गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

दवा और इंटरवेशन से कम हो सकती है ब्रेन स्ट्रोक के कारण होने वाली परेशानी


 विश्व ब्रेन स्ट्रोक जागरूकता दिवस आज

दवा और इंटरवेशन से कम हो सकती है ब्रेन स्ट्रोक के कारण होने वाली परेशानी

 

दो फीसदी से कम लोग ही गोल्डन आवर में पहंचते है विशेषज्ञ के पास


कुमार संजय। लखनऊ

ब्रेन स्ट्रोक पड़ने में दो से तीन घंटे के अंदर सही इलाज मिल जाए तो मरीजों को ब्रेन स्ट्रोक के कारण होने वाली परेशानी से बचाया जा सकता है। इसके लिए इलाज की दो तकनीक है। ब्रेन स्ट्रोक के बाद तुरंत सीटी स्कैन कर इलाज की दिशा तय की जाती है। ब्रेन इंटरवेंशन रेडियोलाजिस्ट प्रो.विवेक सिंह कहते है कि दो तरह के स्ट्रोक होने है जिसे हिमैरजिक और इस्केमिक के नाम से जाना जाता है दो ब्रेन स्ट्रोक में इंटरवेंशन की अहम भूमिका है। 30 से 40 फीसदी में इंटरवेंशन के जरिए परेशानी को कम किया जा सकता है। इस्केमिक स्ट्रोक जिसमें रक्त वाहिका में थक्का बन जाता है जिसके कारण नस फट जाती है इसमें स्ट्रोक पड़ने के दो से तीन घंटे के अंदर थक्के के निकाल देते है। इसके लिए जरूरी है कि मरीज दो घंटे अंदर पहुंच जाए। हिमैरजिक स्ट्रोक में इसमें नस में एन्यूरिज्म ( गुब्बारा) बन जाता है जिसमें हम लोग क्वायल( छल्ला) डाल कर रक्त स्राव को रोकते है। देखा गया है कि ब्रेन स्ट्रोक पड़ने के एक से दो फीसदी लोग ही गोल्डन आवर में विशेषज्ञ के पास पहुंच पाते है।

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चार घंटे के अंदर टीपीए देने  से कम होता ब्रेन को नुकसान

संस्थान के न्यूरोलाजी विभाग की प्रो, रूचिका टंडन कहती है कि स्ट्रोक पड़ने के पहले चार घंटे काफी अहम है। चार से 4.5 घंटे के अंदर मरीज को यदि आरटीपीए( टिशू प्लाजमीनजेन एक्टीवेटर) रसायन दी जाए तो उसे ब्रेन स्ट्रोक के कारण होने वाली तमाम परेशानी से बचाया जा सकता है। इमरजेंसी में यदि मरीज को तीन से 3.5 घंटे के अंदर लाया जाता है तो इमरजेंसी में तैनात डाक्टर न्यूरोलाजी के विशेषज्ञों से संर्पक कर सीटी स्कैन कराने के बाद तुंरत दवा दी जाती है। यह रसायन केवल इस्केमिक स्ट्रोक में ही कारगर है। देश में हर साल एक लाख लोगों मे से 73 लोग ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होते हैं।

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70 फीसदी मे होता है इस्केमिक स्ट्रोक

 ब्रेन स्ट्रोक के शिकार 70 फीसदी लोगों में इस्केमिक स्ट्रोक होता है बाकी ब्रेन हैमरेज कारण हिमैरजिक होता है।  ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होने वाले 40 फीसदी लोग की उम्र चालिस से कम होती है। चालिस फीसदी लोगों में स्ट्रोक का कारण उच्च रक्तचाप और 17 फीसदी लोगों में कोलेस्ट्राल का बड़ा स्तर होता है। स्मोकिंग और एल्कोहल भी स्ट्रोक का बड़ा कारण है।

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यह परेशानी तो सावधान

चेहरा एक तरफ लटके

एक हाथ में बल न लगना

बोलने में लड़खड़ाहट

-सिर में तेज दर्द

एक दम से देखने में एक या दोनों आंख में परेशानी

एक दम से चक्कर 

पीजीआई---आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस करेगा अल्सरेटिव कोलाइटिस के इलाज की भविष्यवाणी

 देश का पहला एआई माडल पीजीआई ने किय़ा विकसित

 






आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस करेगा अल्सरेटिव कोलाइटिस के इलाज की भविष्यवाणी

