रविवार, 25 जनवरी 2026

जेल से फरारी पर हीरक पदक, लूट के आरोपियों को रजत सम्मान

 



जेल से फरारी पर हीरक पदक, लूट के आरोपियों को रजत सम्मान

गणतंत्र दिवस पर कारागार विभाग में पदक वितरण बना सवालों के घेरे में

राजेश यादव निडर

लखनऊ। प्रदेश के कारागार विभाग में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जारी पदक सूची ने विभागीय गलियारों में तीखी चर्चाओं को जन्म दे दिया है। आरोप है कि जेलों में गंभीर अनियमितताओं और फरारी जैसे मामलों से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों को भी पदकों से नवाजा गया, जबकि कई पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए।

कारागार मुख्यालय की ओर से 23 जनवरी को जारी सूची के अनुसार, “उत्कृष्ट और सराहनीय सेवाओं” के नाम पर हीरक (प्लैटिनम), स्वर्ण, रजत पदक और डीजी प्रशंसा प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम कानपुर नगर जेल से बंदी फरारी प्रकरण में निलंबित रह चुके जेलर मनीष कुमार का है, जिन्हें डीजी जेल का हीरक पदक प्रदान किया गया।

इतना ही नहीं, बुलंदशहर, फिरोजाबाद और मुजफ्फरनगर जेलों में बैठकी, हाता समेत अन्य मदों में वसूली और अनियमितताओं के आरोप झेल रहे अधीक्षक—कोमल मंगलानी, अमित चौधरी और अभिषेक चौधरी—को रजत पदक से सम्मानित किया गया।

सूची में एक और रोचक तथ्य यह सामने आया कि एआईजी जेल प्रशासन की नोएडा के एक कॉलेज में पढ़ रही दो बेटियों की “सेवा” में लगे वार्डर अक्षय सहित अन्य को भी डीजी का प्रशंसा प्रमाण पत्र दे दिया गया। इसके अलावा, कन्नौज जेल में तैनात रहते हुए प्रशिक्षण संस्थान में रहकर मुख्यालय में अधिकारियों की निकटता रखने वाले दो डिप्टी जेलरों को भी सम्मानित किया गया है।

पदक बना वसूली का जरिया?

विभागीय सूत्रों का आरोप है कि पदक वितरण की व्यवस्था अब कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के बजाय अधिकारियों की वसूली का माध्यम बन चुकी है। एक डिप्टी जेलर ने बताया कि वह इस बार स्वर्ण पदक की प्रबल दावेदार थीं, लेकिन मुख्यालय में “संबंधित अधिकारी से संपर्क न होने” के कारण उनका नाम सूची से बाहर रह गया। वहीं, एक बाबू का कहना है कि पिछले दो वर्षों से उसका नाम भेजा ही नहीं गया, और इस बार भेजे जाने के बावजूद पदक नहीं मिला।

इन आरोपों के बीच विभाग के कई ईमानदार और पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए, जबकि दागदार अधिकारियों के नाम सूची में प्रमुखता से शामिल रहे।

अधिकारियों की चुप्पी

मामले को लेकर जब एआईजी जेल प्रशासन धर्मेंद्र सिंह और प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो दोनों अधिकारियों के फोन नहीं उठे। विभागीय चुप्पी ने पदक वितरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर और सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल, पदक वितरण की यह सूची कारागार विभाग के भीतर ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

कॉक्लियर इम्प्लांट से बच्चों और वयस्कों को मिल सकती है सुनने की नई क्षमता

 

कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए पीजीआई मेडिकल कॉलेजों के चिकित्सकों को देगा प्रशिक्षण

कार्यशाला के ज़रिए श्रवण बाधितों को नई ज़िंदगी देने की तैयारी

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) ने श्रवण हानि के उपचार और विशेषज्ञ चिकित्सकों के कौशल संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए प्रथम कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यशाला का सफल आयोजन किया। हेड एंड नेक सर्जरी विभाग द्वारा विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी के नेतृत्व में 24 और 25 जनवरी को आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों से आए विशेषज्ञों एवं युवा सर्जनों ने भाग लिया।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की सबसे जटिल प्रक्रिया माने जाने वाले टेम्पोरल बोन विच्छेदन का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना था। इस दौरान कुल 20 सर्जनों ने टेम्पोरल बोन का हैंड्स-ऑन डिसेक्शन किया, जिससे उनकी शल्य-तकनीकी दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रोबोटिक 3डी डिजिटल माइक्रोस्कोप के माध्यम से किया गया लाइव विच्छेदन प्रदर्शन रहा, जो भारत में इस तरह का पहला शैक्षणिक प्रयोग माना जा रहा है। इस उन्नत तकनीक से कान की सूक्ष्म संरचनाओं को अत्यंत स्पष्टता के साथ समझने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक  प्रोफेसर आर.के. धीमन ने अपने संबोधन में कहा कि श्रवण हानि आज भारत में एक गंभीर जन स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी ऐसे मरीजों के लिए जीवन बदलने वाली तकनीक है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि एसजीपीजीआई इन संस्थानों को प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करेगा। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सहयोग से नवजात शिशुओं की अनिवार्य श्रवण जांच, शीघ्र निदान और पुनर्वास को अत्यंत आवश्यक बताया।

मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर देवेंद्र गुप्ता ने विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यक्रम को और सशक्त बनाने के लिए संस्थान स्तर पर सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी ने बताया कि एसजीपीजीआई में बच्चों और वयस्कों दोनों में नियमित रूप से कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला के माध्यम से प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी इस अत्याधुनिक सर्जरी की नींव मजबूत होगी। कार्यक्रम में सर्जनों के साथ ऑडियोलॉजिस्ट और पुनर्वास विशेषज्ञों के व्याख्यान भी शामिल रहे, जिससे प्रतिभागियों को कॉक्लियर इम्प्लांट के हर पहलू की समग्र जानकारी मिली।



बॉक्स

भारत में श्रवण हानि की गंभीर स्थिति

लगभग 63 लाख लोग श्रवण हानि से प्रभावित

 कॉक्लियर इम्प्लांट से बच्चों और वयस्कों को मिल सकती है सुनने की नई क्षमता

 समय पर जांच और सर्जरी से बदली जा सकती है पूरी ज़िंदगी

शनिवार, 24 जनवरी 2026

एसजीपीजीआई में कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की बारीकियों पर हैंड्स-ऑन डिसेक्शन,

 




एसजीपीजीआई में कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की बारीकियों पर हैंड्स-ऑन डिसेक्शन,


 विशेषज्ञों ने साझा किया व्यावहारिक अनुभव



लखनऊ। कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी में सबसे अहम माने जाने वाले टेम्पोरल बोन डिसेक्शन और सटीक सर्जिकल तकनीक पर आज संजय गांधी पीजीआई में विशेष वैज्ञानिक सत्र आयोजित किया गया। यह सत्र हैंड्स-ऑन कॉक्लियर इम्प्लांट वर्कशॉप का प्रमुख हिस्सा रहा, जिसमें देशभर से आए ईएनटी सर्जनों ने प्रत्यक्ष अभ्यास के माध्यम से सर्जरी की जटिल संरचनाओं को समझा।

वर्कशॉप के मुख्य समन्वयक एवं हेड एंड नेक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. अमित केशरी ने बताया कि कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी केवल मशीन लगाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह माइक्रो-एनाटॉमी और अत्यधिक सटीकता पर आधारित सर्जरी है। उन्होंने कहा कि टेम्पोरल बोन की संरचना को सही तरीके से समझना सर्जरी की सफलता और मरीज की सुनने की क्षमता लौटाने के लिए बेहद जरूरी है।

इस वैज्ञानिक कार्यशाला में सर्जरी से पहले की ऑडियोलॉजिकल जांच, सीटी और एमआरआई द्वारा कान की आंतरिक संरचना का मूल्यांकन, इम्प्लांट के इलेक्ट्रोड चयन और सर्जिकल अप्रोच पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही वेरिया तकनीक और पोस्टेरियर टायम्पैनोटॉमी जैसी उन्नत सर्जिकल तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया।

प्रो. केशरी के अनुसार, समय पर और सही तकनीक से किया गया कॉक्लियर इम्प्लांट बच्चों में सुनने और बोलने की क्षमता विकसित कर सकता है, जिससे वे सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी सकते हैं। उन्होंने आम जनता से अपील की कि बधिरता को अभिशाप न मानें, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके प्रभावी समाधान उपलब्ध हैं।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

सड़क दुर्घटना में खोई सुनने की क्षमता लौटी, एसजीपीजीआई ने कॉक्लियर इम्प्लांट से रचा चिकित्सा चमत्कार

 






सड़क दुर्घटना में खोई सुनने की क्षमता लौटी, एसजीपीजीआई ने कॉक्लियर इम्प्लांट से रचा चिकित्सा चमत्कार


भीषण हादसे में दोनों कान क्षतिग्रस्त हुए थे, अत्याधुनिक तकनीक से  ज़िंदगी का तोहफा

पीजीआई चंडीगढ़ और एसजीपीजीआई ने मिलकर किया इलाज


लखनऊ। सड़क दुर्घटना में पूरी तरह सुनने की क्षमता खो चुके मऊ निवासी धनंजय 23 वर्षीय युवक के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ ने उम्मीद की नई राह खोल दी है। अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के सफल प्रयोग से युवक की श्रवण क्षमता बहाल करने की दिशा में ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है। चिकित्सकों के अनुसार यह उपलब्धि किसी “लॉटरी” से कम नहीं, जिसने अंधेरे में डूब चुके जीवन को फिर से आवाज़ दी है।

युवक को एक भीषण सड़क दुर्घटना में गंभीर सिर की चोट लगी थी, जिससे दोनों कानों में गहरी श्रवण हानि हो गई। बायां भीतरी कान पूरी तरह नष्ट हो चुका था, जबकि दायां कान फ्रैक्चर के कारण अत्यंत जटिल स्थिति में था। ऐसे में चिकित्सकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि क्या दाहिने कान की श्रवण तंत्रिका कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए पर्याप्त रूप से सुरक्षित है या नहीं।

इस जटिल निर्णय में पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के प्रोफेसर रमनदीप के विशेषज्ञ परामर्श ने अहम भूमिका निभाई। एक विशेष नैदानिक परीक्षण के जरिए दाहिने कान की तंत्रिका कार्यप्रणाली की पुष्टि हुई, जिसके बाद सर्जरी का मार्ग प्रशस्त हुआ।

एसजीपीजीआई की न्यूरोऑटोलॉजी टीम ने डॉ. एम. रवि शंकर के नेतृत्व में जनवरी के दूसरे सप्ताह में यह जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की। इसमें अत्याधुनिक इम्प्लांट प्रोसेसर का उपयोग किया गया, जो लगभग सामान्य वाक् कोडिंग प्रदान करता है। उत्तर प्रदेश में इस तकनीक का यह पहला प्रयोग बताया जा रहा है।

