लैब में उगाईं हार्ट वाल्व की कोशिकाएं, परखीं दवाएं; देखा - वाल्व की बीमारी को रोकने में कारगर होगी कौन सी दवा
- रूमेटिक हार्ट डिजीज पर अहम शोध में सूजन और फाइब्रोसिस की वजह का चला पता, सर्जरी टालने की जगी उम्मीद
लखनऊ
रूमेटिक हार्ट डिजीज (आरएचडी) से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। संजय गांधी पीजीआइ के वैज्ञानिकों ने लैब में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाएं उगाकर यह देखा केि वाल्व धीरे-धीरे मोटा और सख्त होकर खराब हो जाता है जिसे दवा के जरिए रोका जा सकता है। उन दवाओं का भी पता लगाया जो वाल्व को सुरक्षित रख सकती हैं।
शोध में सामने आया है कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और कुछ खास प्रोटीन वाल्व को नुकसान पहुंचाकर फाइब्रोसिस (सख्त होने की प्रक्रिया) को बढ़ाते हैं। यदि इस प्रक्रिया को शुरुआती दौर में ही नियंत्रित किया जा सके तो भविष्य में कई मरीजों को हार्ट वाल्व बदलने की सर्जरी से बचाया जा सकता है।
यह महत्वपूर्ण शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकैमिस्ट्री ने स्वीकार किया है।
शोध में पाया गया कि रूमेटिक हार्ट डिजीज केवल वाल्व तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि इसमें पूरे शरीर में सूजन की प्रक्रिया सक्रिय रहती है। मरीजों के खून में ऐसे कई प्रोटीन मिले जो सूजन बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। यही सूजन धीरे-धीरे हार्ट वाल्व की कोशिकाओं में बदलाव लाकर उसे मोटा और कठोर बना देती है।
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाओं को उगाकर उन पर अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि टीजीएफ-बीटा नामक प्रोटीन वाल्व की कोशिकाओं को तेजी से सख्त बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। वहीं एसबी204741 और टाडालाफिल जैसी दवाओं ने इस नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया को काफी हद तक रोकने में सफलता दिखाई।
ऐसे हुआ शोध
वैज्ञानिकों ने आरएचडी के उन मरीजों के माइट्रल हार्ट वाल्व के ऊतकों का अध्ययन किया, जिन्हें बीमारी के कारण वाल्व बदलने की सर्जरी करानी पड़ी थी। ऑपरेशन के दौरान निकाले गए खराब वाल्व के ऊतकों की आधुनिक एलसी-एमएस/एमएस प्रोटिओमिक्स तकनीक से जांच की गई। तुलना के लिए इस्कीमिक हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीजों के माइट्रल वाल्व ऊतकों की भी इसी तकनीक से जांच की गई।
शोधकर्ताओं की भूमिका
यह शोध क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के यंग साइंटिस्ट डॉक्टर मोहित के राय और विभाग के प्रोफेसर विकास अग्रवाल के नेतृत्व में किया गया। शोध टीम में डा. आलोक कुमार, डा. दियाब रामिरेड्डी, डा. अंजलि सिंह, कार्डियो सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. सुरेंद्र के. अग्रवाल और प्रो. शांतनु पांडे शामिल रहे।






















