंकुश लगाने के लिए फिर से प्लान बनाना होगा। शिक्षा व नगर निगम विभाग को भी शामिल करना होगा। वहीं, स्कूल के आस-पास तंबाकू उत्पादों की बिक्री प्रतिबंधों पर कड़ाई से लागू करना होगा। इस दौरान डीजी हेल्थ डॉ. पदमाकर सिंह, सीएमओ डॉ. जीएस वाजपेयी व केजीएमयू के डॉ. सूर्यकांत भी मौजूद रहे।



सोमवार, 1 जनवरी 2018

डाक्टर और पैरामेडिकल के खराब व्यवहार से संस्थान की इमेज होती है प्रभावित

पीजीआई के न्यूरोलाजी विभाग का स्थापना दिवस 




 डाक्टर और पैरामेडिकल के खराब व्यवहार से संस्थान की इमेज होती है प्रभावित

सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को सिखाया जाए कम्युनिकेशन स्किल 
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
अमूमन मरीज या उनके तीमारदार शिकायत करते है कि डाक्टर , नर्सेज और दूसरे पैरामेडिकल स्टाफ ठीक से बात नहीं करते। बात -बात पर झिड़क देते है खास तौर पर सरकारी अस्पताल में।  इस शिकायत को संजय गांधी पीजीआई के न्यूरोलाजी विभाग ने महसूस किया । इसी लिए विभाग के स्थापना दिवस के मौके पर विभाग में काम करने वाले डाक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ के लिए  मरीज या तीमारदार से बात करें  विषय पर वर्कशाप का अायोजन किया। अाकाशवाणी के निदेशक पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि कोई किसी का दुश्मन या मित्र जंम से नहीं होता है लेकिन यह वाणी ही दोस्त और दुश्मन बनाती है इसलिए बोलने से पहले थोडा सा जरूर सोचना चाहिए।मेडिकल प्रोफेशन में यह अाम शिकायत है कि ठीक से बात नहीं करते है इसके पीछे वर्क लोड के साथ ,डाक्टर की उम्र है। इन सब तमाम तर्कों के बीच यह सोचना जरूरी है कि अाप के पास परेशान अादमी अाता है अाप के दो मीठे बोल से उसे काफी राहत मिल सकती है। अाप के खराब व्यवहार से अाप की इमेज तो खराब होती ही है साथ ही संस्थान की इमेज भी प्रभावित होती है।  इस मौके पर विभाग के प्रो.संजीव क्षा, प्रो.विनीता के अलावा नर्सेज, टेक्नोलाजिस्ट सहित कई लोग मौजूद थे। प्रो. झा ने कहा कि यह वर्कशाप हम लोगों के अंदर काफी असर लाएगा।   

मीठी वाणी से दूर हो जाती है मरीज की साइकोलाजिकल परेशानी

विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान ने कहा कि अाप के पास सौ परेशान अाते है लेकिन अगला जो अा रहा है वह अापके लिए 101 वां है लेकिन मरीज या तीमारदारा के लिए वह पहला है। वन टू वन का रिश्ता है अाप की अच्छी भाषा से साइकोलाजिकल परेशानी 25 से 30 फीसदी तक दूर हो जाती है। किसी भी बीमारी के शारीरिक पहलू के साथ मानसिक पहलू होता है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हर अगले मरीज से डाक्टर और पैरामेडिक स्टाफ का नया रिश्ता बनता है इस लिए रिश्ता मजबूत हो कोई गांठ न हो ध्यान देने की जरूरत है।    


कम्युनिकेशन स्किल पर नहीं जोर

विभागके  प्रो.वीके पालीवाल ने  कहा कि डाक्टर को केवल डाक्टरी पढाई जाती है एजूकेशन सिस्टम कम्युनिकेशन स्किल नहीं सिखाया जाता है। अपील किया सुनने की स्किल अपने अंदर विकसित करें हमारे संस्थान में इसके लिए 01, 02 कोर्स कराया जाता है जिसमें स्किल दी जाती है लेकिन यह काफी कम है। 



रविवार, 31 दिसंबर 2017

ग्रामीण क्षेत्र के 24.7 फीसदी में बढ़ा मिला रक्त दाब

शहरी बीमारी गांव में जमा रही है जडें
 ग्रामीण क्षेत्र के  24.7 फीसदी में बढ़ा मिला रक्त दाब 