डिवाइस को गुरुवार को सक्रिय किया गया, जिसके बाद युवक ने तुरंत ध्वनि के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। ऑडियोलॉजी प्रक्रिया में पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ की  पारुल , एसजीपीजीआई की  आद्या,  कीर्ति,  मंगल सहित विशेषज्ञ  माथुर और  शिवांगी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

विशेषज्ञों के अनुसार यह सफलता न केवल तकनीकी प्रगति बल्कि संस्थानों के बीच समन्वय और टीमवर्क का जीवंत उदाहरण है। अब युवक गहन श्रवण पुनर्वास से गुजरेगा, जिससे वह दोबारा प्रभावी संवाद कर सकेगा और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आएगा।




पीजीआई में मिला नया जीवन, 140 किलो वजन के बावजूद जटिल हिप सर्जरी सफल

 

पीजीआई में मिला नया जीवन, 140 किलो वजन के बावजूद जटिल हिप सर्जरी सफल





कानपुर निवासी 50 वर्षीय इस्सत बानो के लिए चलना-फिरना लगभग असंभव हो चुका था। 140 किलोग्राम से अधिक वजन, थायराइड, उच्च रक्तचाप और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया जैसी गंभीर बीमारियों के कारण कई बड़े अस्पतालों ने उनके कूल्हे (फीमर नेक) के फ्रैक्चर की सर्जरी करने से इनकार कर दिया था। सांस लेने के लिए सीपैप  मशीन पर निर्भर इस महिला के लिए हर सर्जरी जानलेवा जोखिम मानी जा रही थी।

लेकिन संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के डॉक्टरों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए जटिल हिप सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और महिला को नया जीवन दिया।

इस्सत बानो की सर्जरी के लिए  कई अस्पतालों ने जोखिम बताकर हाथ खड़े कर दिए, वहीं एसजीपीजीआई के डॉक्टरों ने मरीज की पीड़ा को समझा और इलाज का संकल्प लिया।


एसजीपीजीआई के अस्थि रोग विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. कुमार केशव और एनेस्थिसियोलॉजी विभाग की एडिशनल प्रोफेसर डॉ. वंश प्रिय ने बताया कि अत्यधिक मोटापे के कारण फ्रैक्चर तक पहुंचना और रक्तस्राव को नियंत्रित करना सर्जरी की सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन सटीक योजना और अनुभव के बल पर ऑपरेशन सफल रहा।

एनेस्थीसिया टीम के लिए भी यह केस बेहद तकनीकी था। जनरल एनेस्थीसिया से बचते हुए अत्याधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से 150 मिमी लंबी विशेष सुई द्वारा स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया गया। ऑपरेशन के बाद मरीज में रैबडोमायोलिसिस जैसी गंभीर जटिलता सामने आई, जो समय रहते इलाज न होने पर किडनी फेल होने का कारण बन सकती थी। एनेस्थीसिया आईसीयू में समय पर पहचान और इलाज से मरीज को सुरक्षित बचा लिया गया।

अब इस्सत बानो के टांके कट चुके हैं और वह वॉकर के सहारे चलने में सक्षम हैं




इन्होंने किया इलाज


डॉ. कुमार केशव (अस्थि रोग विशेषज्ञ) की टीम में 

 डॉ. उत्कर्ष, डॉ. अर्पण, डॉ. राजेश, डॉ. योगेश और स्क्रब नर्स अंकित शामिल रहे।

एनेस्थीसिया टीम में डॉ. वंश प्रिय, डॉ. रुमित, डॉ. निकिता और आईसीयू में डॉ. सुरुचि की सतर्कता ने मरीज की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

सत्ता से टकरावों की शृंखला

 






सत्ता से टकरावों की शृंखला और माघ मेले की नई दरार

गंगा की अविरलता के लिए 2008 का अनशन, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर टूटने का खुला विरोध, ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान और 108 घंटे की भूख हड़ताल, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी में उम्मीदवार उतारने की कोशिश, 2024 में ‘गऊ गठबंधन’ के जरिए राजनीतिक दखल और जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया विवादित बयान—इन तमाम घटनाओं ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उस संत के रूप में स्थापित किया है, जो सत्ता के साथ सामंजस्य से ज्यादा टकराव की राह चुनते हैं।

इसी क्रम में 18 जनवरी को प्रयागराज के माघ मेले में हुआ विवाद कोई अचानक उपजा प्रशासनिक संकट नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रहे उसी वैचारिक संघर्ष की ताज़ा अभिव्यक्ति थी। मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज पर स्नान को लेकर शंकराचार्य और प्रशासन के बीच जो टकराव सामने आया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि आधुनिक राज्य व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक नेतृत्व के बीच संतुलन आखिर कैसे बने।

माघ मेला: परंपरा बनाम प्रबंधन

मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ संगम नोज की ओर बढ़े। प्रशासन ने भारी भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सीमित संख्या में पैदल स्नान का विकल्प दिया। बात नहीं बनी। संगम नोज वॉच टावर के पास हालात तनावपूर्ण हो गए, धक्का-मुक्की की तस्वीरें सामने आईं और अंततः शंकराचार्य बिना स्नान किए लौट गए। इसके बाद वे अपने शिविर में अनशन पर बैठ गए।

