सोमवार, 29 अगस्त 2022

सांस की नली फंसी गोली निकाल कर बचायी जिंदगी - नहीं करनी पड़ी ओपेन सर्जरी मुंह से निकल गई गोली

 


 

 

सांस की नली फंसी गोली निकाल कर बचायी जिंदगी

नहीं करनी पड़ी ओपेन सर्जरी मुंह से निकल गई गोली

सांस की नली को किया रिपेयर

रिजिड ब्रोन्कोस्कोपी के जरिए संभव हुई यह प्रक्रिया

 

   


 20 वर्षीय युवक को  गोली लगने के कारण संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में गंभीर अवस्था में लाया गया। परीक्षण के बाद पता लगा कि गोली सांस की नली में ट्रेकिया में फंसी थी जिसके कारण सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी। गोली पीठ के निचले हिस्से से निकल कर छाती में जा लगी थी और वायुमार्ग ( ट्रेकिया) को भेद कर उसमे फंस गई थी।  इससे आसपास के क्षेत्र में हवा का रिसाव होने लगा जिससे मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ के मुताबिक ट्रामा सेंटर में

  ट्रामा सर्जरी विभाग के डाक्टर अमित कुमार सिंह की देखरेख में भर्ती किया गया। हमारे विभाग के डा. अजमल सहित अन्य ने  प्रारंभिक ब्रोन्कोस्कोपिक मूल्यांकन के बाद, मरीज की सामान्य एनेस्थेसिया के अंतर्गत मुंह के माध्यम से रिजिड  ब्रोन्कोस्कोपी की गयी और फोरसेप का उपयोग करके गोली को निकाल दिया गया । इसके बाद, वायुमार्ग की दीवार में लगभग 2 सेमी  को कवर करने के लिए एक सिलिकॉन स्टेंट लगाया गया। स्थिति में सुधार होने लगा जिसके बाद सचेत स्थिति में आईसीयू में स्थानांतरित कर दिया गया । इस प्रक्रिया द्वारा बिना किसी सर्जिकल चीरे के छाती से गोली निकालने के लिए एक प्रमुख शल्य प्रक्रिया को टाला जा सका। मरीज अभी ट्रामा सेंटर के आईसीयू में स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहा है।इस प्रक्रिया में  एनेस्थेसिया विभाग की डाक्टर रुचि वर्मा व रेडियोलाजी विभाग के डाक्टर जफर नियाज का विशेष योगदान रहा।

रविवार, 28 अगस्त 2022

एक्यूट पैक्रिएटाइिटस का मिला दुश्मन : पित्ताशय स्टोन और शराब पैंक्रियाज का दुश्मन

 


एक्यूट पैक्रिएटाइिटस का मिला दुश्मन

पित्ताशय स्टोन और शराब पैंक्रियाज का दुश्मन

मोटापा भी बढ़ा रहा है खतरा

पहली बार हुई इस बीमारी के कारण और रिस्क फैक्टर पर शोध




एक्यूट पैक्रिएटाइटस के कारण का पता लगाने में विशेषज्ञों ने कामयाबी हासिल की है। इस परेशानी से ग्रस्त 120 लोगों पर शोध के बाद देखा गया कि मोटापा, अधिक संख्या( हेमेटोक्रिट) में लाल रक्त कणिकाएं और सी रिएक्टिव प्रोटीन का बढ़ा स्तर परेशानी की आशंका को बढ़ाता है। अल्कोहल और पित्ताशय में स्टोन इस परेशानी का सबसे बड़ा कारण सामने आया है। इस परेशानी से बचने के लिए पित्ताशय स्टोन का सही समय पर इलाज कराना चाहिए। शराब के सेवन नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही रिस्क फैक्टर में मोटापे पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। यह परेशानी 14 से 60 आयु वर्ग के बीच किसी को हो सकती है। सबसे अधिक 41 से 60 आयु वर्ग के बीच देखी गयी है। 50 फीसदी लोगों में सीवियर एक्यूट पेनक्रिएटाइटिस  परेशानी होती है। सही समय पर सही मैनेजमेंट न होने पर मल्टी ऑर्गन फेल्योर की स्थिति आ सकती है। इस शोध को विश्व स्तर पर स्वीकार करते हुए एनल आफ अफ्रीकन मेडिसिन जर्नल ने स्वीकार किया है। इस परेशानी में पेट में तेज दर्द, उल्टी, मचली की परेशानी होती है। पुरुषों में यह परेशानी महिलाओं से अधिक देखी गयी है।

