गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

कोई बेटी बूढ़ी मां को तड़पता छोड़ गई, कोई पिता मासूम बेटा को ले जाने को नहीं

 कोई बेटी बूढ़ी मां को तड़पता छोड़ गई, कोई पिता मासूम बेटा को ले जाने को नहीं तैयार 


महाकुंभ में मिलन, विछोह और लाचारी की तीन कहानियां रसिक द्विवेदी जागरण महाकुंभ नगर अनगिनत भीड़। टोलियों में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलते लोग। कुछ समूह तो रस्सी के घेरे में अपनों को साथ लिए हुए। कोशिश इस बात की कि कोई बिछड़े न। लेकिन, भीड़ के महासमुद्र में हजारों ऐसे लोग भी हैं जो बिछड़े और मिले भी। ऐसे ही लोगों में कुछ की कहानियां आंखें भिगो देंगी। मां को छोड़ गई बेटीः बिहार के समस्तीपुर की 75 वर्षीय अहिल्या देवी को साथ लेकर आई बेटी छोड़ गई। उनके पास पर्ची में एक फोन नंबर था। उसे मिलाया गया तो किसी दुर्गा देवी ने बात की। असहाय छोड़ देने का कारण जाना गया तो उत्तर मिला कि उन्हें हम नहीं जानते हैं। जब कहा गया कि पुलिस आपके घर पहुंचेगी तो दुर्गा देवी ने बताया कि चंद्रभान अहिल्या देवी के दामाद हैं। फोन नंबर उन्हीं का है। पहले तो चंद्रभान ने पल्ला झाड़ने की कोशिश की। दबाव पड़ा तो बताया कि हमारे गांव का एक सिपाही कुंभनहाने गया है। उसको अहिल्या देवी के पास भेजते हैं। काफी इंतजार के बाद सुनीत नाम का व्यक्ति अहिल्या को लेने पहुंचा। पड़ताल में जुटे स्वप्निल द्विवेदी बताते हैं कि पहले तो साफ नकार दिया गया। जोर दबाव पड़ा तो उसे माता जी को ले जाना पड़ा। 


तमिलनाडु की भामा जी जब हुईं असहायः


 तमिलनाडु में चेन्नई निवासी भामाजी मेले में अपनों से बिछड़ गईं। मोबाइल फोन भी गुम हो गया। तमिल के अलावा और किसी भाषा की जानकारी नहीं थी। जैसे तैसे कैंप में पहुंची। उनकी बातों को वायस ट्रांसलेट करके सारा माजरा समझा गया। फिर चेन्नई में उनके अपनों से वार्ता हुई। उसके बाद उनके घर वाले आए और भामाजी को ले गए। 




 त सात साल के बच्चे को गंगा किनारे छोड़ गई मां


 बेबसी ने रुलाया होगा और हालात ने तड़पाया होगा। विकल्प ढूंढे नहीं मिला होगा तभी तो मां अपने सात वर्ष के सुंदर से बालक को गंगा किनारे छोड़ गई। तीन दिनों से बालक संगम किनारे खोया-पाया केंद्र में है। मुजफ्फरपुर जिले के भरवारी में उसका घर है। पापा वहां बस अड्डे के पास चाय की दुकान लगाते हैं। बेटे ने पिता का नाम राधारमन सिंह बताते हुए मोबाइल फोन नंबर भी दिया। बात भी हुई। राधारमन ने साफ कहा कि बेटे को वह लेने नहीं आएंगे क्योंकि, इसकी मां तीन-चार विवाह कर चुकी है। वह बेगूसराय की रहने वाली है। हमसे छह माह का नन्हा बेटा है, उसे मेरे पास ही छोड़ गई है। मासूम पिता-माता के बीच क्या है, क्या नहीं? इन सबसे दूर बस एक ही सवाल करता है कि... का हमका हमरी मम्मी से मिलवावै आए हौ? 79 वर्ष पहले रखी गई थी खोया-पाया कैंप की नींव पूर्व सांसद रीता बहुगुणा जोशी बताती हैं कि 79 वर्ष पूर्व खोया-पाया कैंप की कल्पना को अमलीजामा पहनाया गया था। मृदुलासाराभाई, कमला बहुगुणा और इंदिरा गांधी के सतत प्रयास को पंडित रणजीत शिक्षा समिति द्वारा जारी रखा गया। 24 वर्ष पूर्व समिति में हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम भी जोड़ दिया गया। इसका संचालन खुद देख रही हूं। उनके कैंप में ही 5300 लोगों को मिलाया जा चुका है। 2019 में 37 हजार लोगों को मिलवाया था। बिछड़े लोगों को मिलाने की शुरुआत 1954 में कुंभ में भगदड़ के बाद हुई थी। अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों को अपनों से मिलवाया जा चुका है।