अगले दिन प्रयागराज मंडल की आयुक्त सौम्या अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि स्नान की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी और दो वाहनों की अनुमति पहले ही अस्वीकार कर दी गई थी। इसके बावजूद शंकराचार्य आपातकालीन त्रिवेणी पीपा पुल से सैकड़ों अनुयायियों के साथ संगम नोज के करीब पहुंचे। शंकराचार्य का दावा इसके उलट था—उनका कहना था कि सूचना तीन दिन पहले दी गई थी और परंपरागत सम्मान का पालन किया जाना चाहिए था।

यह सिर्फ एक दिन का विवाद नहीं

राजनीतिक और धार्मिक विश्लेषक मानते हैं कि माघ मेला प्रकरण को केवल नियम उल्लंघन या भीड़ प्रबंधन की असफलता के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यह उस लंबी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार सत्ता और व्यवस्था के सामने खड़े होते रहे हैं।

उनके समर्थकों की दृष्टि में यह संघर्ष सनातन परंपराओं की रक्षा का प्रतीक है। आलोचकों का तर्क है कि वे हर बड़े मंच पर टकराव की स्थिति खुद रचते हैं, ताकि सत्ता-विरोधी संत की छवि को मजबूत किया जा सके।

साधारण जन्म, असाधारण व्यक्तित्व

15 अगस्त 1969 को प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुरा गांव में जन्मे उमाशंकर पांडेय का जीवन आरंभ से ही अलग दिशा में बहता दिखा। छठवीं कक्षा के बाद उन्हें गुजरात के बड़ौदा स्थित विश्वनाथ मंदिर ले जाया गया, जहां से साधना और सेवा की राह शुरू हुई। काशी में करपात्री जी महाराज का सान्निध्य मिला, जिन्होंने उनमें नेतृत्व और जुझारूपन देखा।

वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शास्त्र और नव्य व्याकरण की पढ़ाई के दौरान वे एक प्रखर छात्रनेता के रूप में उभरे। यहीं धर्म और राजनीति का वह संगम बना, जिसने आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा तय की।

संन्यास से आंदोलन तक

2000 में ब्रह्मचारी दीक्षा और 2003 में संन्यास के बाद वे अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बने। गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निर्देश पर उन्हें श्रीविद्यामठ की जिम्मेदारी मिली और राम मंदिर, रामसेतु तथा अविरल गंगा जैसे आंदोलनों की कमान सौंपी गई। इन आंदोलनों ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई।

2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए किया गया उनका अनशन निर्णायक मोड़ साबित हुआ। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान पुराने मंदिरों के टूटने का विरोध करते हुए उन्होंने विकास बनाम विरासत की बहस को केंद्र में ला दिया।

मुख्यधारा से दूरी की राजनीति

ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका और राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रण के बावजूद दूरी बनाए रखना—ये फैसले दिखाते हैं कि वे धार्मिक-राजनीतिक सर्वसम्मति का हिस्सा बनने से बचते हैं।

राजनीति में उनका दखल भी इसी सोच से जुड़ा है। 2019 और 2024 के प्रयोग बताते हैं कि वे धर्म को केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते हैं।

बयान, विवाद और सत्ता की असहजता

केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का आरोप हो या ‘भगवा टेरर’ जैसे शब्दों पर उनकी तीखी प्रतिक्रिया—वे बिना लाग-लपेट के बोलते हैं। जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया बयान सत्ता के शीर्ष तक सीधी चुनौती माना गया। इसके बाद उनका स्टेट गेस्ट दर्जा रद्द होना और कुछ संतों द्वारा सार्वजनिक आलोचना इस टकराव की तीव्रता को दिखाता है।

क्यों बार-बार टकराव?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती न तो सत्ता के स्थायी सहयोगी हैं, न ही उससे पूरी तरह अलग-थलग। वे उस धूसर क्षेत्र में खड़े हैं, जहां धर्म, परंपरा और राज्य लगातार एक-दूसरे से भिड़ते हैं। यही स्थिति उन्हें प्रासंगिक भी बनाती है और विवादों में भी घसीटती है।

माघ मेला विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में भी वे व्यवस्था के लिए एक असहज सवाल बने रहेंगे। इसे आस्था की रक्षा कहें या राजनीतिक हस्तक्षेप—इतना तय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम विवाद के बिना शायद ही लिया जाएगा।

रविवार, 18 जनवरी 2026

सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन

 








रुचि खंड, चंपा पार्क में सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन

लखनऊ। रुचि खंड स्थित चंपा पार्क में आज सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन मां पीतांबरा समूह  , सरोजिनी नगर द्वारा किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल्यों का प्रसार, सामाजिक समरसता को मजबूत करना तथा समाज में आपसी भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करना रहा।

सम्मेलन में कमल किशोर शर्मा, अंगद जी, दुर्गेश पाण्डेय, संजय मिश्रा,  सुरेश बाजपेई, अंकित शर्मा, अमित शर्मा, दुर्गेश मिश्रा, देवेश मिश्रा, संतोष कनौजिया, डी. के. त्रिवेदी, प्रीति शर्मा, नीलू त्रिवेदी, संजय तिवारी के अलावा विशिष्ट अतीत के रूप में, पूर्व आईएएस कैप्टन एसके द्विवेदी, पूर्व आईएएस सी पी तिवारी, कर्नल दया शंकर दुबे, देवेंद्र शुक्ला, कोमल द्विवेदी, जे पी बाजपेई, आई जी पुलिस अजय पांडे जी, वरिष्ठ एडवोकेट योगेश भट्ट, ओ पी पटेल, इंजीनियर अजय श्रीवास्तव, माधवी सिंह मधुबन तिवारी, अन्नपूर्णा रसोई के उमेश मिश्रा ,नीरज अवस्थी शामिल हुए। 

सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। वक्ताओं ने सनातन परंपराओं, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के अंत में समरसता भोज का आयोजन किया गया, जिसमें सभी ने एक साथ बैठकर भोजन किया। आयोजन ने सामाजिक सौहार्द, समता और एकता का सशक्त संदेश दिया।


शनिवार, 17 जनवरी 2026

रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह भव्य रूप से संपन्न

 


रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह भव्य रूप से संपन्न

हमारे संस्थान के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह म निदेशक प्रो. एम. एल. बी. भट्ट के दूरदर्शी नेतृत्व में गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया।  आयोजन सचिव के रूप डॉ प्रमोद गुप्ता रहे। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सी. एम. सिंह, निदेशक, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ रहे। विशिष्ट अतिथि एवं फाउंडेशन डे ओरेटर के रूप में प्रो. सत्यजीत प्रधान, निदेशक, टाटा अस्पताल, वाराणसी उपस्थित रहे। उन्होंने फाउंडेशन डे ओरेशन प्रस्तुत करते हुए महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के उपचार में ब्रैकीथेरेपी की नवीनतम प्रगति पर अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक विचार साझा किए, जिससे उपस्थित फैकल्टी एवं रेजिडेंट डॉक्टरों को नवीनतम उपचार विधियों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।

इस सफल आयोजन के लिए विभागाध्यक्ष एवं आयोजन अध्यक्ष डॉ. शरद सिंह, आयोजन सह-सचिव डॉ. रुमिता सिंह, डॉ. वरुण विजय (एमएस), डॉ. आयुष लोहिया, एफओ रजनीकांत वर्मा (ईआर) सहित विभाग के सभी फैकल्टी सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों, प्रशासनिक अधिकारियों, नर्सिंग स्टाफ एवं संस्थान के समस्त सहयोगी कर्मचारियों का सहयोग सराहनीय रहा।

स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत स्टाफ सदस्यों के लिए पोस्टर एवं रंगोली प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया, जिससे कर्मचारियों में रचनात्मकता और सहभागिता को प्रोत्साहन मिला।

इसके अतिरिक्त लखनऊ के सभी प्रमुख चिकित्सा संस्थानों एवं अस्पतालों से पधारे फैकल्टी सदस्यों, अतिथियों एवं परामर्शदाताओं की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। यह स्थापना दिवस समारोह उत्तर प्रदेश एवं आसपास के राज्यों के कैंसर रोगियों को उन्नत, उच्च गुणवत्ता वाली, किफायती एवं समर्पित कैंसर उपचार सेवाएं प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ करता है।


पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी से अंग विच्छेदन के खतरे को किया जा सकता है कम

 

पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी से अंग विच्छेदन के खतरे को किया जा सकता है कम

लखनऊ। हाथ, पैर या शरीर के अन्य अंगों में रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट आने पर गंभीर घाव, संक्रमण और अंततः अंग विच्छेदन जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लेकिन अब इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के अंतर्गत की जाने वाली पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी एवं अन्य एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशन तकनीकों के माध्यम से बंद धमनियों को खोलकर रक्त संचार बहाल किया जा रहा है। इससे न केवल मरीजों की जान बच रही है, बल्कि बड़ी सर्जरी और अंग कटने के खतरे से भी राहत मिल रही है। यह उन्नत चिकित्सा सुविधा संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लोहिया संस्थान और केजीएमयू जैसी प्रमुख चिकित्सा संस्थाओं के रेडियोलॉजी विभागों में उपलब्ध है।

ग्लोबल इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी डे के अवसर पर आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम में इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट प्रो. विवेक सिंह ने बताया कि डायबिटीज, रक्त जमने की समस्या या लंबे समय से चली आ रही पेरीफेरल आर्टेरियल डिजीज के मामलों में यदि समय रहते रेडियोलॉजी विभाग से संपर्क किया जाए, तो अंग विच्छेदन से प्रभावी रूप से बचाव संभव है।

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी की इमेज-गाइडेड एवं न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों ने कई जटिल और जानलेवा रोगों के उपचार को सुरक्षित और प्रभावी बनाया है। एक्यूट स्ट्रोक के इलाज में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी, ब्रेन एन्यूरिज्म में एंडोवैस्कुलर कॉइलिंग, अत्यधिक गर्भाशय रक्तस्राव में यूटेराइन आर्टरी एम्बोलाइजेशन तथा गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग में एम्बोलाइजेशन जैसी आधुनिक तकनीकों से मरीजों को तेज़ और बेहतर उपचार मिल रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि ये आधुनिक उपचार पद्धतियां कम जोखिम, कम दर्द, कम अस्पताल प्रवास और तेज़ रिकवरी के साथ मरीजों को बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान कर रही हैं। कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी भविष्य की सटीक, सुरक्षित और मरीज-केंद्रित चिकित्सा का मजबूत आधार बन चुकी है।

कार्यक्रम में एसजीपीजीआई से प्रो. अर्चना गुप्ता, प्रो. विवेक सिंह, प्रो. अनिल, प्रो. सूर्यकांत, प्रो. सत्यव्रत एवं डॉ. अनुराधा, केजीएमयू से प्रो. अनित परिहार, प्रो. मनोज, प्रो. सौरभ, प्रो. सिद्धार्थ एवं प्रो. नितिन, आरएमएलआईएमएस से प्रो. तुषांत तथा कमांड अस्पताल से प्रो. कविता ने अपने विचार साझा किए।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

