सोमवार, 20 अप्रैल 2026

कैंसर संस्थान में डॉक्टरों की कमी से इलाज पर संकट 🔴 इलाज पर गहराता संकट

 


वेतन विसंगति ने तोड़ा सिस्टम: कैंसर संस्थान में डॉक्टरों की कमी से इलाज पर संकट

🔴 इलाज पर गहराता संकट | मरीजों को फिर बाहर का रास्ता

विका




लखनऊ: उत्तर प्रदेश में कैंसर इलाज को लेकर बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत चिंता बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी योजना के तहत बने कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान को टाटा मेमोरियल अस्पताल की तर्ज पर विकसित करने की बात कही गई थी, लेकिन वेतन विसंगति और नीतिगत फैसलों की देरी ने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

हालात यह हैं कि संस्थान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी हो गई है, जिसका सीधा असर कैंसर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। प्रदेश में हर साल करीब 2 से 2.5 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं, जबकि अनुमानित कुल मरीजों की संख्या 4 से 5 लाख के बीच मानी जाती है। ऐसे में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा कर रही है।

भर्ती निकली, डॉक्टर नहीं मिले

संस्थान ने 74 डॉक्टरों की भर्ती निकाली, लेकिन 50 से भी कम आवेदन आए। इससे साफ है कि डॉक्टर यहां काम करने में रुचि नहीं दिखा रहे।

इस समय संस्थान में केवल 35 नियमित डॉक्टर हैं, जबकि रोजाना 350–400 गंभीर मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं और 300 बेड लगभग फुल रहते हैं।

शासन स्तर पर फैसलों में देरी

संस्थान प्रशासन ने डॉक्टरों को SGPGIMS और लोहिया संस्थान के बराबर वेतन देने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली।

शासी निकाय की बैठकों में भी कोई ठोस निर्णय न होने से डॉक्टरों में असंतोष बढ़ा है।

परिणाम यह हुआ कि पिछले साल 94 पदों के इंटरव्यू में चयनित 21 में से सिर्फ 10 डॉक्टरों ने ज्वाइन किया, बाकी बेहतर वेतन और सुविधाओं के कारण अन्य संस्थानों में चले गए।

महत्वपूर्ण विभाग बिना विशेषज्ञ के

रेडियोलॉजी, मेडिकल ऑन्कोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी जैसे अहम विभागों में डॉक्टरों की कमी है।

एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जरूरी जांच के लिए निजी केंद्रों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे इलाज की प्रक्रिया धीमी और महंगी हो रही है।

6 साल में बड़ा पलायन

पिछले छह वर्षों में

27 डॉक्टर

60 नर्सिंग स्टाफ

10 टेक्नीशियन

संस्थान छोड़ चुके हैं

यह आंकड़े दिखाते हैं कि समस्या सिर्फ भर्ती की नहीं, बल्कि डॉक्टरों को रोक पाने में विफलता की भी है।

मरीजों पर सीधा असर

डॉक्टरों की कमी के कारण

इलाज में देरी

लंबी वेटिंग

बाहर रेफर होने की मजबूरी

बढ़ रही है। कई मरीजों को अभी भी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों का रुख करना पड़ रहा है।

सवाल खड़े करती स्थिति

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते वेतनमान, स्थायी नियुक्ति और कार्य परिस्थितियों में सुधार नहीं किया गया, तो यह संस्थान अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पाएगा।

प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे कैंसर मामलों के बीच यह स्थिति यह संकेत देती है कि नीतिगत देरी और प्रशासनिक स्तर पर धीमी कार्रवाई का सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है।


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