बुधवार, 12 फ़रवरी 2025

गमछे में गंगा, पूरा गांव चंगा भला गमछे में भी गंगा

 

गमछे में गंगा, पूरा गांव चंगा भला गमछे में भी गंगा

गमछे में गंगा, पूरा गांव चंगा भला गमछे में भी गंगा को बांधा जा सकता है? कोई कुछ भी कहे, मगर आस्था और विश्वास का जवाब है हां। जब भगवान प्रेम की डोर से बंधे हैं तो मां गंगा क्यों नहीं। यह कहता है मऊ निवासी सालिगराम का। संगम तट पर भ्रमण के दौरान इन्हीं बुजुर्ग सालिगराम ने अचानक मेरा ध्यान खींचा। दृश्य ही कुछ ऐसा था, सालिगराम पतित पावनी के अविरल प्रवाह से अंजुरी में जल भरकर लाते और मंत्र पढ़कर किनारे बिछे सफेद गमछे पर डालते जाते। त्रिवेणी का जल गमछे के नीचे बिछे पुआल से रिसकर त्रिवेणी की ही रेती में समाता जा रहा था। लेकिन धारा और गमछे के बीच सालिगराम की दौड़ जारी थी। मैंने उनके पास जाकर जैसे ही कुछ कहना चाहा तो मंत्र बुदबुदाते होठों पर अंगुली रखकर शांत रहने का इशारा किया। जिज्ञासावश मैं वहीं बैठकर उनकी यह साधना संपन्न होने का इंतजार करता रहा। खैर मेरी कौतूहल भरी प्रतीक्षा उनकी साधना के साथ समाप्त हुई और गमछा श्रद्धापूर्वक समेटकर रखा गया। मैंने छूटते ही पूछा, दादा ये क्या था ? किसी साधना को पूरी करने के आत्मविश्वास की चमक सालिगराम के चेहरे की झुर्रियों पर भारी पड़ रही थीं। हंसते हुए, जवाब मिला वे बंधना है बच्चा! बंधना काहे का? अरे ये बंधना बच्चों को नजर और टोने-टोटके से बचाता है, गर्भवती महिलाओं को पीड़ा से बचाता है। जब गांव में किसी को तकलीफ होती है तो इसी गमछे की चिट फाड़कर देता हूं, बांधने से ही तकलीफ दूर हो जाती है। अब यह गमछा नहीं, गंगा मैया हैं। इसकी रोज पूजा करता हूं। मंत्र पढ़कर 101 अंजुरी जल चढ़ाता हूं। सालभर यह गमछा लोगों के काम आता है और अगले कल्पवास में फिर आऊंगा।  हर साल कल्पवास में आता हूं और गंगा मैया को ऐसे ही लेकर जाता हूं। थोड़ा व्यंग्यात्मक होते हुए मैंने पूछा, किसी को फायदा होता भी है ? एक पल को उनकी नजरों में मेरे लिए उपहास और उपेक्षा का भाव नजर आया और चलते-चलते बोले, चला हो हमरे साथ तब्बै पता चली। कान में उनका आत्मविश्वास भरा दावा गूंज रहा था और मन मंथन में था कि क्या यह संभव है? आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समय में यह बातें कितना मायने रखती हैं। इसके बावजूद टिटनेस, बौसीजी और तमाम टीकों के बीच सालिगराम का गमछा मुस्करा रहा था। खैर आस्था तो आस्था होती है, उसमें तर्क की जगह नहीं होती। जब बढ़ते प्रदूषण के बावजूद गंगा एक डुबकी से हमारे पाप चो देती है तो चिट भी दर्द हरती ही होगी। त्रिवेणी पर करोड़ों लोगों का आगमन सिर्फ एक डुबकी के लिए ही तो होता है। सामने हर-हर महादेव और जय गंगा मैया के जयकारों के साथ लोग लहरों का पुण्य लूट रहे थे और सालिगराम अपने शिविर को प्रस्थान कर चुके थे। मैं संगम तट पर पर खड़ा अपने सवालों की क्षुधापूर्ति आस्था के जवाबों से कर रहा था। इसके बावजूद सच यही है कि गंगा गमछे में जाकर पूरे गांव को चंगा कर रही हैं।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

पूर्णिमा के पर्व पर श्रद्धालु बोले प्रयागराज का पूरा क्षेत्र संगम है

  