केजी मेडिकल यूनिवर्सिटी =94 दिन जीवन से संघर्ष के बाद लौटी ज़िंदगी

 



94 दिन  जीवन से संघर्ष के बाद लौटी ज़िंदगी



गिलियन-बैरे सिंड्रोम से अक्टूबर में 10 वर्षीय अज़ान हुआ था पूरी तरह लकवाग्रस्त



आलमबाग के रहने वाले 10 वर्षीय अज़ान ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के आईसीयू में 94 दिनों तक चले कठिन जीवन–संघर्ष के बाद नई ज़िंदगी पाई है। गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जी बी एस ) से पीड़ित अज़ान को 12 अक्टूबर माह में केजीएमयू के सीसीयू-2 आईसीयू में भर्ती कराया गया था। भर्ती के समय वह पूरी तरह पैरालाइज़ था, हालांकि होश में था और उसकी हालत बेहद गंभीर बनी हुई थी।

आईसीयू विभाग के डॉक्टर विपिन सिंह ने बताया कि बच्चे को लगभग तीन महीने तक लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर पर मरीज को मैनेज करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि इस दौरान संक्रमण, बेड सोर और अन्य गंभीर जटिलताओं का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि आईसीयू ड्यूटी केवल इलाज नहीं बल्कि धैर्य, सतर्कता और निरंतर मेहनत की असली परीक्षा होती है।

डॉ. विपिन सिंह के अनुसार, आईसीयू में हड़बड़ी या लापरवाही की कोई जगह नहीं होती। अच्छे परिणाम के लिए हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है। अज़ान के इलाज में सीसीयू-2 की पूरी टीम ने दिन-रात समन्वय के साथ काम किया। इलाज करने वाली टीम में डॉ. विपिन सिंह, डॉ. विनोद और डॉ. मयंक शामिल रहे, जबकि नर्सिंग ऑफिसर निशा और ममता ने निरंतर देखभाल कर अहम भूमिका निभाई।

आईसीयू विभाग की हेड ऑफ डिपार्टमेंट प्रोफेसर मोनिका कोहली के नेतृत्व में पूरी टीम ने संक्रमण और बेड सोर जैसी जटिलताओं से बच्चे को सुरक्षित रखते हुए इलाज जारी रखा, जिसका परिणाम यह रहा कि 94 दिन बाद अज़ान को सुरक्षित डिस्चार्ज किया जा सका।

डॉ. विपिन सिंह ने कहा कि मरीज के स्वस्थ होकर घर लौटने की खुशी आम लोगों को भले ही उतनी महसूस न हो, लेकिन आईसीयू में दिन-रात मेहनत करने वाले डॉक्टरों और स्टाफ के लिए यह पल अपार संतोष और गर्व का होता है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि इतने लंबे समय तक उच्चस्तरीय और निःशुल्क इलाज केवल केजीएमयू जैसे सरकारी संस्थान में ही संभव है। 



 : क्या है गिलियन-बैरे सिंड्रोम 

गिलियन-बैरे सिंड्रोम  एक दुर्लभ लेकिन गंभीर तंत्रिका रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही नसों पर हमला करने लगती है। इससे मांसपेशियों में कमजोरी और कई मामलों में लकवा हो सकता है।



क्यों होता है जी बी एस

यह बीमारी अक्सर वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण, बुखार, दस्त या सांस के संक्रमण के कुछ दिनों या हफ्तों बाद हो सकती है।



मुख्य लक्षण

पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन

पैरों से शुरू होकर हाथों तक कमजोरी

चलने-फिरने में परेशानी

बोलने या निगलने में दिक्कत

गंभीर मामलों में सांस लेने में कठिनाई

पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाना


इलाज

गंभीर मामलों में आईसीयू में भर्ती, वेंटिलेटर सपोर्ट, लगातार निगरानी और बाद में फिजियोथेरेपी की जरूरत होती है। समय पर इलाज से अधिकांश मरीज धीरे-धीरे स्वस्थ हो सकते हैं।

साल दर साल बढ़ता गया साइबर फ्रॉड ऐसे करें बचाव

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 साल दर साल बढ़ता साइबर फ्रॉड: मामलों की रफ्तार भी तेज, नुकसान की रकम ने तोड़े सारे रिकॉर्ड


ऐसे ही करें बचाव

देश में साइबर और बैंकिंग फ्रॉड लगातार बढ़ते जा रहे हैं और उपलब्ध आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को साफ तौर पर उजागर करते हैं। बीते पांच वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे न सिर्फ फ्रॉड के मामलों की संख्या बढ़ी, बल्कि धोखाधड़ी से होने वाला आर्थिक नुकसान भी कई गुना हो गया।

वर्ष 2019-20 को आधार वर्ष माना जाए तो उस समय देश में 73,386 साइबर/बैंकिंग फ्रॉड के मामले दर्ज किए गए थे। इन मामलों में कुल 244.01 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह वह दौर था जब डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग का विस्तार तो हो रहा था, लेकिन साइबर अपराध अभी सीमित दायरे में थे।

2020-21 में मामलों की संख्या लगभग स्थिर रही, लेकिन कुल नुकसान 228.65 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। यानी मामलों में बड़ा बदलाव नहीं हुआ, पर फ्रॉड की प्रकृति अधिक संगठित होने लगी।