इन्होंने ने किया शोध

किंग जार्ज मेडिकल विवि के मेडिसिन विभाग के डा.एमएल पटेल, डा. वीरेंद्र आतम, डा. हरीश भारती, जियाट्रिक मेडिसिन के डा. राधेश्याम, गायनोकोलॉजी से डा.रेखा सचान और रेडियोलॉजी विभाग के डा. अनित परिहार में यह शोध किया ।


किसमें कितना

पुरुष- 73.73 फीसदी

महिला- 26.66 फीसदी

कारण

अल्कोहल- 70.8 फीसदी

पित्ताशय में पथरी-20.8 फीसदी

अज्ञात कारण- 4.1 फीसदी

रिस्क फैक्टर

बॉडी मास इंडेक्स- 25 से अधिक

हेमाटोक्रिट- 44 फीसदी से अधिक

सी रिएक्टिव प्रोटीन- 150 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक


किस उम्र में परेशानी

14 से 40- 31.66 फीसदी

41 से 60- 51.66

60 से अधिक- 16.66

 

क्या है एक्यूट पैक्रिएटाइटस

एक्यूट पेनक्रिएटाइटिस  (तीव्र अग्नाशयशोथ) एक ऐसी स्थिति है जहां अग्न्याशय( पैंक्रियाज) में  थोड़े समय के लिए सूजन हो जाता है । अग्न्याशय (पैंक्रियाज) पेट के पीछे स्थित एक छोटा अंग है, जो पाचन में मदद करता है। तीव्र अग्नाशयशोथ वाले अधिकांश लोग लगभग एक सप्ताह के भीतर  बेहतर महसूस करने लगते हैं। इस दौरान दर्द निवारक दवाएं दी जाती है। कई बार पैंक्रियाज से निकलने वाली डक्ट में रुकावट होती है जिसे दूर दिया जाता है। पेनक्रिएटाइटिस की स्थिति में एमाइलेज और लाइपेज एंजाइम  का स्तर रक्त में बढ़ जाता है।   कुछ भी खाने या पीने से दर्द बढ़ जाता है।

सोमवार, 22 अगस्त 2022

निकला त्वचा और टेंडन  सही कर दिया पंजा

 निकला त्वचा और टेंडन  सही कर दिया पंजा





सांप ने काटा बना घाव और बंद हो गई उंगली की गति

 

25 वर्षीय सुमिता को सांप ने काट लिया । एंटी स्नेक इंजेक्शन लगने के बाद उसकी जान तो बच गयी लेकिन कलाई के निचले हिस्से में घाव हो गया तो बढ़ता ही जा रहा था। तमाम इलाज के बाद भी घाव ठीक नहीं हो रहा था। इसके साथ ही ऊंगलिया भी चलनी बंद हो गयी। घर वाले इनको लेकर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के प्लास्टिक सर्जरी विभाग में लेकर आए तो विभाग के प्रमुख प्रो. राजीव अग्रवाल ने देखा तो पतला चला  कि सांप के जहर से घाव के साथ ऊंगलियों को गति देने वाले टेंडन भी क्षति ग्रस्त हो गए है। त्वचा के ठीक नीचे टेंडन होता हैत्वचा के ठीक नीचे टेंडन होता है। त्वचा के क्षति ग्रस्त होने पर टेंडन की आशंका काफी हद तक रहती है। विशेष ड्रेसिंग से पहले घाव को ठीक किया। रेडियल आर्टरी फोर आर्म फ्लैप के जरिए टेंडन को ठीक किया। प्रो. राजीव के मुताबिक पहले सूखे टेंडन को निकाल फिर फोर आर्म( कलाई और कुहनी के बीच ) से त्वचा और टेंडन लेकर धाव के वाले हिस्से में रोपित किया। अब उंगलियां मुडने लगी है। घाव पूरी तरह ठीक हो गया है। प्रो. राजीव ने बताया कि 5 अगस्त 2022 को एक 25 साल कि युवती जिसको सांप ने काटा हुआ था ओ0पी0डी0 में दिखाने आयी थी