वसंत के बाद अपेक्षाकृत कठुआते पूस की पूर्णिमा से माघ मास के स्नान-दान, नियम-संयम के विधान पूर्णता को और हैं। कण-कण आहादित, हर मन श्रद्धा की डोर से बंधा और तन त्रिवेणी संगम की ओर है। संगम के तीरे माघ में ही फाल्गुन की ऊष्मा स्फुटित हो रही है। शीतल जल से बाहर निकलते ही हवा जैसे ही तन का स्पर्श करती हैं, रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठता है। सनातन धर्म को समाहित किए एकादश मास कुछ ही घंटों में पूर्ण होगा। अध्यात्म दर्शन को ऊर्जान्वित करेगा। समुद्र मंथन प्रसंग से छलके बूंद-बूंद अमृत से आत्म तत्व को सराबोर कर जाएगा। वैदिक कालीन महाअनुष्ठान और विदा की बेला में गंग-जमुन की अंगनाई चहक उठी है। पुण्य के लिए तेजी से करोड़ों श्रद्धालुओं के कदम संगम की और अनवरत बढ़‌ते जा रहे हैं। बिहार के भागलपुर से अजय सिंह संगम में स्नान करने के लिए उत्साहित है। शास्त्र के ज्ञान के साथ ही छात्रों

को साहित्य के दर्शन ज्ञान का वह बोध कराते हैं। बोले- यह संगम में स्नान से ज्यादा क्षेत्र के दर्शन का महत्व है। एक ही स्थान पर देश और दुनिया के कितनी सभ्यताओं का मिलन हो रहा है, यही तो महाकुंभ हैं। मनीषियों ने माघ मास को विशेष पुण्यप्रद माना है। निर्णय सिंधु के अनुसार यह मास भगवान विष्णु को अति प्रिय है। इस मास में अंतिम दिन यानी माधी पूर्णिमा को किए गए स्नान-दान को अनंत फल देने वाला बताया गया है। इसी अभिलाषा के साथ ही हैदराबाद से इस स्वामी पूरे परिवार के साथ संगम में डुबकी लगाने पहुंचे थे। हालांकि भीड़ अत्यधिक होने के कारण वह संगम नोज तक नहीं पहुंच पाए, जिसके बाद उन्होंने वीआइपी घाट के बाद से स्नान करने का निर्णय लिया.. बोले प्रयागराज का पूरा क्षेत्र संगम है। यहां पर किसी भी घाट में स्नान करना त्रिवेणी के स्नान करना है। संतकबीर नगर से सरस्वती देवी टोली के साथ कहती है  कि आने में बहुत परेशानी हुई, लेकिन एक डुबकी लगाते ही अनंत सुख की अनुभूति हुई। यही त्रिवेणी के अमृत स्नान का चमत्कार है। घाट पर मौजूद संजय मिश्रा  बोले-धर्म, ज्ञान और संस्कृति दर्शन संगम मे देखने को मिल रहा है। भेद, भाव और विवाद को भूलकर लोग एक् साथ संगम में डुबकी लगा रहे हैं। समरसता का इससे बड़ा दर्शन की और नहीं हो सकता है। त्रिवेणी की महिमा को लेकर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में 'माघ मकरगत रबि जब होई। तीरभपतिर्हि आव सब कोई॥ देख दनुज किंगर नर श्रेगी। सादर मज्जहिं सकल त्रिब्रेनों,' पंक्तियों से संपूर्ण प्रयागराज मे माघ मास पर्यंत स्नान की महत्ता का बखान किया है। महाकुंभ मे पुष्यामृत वर्षा का संतों-ऋषियो ने शास्त्रों में गान किया है। इसमे माघ की पूर्णिमा को सर्वोपरि स्थान दिया है। कहा है कि त्रिस्नावी अर्थात अंतिम तीन दिन और वह भी न कर पाएं तो माघ पूर्णिमा पर डुबकी संपूर्ण पुण्य फल प्रदान कर देती है।

आज १२ फरवरी पीजीआई में नहीं देखे जाएंगे नए मरीज

 



आज पीजीआई में नहीं देखे जाएंगे नए मरीज


बुधवार १२ फरवरी को संजय गांधी पीजीआई में सार्वजनिक अवकाश रहेगा संस्थान प्रशासन के मुताबिक नए मरीजों का पंजीकरण नहीं होगा। पुराने मैरिज जिनका कल दिखाने की डेट मिला है उनको देखा जाएगा जिन मरीजों को जांच जांच और सर्जरी की डेट दी गई है वह सभी प्रक्रिया होगी 24  घंटे लैब  चलेगा ओपीडी कलेक्शन का बंद रहेगा