वर्ष 2021-22 में फ्रॉड के मामलों की संख्या घटकर 65,893 रह गई, लेकिन इसके बावजूद आर्थिक नुकसान बढ़कर 258.61 करोड़ रुपये हो गया। यह संकेत था कि अपराधी कम मामलों में ज्यादा रकम की ठगी करने लगे थे।

2022-23 में हालात तेजी से बिगड़े। इस साल फ्रॉड के मामले बढ़कर 75,800 हो गए और इससे होने वाला नुकसान सीधे 421.4 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह पहला मौका था जब नुकसान की रकम 400 करोड़ रुपये के पार गई।

सबसे गंभीर स्थिति 2023-24 में देखने को मिली। इस साल साइबर फ्रॉड के मामलों में अचानक विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई और मामलों की संख्या बढ़कर 2,92,800 तक पहुंच गई। इसी अवधि में धोखाधड़ी से होने वाला कुल नुकसान 2,054.6 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग, फर्जी कॉल, ओटीपी और केवाईसी ठगी, सोशल मीडिया लिंक और ऑनलाइन निवेश फ्रॉड इसके प्रमुख कारण हैं। आंकड़े साफ बताते हैं कि जैसे-जैसे डिजिटल लेन-देन बढ़ा, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों की सक्रियता भी कई गुना बढ़ती गई।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते साइबर सुरक्षा, बैंकिंग निगरानी और जन-जागरूकता को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह नुकसान और भी भयावह रूप ले सकता है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

[16/01, 9:55 pm] Kumar Sanjay: साइबर फ्रॉड से बचने के 10 ज़रूरी उपाय

1. ओटीपी और पिन कभी साझा न करें

बैंक, पुलिस या कोई भी सरकारी संस्था कभी भी ओटीपी, एटीएम पिन या यूपीआई पिन फोन पर नहीं मांगती। ऐसा कोई कॉल आए तो तुरंत काट दें।

2. फर्जी कॉल और मैसेज से सावधान रहें

अगर कोई खुद को बैंक अधिकारी, केवाईसी टीम, कूरियर कंपनी या सरकारी अफसर बताकर कॉल करे, तो उसकी बातों पर भरोसा न करें।

👉 अचानक डर या लालच दिखाने वाले कॉल सबसे खतरनाक होते हैं।

3. अनजान लिंक पर क्लिक न करें

एसएमएस, व्हाट्सऐप या ई-मेल में आए इनाम, रिफंड, केवाईसी अपडेट या अकाउंट ब्लॉक जैसे मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक न करें।

4. यूपीआई में “कलेक्ट रिक्वेस्ट” समझकर ही स्वीकार करें

ध्यान रखें—

✔️ पैसा भेजने के लिए पिन डालते हैं

❌ पैसा पाने के लिए पिन नहीं लगता

अगर कोई पैसा भेजने के बहाने पिन डालने को कहे, तो वह फ्रॉड है।

5. मोबाइल में केवल भरोसेमंद ऐप ही डाउनलोड करें

थर्ड पार्टी वेबसाइट या फर्जी लिंक से ऐप डाउनलोड न करें। केवल गूगल प्ले स्टोर या ऐप स्टोर का ही इस्तेमाल करें।

6. सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा न करें

जन्मतिथि, मोबाइल नंबर, बैंक डिटेल, लोकेशन या परिवार से जुड़ी जानकारी सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें।

7. फोन में स्क्रीन लॉक और ऐप लॉक रखें

मोबाइल खो जाने या चोरी होने की स्थिति में आपका डेटा सुरक्षित रहेगा।

8. अकाउंट स्टेटमेंट और अलर्ट नियमित जांचें

बैंक एसएमएस और ई-मेल अलर्ट चालू रखें।

कोई संदिग्ध लेन-देन दिखे तो तुरंत बैंक को सूचना दें।

9. फ्रॉड होते ही तुरंत शिकायत करें

जितनी जल्दी शिकायत, उतनी ज़्यादा रकम बचने की संभावना।

✔️ हेल्पलाइन: 1930

✔️ वेबसाइट: cybercrime.gov.in

10. परिवार को भी जागरूक करें

खासतौर पर बुज़ुर्गों, बच्चों और नए स्मार्टफोन यूज़र्स को साइबर ठगी के तरीकों के बारे में जरूर बताएं।

याद रखें

डर, लालच और जल्दबाज़ी — साइबर ठगों के सबसे बड़े हथियार हैं।

सोच-समझकर कदम उठाएं, तभी आप और आपकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहेगी।

सोमवार, 12 जनवरी 2026

सावधान! मैट्रिमोनियल साइट कहीं न बन जाए आर्थिक तबाही का कारण




सावधान! मैट्रिमोनियल साइट कहीं न बन जाए आर्थिक तबाही का कारण

45 वर्ष से अधिक उम्र के लोग साइबर ठगों के नए निशाने पर


लखनऊ। मैट्रिमोनियल साइट अब रिश्ते ही नहीं, बल्कि साइबर ठगी का नया जाल भी बनती जा रही हैं। साइबर अपराधियों ने 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और बुजुर्गों को निशाना बनाने के लिए बेहद सुनियोजित और खतरनाक तरीका अपनाया है। ठग गिरोह महिलाओं के जरिए मैट्रिमोनियल साइट पर दोस्ती कर भरोसा जीतते हैं और फिर निवेश व मुनाफे का लालच देकर लाखों–करोड़ों रुपये की ठगी कर लेते हैं।