यह बिहार के एक छोटे से गाँव मीनापूर, जिला - मुजफ्फरपूर कि रहने वाली है। इसने बताया 24 जुलाई 2022 कि रात को जब वह सो रही थी, तब सांप ने दायें हाथ पर डस लिया। डसने के तुरंत बाद हाथ मे  अत्यधिक दर्द,सूजन और जलन हो गयी। आस-पास के त्वचा के रंग मे  भी बदलाव आ गया, और साथ हीं साथ बुखार,उल्टी,सिर दर्द एवं कंपकपी लगने लगी। उसके बाद उसके मुहं से झाग निकलने लगा और वो बेहोश हो गयी। घर पर उसका प्राथमिक इलाज जो भी उपलब्ध था उसे किया गया एवं घर के लोग  ने हाथ के उपर के हिस्से पर कस के कपड़ा बांध दिया। पी0एस0सी0 से उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां पर एन्टीवेनम दिया गया । एन्टीवेनम देने के बाद होश आ गया। इसके कुछ दिनों के बाद रोगी सर्पदंश से ठीक हो गयी, लेकिन उसके हाथ का घाव बढता गया। उंगलिया चलनी बंद हो गयी थी। निश्चेतना विशेषज्ञ प्रो. संजय कुमार और प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डा. भूपेश ने विशेष योगदान रहा।    

सांप काटे तो क्या करें क्या न करें

- तुरंत डॉक्टर को फोन करें एवं अस्पताल ले जाने कि तैयारी करें।

-. रोगी को जमीन पर आराम की अवस्था में  लेटा दें।

- सांप काटने के घाव को पानी एवं साबुन से धोयें।

- अंगुठी,घडी़,चूड़ी इत्यादी पहने हो तो उसे निकाल दें।

- कटे वाले भाग को स्थिर रखे  एवं ज्यादा चलायें नही, और

एक खपची बांध दें।

-. टूनिकेट(रक्त बंद ना लगाएं) - डसे हुए हिस्से के आगे या ऊपर कोई

कपड़ा या रस्सी ना बांध ।

- सर्पदंश के घाव को चाकू से ना काटें।

- सर्पदंश के घाव को मुंह से ना चूसें

-. सर्पदंश के रोगी को दर्द निवारक दवा भी ना दें।

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

विशेष एंजियोप्लास्टी तकनीक से पीजीआई ने दिल को किया दुरूस्त -ओसीटी और इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग के जरिए मुख्य धमनी की दूर की गई रुकावट

 विशेष एंजियोप्लास्टी तकनीक से पीजीआई ने दिल को किया दुरूस्त  

 


ओसीटी और इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग के जरिए मुख्य धमनी की दूर की गई रुकावट

 



एक 60 वर्षीय पुरुष के मुख्य धमनी में दो जगह रुकावट को दूर करने में कामयाबी संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञों ने हासिल की है। इस जटिल कोरोनरी इंटरवेंशन तकनीक का सजीव प्रसारण भी कार्डियोलॉजी इंडिया साउथ एशिया के अधिवेशन में किया गया। इसका आयोजन हैदराबाद में किया गया हो रहा था। 60 वर्षीय पुरुष मुख्य कोरोनरी धमनी के लेफ्ट एंटीरियर डिसेंडिंग और सीएक्स आर्टरीज में  में ब्लॉकेज थी। इस रुकावट को दूर करने में विभाग के प्रमुख  प्रो.  आदित्य कपूर, प्रो सत्येंद्र तिवारी, प्रो सुदीप कुमार, प्रो. रूपाली खन्ना प्रो.  अंकित साहू शामिल थे। विशेषज्ञों ने बताया कि  नवीनतम कोरोनरी इमेजिंग का मार्गदर्शन लेते हुए एक कोरोनरी एंजियोप्लास्टी की गई। इस केस में  इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग और ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी का उपयोग किया गया।