 

गंभीर अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीजों की बचेगी जिंदगी

 

 

 

 कुमार संजय। लखनऊ

 

आर्टीफिशयल इंटेलीजेंस( एआई) के जरिए पेट की बीमारी गंभीर अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीजों में बताना संभव होगा कि किस मरीज में कौन सा इलाज कारगर होगा। एआई मैथमेटिकल माडल संजय गांधी पीजीआइ के गैस्ट्रोइंट्रोलाजिस्ट प्रो.यूसी घोषाल ने तैयार किया है। इस माडल का उन्होंने 131 मरीजों में सफल परीक्षण भी किया है। 12 साल के लंबे शोध के बाद  यह देश का पहला एआई माडल है जो अल्सरेटिव कोलाइटिस मरीजों में बताएगा कि कौन सी दवा से इलाज संभव होगा। प्रो.घोषाल के मुताबिक  अल्सरेटिव कोलाइटिस के गंभीर मरीज रक्त युक्त मल और 10 से 12 बार मल जाने की परेशानी लेकर आते है ऐसे में इनमें कई तरह का खतरा हो सकता है। ऐसे मरीजों में इलाज की दिशा तय करना काफी जटिल काम होता है। देखा गया है कि 10 फीसदी इन मरीजों में प्रचलित इम्यूनो सप्रेसिव ट्रीटमेंट कारगर नहीं होता है ऐसे मरीजों में बायोलाजिकल दवाएँ देनी होती है। कई बार यह दवाएँ भी कारगर नहीं होती है इनमें तुरंत सर्जरी करनी होती है जिसके लिए  सर्जन को तैयार करने के साथ मरीज के तीमारदार को भी मानसिक रूप से तैयार करना होता है। किस मरीज में कौन सा इलाज कारगर होगा इसका पता तुरंत लग जाए तो बिना समय गवांए इलाज की दिशा तय कर राहत पहुंचायी जा सकती है। इसके लिए एआई बेस्ड मैथमेटिकल प्रोग्राम माडल तैयार किया है । इस शोध के जर्नल आफ गैस्ट्रो इंट्रोलाजी एंड हिपैटोलाजी ने स्वीकार किया है। 

 

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कैसे काम करता है माडल

 

मैथमेडिकल माडल में एलब्यूमिन का स्तर हीमोग्लोबीन का स्तर प्लेटलेट्स की संख्या सहित 25 पैरामीटर इंटर किया जाता है जिसके बाद माडल बता देता है कि कौन सा ट्रीटमेंट कारगर होगा।

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लिवर सिरोसिस में भी  दिया था देश का पहला एआई माडल

 

प्रो. घोषाल ने 2003 में जब वह कोलकत्ता में थे जब देश एआई माडल लिवर सिरोसिस पर तैयार किया था जिसमें बताया जा सकता था किस मरीज में तुरंत लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है किसमें कुछ समय इंतजार किया जा सकता है। इस शोध को जर्नल आफ गैस्ट्रोइंट्रोलाजी एंड हिपैटोलाजी ने स्वीकार किया था।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

लक्षण से लगेगा कितनी है वेंटीलेटर की जरूरत ----आप खुद लगा सकते है कितनी गंभीर है परेशानी

 


कोरोना संक्रमित के लक्षण से लगेगा कितनी है वेंटीलेटर की जरूरत

 

 

 

1653 कोरोना संक्रमित मरीजों पर शोध के आधार मिला यह संकेत

 

 

 

 

 

कुमार संजय़ । लखनऊ

 

 

 