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

पीजीआई प्रोफेसर महेंद्र भंडारी और प्रोफेसर एसएस अग्रवाल को दो बार मिला में नियुक्ति

 

पीजीआई के निदेशक का कार्यकाल आज होगा खत्म, मिल सकता है सेवा विस्तार

 संस्थान के 10 डॉक्टर भी निदेशक बनने की होड़ मे



पीजीआई के निदेशक डॉ. आरके धीमन का पांच साल का कार्यकाल सात फरवरी 2025 को पूरा हो जाएगा। पीजीआई को जनवरी में नैक ए प्लस प्लस मिलने के बाद से ही यह कयास लगाई जा रही थी कि निदेशक को सेवा विस्तार मिल सकता है।  पहली बार जब शासन स्तर से पीजीआई के 1983 एक्ट में संशोधन करते हुए निदेशक पद के लिए तीन साल तक कार्यकाल बढ़ाने का शासनादेश जारी हो गया तो अब यह पक्का माना जा रहा है कि कोई दूसरा निदेशक नहीं बन सकेगा। 

पीजीआई डॉक्टरों ने कर रखा आवेदन 

पीजीआई के निदेशक पद के लिए खुद संस्थान के ही 10 डॉक्टरों ने दावेदारी ठोकते हुए आवेदन कर रखे हैं। उसके अलावा देश भर से 42 डॉक्टरों ने निदेशक पद के लिए आवेदन किए हुए हैं। पीजीआई के इमरजेंसी मेडिसिन के प्रमुख डॉ. आरके सिंह, रेडियोथेरेपी के प्रमुख डॉ. शालीन कुमार, कॉर्डियोलॉजी के प्रमुख डॉ. आदित्य कपूर, नेफ्रोलॉजी के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद, एंडोक्राइन सर्जरी के डॉ. गौरव अग्रवाल व अंजलि मिश्रा, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के डॉ. अमिताभ आर्या, पैथालॉजी के डॉ. रामनवल राव, एनेस्थीसिया विभाग व वर्तमान में सीएमएस डॉ. संजय धीराज, सीसीएम की प्रमुख डॉ. बी. पोद्दार शामिल हैं। 

डॉ. राकेश कपूर को मिला था सेवा विस्तार 

पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमन का कार्यकाल का सात फरवरी को अंतिम दिन है। पीजीआई निदेशक पर इससे पहले भी डॉ. राकेश कपूर को तीन माह का सेवा विस्तार मिला था। उनका कार्यकाल नवंबर 2014 से नवंबर 2019 तक था। उसके बाद वह फरवरी 2020 तक सेवा विस्तार पर रहे। वहीं, इससे पहले पीजीआई के निदेशक पद पर डॉ. एसएस अग्रवाल और डॉ. एम. भंडारी ही दो बार तैनाती दी गई। इन दोनों का कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया था, बल्कि निदेशक पद पर तैनाती दी गई थी। 

पीजीआई में अब तक निदेशकों का कार्यकाल 

पीजीआई के पहले निदेशक डॉ. बीसी जोशी दिसंबर 1982 से मई 1986 तक रहे।

 उसके बाद डॉ. बीबी सेठी अगस्त 1986 से अप्रैल 1990 तक,

 डॉ. केएन अग्रवाल, सितंबर 1990 से जुलाई 1993, डॉ. एसएस अग्रवाल अक्तूबर 1993 से मार्च 1997, डॉ. एम. भंडारी मार्च 1997 से मार्च 2000,

 डॉ. एसएस अग्रवाल मार्च 2000 से मार्च 2001, डॉ. एम. भंडारी मार्च 2001 से अगस्त 2003,

 डॉ. करतार सिंह अगस्त 2003 से अगस्त 2006, डॉ. एके महापात्रा सितंबर 2006 से सितंबर 2009, डॉ. आरके शर्मा सितंबर 2009 से सितंबर 2014, डॉ. राकेश कपूर नवंबर 2014 से नवंबर 2019 तक रहे। डॉ. आरके धीमन फरवरी 2020 से अब तक हैं।








सही समय पर न सोना और न उठाना बन रहा है तनाव का कारण

 