इन इमेजिंग तकनीक  उपयोग से कोरोनरी एनाटॉमी, प्लाक संरचना और कोरोनरी वैस्कुलर को चित्रित करने में मदद मिलती है जो साधारण कोरोनरी एंजियोग्राफी द्वारा नहीं देखे जाते हैं।प्रो सत्येंद्र तिवारी ने बताया कि इस मरीज में रणनीति तय हो जाने के बाद पहले सीएक्स आर्टरी  में स्टेंट डालकर ठीक किया गया। इसके बाद मुख्य धमनी यानी लेफ्ट मेंन  कोरोनरी धमनी में स्टेंट डाले गए।

 

कैसा स्टंट होगा कारगर पहले लगता है पता

 

 प्रो सुदीप कुमार ने बताया कि प्लानिंग  ऐसे मामलों में सफलता की कुंजी है क्योकि अक्सर ऐसे मामले  में कोरोनरी धमनियों में कई वायर और बैलून डालने पड़ते है । डॉ रूपाली खन्ना ने कहा कि इन स्थितियों में आईवीयूएस या ओसीटी का उपयोग करके इमेजिंग न केवल आवश्यक है,  अपितु स्टेंट आकार को समझने के लिए अनिवार्य भी है।

 

नई इमेजिंग तकनीक से मिलती सफलता का लगता है पता

 प्रो. अंकित साहू ने बताया कि इमेजिंग  से पता चलता है कि  क्या स्टेंट अच्छी तरह से लगाया गया और कोरोनरी धमनी की दीवार पर पर सही से फूल गया की नहीं। ओसीटी द्वारा एक अंतिम इमेजिंग विश्लेषण किया गया था ताकि स्टेंट के सारे डायमेंशन और मेजरमेंट लिए जा सकते हैं। 

 

रविवार, 31 जुलाई 2022

हाइड्रोसेफलस का आधुनिक तकनीक से हुआ पहली बार पीजीआई में इलाज-पहली बार हाइड्रोसेफलस ग्रस्त में लगा प्रोग्राम्ड शंट

 




नया शंट नियंत्रित रखेगा दिमाग में पानी

हाइड्रोसेफलस का आधुनिक तकनीक से हुआ पहली बार पीजीआई में इलाज

अब दोबारा बिना सर्जरी नियंत्रित किया जाएगा दिमाग में पानी

पहली बार  हाइड्रोसेफलस ग्रस्त में लगा प्रोग्राम्ड शंट

 


 

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के न्यूरो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों ने पहली बार   हाइड्रोसेफलस  से ग्रस्त मरीज में प्रोग्राम्ड शंट रोपित किया है। 55 वर्षीय प्रमोद में यह शंट लगाया गया है। इस शंट की खासियत है कि दिमाग पानी की मात्रा नियंत्रित करने के लिए दोबारा ओपेन सर्जरी नहीं करनी पड़ेगी । इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स के जरिए बाहर से पानी की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकेगा। शंट रोपित करने वाले न्यूरो सर्जन प्रो. वेद प्रकाश, प्रो. अरुण श्रीवास्तव एवं विभाग के प्रमुख प्रो. राजकुमार ने बताया कि संस्थान में इस तरह का शंट पहली बार रोपित किया गया। मरीज के हालत में काफी सुधार है। विशेषज्ञों ने बताया कि दिमाग में 24 घंटे में 600 मिलीलीटर पानी बनता है लेकिन दिमाग में केवल 120 से 125 मिलीलीटर ही रहता है बाकी पानी खून के जरिए निकल जाता है। कई बार पानी की अतिरिक्त मात्रा दिमाग से नहीं निकल पाता है जिसके कारण कई तरह की परेशानी होती है। इस परेशानी को दूर करने के लिए दिमाग में शंट लगाया जाता है तो अतिरिक्त पानी को पेट में निकाल देता है। सामान्य शंट( छाबड़ा शंट) जो अब तक लगते रहे है इसमें पानी की मात्रा अधिक या कम हो सकती है दिमाग में । इस परेशानी को दूर करने के लिए दोबारा सर्जरी की जरूरत पड़ती है । प्रोग्राम्ड शंट में पानी की मात्रा को प्रोग्राम डिवाइस के जरिए शंट के चेंबर को एडजस्ट किया जाता है जिससे पानी की मात्रा जरूरत के अनुसार दिमाग में रखा जाता है। यह मरीज पार्किंसंस की आशंका के साथ न्यूरोलॉजी में आए थे लेकिन बीमारी दूसरी निकली।