कोरोना संक्रमित किस मरीज को वेंटीलेटर की जरूरत पड़ सकती है इसका अंदाजा अब लक्षण के आधार पर लगना संभव होगा। विशेषज्ञों ने देखा है कि  फ्लू की तरह लक्षण( सिर दर्द, सुंगध में कमी, मांसपेशियों में दर्द, कफ , गले में खरास, सीने में दर्द) की परेशानी लेकिन बुखार नहीं है तो इन संक्रमित मरीजों में वेंटीलेटर की जरूरत काफी कम पड़ती है। इन लक्षणों वाले केवल 1.5 फीसदी  मरीजों वेंटीलेटर या आक्सीजन सपोर्ट की जरूर पड़ती है।  ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के शोध सिम्पटम कल्सटर इन कोविड -19 ए पोटेंशियल क्लीनिकल प्रिडिक्शन ट्यूल फ्रमा द कोविड सिम्पटम स्टडी एप के हवाला देते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि इन लक्षण के आधार पर मरीजों को विशेष एहतियात बरतने की जरूरत है। विज्ञानियों ने कोरोना पीड़ितों को उनके लक्षणों के मुताबिक, अलग-अलग 6 ग्रुप में रखकर शोध किया  लक्षणों के आधार पर बताया इन्हें वेंटिलेटर की कितनी जरूरत पड़ेगी। अगर लक्षणों के आधार पर इस बात को समझ लें तो मरीज की हालत नाजुक होने से रोका जा सकता है। शोध कोरोना संक्रमित 1653 मरीजों पर किया गया है। गंभीर स्तर तीन और पेट , सांस लेने में परेशानी( सिर दर्द, सुगंध और भूख में कमीष कफ, बुखार, गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान , कंफ्यूजन, मांस पेशियों में दर्द, सांस लेने में परेशानी, डायरिया, पेट में दर्द) के मरीजों में सबसे अधिक वेंटीलेटर की जरूरत पड़ी। संजय गांधी पीजीआइ के आईसीयू एक्सपर्ट प्रो. जिया हाशिम और डा. अनिल गंगवार कहते है कि लक्षण पर नजर रखना बहुत जरूरी है यदि लंभीर लेवन थ्री के लक्षण है तो ट्रीट मेंट की विशेष प्लानिंग की जरूरत होती है। 

 

 

यह 6 लक्षण वर्ग के मरीज

 

1.     फ्लू के लक्षण लेकिन बुखार नही( सिर दर्द, सुगंध में कमी, मासपेशियों में दर्द, कफ, गले में खरास, सीने में दर्द )

 

2.     फ्लू के लक्षण और साथ में बुखार( सिर दर्द, सुगंध में कमी, गले में खरास, भूख में कमी)

 

3.     पेट की परेशानी( सिर दर्द, सुगंध में कमी, भूख में कमी, डायरिया, गले में खरास, चेस्ट पेन लेकिन कफ नहीं)

 

4.     गंभीर स्तर एक और थकना( सिर दर्द, सुगंध में कमी, कफ , फीवर,सीने में दर्द, थकान

 

5.     गंभीर स्तर दो और कंफ्यूजन( सिर दर्द, भूख में कमी, सुगंध में कमी, कफ, बुखार,गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान, मासपेशियों में दर्द, कंफ्यूजन

 

6.     गंभीर स्तर तीन और पेट , सांस लेने में परेशानी( सिर दर्द, सुगंध और भूख में कमीष कफ, बुखार, गले में खरास, चेस्ट पेन, थकान , कंफ्यूजन, मांस पेशियों में दर्द, सांस लेने में परेशानी, डायरिया, पेट में दर्द)

 

 

 

 

 

 

 

ग्रुप 1 : इस ग्रुप में रहे मरीजों में अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट से जुड़े लक्षण दिखे। जैसे लगातार खांसी और शरीर का दर्द। इस ग्रुप में से सिर्फ 1.5% मरीजों को ही वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। 16% मरीजों को एक या उससे ज्यादा बार ही अस्पताल जाने की नौबत आई।

 

 

 

ग्रुप 2: यह ग्रुप मरीजों को भी अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट यानी की सांस की नली के ऊपरी हिस्से में तकलीफ थी लेकिन उन्हें बुखार आता था और खानापान भी सामान्य नहीं था। ऐसे 4.4% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरुरत पड़ी थी और 17.5% लोगों को अस्पताल जाना पड़ा था।

 

ग्रुप 3: इस ग्रुप में मरीजों को अन्य लक्षणों के साथ साथ डायरिया जैसी गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी की पेट की बीमारी देखी गई थी। ऐसे 3.7% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरुरत लगी थी और 24% मरीजों को कम से कम एक बार अस्पताल इलाज के लिए जाना पड़ा था।

 

ग्रुप 4: अधिक थकावट, सीने में लगातार दर्द और खांसी जैसे लक्षण मरीजों में दिखे थे। 8.6% मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी जबकि 23.6% लोगों को एक या उससे ज्यादा बार अस्पताल जाना पड़ा।

 

