फोलिक एसिड देकर और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का समय से पता कर दिया जा सकता है मां और शिशु को स्वस्थ जीवन
लखनऊ। सुरक्षित मातृत्व का अर्थ गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मां और शिशु को समुचित चिकित्सकीय देखभाल उपलब्ध कराना है, जिससे मातृ, भ्रूण और नवजात मृत्यु व बीमारियों को कम किया जा सके। संजय गांधी पीजीआई के मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य विभाग की प्रोफेसर इंदु लता के अनुसार, समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप और नियमित निगरानी से अधिकांश जटिलताओं को रोका जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य अभी भी चुनौती बना हुआ है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम 2018-20 के अनुसार राज्य में मातृ मृत्यु अनुपात 167 प्रति एक लाख जीवित जन्म था, जो घटकर करीब 150 के आसपास पहुंचा है, लेकिन यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वहीं नवजात मृत्यु दर उत्तर प्रदेश में लगभग 30 प्रति हजार जीवित जन्म के आसपास दर्ज की गई है, जो देश में ऊंचे स्तरों में गिनी जाती है।
प्रो. इंदु लता बताती हैं कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में 400 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड देना जरूरी है, जिससे भ्रूण में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसी जन्मजात विकृतियों की रोकथाम की जा सकती है। दूसरी और तीसरी तिमाही में नियमित एएनसी जांच, लेवल-2 अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट, आयरन और कैल्शियम का सेवन तथा टेटनस टॉक्सॉइड के टीके सुरक्षित गर्भावस्था के लिए आवश्यक हैं।
उन्होंने कहा कि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी जैसे गर्भावधि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एनीमिया, थायरॉयड, जुड़वां गर्भ या पूर्व जटिलताओं वाले मामलों की समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है। समय पर प्रबंधन से जटिलताओं और मृत्यु के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार द्वारा प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं चलाकर संस्थागत प्रसव और निःशुल्क जांच को बढ़ावा दिया जा रहा है।
प्रो. इंदु लता के अनुसार, यदि गर्भावस्था की शुरुआत से ही सही पोषण, नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान सुनिश्चित हो, तो मां और शिशु दोनों को स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है।
बॉक्स: उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु और जन्मजात विकृतियां—स्थिति और कारण
जन्मजात विकृतियां
विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 2-3% शिशु किसी न किसी जन्मजात विकृति के साथ पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह संख्या हर वर्ष लाखों जन्मों के अनुपात में महत्वपूर्ण बन जाती है।
नवजात मृत्यु
उत्तर प्रदेश में लगभग 30 शिशु प्रति 1000 जीवित जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।
गर्भावस्था के दौरान शिशु मृत्यु
राज्य में अनुमानित रूप से 20-25 प्रति 1000 जन्म स्टिलबर्थ (मृत जन्म) के रूप में दर्ज किए जाते हैं।
प्रमुख कारण:
समय से पहले जन्म
कम जन्म वजन
जन्म के समय सांस न आना
संक्रमण (सेप्सिस)
जन्मजात विकृतियां
गर्भावस्था में मां की बीमारियां (डायबिटीज, हाई बीपी, एनीमिया)
रोकथाम कैसे संभव:
गर्भावस्था की शुरुआत से फोलिक एसिड का सेवन
नियमित एएनसी जांच और अल्ट्रासाउंड
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान
संस्थागत प्रसव और नवजात की विशेष देखभाल
यह आंकड़े बताते हैं कि समय पर पहचान, उचित पोषण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए मातृ और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।


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