जेल से फरारी पर हीरक पदक, लूट के आरोपियों को रजत सम्मान
गणतंत्र दिवस पर कारागार विभाग में पदक वितरण बना सवालों के घेरे में
राजेश यादव निडर
लखनऊ। प्रदेश के कारागार विभाग में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जारी पदक सूची ने विभागीय गलियारों में तीखी चर्चाओं को जन्म दे दिया है। आरोप है कि जेलों में गंभीर अनियमितताओं और फरारी जैसे मामलों से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों को भी पदकों से नवाजा गया, जबकि कई पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए।
कारागार मुख्यालय की ओर से 23 जनवरी को जारी सूची के अनुसार, “उत्कृष्ट और सराहनीय सेवाओं” के नाम पर हीरक (प्लैटिनम), स्वर्ण, रजत पदक और डीजी प्रशंसा प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम कानपुर नगर जेल से बंदी फरारी प्रकरण में निलंबित रह चुके जेलर मनीष कुमार का है, जिन्हें डीजी जेल का हीरक पदक प्रदान किया गया।
इतना ही नहीं, बुलंदशहर, फिरोजाबाद और मुजफ्फरनगर जेलों में बैठकी, हाता समेत अन्य मदों में वसूली और अनियमितताओं के आरोप झेल रहे अधीक्षक—कोमल मंगलानी, अमित चौधरी और अभिषेक चौधरी—को रजत पदक से सम्मानित किया गया।
सूची में एक और रोचक तथ्य यह सामने आया कि एआईजी जेल प्रशासन की नोएडा के एक कॉलेज में पढ़ रही दो बेटियों की “सेवा” में लगे वार्डर अक्षय सहित अन्य को भी डीजी का प्रशंसा प्रमाण पत्र दे दिया गया। इसके अलावा, कन्नौज जेल में तैनात रहते हुए प्रशिक्षण संस्थान में रहकर मुख्यालय में अधिकारियों की निकटता रखने वाले दो डिप्टी जेलरों को भी सम्मानित किया गया है।
पदक बना वसूली का जरिया?
विभागीय सूत्रों का आरोप है कि पदक वितरण की व्यवस्था अब कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के बजाय अधिकारियों की वसूली का माध्यम बन चुकी है। एक डिप्टी जेलर ने बताया कि वह इस बार स्वर्ण पदक की प्रबल दावेदार थीं, लेकिन मुख्यालय में “संबंधित अधिकारी से संपर्क न होने” के कारण उनका नाम सूची से बाहर रह गया। वहीं, एक बाबू का कहना है कि पिछले दो वर्षों से उसका नाम भेजा ही नहीं गया, और इस बार भेजे जाने के बावजूद पदक नहीं मिला।
इन आरोपों के बीच विभाग के कई ईमानदार और पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए, जबकि दागदार अधिकारियों के नाम सूची में प्रमुखता से शामिल रहे।
अधिकारियों की चुप्पी
मामले को लेकर जब एआईजी जेल प्रशासन धर्मेंद्र सिंह और प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो दोनों अधिकारियों के फोन नहीं उठे। विभागीय चुप्पी ने पदक वितरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर और सवाल खड़े कर दिए हैं।
फिलहाल, पदक वितरण की यह सूची कारागार विभाग के भीतर ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है।




