ग्रुप 5: इस ग्रुप में घबराहट, अधिक थकावट और खाना खाने की इच्छा न करने जैसे लक्षण थे। इस ग्रुप के 9.9% मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। 24.6% मरीजों को अस्पताल जाना पड़ा।

 

ग्रुप 6: सांस चढ़ना, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, थकावट और पेट की बीमारी जैसे लक्षण इस ग्रुप के मरीजों में देखे गए। इस ग्रुप के लगभग 20% मरीजों को आर्टिफिशियल ब्रीदिंग सपोर्ट लेने की जरूरत पड़ी जब की 45.5% लोगों को अस्पताल इलाज के लिए जाना पड़ा

 

 

 

 

 

पहले पांच दिन रखनी है नजर

 

पहले पांच दिन में दिखते लक्षणों और उम्र पर नजर रखी जाए तो बताया जा सकता है कि मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ेगी या नहीं।

मानसिक रोग की दवा करेगी करोना का काट - कोशिका के अंदर वायरस नहीं बढा पाता है अपनी संख्या

 


मानसिक रोग की दवा करेगी करोना का काट

 

कोशिका के अंदर वायरस नहीं बढा पाता है अपनी संख्या

 

कुमार संजय। लखनऊ

 

एक तरह का मानसिक रोग बायपोलर डिसआर्डर के इलाज के लिए दी जाने वाली दवा एब्सेलीन अब कोरोना संक्रमित मरीजों को राहत दिलाएगी। इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो गया है। साइंस एडवांस मेडिकल जर्नल ने इस दवा के बारे में शोध रिपोर्ट में बताया है कि विज्ञानियों ने  अत्याधुनिक कंप्यूटर सिमुलेशन का इस्तेमाल किया तो उन्हें पता चला कि एब्सेलेन दवा कोरोनावायरस को मेजबान कोशिकाओं( होस्ट सेल) को बढ़ने से रोकने में कारगर है।  कोरोनावायरस के मुख्य प्रोटीन एमप्रो की जांच सबसे पहले की गई। शोधकर्ताओं की इस जांच में पता चला एमप्रो कोरोनावायरस के जेनेटिक मैटीरियल से प्रोटीन बनाने की क्षमता को सुविधाजनक बनाता है। इस तरह से कोरोनावायरस मेजबान सेल में अपनी प्रतिकृति(कापी) का निर्माण करता है। यह दवा सेल में वायरस के संख्या (कापी ) बढने से रोकता है।

 

शोध वैज्ञानिकों ने एसपीआई-1005 ट्रीटमेंट इन माडरेट कोविड-19 पेशेंट के नाम से क्लीनिकल ट्रायल फाइल किया है जिसे स्वीकार किया गया है।  देखा कि  एब्सेलीन  दवा एमप्रो के खिलाफ अपना असर प्रभावी तरीके से दिखा रही है। एब्सेलेन दवा  में कई गुण मौजूद होते हैं जैसे एंटीवायरल, जीवाणुनाशक, एंटीऑक्सीडेटिव, एंटी-इंफ्लेमेटरी, सेल-सुरक्षात्मक गुण आदि। संजय गांधी पीजीआई के कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे है प्रो.ज्ञान चंद कहते है कि इस दवा के आने से इलाज का एक विकल्प और मौजूद होगा जिससे मरीजों को काफी राहत मिलेगी।

 

इंसानों पर भी पॉजिटिव असर दिखा

 

एब्सेलेन दवा का इस्तेमाल कई बीमारियों को ठीक करने के लिए किया जाता है। खासकर, बायपोलर डिसऑर्डर एवं सुनाई न देने पर इसे मरीजों को दिया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस दवा पर कई क्लिनिकल ट्रायल किए गए हैं, जिससे साबित हुआ है कि इंसानों में इसका इस्तेमाल करना सुरक्षित है।

 

 

 

इन दवाओं से हो रहा है कोरोना का इलाज

 

फिलहाल, गंभीर रूप से कोविड-19 संक्रमित मरीजों का इलाज  रेमडेसिवीर दवा से किया जा रहा है। इस दवा का इस्तेमाल इबोला के मरीजों पर किया जाता है, जो एक एंटीवायरल दवा है। हालांकि, यह दवा इबोला के मरीजों पर कारगर साबित नहीं हुई थी, लेकिन कोरोना मरीज़ों पर इसके पॉजिटिव रिजल्ट ही सामने आए हैं।  ब्लड प्लाज्मा, डेक्सामेथासोन दवा से भी कोरोना के मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