अधूरी नींद से बढ़ रहा विद्यार्थियों में तनाव


लखनऊ: देर रात तक पढ़ाई करना,

सुबह देर से उठना। नींद पूरी न होने से दिन भर सिर में भारीपन रहना। यह लक्षण छात्र-छात्राओं में तनाव बढ़ा रहे हैं। लवि के जंतु विज्ञान विभाग की ओर से राजधानी के विभिन्न स्कूलों में कक्षा नौ से 12वीं तक के 884 छात्र-छात्राओं पर शोध में यह तथ्य सामने आए हैं। शोध में छात्र छात्राओं में क्रोनोटाइप (किसी व्यक्ति की आंतरिक जैविक घड़ी के आधार पर सोने व जागने के लिए उसके पसंदीदा समय का विवरण) के साथ साथ उनकी लार लेकर नींद व तनाव के लिए मेलाटोनिन और कोर्टिसोल हामौस की जांच की गई थी। शोध रिपोर्ट को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद भेजी जाएगी।


विभाग की प्रो. शैली मलिक को वर्ष 2021 में सीएसटी से 'डेली पैटन्सं आफ क्लाक रिलेटेड फिजियोलाजी एंड विर्हवियर इन यंग स्टूडेंट्स' शोध प्रोजेक्ट मिला था। बताया कि लखनऊ के कई स्कूलों के कक्षा नौ से 12वीं तक के 13 से 19 वर्ष की आयु वाले छात्र-छात्राओं पर यह शोध पूरा हुआ है। इसमें तीन प्रकार की प्रश्नावली का प्रयोग किया गया। क्रोनोटाइप सर्वेक्षण


में एमईक्यू (प्रातःकालीन, सायंकालीन प्रश्नावली), नींद की गुणवत्ता के लिए पिट्सबर्ग स्लीप क्वालिटी स्केल (पीएसक्यूआई), दिन में नींद आने के लिए ईएसएस (एप्वोर्थ नींद संबंधित प्रश्न पत्रिका) और थकान के स्तर के लिए एफएसएस (थकान संबंधित प्रश्नपत्रिका) पर प्रश्न पूछे गए। क्रोनोटाइप में विद्यार्थियों की पूरे दिन की गतिविधियां देखी गईं। 40 प्रतिशत (354) छात्र-छात्राएं सुबह से ही अपने कार्यों को लेकर सक्रिय मिले। 50 प्रतिशत (442) छात्र-छात्राओं का कोई निश्चित समय नहीं निर्धारित था। उन्हें नीदर टाइम की श्रेणी में रखा गया। सायंकालीन प्रकार वालों में 10 प्रतिशत विद्यार्थी देर रात तक जागने और सुबह देर से दिन की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं। इनको पर्याप्त नींद न मिलने की वजह से उनमें तनाव का स्तर बढ़ा मिला। उसकी


दिए गए सुझाव


• विद्यार्थियों के पढ़ने और सोने का समय निर्धारित होना जरूरी


• विद्यार्थियों के लिए फ्री आवर हो, जिसमें एक्टिविटी कराई जाएं


• अभिभावक बच्चों को तनाव से दूर रखने का प्रयास करें।


गुणवत्ता खराब थी। 30 प्रतिशत आबादी थकान से पीड़ित थी।

लार से हुई हार्मोंस की जांच परीक्षा और विना परीक्षा के दिनों में सभी छात्र-छात्राओं के दो हार्मोस मेलाटोनिन और मेलाटोनिन की जांच उनकी लार से की गई। मेलाटोनिन हामौस नींद से संबंधित है। शोध के अनुसार सुबह के समय और नीदर टाइम वाले 50 प्रतिशत विद्यार्थियों में हामाँस का स्तर यह सही था। 10 प्रतिशत वालों में रात के समय हार्मोस का स्तर उच्च नहीं था। लेकिन दोपहर के समय देखने पर स्तर उच्च पाया गया। परीक्षा के दौरान सभी छात्र-छात्राओं में मेलाटोनिन का स्तर कम पाया गया। मतलब उनकी नींद पूरी नहीं हो पा रही। कोर्टिसोल हामौस से विद्यार्थियों में सुबह और रात में जांच में तनाव देखा तो सुबह इसका स्तर बढ़ा पाया गया।

नेहरू ,अटल जी सोनिया गांधी ने भी कुंभ में किया था स्नान

 