 

  

 

 क्या होता है शंट

 

शंट एक ट्यूब बहुत ही पतला ट्यूब होता है जिसे दिमाग के निलय से पेट में जोडा जाता है। इससे दिमाग का अतिरिक्त पानी( सीएसएफ) पेट में निकल जाता है।

 

 

 

क्या है हाइड्रोसेफलस

 

 हाइड्रोसेफलस में  दिमाग के  वेंट्रिकल्स (गुहाओं) में तरल पदार्थ के तय मात्रा से अधिक बनना होता है। अत्यधिक तरल पदार्थ गुहाओं के आकार को बढ़ाता है और मस्तिष्क पर अत्यधिक दबाव डालता है। सेरेब्रोस्पाइनल तरल पदार्थ के रूप में जाना जाने वाला द्रव रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में बहता है। अत्यधिक सेरेब्रोस्पाइनल तरल पदार्थ का दबाव मस्तिष्क के ऊतकों को नष्ट करता है और मस्तिष्क में गंभीर हानि का कारण बनता है।

 

 

 

नार्मल प्रेशर हाइड्रोसेफलस में यह होती है परेशानी

 

-   याददाश्त में कमी होती है जो बढ़ती जाती है

 

-   पेशाब और मल पर नियंत्रण खत्म का कम हो जाता है

 

-   चलने की गति कम हो जाती है, पैर में भारीपन आ जाता है

 

शनिवार, 16 जुलाई 2022

हिंदू मुस्लिम भाई भाई जीन में मिली समानता

 हिंदू मुस्लिम भाई -भाई 

प्रदेश के मुसलमानों की जीन हिंदुओं से नहीं है अलग

विश्व के तीन संस्थानों ने २४ सौ लोगों के जीन स्टडी के बाद किया खुलासा

प्रदेश के हिंदु और मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं। अमूमन सामाजिक सौहार्द के लिए लगाये जाने वाले नारे को विज्ञानियों ने  लखनऊ, बरेली , कानपुर , रामपुर के २४ सौ  मुसलामानों और हिंदुओं पर अनुवांशिकी शोध  के बाद सही साबित किया है। विज्ञानियों ने देखा है कि  प्रदेश के  शिया,  सुन्नी  मुसलमान और हिंदओं के जीन में  कोई अंतर नहीं है।  इतना ही नहीं विज्ञानियों ने  तुलनात्मक अध्ययन भारतीय हिंदुओं, अरब देशों, सेंट्रल एशिया, नार्थ ईस्ट अफ्रीकी देशों के मुसलमानों के जीन के बीच किया तो पाया कि भारतीय मुसलमानों के जीन भारतीय हिंदुओं से पूरी तरह मेल खाते हैं। इनके जीन विदेशी  मुसलमानों से मेल नहीं खाते हैं। कहने का मतलब है कि भारतीय खास तौर पर प्रदेश के मुसलमान की जड़े यहीं है न कि किसी दूसरे मुल्क से जुड़ी है। इनके जीन में काफी समानता हिंदुओं  से है न कि अरब या किसी दूसरे देश के लोगों से मिलती है। इस तथ्य का खुलासा डिर्पाटमेंट आफ बायोलाजिकल साइंस फ्लोरिडा इंटरनेशनल विवि के डा. एमसी टेरास, डेयान रोवाल्ड , रेने जे हेरेरा, डिपार्टमेंट आफ जेनटिक्स यूनिवर्सटी डि विगो स्पेन के डा. जेवियर आर ल्यूस एवं संजय गांधी पीजीआई के अनुवांशिकी रोग विभाग की प्रो.सुरक्षा अग्रवाल एवं डा. फैजल खान ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के जीन पर लंबे शोध के बाद किया है। इनके शोध को अमेरिकन जर्नल आफ फिजिकल एंथ्रोपालजी ने भी स्वीकार किया।