प्रो. सुनील प्रधान डाक्टर आफ साइंस से हुए सम्मानित

 





प्रो. सुनील प्रधान डाक्टर आफ साइंस से हुए सम्मानित

 

न्यूरोलाजी के क्षेत्र में कार्य के लिए मिली उपाधि

  

 

लकवामिग्रीदिमाग की टीबीपार्किंसनब्रेन स्ट्रोक के सटीक इलाज के साथ कई नई तकनीक स्थापित करने वाले पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख व पद्मश्री डॉ. सुनील प्रधान हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विवि ने डाक्टर आफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया है। इससे रानी दुर्गावती विवि जबलपुर ने ने भी इस उपाधि से सम्मानित किया था। यह उपाधि प्रो. प्रधान को उनके विशेष शोध और सेवा के लिए दिया गया है। प्रो. प्रधान ने मांस पेशियों की बीमारी के इलाज के लिए तकनीक इजाद की। जिसे प्रधान साइन के नाम जाना जाता है। इसके अलावा हाल में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के हाथ-पैर में जान डालने का नई तकनीक विकसित की है। इसे करेक्टेड एसिस्सटेड सिंक्रोनाइज्ड पियारोडिक (कैस्प) थेरेपी नाम दिया है। बिजनौर जिले में वर्ष 1957 में जन्मे डॉ. सुनील प्रधान ने केजीएमयू से एमबीबीएसएमडी और डीएम की पढ़ाई की। डॉ. प्रधान ने 1989 में पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग में बतौर ज्वाइन किया। डॉ. प्रधान को वर्ष 2014 में पद्मश्री के अलावा शांति स्वरूप भटनागरआईसीएमआरआरोग्य भारती सम्मान,विज्ञान रत्न व विज्ञान गौरव समेत दो दर्जन से अधिक सम्मान पा चुके हैं। डॉ. प्रधान ने 200 से अधिक शोध पत्र एवं पुस्तकें लिखी हैं

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

पीजीआइ में स्थापित हुई प्रैक्रियाज ट्यूमर की सर्जरी के लिए विपल लेप्रोस्कोपिक तकनीक


 

 

निकाला पैक्रियाज का कैंसर इस दौरान पास स्थित चार अंगों को भी किया दुरुस्त

 

पीजीआइ में स्थापित हुई प्रैक्रियाज ट्यूमर की सर्जरी के लिए विपल लेप्रोस्कोपिक तकनीक

 

 


 

संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के सहायक प्रोफेसर डा. अशोक कुमार द्तीय ने संस्थान में लेप्रोस्कोपिक विपल( पैंक्रीएटोकोड्यूडेनेक्टमी) तकनीक से प्रैक्रियाज कैंसर की सर्जरी की तकनीक स्थापित करने में सफलता हासिल की है। गोपाल गंज बिहार के रहने वाले  64 वर्षीय मुहम्द अली पैक्रियाज में ट्यूमर की परेशानी से ग्रस्त थे जिनमें विपल तकनीक से सर्जरी कर ट्यूमर के निकाला गया। डा. अशोक कुमार के मुताबिक 9 अक्टूबर को सर्जरी की गयी । इनकी हालत में तेजी से सुधार हो रहा है। वह चल फिर रहे है। यह सर्जरी फिलहाल ओपेन तकनीक से की जाती है लेकिन हमने विपल लेप्रोस्कोप तकनीक से करने का फैसला लिया जिसके लिए योजना तैयार करने के साथ टीम को तैयार किया। पैक्रियाज का ट्यूमर निकालने के समय उसके आस –पास स्थित छोटी आंत, आमाशय, पित्त की नली के भी भाग को निकलना होता है क्योंकि कैंसर सेल के उसमें होने की आशंका रहती है। इसके बाद सभी अगों को वापस जोड़ना होता है जो काफी जटिल प्रक्रिया है। अंगो को जोडने के बाद जरा सी चूक होने पर अंदर स्राव होने की आशंका रहती है जो पूरी सर्जरी को फेल कर सकता है।   

      डा. अशोक का दावा है कि संस्थान में इस तकनीक से पहली बार सर्जरी की गयी है जिसका फायदा आगे इस तरह के मरीजों को मिलेगा। यह तकनीक देश के गिने चुने संस्थान में ही उपलब्ध है। ओपन विधि से २०-२५ सेंटीमीटर  के चीरे की जरूरत होती हैऔर ऑपरेशन में ९-१० घंटे का समय लगता है। इसके साथ ही जटिलता की आशंका रहती है।