संगम में डूबे मोदी-योगी के धार्मिक ध्रुवीकरण के नारे

महात्मा गांधी और कुंभ मेला

महात्मा गांधी का कुंभ मेले से जुड़ाव ऐतिहासिक रहा है। 1915 के हरिद्वार कुंभ के दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से मुलाकात की थी। यह भेंट ऐतिहासिक थी, क्योंकि इसी दौरान गोखले ने गांधीजी को भारतीय समाज और राजनीति को नजदीक से समझने की सलाह दी थी। गोखले ने गांधीजी को कुंभ मेले की आध्यात्मिक और सामाजिक महत्ता बताते हुए उनसे इसमें स्नान करने का आग्रह किया। 1918 में जब प्रयागराज में कुंभ मेला आयोजित हुआ, तब देश में अंग्रेजों का शासन था और स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। ब्रिटिश सरकार ने इस आयोजन पर कड़ी नजर रखी थी और कई नेताओं की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रखा था। इसके बावजूद, महात्मा गांधी ने गुप्त रूप से प्रयागराज पहुंचकर संगम में स्नान किया। वे यहां एक साधु के आश्रम में ठहरे और बिना किसी प्रचार के कुंभ स्नान किया।

इस ऐतिहासिक स्नान का जिक्र गांधीजी ने बाद में 10 फरवरी 1918 को फैजाबाद में हुए कांग्रेस अधिवेशन में किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सख्ती के बावजूद कुंभ मेले में भाग लिया। इस घटना का उल्लेख राजकीय अभिलेखागार में मौजूद ब्रिटिश अफसरों की खुफिया रिपोर्ट में भी दर्ज है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद: राष्ट्रपति के रूप में कुंभ में कल्पवासः 1954 के प्रयागराज कुंभ में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कुंभ मेले में कल्पवास किया। यह पहली बार था जब किसी राष्ट्राध्यक्ष ने आधिकारिक रूप से इस धार्मिक आयोजन में भाग लिया। संगम तट पर स्थित अकबर किले में उनके रहने की विशेष व्यवस्था की गई थी। राष्ट्रपति होने के बावजूद उन्होंने सादगी और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन किया। उनकी उपस्थिति ने कुंभ मेले की धार्मिक और राष्ट्रीय महत्ता को और बढ़ाया। अब वह स्थान जहाँ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कल्पवास किया था, "प्रेसिडेंट व्यू" के नाम से प्रसिद्ध है और कुंभ मेले में विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया है।

पंडित नेहरू भी गये थे कुंभ

पंडित जवाहरलाल नेहरू का तो जन्म ही 14 नवंबर 1889 को गंगा किनारे बसे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। नेहरू ने अपनी आत्मकथा "टुवर्ड फ्रीडम" में गंगा के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा है: "गंगा, विशेष रूप से, भारत की नदी है, जिसके साथ हमारी सभ्यता के पूरे इतिहास में गहरा संबंध रहा है।" लेकिन वे आज के नेताओं की तरह ढकोसले बाज नहीं थे। जब 10 जनवरी 1938 को नेहरू की मां, स्वरूप रानी नेहरू, का निधन हुआ, तो नेहरू ने इलाहाबाद में संगम तट पर उनकी अस्थियों का विसर्जन किया था। इस अवसर पर ली गई एक तस्वीर में नेहरू जी गंगा में स्नान करते हुए दिखाई देते हैं। इस तस्वीर को कभी-कभी उनके कुंभ मेले में स्नान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो सही नहीं है। 1954 के प्रयागराज कुंभ मेले में पंडित जवाहरलाल नेहरू गये जरूर थे, पर वे व्यवस्थाओं की समीक्षा करने के लिए पहुंचे थे। और राज्यसभा में दिए अपने बयान में उन्होंने साफ कहा था कि वे संगम में स्नान करने नहीं गए।

कामा मैकलीन की पुस्तक “Pilgrimage and Power: The Kumbh Mela in Allahabad from 1776-1954” में नेहरू की 1954 के कुंभ मेले की तस्वीर छपी है, जिसमें वह भीड़ के बीच नजर आ रहे हैं। मैकलीन लिखती हैं कि जब नेहरू से संगम में स्नान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया—"मैंने शारीरिक रूप से नहीं, लेकिन अन्य रूप में स्नान किया।"

 - Satya Hindi

लाल बहादुर शास्त्री के सचिव सी.पी. श्रीवास्तव ने अपनी जीवनी में लिखा है कि नेहरू ने शास्त्रीजी के कुंभ स्नान के अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि "मुझे गंगा नदी से प्रेम है, लेकिन कुंभ में स्नान नहीं करूंगा।"