प्रो. सुरक्षा अग्रवाल के मुताबिक  मुसलमानों के साथ ब्राह्मण, कायस्थ, खत्री, वैश्य, चतुर्वेदी, भार्गव और अनसूचित जाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों के जीन का तुलनात्मक अध्ययन किया तो पाया इन सभी जातियों के जीन आपस में एक होने के साथ ही मुसलमान के जीन से भी मिलते हैं।  hamaresehatkhabar.blogspot.com

मंगलवार, 28 जून 2022

पीजीआई प्रदेश का पहला संस्थान मैट्रिक्स रिब तकनीक से दिया कान को सही आकार

 



पीजीआई प्रदेश का पहला संस्थान मैट्रिक्स रिब तकनीक से दिया कान को सही आकार


मैट्रिक्स रिब तकनीक से पसली से निकाला कार्टिलेज और पसली को भी किया रिपेयर 

अब सुकन्या का चेहरा भी सामान्य जम से ही आगे तरफ झुके थे कान

 


संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों ने उन्नाव की 12 वर्षीय सुकन्या के दोनों कान आगे की तरफ जन्मजात कारणों से झुके हुए थे जो सुकन्या के चेहरे की बनावट को खराब कर रहा था। इसकी वजह से आगे चल कर तमाम सामाजिक परेशानी की आशंका को कान को सही आकार ला कर इन परेशानियों को दूर कर दिया। प्रदेश में पहली बार इस परेशानी को दूर करने के लिए मैट्रिक्स रिब तकनीक का इस्तेमाल किया गया। विभाग के प्रमुख प्रो.राजीव अग्रवाल के मुताबिक कान कार्टिलेज से बना होता है। कान की किसी भी तरह को बनावट को ठीक करने के लिए कार्टिलेज की ही जरूरत होती है। शरीर में सबसे अधिक कार्टिलेज पसली की हड्डी में होता है।  प्रचुर मात्रा में कार्टिलेज लिया जा सकता है। हमने पसली के पास चीरा लगा कर पसली का हिस्सा लिया जिससे कान की विकृति को दूर किया। अभी तक पसली से निकले हिस्से को वैसे ही छोड़ दिया जाता रहा है। इससे सांस लेने में परेशानी के अलावा अन्य परेशानी की आशंका रहती है। पसली सांस लेने के साथ गतिमान रहती है। हमने  टाइटेनियम से बनी प्लेट से पसली के खाली हिस्से को भी भर दिया जिससे आगे चल कर किसी तरह की परेशानी सुकन्या को नहीं होगी। प्रो. अग्रवाल कहते  है कि यह एक जटिल सर्जरी है क्योंकि पसली चलती रहती है ऐसे में प्लेट लगाना जटिल होता है । इसके नीचे फेफड़ा होता है जिसे बचाना होता है। सर्जरी में एनेस्थीसिया विभाग के डॉ.  संजय कुमार एवं डा. दिव्या श्रीवास्तव और प्लास्टिक सर्जरी के रेजिडेंट डा. भूपेश गोगीया के सहयोग से यह सर्जरी करने में सफलता हासिल हुई।

 

 

 

क्या है मैट्रिक्स रिब रिबप्लास्टी

 

एक अथवा एक से अधिक पसलियों को निकालने के बादए  टाइटेनियम प्लेट से जोड़ा जाता है।  पसलियों  में  कहीं  भी  खाली  जगह  नही रह जाती  है।   पसली पूर्व कि तरह  मजबूत रहती है। एक से ज्यादा पसलियों के लिए भी किया जा सकता है। 

 

 