 

कौशल की होती है इस तरह की सर्जरी में जरूरत

   

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में  कौशल की जरूरत होती है। इस सर्जरी में  कम टिश्यू इंजुरी और कम खीच - तान कि वजह से ब्लड लॉस कम होता है।  रिकवरी जल्दी होती है साथ घाव से संबंधित कॉम्प्लिकेशन कम होते हैं और मरीज जल्द डिस्चार्ज हो जाता है।  ऑपरेशन करने से पहले ट्रेनिंग और कई सालों अथक प्रयासों की जरूर होतीऔर शुरूआत में दूसरे कम जटिल ऑपरेशन से शुरुआत करनी होती है।

 

 

   

ई ओपीडी से मिली मंजिल

 ई ओपीडी में फोन किया जिसके बाद लक्षण के आधार पर कुछ जांच लोकल कारने को कहा गया जिसके बाद मरीज को यहां बुलाया गया। पहले होल्डिंग एरिया में भर्ती कर बाकी जांचे करायी गयी जिसके बाद लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट में शिफ्ट कर सर्जरी की प्लानिंग की गयी।    

         

 

इन लोगों की मेहनत से मिला मुकाम

मुख्य ऑपरेटिंग सर्जन एसोसिएट प्रोफेसर  डा. अशोक कुमार द्तीय के साथ उनके सीनियर रेजिडेंट डा निशांतडा सोमनाथडा नलिनीडा किरन के साथ एनस्थीसिया टीम डा. प्रतीकडा. सुरुचि , डा. फरजाना, डा. प्रत्यूष , सिस्टर दीपमाला, सिस्टर प्रियंका सहयोग से यह सफल हो पाया। 

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

विश्व अर्थराइटिस दिवस आज 60 फीसदी जोड़ों में खराबी के साथ आते हैं एसजीपीजीआई


 विश्व अर्थराइटिस दिवस आज

60 फीसदी जोड़ों में खराबी के साथ आते हैं एसजीपीजीआई

90 फीसदी अर्थराइटिस मरीज भटकने के बाद जाते हैं विशेषज्ञ के पास

लखनऊ।  कुमार संजय

रूहमैटायड अर्थराइटिस( गठिया) के परेशानी 90 फीसदी मरीज हड्डी के डाक्टर के पास पहले इलाज के लिए जाते हैं। एक डाक्टर के पास फायदा न होने पर कई डॉक्टरों को  अजमाने के बाद वह किसी रूहमैटोलाजिस्ट के पास जाते हैं। इतने में काफी देर हो चुकी होती है। संजय गांधी पीजीआई में आने वाले 60 फीसदी मरीज  जोड़ो में विकृति के साथ आते हैं। जब जोड़ खराब हो चुका होता है तब ऐसे में जोड़ को दोबारा ठीक करना संभव नहीं रहता है।  यह समझना होगा कि अर्थराइटिस एक आटोइम्यून डिजीज है जिसका सही इलाज क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट या रूहमैटोलाजिस्ट ही कर सकता है। विश्व अर्थराइटिस दिवस (12 अक्टूबर ) के मौके पर विशेषज्ञों पर कहना है कि सही समय पर सही इलाज मिल जाए जोड़ो को काफी हद तक बचाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के प्रो.विकास अग्रवाल और प्रो.दुर्गा प्रसन्ना के मुताबिक अर्थराइटिस कई तरह की होती है लेकिन सबसे अधिक कामन रूहमैटायड अर्थराइटिस और बच्चों में होने वाले जूविनाइल रूहमैटायड अर्थराइटिस है। इस परेशानी से एक दो फीसदी लोग परेशान है। महिलाओं में यह परेशानी पुरूषों के मुकाबले अधिक होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवा के मरीज का मूवमेंट इलाज में अहम रोल अदा करता है। इसी लिए इस साल का थीम है मूव टू इंप्रूव यानि बीमारी को ठीक करने के लिए चलें। इस बीमारी से प्रभावित लोगों को हर सप्ताह 150 मिनट या इससे अधिक मध्यम दर्जे का एरोबिक(हल्का) व्यायाम करना चाहिए। मांस पेशियों को मजबूती देने वाली कसरत सप्ताह में दो बार करनी चाहिए। इलाज के लिए डिजीज माडीफाइड दवाएं दी जाती है।

