आंख की रेयर डिजीज से ग्रस्त बच्चे को मिली रोशनी
8 बार स्क्लेरोथेरेपी फेल, फिर सिरोलिमस टारगेट थेरेपी से मिली राहत
लखनऊ
संजय गांधी पीजीआइ के नेत्र रोग विभाग के डॉक्टरों ने आंख की दुर्लभ बीमारी में 8 बार इंजेक्शन वाली स्क्लेरोथेरेपी तकनीक फेल होने के बाद टारगेटेड थिरेपी से बच्चे की रोशनी लौटा दी। 19 महीने के फॉलोअप में एमआरआई में घाव लगभग खत्म मिला। इस को ब्रिटिश मेडिकल जर्नल केस रिपोर्ट्स ने स्वीकार किया गया है। लखनऊ का रहने वाला 6 वर्षीय बच्चा जन्मजात रेयर डिजीज राइट ऑर्बिटल वेनोलिम्फेटिक मालफॉर्मेशन से ग्रस्त था। इसमें आंख के पीछे खून और लसीका की नलियों का गुच्छा बन जाता है। बच्चेकी दाहिनी आंख 26 मिमी बाहर निकल आई थी, लाल-सूजन थी और होंठ-तालू व मैक्सिलरी साइनस तक फैलाव था। बच्चे की रोशनी काफी कम हो गई थी । चेहरा बिगड़ने से उसने स्कूल जाना छोड़ दिया था।
पुराना इलाज फेल
तीन साल तक दूसरे सेंटर पर 5 बार ब्लेओमाइसिन और 3 बार एसटीएस स्क्लेरोथेरेपी की गई। इसमें सुई से गांठ में दवा डालकर सुखाया जाता है, पर इस बच्चे को कोई फायदा नहीं हुआ । बीमारी बढ़ती गई। सर्जरी में भारी ब्लीडिंग और स्थायी अंधेपन का खतरा था।
नया इलाज और कितने दिन में फायदा
प्रो. रचना अग्रवाल और डा अंकिता ऐश्वर्या ने तमाम मूल्यांकन के बाद माता-पिता की सहमति से ओरल सिरोलिमस शुरू की। यह टारगेटेड थेरेपी है।4 से 6 हफ्ते में ही सूजन घटने लगी। 3 महीने में साफ दिखने लगा, 6 महीने पर रोशनी 6/12 और 19 महीने पर 6/9-2 हो गई जो सामान्य के करीब है। प्रोप्टोसिस 26 से घटकर 15 मिमी रह गया, तालू का घाव ठीक। कोई बड़ा साइड इफेक्ट नहीं। बच्चा फिर स्कूल लौट आया। विभागाध्यक्ष प्रो. विकास कनौजिया ने कहा, हम रूटीन इलाज के साथ रेयर बीमारियों पर रिसर्च भी कर रहे हैं। यह उसी का नतीजा है कि बिना सर्जरी बच्चे की आंख बच गई।
क्या है यह बीमारी
ऑर्बिटल ट्यूमर कुल आबादी में करीब 1 फीसदी में मिलता है। बच्चों में पहले दशक के उम्र में दिखते हैं। आंख बाहर निकलना, लाल सूजन, रोशनी कम होना। सर्दी या चोट के बाद अचानक सूजन बढ़े तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ को दिखाएं।
फोटो परिचय
1 बाएं से प्रोफेसर रचना अग्रवाल और डॉक्टर अंकित 2 बीमारी के दौरान की आंख की फोटो और बीमारी ठीक होने के बाद आंख की फोटो



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