मैट्रिक्स रिब तकनीक अत्यन्त नाजुक एवं कठिन तकनीक

 पसलियों को निकालने एवं पुनः बनाने का कार्य अत्यंत संवेदनशील एवं जोखिम भरा हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में रोगी निश्चेतना कि अवस्था में होता है।    सांस लेते रहता है। सांस लेते वक्त रोगी कि पसलियां निरंतर गतिशील रहती हैं। हिलते हुए स्थान पर सर्जरी करना पड़ता है।  पावर ड्रील मशीन  से  सुराख  करने  पड़ते  है।   पसलियों  के  कुछ मिलीमीटर नीचे फेफड़ा होता है और जरा सी भूल फेफड़े को क्षतीग्रस्त कर सकती है।

गुरुवार, 23 जून 2022

युवा होने से पहले कम हो रहा है हड्डियों में दम

 

युवा होने से पहले कम हो रहा है हड्डियों में दम

 

55 फीसदी स्कूल जाने की उम्र के बच्चों में मिली विटामिन डी की कमी

लड़को से अधिक लड़कियों में अधिक मिली कमी

लड़कियों में धूप और कैल्शियम युक्त आहार की कमी बडा कारण कारण

कुमार संजय। लखनऊ

 

युवा होने से पहले स्कूल जाने वाली उम्र( 6 से 18)  में 55 फीसदी

 विटामिन डी के कमी के शिकार है।  दूध और धूप की कमी( सन

 एक्सपोजर) सबसे बड़ा कारण है। संजय गांधी स्नातकोत्तर

 आयुर्विज्ञान संस्थान के पीडियाट्रिक इंडोक्राइनोलॉजी में आने वाले

 स्कूल जाने की उम्र के बच्चों पर शोध के बाद यह तथ्य सामने

 आया है। इस उम्र के 135 बच्चों पर विटामिन डी की स्थिति

 जानने के लिए हाइड्रोक्सी विटामिन डी के स्तर का अध्ययन किया

 गया तो देखा गया कि इनमें 55 फीसदी में विटामिन डी का स्तर

 12 मोनोग्राम प्रति मिलीलीटर से कम मिला जबकि यह 30 नैनो

 ग्राम प्रति मिलीलीटर से अधिक होना चाहिए। देखा गया कि

 लड़कियों में हाइड्रोक्सी विटामिन डी का स्तर लड़को के मुकाबले

 कम मिला। लड़कियों में औसतन 12.3 और लड़कों में 15.8 नैनो

 ग्राम प्रति मिलीलीटर मिला। विटामिन डी की कमी पीछे कारण धूप

 और कैल्शियम युक्त आहार की कमी होता तो देखा गया कि

 लड़कियां कम धूप लेती है।  औसतन यह 38.9 मिनट धूप लेती है

 जबकि लड़के 63.0 मिनट धूप में एक्सपोज होते है। कैल्शियम

 युक्त आहार लड़कियां 517 मिली ग्राम लेती है जबकि लड़के

 623.3 मिलीग्राम कैल्शियम युक्त आहार लेते है जिसमें दूध और

 दूध से बने पदार्थ शामिल हैं। संस्थान के एंडोक्राइन विभाग से डॉ.

 कीर्ति जोशी, डा. इशिता जोशी, डॉ. निरुपमा सिंह और प्रो. विजय

 लक्ष्मी भाटिया के शोध को इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक

 विटामिन डी स्टेटस आफ स्कूल एज चिल्ड्रेन शीर्षक से शोध पत्र

 को स्वीकार किया है। शोध पत्र में विशेषज्ञों ने कहा है कि लड़कियों

 मे विटामिन डी के कमी अधिक आशंका है।

कैसे करें कमी पूरी

पोषण विशेषज्ञ डा. निरुपमा सिंह के मुताबिक  धूप और दूध से बने उत्पाद,चना

 अंडे का सफेद भाग  सेवन से कमी पूरी की जा सकती है । सुबह की धूप 45

 मिनट लेना चाहिए। धूप  सीधे स्किन पर धूप पड़े। चेहरा, गर्दन, कंधे,  पीठ खुली

 हो।  अधिक कमी होने पर  चिकित्सक की सलाह पर 60000 आईयू टैबलेट या

 पाउच  कॉलेकैल्सिफेरॉल लेना चाहिए। यह पहले 6 सप्ताह कर हर हफ्ते एक

 इसके बाद महीने में एक गोली लेने से कमी पूरा हो जाती है। यह विटामिन-डी

 का एक रूप है। कैल्शियम, फॉस्फेट और विटामिन ए के अवशोषण को बढ़ावा देता है।

 