अन्य प्रधानमंत्रियों और राजनेताओं का कुंभ से संबंध

इंदिरा गांधी: इंदिरा गांधी का इलाहाबाद, गंगा नदी और कुंभ मेले से गहरा संबंध था। वह इलाहाबाद में पली-बढ़ीं, जहां उनके परिवार का निवास आनंद भवन स्थित है। गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर में उनका बचपन बीता, जिससे गंगा के प्रति उनका विशेष लगाव विकसित हुआ। 1966 में, जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हुआ, तो इंदिरा गांधी उनकी अस्थियां लेकर इलाहाबाद पहुंचीं और उन्हें गंगा नदी में विसर्जित किया, जो उनकी गंगा के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। लेकिन उनके संगम में स्नान का कोई प्रमाण नहीं है।

भारतीय राजनीति के प्रखर समाजवादी नेता, अपनी स्पष्टवादिता और सिद्धांतों के प्रति अडिग पहचान वाले प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जन्म भी गंगा नदी के समीप उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 को हुआ था। "बागी बलिया" के नाम से मशहूर बलिया की सबसे बड़ी झील सुरहाताल, कटहल नाले के माध्यम से गंगा से जुड़ी हुई है, और जिसने बलिया को एक समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान दी है। चंद्रशेखर गंगा को भारतीय संस्कृति की आत्मा और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चेतना की वाहक मानते थे।  1989 के कुंभ मेले में संतों-महंतों से संवाद के दौरान उन्होंने कहा था कि गंगा हमारी सभ्यता की पहचान है और इसकी पवित्रता को बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।  10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के नौवें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर ने अपने छोटे लेकिन प्रभावशाली कार्यकाल में भी राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत के महत्व पर बल दिया। लेकिन धर्म के नाम पर आडंबर और धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं किया।  

नेहरू और चंद्रशेखर की तरह अटल बिहारी वाजपेयी का भी कुंभ मेले के प्रति विशेष सम्मान था। उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को सदैव महत्व दिया। पर वे अंधविश्वासी नहीं, दार्शनिक थे। 2001 के प्रयागराज में आयोजित कुंभ महापर्व में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भाग लिया था। अटल जी भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान रखते थे, और कुंभ मेले जैसे आयोजनों के महत्व को भली-भांति समझते थे। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने कुंभ मेले की व्यवस्थाओं की समीक्षा की और संतों-महंतों से मुलाकात की। लेकिन उनके संगम में स्नान करने का कोई प्रमाण नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियों का संगम में विसर्जन जरूर किया गया था।

•      2001 में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने भी कुंभ मेले में भाग लिया और गंगा में डुबकी लगाई थी।•      2019 के अर्धकुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा में डुबकी लगाई थी। 

मुगल सम्राट और कुंभ मेला

मुगल सम्राट अकबर ने 1583 के प्रयागराज कुंभ में भाग लिया था और इसी कुंभ के दौरान उन्होंने प्रयागराज में एक विशाल किला बनवाया था, जिसे आज भी "अकबर किला" कहा जाता है।जहांगीर ने अपने संस्मरण "तुजुक-ए-जहांगीरी" में 1612 के कुंभ मेले का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा कि किस प्रकार इस आयोजन में लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते थे।1665 के कुंभ में औरंगजेब ने हिंदू संतों की बढ़ती शक्ति को देखकर इस मेले पर विशेष निगरानी रखने का आदेश दिया था।

ब्रिटिश गवर्नर जनरल और कुंभ

  • 1838 के कुंभ मेले के दौरान लॉर्ड विलियम बेंटिक ने भीड़ और अव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक हस्तक्षेप किया था। यह पहला अवसर था जब अंग्रेजों ने मेले के संचालन में हस्तक्षेप किया।
  • 1858 के कुंभ मेले के दौरान लॉर्ड डलहौजी ने पहली बार मेले की जनगणना करवाई और इसे "दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला" बताया।
  • 1820 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने कुंभ मेले पर व्यापक अध्ययन किया और इसे पश्चिमी जगत में लोकप्रिय बनाया।

रोचक प्रसंग और किस्से

•      1867 कुंभ में साधु-संतों और अंग्रेजों की झड़प: प्रयागराज कुंभ में नागा साधुओं और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच विवाद हुआ था, जिसमें कई साधु घायल हुए।•      1954 कुंभ त्रासदी: कुंभ मेले में भगदड़ मचने से 800 से अधिक लोग मारे गए थे।•      2025 महाकुंभ त्रासदी: इस साल महाकुंभ में भगदड़ मचने की छह घटनाओं का चर्चा हो रही है। दो बार आगजनी की घटनाएं भी हो चुकी हैं। सरकारी आंकड़ों में महज 30 लोगों के मरने की बातें कही गयी हैं। लेकिन सोशल मीडिया में सैकड़ों लोगों के मारे जाने और करीब 1500 लोगों के लापता होने की पुष्ट अपुष्ट खबरें चल रही हैं।