कुमार संजय। लखनऊ
दिल और दिमाग का दुश्मन उच्च रक्तचाप से गांवों में अपनी जड़ें जमा चुका है। संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो.सुदीप कुमार कहते है कि शहरी बीमारी गांव में भी जडे जमा रहा है। नेशनल फेमली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलता है कि ग्रमीण क्षेत्र में बीपी की परेशानी 24.7 फीसदी में है जबकि शहरी क्षेत्र के 21.0 फीसदी लोगों में है। कुल उच्च् रक्त चाप से ग्रस्त लोगों में 8.8 फीसदी महिलाएं और 13.4 फीसदी पुरूष है जिसमें ग्रामीण और शहरी दोनों शामिल है। उच्च रक्त चाप को तीन श्रेणियों में बांटा गया है- सामान्य से थोड़ा अधिक रक्तचापअधिक रक्तचाप और बहुत अधिक रक्तचाप। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि ऐसे लोगों की तादाद काफी ज्यादा हैजिनको उच्च रक्तचाप होने की आशंका है। ये लोग बीमारी से ठीक पहले की स्थिति में हैं। इसका मुख्य कारण जीवन शैली बदलाव । बैठकर अधिक समय गुजार रहे हैं। धूम्रपान की भी इसमें अहम भूमिका है। फल और सब्जियों का कम सेवन भी उच्च रक्तचाप के लिए जिम्मेदार है।


नमक भी है एक वजह    
प्रो. सुदीप कहते है कि शरीर गुर्दे की मदद से अतिरिक्त नमक को बाहर निकालता है। खाद्य पदार्थों में अत्यधिक नमक की वजह से गुर्दों पर बोझ बढ़ जाता है और वे अपना काम करना बंद कर देते हैं। ऐसी स्थिति में नमक रक्त में घुलने लगता हैजिससे रक्त में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। इससे धमनियों पर दबाव पड़ने के कारण रक्तचाप बढ़ जाता है।इस तनाव से निपटने के लिए रक्त वाहिकाएं तथा धमनियां मोटी होती जाती हैं। ऐसा होने पर रक्त के प्रवाह के लिए बहुत ही कम जगह बचती है और रक्तचाप पुनः और अधिक बढ़ता है। इससे उत्पन्न तनाव से निपटने के लिए दिल अपनी कार्यगति बढ़ाता है और ह्रदय की बहुत सारी बीमारियों की संभावनाओं को जन्म देता है।

बढा रहा है इलाज का खर्च
विशेषज्ञों का कहना है कि एक ग्रामीण व्यक्ति ह्रदय और रक्तवाहिका संबंधी रोगों पर हर बार औसतन 438 रुपये खर्च करता है। इस तरह की बीमारियों के लिए एक ग्रामीण का जहां सरकारी अस्पताल का खर्च 240 रुपये है वहीं निजी अस्पताल में 470 रुपये तक औसतन व्यय होता है। ह्रदय और रक्तवाहिका संबंधी रोग की वजह से अगर व्यक्ति को एक बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ेतो औसतन करीब 31,647 रुपये खर्च होते हैं। सरकारी अस्पताल का खर्च जहां 11,549 रुपये हैवहीं प्राइवेट अस्पताल में यह खर्च 43,262 रुपये बैठता है।


50 फीसदी को हाई बीपी का नहीं आभास

चिंताजनक बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या गांव में अधिक हैजिन्हें मालूम भी नहीं है कि वे उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन की बीमारी से ग्रसित है। गांव के 50 से  60 लोगों को इसका आभास तक नहीं होता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इस बीमारी का शुरुआत में कोई विशेष लक्षण नहीं दिखता। इसलिए हम लोग एक स्क्रीनिंग जरूरी है।  30 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों में मधुमेह और उच्च रक्तचाप की जांच कराते रहना चाहिए। अगर रक्तचाप के अधिक होना का पता चलता है तो बहुत हद तक इसे बिना दवा के ही ठीक किया जा सकता है।

यह है बीपी का पैमाना
 सिस्टोलिक रक्तचाप की स्थिति 120 से 129 एमएमएचजी और डायस्टोलिक रक्तचाप की स्थिति 80 से 89 एमएमएचजी के बीच की होती है। अगर यह दबाव 115/75 एमएमएचजी से कम या ज्यादा होता हैतो खतरा बढ़ता है। प्रत्येक 20/10 एमएमएचजी चढ़ाव पर दिल की बीमारियों की संभावना दोगुना होती जाती है। 



उच्च रक्तचाप के खतरे 
         स्ट्रोक: उच्च रक्तचाप से एक समय बाद दिल का आकार बढ़ने के कारण यह ठीक से खून पंप करना बंद कर देता हैजिससे स्ट्रोक और हार्ट फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।
         ऐन्यूरिज्म: उच्च रक्तचाप के कारण नसों में कमजोरी और सूजन आ जाती है। ऐन्यरिज्म फटने से मौत भी हो सकती है।
         किडनी खराब: किडनी की रक्त धमनियां कमजोर और पतली हो जाती हैंजिससे किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती।
         आंखों की रोशनी जाना: आंखों की रक्त धमनियां प्रभावित होने से अंधेपन का ख़तरा भी उत्पन्न हो जाता है।
         मेटाबॉलिक सिंड्रोम: यह शरीर में ऊर्जा के उपयोग और स्टोरेज से संबंधित अनियमितता है। उच्च रक्तचाप होने पर मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ी अन्य सेहत संबंधी परेशानी होने की आशंका अधिक बढ़ जाती है।