   

 यह हो सकती है परेशानी

 

-    मोटापा

-शरीर में लगातार दर्द रहना

- ज्यादा थकान रहना और दिनभर सुस्ती रहना

- जोड़ों में दर्द

- डिप्रेशन

- कूल्हों, पीठ और घुटनों में दर्द

- बच्चों में रिकेट ( हड्डी के कमजोरी )

- ओस्टियोपेनिया (हड्डियों में प्रोटीन की कमी)

- पीरियड्स का अनियमित होना

- ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों का घनत्व  कम हो जाता है ।  आसानी से टूटने लगती हैं.

बुधवार, 22 जून 2022

गोरखपुर के मनोज दुनिया में नहीं लेकिन किडनी और लिवर हमेशा रहेगा जिंदा

 ब्रेन डेड के शिकार मनोज तीन को जिंदगी




अपोलो में ब्रेन डेड शिकार मनोज के परिजनों ने दो किडनी और लिवर कराया दान

  किडनी का पीजीआई, अपोलो और लिवर का मेडिकल विवि में हुआ प्रत्यारोपण


अपोलो मेडिक्स में ब्रेन डेड के शिकार 50 वर्षीय मनोज  तीन लोगों को जिंदगी दे गए। ब्रेन डेड के बाद इनके परिजनों ने अंगदान का फैसला लिया। एक किडनी पीजीआई में दी गयी। एक किडनी अपोलो में प्रत्यारोपित की गयी। लीवर किंग जार्ज मेडिकल विवि में प्रत्यारोपण के लिए दिया गया। संजय गांधी पीजीआई में प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल रहा। संस्थान के गुर्दा रोग विशेषज्ञ एवं नेफ्रोलॉजी विभाग प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद के मुताबिक सोमवार को देर रात अपोलो से एक किडनी मिलने की जानकारी मिली । हमने तुरंत डोनर के मैचिंग वाले मरीजों को बुलाया । क्रॉस मैचिंग परीक्षण के बाद 53 वर्षीय मुनेश्वर दयाल जिनमें 2018 से किडनी खराबी की परेशानी थी। इन्हे प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त पाया गया। यूरोलॉजिस्ट प्रो. यूपी सिंह और डा. संचित की टीम ने प्रत्यारोपण किया जो सफल रहा है। किंग जार्ज मेडिकल विवि में भी लिवर प्रत्यारोपण जारी है।

 

रोड एक्सीडेंट के कारण मनोज को हुआ ब्रेन डेड

गोरखपुर के रहने वाले मनोज कुमार सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए थे। गोरखपुर में ही इनका इलाज चला । सर्जरी भी हुई लेकिन राहत न मिलने पर 20 जून को परिवार के लोग इन्हे अपोलो मेडिक्स वे जाए जहां पर ब्रेन डेड हो गया। परिजनों को अंगदान के लिए अस्पताल के लोगों ने प्रेरित किया ।

 

मुनेश्वर के लिए संजीवनी साबित हुई किडनी

मुनेश्वर के किडनी की बीमारी ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज( एडीपीकेडी)   से ग्रस्त थे जिसके कारण किडनी काम नहीं कर रही थी। जिन जीन के कारण यह बीमारी होती है वह परिवार में होता है जिसके कारण परिवार के लोगों की किडनी इनमें नहीं लग सकती थी।डोनर न होने के कारण 2018 से डायलिसिस पर जीवन काट रहे थे।

 

आठ लोगों में एक की मैच की किडनी

प्रो. नारायण प्रसाद के मुताबिक पहले मैचिंग के लिए पांच लोगों को बुलाया । सोमवार की रात में एक बजे से मैचिंग जांच फ्लोसाइटोमेटरी से शुरू किया लेकिन इन सबसे मैचिंग नहीं पायी। इनके बाद तीन लोगों को और बुलाया सुबह सात बजे तक मैचिंग जांच किया । इनमें से मुनेश्वर की मैचिंग हो पायी।