संसद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने हजारों मृतक श्रद्धालुओं को श्रद्धांजलि देने की बात कही तो बवाल मच गया। दोनों नेताओं ने हादसे की जांच के लिए जेपीसी गठित करने और सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी मांग की। पर सरकार खामोश है।

अनेक साधु संतों और शंकराचार्यों ने कुंभ को धार्मिक-राजनीतिक पर्यटन से जोड़ने और एक तथाकथित सनातनी भावनाओं को उभारने वाले इवेंट की तरह इस्तेमाल करने पर कड़ी आपत्ति जतायी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपनी मनमर्जी से अर्ध कुंभ को कुंभ और पूर्ण कुंभ को महा कुम्भ बनाने पर भी विरोध जताया गया है। भगदड़ में हुई मौतों का आंकड़ा न देने पर सवाल उठाते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग की और कहा कि इस सरकार ने तो मृतकों का श्राद्ध या उनकी आत्मा की शांति के लिए मौन तक रखने का मौका नहीं दिया। उन्होंने कहा कि जो सरकार 2700 अत्याधुनिक कैमरों से मेले में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के आंकड़े जारी कर रही थी, वह मौतों और लापता लोगों की सूची नहीं दे पा रही। जिन हेलीकॉप्टरों को घायलों के अस्पताल ले जाने के लिए लगाना चाहिए था, उनसे हादसे के बावजूद फूल बरसाकर घाव पर नमक छिड़का जाता रहा।

सबसे दुखद तो यह था कि जहां योगी सरकार लाखों श्रद्धालुओं को राहत की मूलभूत सुविधाएं देने की बजाय डंडों से भगाती रही, मुसलमानों के मेला क्षेत्र में प्रवेश पर रोक लगाती रही, वहीं उनके कटोगे तो बंटोगे के नारे के बावजूद इलाहाबाद की मुस्लिम बस्तियों के हजारों लोगों ने लाखों श्रद्धालुओं को रहने खाने, दिनचर्या और राहत की सुविधाएं देकर गंगा-जमुनी एकता की मिसाल कायम की। प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या (29 जनवरी 2025) के दौरान हुई भगदड़ के बाद, प्रयागराज की गंगा-जमुनी तहजीब ने एक बार फिर मानवता और भाईचारे की मिसाल पेश की। स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने श्रद्धालुओं की मदद के लिए अपने घरों, स्कूलों और संस्थानों के दरवाजे खोल दिए, जिससे कई लोगों की जान बचाई जा सकी।

चाहे नखास कोहना, चौक, रौशनबाग, सेवई मंडी का इलाका हो या रानीमंडी से लेकर हिम्मतगंज का इलाका, इस सारे इलाके के मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने घरों के दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए। उन्होंने आराम के लिए दरी, चादर, प्लास्टिक बिछाई और चाय, बिस्किट, पूड़ी, सब्जी आदि का प्रबंध किया। दो दिनों तक हजारों श्रद्धालु यहां ठहरे रहे।

28 जनवरी की रात को, जिस दिन भगदड़ हुई, तो कोतवाली क्षेत्र में यादगार हुसैनी इंटर कॉलेज के प्रबंधक गौहर काज़मी ने कॉलेज खोलने का आदेश दिया। क्षेत्रवासियों के सहयोग से श्रद्धालुओं के ठहरने, खाने-पीने की सभी सुविधाएं प्रदान की गईं। कॉलेज परिसर का मैदान और कक्षाएं श्रद्धालुओं से भर गईं, जहां उनके आराम के लिए दरी, चादर, प्लास्टिक बिछाई गई थी और चाय, बिस्किट, पूड़ी, सब्जी का बंदोबस्त किया गया था।

इसी तरह चौक क्षेत्र के निवासियों ने मिलकर थके हुए श्रद्धालुओं को भोजन कराया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों, जैसे शताब्दी छात्रावास, केपीयूसी, पीसी बनर्जी, सर सुंदरलाल छात्रावास, महादेवी वर्मा छात्रावास और कल्पना चावला छात्रावास की छात्राओं ने भी श्रद्धालुओं की सहायता में योगदान दिया।

इन प्रयासों ने प्रयागराज की गंगा-जमुनी संस्कृति और मानवता की गहरी जड़ों को उजागर किया, जहां सभी समुदायों ने मिलकर संकट के समय में एक-दूसरे की मदद की। और इसके साथ ही मोदी-योगी और भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण के नारे संगम में डूब गये।