बीमारी का टोकरा बना देती है अर्थराइटिस

रूहमैटायड अर्थराइटिस से का सही समय पर सही इलाज न मिलने पर इस बीमारी से ग्रस्त 15 से 20 फीसदी लोगों में आंखत्वचादिल फेफड़ाकिडनी,  न्यूरोलाजिकल और लिवर की परेशानी हो सकती है। इसके अलावा एनीमिालिम्फोमा और दूसरे तरह के हिमैटोलाजिकल परेशानी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आटोइम्यू डिजीज है जो शरीर के दूसरे अंगों के खिलाफ एंटीबाडी बना कर डैमज कर सकता है।

क्या है आटोइम्यून डिजीज

शरीर का इम्यून सिस्मटम शरीर के बीमारीबैक्टीरिया व वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए एंटीबाजी बनाता है। इस सिस्टम में खराबी आने पर सिस्टम शरीर के अंगों को दुश्मन मान कर उसके खिलाफ एंटीबाडी बनाने लगता है। जिस अंग के खिलाफ एंटीबाडी बनती है वह अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है।

 

तीन नई दवाएं जगा रही है नई उम्मीद

अर्थराइटिस के इलाज के लिए तीन दवाएं तैयार हो गयी है जो मरीजों को कोफी राहत पहुंचा सकती है। एंटी इंटर ल्यूरीन 6 रिसेप्टर एंटीबाडी, फास्फोडाइज स्ट्रेज 4 इनहैबिटर दवा मिथोट्रिक्सेट दवा के फेल होने पर काम करती है देखा गया है कि 30 से 40 फीसदी मरीजों में मिथोट्रिक्सेट काम नहीं करता है। जैनुस एसोसिएटेड काइनेज इंहैबिटर दाव की मिथोट्रिक्सेट के कारगर न होने पर प्रभावी है।

 

यह परेशानी तो अर्थराइटिस की आशंका

6 सप्ताह से अधिक शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द और सूजन की परेशानी हो तो रूहमैटोलाजिस्ट या क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट से सलाह लेना चाहिए।

शुरुआती दौर में स्तन कैंसर का 100 % इलाज संभव



शुरुआती दौर में स्तन कैंसर का 100 % इलाज संभव

स्तन कैंसर जागरूकता माह 


 यदि किसी भी महिला को स्तन के आकर में परिवर्तन लग रहा है। कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि हो रही। स्तन के आसपास गांठ प्रतीत हो रही है। तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। क्योंकि यह स्तन कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। पीजीआई के ब्रेस्ट और इंडोक्राइन सर्जन प्रो. गौरव अग्रवाल बताते हैं कि यदि स्तन कैंसर का पता शुरुआती दौर में चल जाय तो इसका 100 फीसदी इलाज सभंव है। पीजीआई में स्तन कैंसर जागरूकता माह के तहत आयोजित वेबिनार में रेडियोथेरेपी विभाग के प्रमुख डॉ. पुनीता लाल, डायटीशियन निरुपमा सिंह ने विचार रखे। 


30 फीसदी में स्तन कैंसर 

महिलाओं में हर प्रकार के कैंसर में 30 % स्तन कैंसर होता है। जिनके घर में कोई महिला स्तन कैंसर से पीड़ित है, तो उसके घर की लड़कियों और महिलाओं में इसके होने की अधिक आशंका रहती है। मासिक धर्म का पहले होना, हार्मोनल गर्भनिरोधक दवाएं, एक्सरे, सिटी स्कैन के संपर्क में आने से इसकी आशंका अधिक रहती है।

 पांच तरीक़े से इलाज संभव डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि स्तन कैंसर इलाज के पांच उपाय हैं। इसमें ऑपरेशन, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, हार्मोन थिरेपी और बायोलाजिकल विधि है। 

 बचाव -स्तन कैंसर के प्रति हर उम्र की युवतियों और महिलाओं में जागरूकता -20 साल से ऊपर की युवती औऱ महिलाओं को खुद से स्तन की जांच करें। देखे की स्तन के आकार में बदलाव, गांठ आदि दिखने पर डॉक्टर की परामर्श लें -40 से ऊपर की महिलाओ को साल में डॉक्टर से स्तन की जांच करानी चाहिए।