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

डब्लूएचओ ने बनाया सुरक्षित प्रसव के लिए चेक लिस्ट

डब्लूएचओ ने बनाया सुरक्षित प्रसव के लिए चेक लिस्ट  




सेफ चाइल्ड बर्थ चेक लिस्ट से संभव हो सकता है सुरक्षित प्रसव

विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रदेश की डेढ़ लाख महिलाओं पर किया किया चेक लिस्ट पर शोध

कुमार संजय। लखनऊ
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ने सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ्य शिशु में परेशानी कम करने के लिए  के चेक लिस्ट बनाया है जिसका इस्तेमाल कर मां और बच्चे में परेशानी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। चेक लिस्ट की उपयोगिता का अध्ययन उत्तर प्रदेश में किया गया जिसमें देखा गया कि चेक लिस्ट का प्रयोग करने से मातृ मृत्यु दर में 10 से 15 की कमी लायी जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने  उत्तर प्रदेश को 'फ़ील्ड-टेस्ट की तरह इस्तेमाल कर साबित किया है कि 'सुरक्षित प्रसव चेकलिस्ट का पालन कर  मातृ और नवजात शिशु को काफी हद तक सुरक्षित बनाया जा सकता है। इस बात को  न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसीन ने स्वीकार भी किया है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूपी सरकार की सहायता से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और एरियान लैब , सामुदायिक सशक्तिकरण प्रयोगशाला लखनऊ में संयुक्त रूप से 'बेहतर जन्म अध्ययननामक इस परियोजना में डब्लूएचओ की सुरक्षित प्रसव चेकलिस्ट के बारे में  जन्म सेवकों को  प्रशिक्षण में शामिल किया गया। 40 प्रशिक्षण सत्र में इन्हे चेक लिस्ट के बारे में जानकारी दी गयी। शोध में उत्तर प्रदेश में 120 समुदाय स्वास्थ्य केंद्रों में आयोजित यह शोध 10-15 तक मातृ एवं नवजात शिशु मृत्यु दर को घटाने का वादा करता है। प्रदेश में प्रशिक्षित  (जहां प्रशिक्षण के बाद कार्यबल को देखा गया) और कंट्रोल  (प्रशिक्षण के बिना कार्यबल को देखा गया) के कार्य को प्रदेश के  चार क्षेत्रों के 24 जिलों  में देखा गया कि कितना फायदा हुअ । इनके प्रशिक्षण को  1.57 लाख महिलाओं को प्रसव के दौरान देखा गया।

आठ महीने के अध्ययन में पता चला है कि चेकलिस्ट के पालन से  70% तक सुधार हुआ।देखा गया कि संक्रणण रोकने का तरीका हैंड हाइजिन  मुख्य रूप से  प्रशिक्षित वर्ग में 35 फीसदी तक बढ़ गया। इसी तरह हाइपोथर्मिया और संक्रमण से कम वजन वाले बच्चों को बचाने के लिए सबसे प्रभावी कंगारू केयर त्वचा से त्वचा संपर्क  सामान्य समूह में 11% के खिलाफ प्रशिक्षित समूह में 79% तक बढ़ गया। स्तन पान शुरूआत अप्रशिक्षित में 3.5% से बढ़कर प्रशिक्षित समूह में 70% हो गई।

क्या है चेक लिस्ट

- भर्ती के समय रक्त दाब और बुखार देख कर  एंटीबायोटिक, एंडी हाइपरटेसिंव दवा शुरू करनी है
- सर्विक्स के फैलाव को देखना है प्रसव का समय नजदीक अने पर 24 सेमी से अधिक हो जाता है और हर घंटे एक सेमी बढ़ता है इसलिए 30 मिनट दो घंटे, चार घंटे पर सर्विक्स को मेजर करना है
- दस्ताने साफ हो, हाथ एल्कोहल से साफ करने के बाद ही छुए
- अक्सीटोसिन इंजेक्शन की वयवस्था सुनिश्चित करें
- सक्सन डिवाइस तैयार रखें
- मास्क , एंबू वैग तैयार रखें
- प्रसव के बाद रक्त स्राव पर नजर रखे रोकने से यूट्रस मसाज, यूट्रोटोनिक का इस्तेमाल करें, अईवी फ्लूड चलाएं. कारण को दूर करें
- शिशु को स्तनपान कराएं
- महिला में बुखार, रक्तदाब पर नजर रखें
-शिशु के सांस पर नजर रखें, बुखार है तो एंटीबायोटिक शुरू करें, कम वजन है इसके लिए जो सुविधा है उसका इस्तेमाल करें
-शिशु को साफ तैलिया , कपडें में रखें



गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

बलरामुर अस्पताल में 24 घंटे होगी खून की जांच नई सुविधा शुरू

अब बलरामपुर अस्पताल में मिलेगी 24 घंटे जांच रिपोर्ट


प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने बलरामपुर अस्पताल में 24 घंटे जांच की व्यस्था शुरू कर दी है। इस सुविधा का उद्घाटन चिकित्सा मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने गुरूवार को किया। इससे मरीजो की बीमारी का पता जल्दी लगने के कारण इलाज की दिशा तय करना संभव होगा। अस्पताल में लैब प्राइवेट पार्टनर शिप के अाधार पर लगायी गयी है। इसके तहत मशीन के साथ जांच करने के लिए लैब टेक्नोलाजिस्ट सब कुछ सेवा प्रदाता व्यवस्था करेंगी। इस मौके पर सेवा प्रदाता पीअो सिटी के प्रमुख सौऱभ गर्ग को चिकित्सा मंत्री से प्रतीक भेट कर सम्मानित किया। अस्पताल के निदेशक ने नई सेवा के बारे में जानकारी देते हुए सेवा प्रदाता की सराहना करते हुए कहा कि पहले से यह सेवा प्रदाता मेडिकल कालेज, पीजीआई सहित कई अस्पतालों में सेवा दे रही है।  इस मौके पर मेयर संयुक्ता भाटिया विशेष रूप से उपस्थित थी।  

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

पीजीआई का एचअारएफ बना रोल माडल---उपलब्ध कराता है 20 से 80 फीसदी कम कीमत पर दवा

पीजीआई का एचअारएफ बना रोल माडल


मरीजों को उपलब्ध कराता है 20 से 80 फीसदी कम कीमत पर दवा
प्रदेश के सभी मेडिकल कालेज और संस्थान पीजीआई की दर पर खरीदेगें दवा और सर्जिकल अाइटम

कुमार संजय। लखनऊ 

संजय गांधी पीजीआई का हास्पिटल रिवालविंग फंड(एचअारएफ) रोल माडल बनता जा रहा है। प्रदेश सरकार ने सभी मेडिकल कालेजों, संस्थानों से कहा है कि पीजीआई जिस दर पर दवाएं, सर्जिकल अाइटम खरीद रहा है उसी दर पर मरीजों के लिए तुरंत दवाएं और सर्जिकल अाइटम खरीद कर मरीजों को राहत पहुंचाएं। संस्थान खुद टेंडर करते है जिसमें देरी होने की अाशंका रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पीजीआई में किस मर्ज के लिए कौन सी दवा या सर्जरी के लिए कौन से सर्किजकल अाइटम खरीदा जाना है यह तो विभाग के संकाय सदस्य तय करते है लेकिन किस पर खरीदी जाए इसके लिए लंबी प्रक्रिया है जिसमें अोपेन रेट कांट्रैक्ट होता है जिसमें सबसे कम कीमत पर दवा सप्लाई करने वाली दवा कंपनी को जरूरत के अनुसार दवा सप्लाई का अार्डर दिया जाता है। निदेशक प्रो.राकेश कपूर कहते है कि कम कीमत के साथ क्वालिटी को सुनिश्चित करने के लिए अच्छी कंपनियों को प्राथमकिता देते है। इससे सही दवा 20 से 80 फीसदी कम कमीत पर मरीजों को मिलती है। उत्तर भारत में इस सिस्टम को अभी कोई पूरी तरह फालो नहीं कर पाया है। एम्स दिल्ली जैसे संस्थान हमारे माडल को अपना रहे है। प्रदेश सरकार ने हाल में अादेश जारी किया कि सभी मेडिकल कालेज और संस्थान जिस दर पर दवाएं और सर्जिकल आइटम खरीद रहे है उसी पर खरीद करें यह हमारे लिए गर्व की बात है। 

पांच हजार तरह की दवाएं और सर्जिकल अाइटम की होती है खरीद

एचअाऱएफ के अारए यादव कहते  है कि पांच हजार तरह की दवाएं  जिसमें एंटी केंसर, इम्यूनोसप्रेसिव, एंटी बायोटिक , कंट्रास , अांको प्रोडेक्ट जो लाइफ सेविंग ड्रग के तहत अाती है उसकी ब्रांडडेड अौर रिसर्च मालीक्यूल लेते है यह दवाएं भी बाजार की कीमत से 20 से 80 फीसदी तक कम कीमत पर मरीजों को दी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसी तरह का माडल पूरे प्रदेश अौर देश के अस्पतालों को अपनाने की जरूरत है।