साइबर क्राइम सेल के अनुसार अब तक इस तरह के 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 25 से ज्यादा मामलों में एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। पुलिस ठगी की रकम वापस दिलाने के प्रयास में जुटी है।

ऐसे रचते हैं ठगी का जाल

जांच में सामने आया है कि गिरोह पहले मैट्रिमोनियल साइट पर 45 वर्ष से अधिक उम्र के, अकेले या भावनात्मक रूप से कमजोर लोगों को चिह्नित करता है। महिला प्रोफाइल के जरिए बातचीत शुरू की जाती है। खुद को कभी सामाजिक कार्यकर्ता, कभी निवेश सलाहकार, तो कभी सरकारी योजना से जुड़ा बताकर भरोसा जीता जाता है। इसके बाद ट्रेडिंग, शेयर मार्केट या क्रिप्टो निवेश के नाम पर मोटी रकम लगवाई जाती है।

25 लाख से शुरू हुई ठगी, फिर संपर्क ब्लॉक

गोमतीनगर निवासी एक व्यापारी ने बताया कि अकेलेपन के कारण उन्होंने मैट्रिमोनियल साइट पर एक महिला से संपर्क किया। महिला लगातार फोन कॉल, मैसेज और वीडियो कॉल करती थी। धीरे-धीरे ट्रेडिंग में निवेश के लिए प्रेरित किया। 25 लाख रुपये से अधिक लगाने के बाद कभी टैक्स, कभी प्रोसेसिंग फीस और कभी खाते में रकम फंसने का बहाना बनाकर और पैसे ट्रांसफर कराए गए। जब पीड़ित ने पैसे वापस मांगे तो महिला ने सभी संपर्क ब्लॉक कर दिए।

कुछ पुराने बड़े मामले

इंदिरानगर निवासी इंजीनियर से 15.98 लाख रुपये की ठगी

गोमतीनगर निवासी व्यापारी से 2.54 करोड़ रुपये की ठगी

जानकीपुरम निवासी बुजुर्ग से 28.60 लाख रुपये हड़प लिए गए

कई राज्यों में फैला नेटवर्क

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह कई राज्यों में सक्रिय है। महिलाएं केवल शुरुआती संपर्क के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, जबकि ठगी की रकम अलग-अलग बैंक खातों में तुरंत ट्रांसफर कर दी जाती है, जिससे रकम का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

पुलिस उपायुक्त अपराध व यातायात कमलेश दीक्षित ने बताया कि शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, निवेश ऑफर या मदद की मांग पर तुरंत भरोसा न करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी थाने में दें।

पुलिस का साफ कहना है—सतर्कता ही इस तरह की साइबर ठगी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है।


हर चौथा वयस्क कब्ज से परेशान, बच्चों में भी 29.6 फीसदी मामले

 







कॉन्स्टिपेशन

हर चौथा वयस्क  कब्ज से परेशान, बच्चों में भी 29.6 फीसदी मामले

फास्ट फूड और बिगड़ी जीवनशैली बनी बड़ी वजह


कुमार संजय

देश में कब्ज (कॉन्स्टिपेशन) अब केवल व्यक्तिगत परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रही है। संजय गांधी पीजीआई के पेट रोग विभाग में  आने वाले मरीजों में देखा गया है कि 22 फीसदी यानी लगभग हर चौथा वयस्क कब्ज की समस्या से जूझ रहा है। चिंताजनक तथ्य यह है कि बच्चों में भी कब्ज के मामले तेजी से बढ़े हैं। अध्ययनों में बच्चों में 29.6 फीसदी तक कब्ज की समस्या पाई गई है, यानी लगभग हर तीन में एक बच्चा इससे प्रभावित है।

 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार ने बताया कि बच्चों में बढ़ता फास्ट फूड कल्चर कब्ज का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। तली-भुनी चीजें, चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर और नूडल्स जैसे भोजन फाइबर की कमी पैदा करते हैं, जिससे पाचन तंत्र प्रभावित होता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली, कम पानी पीने की आदत, मोबाइल और स्क्रीन टाइम बढ़ने से शारीरिक गतिविधि में कमी आई है। सुबह स्कूल जाने की जल्दी में बच्चे अक्सर मल त्याग की इच्छा को रोक लेते हैं, जिससे धीरे-धीरे कब्ज की आदत विकसित हो जाती है।



बवासीर और फिशर की जड़ है कब्ज


प्रो. अशोक कुमार के मुताबिक 40 से 60 फीसदी बवासीर के मामलों के पीछे कब्ज प्रमुख कारण होता है। वहीं, कब्ज से बनने वाले एनल फिशर के 10 से 15 फीसदी पुराने मामलों में संक्रमण बढ़कर फिस्टुला का रूप ले सकता है। फिस्टुला का इलाज केवल सर्जरी से ही संभव है, जबकि बवासीर में दवाओं, लेज़र और न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों से राहत मिल जाती है।

इसके अलावा लंबे समय तक कब्ज रहने से पेल्विक फ्लोर को नुकसान, मल असंयम, यूरिन रिटेंशन, स्टरकोरल परफोरेशन (आंत में छेद), रेक्टल प्रोलैप्स और वॉल्वुलस (आंत का मुड़ना) जैसी गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं।


उम्र के साथ बढ़ती है परेशानी


गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अंशुमन एल्हेस ने बताया कि कब्ज की समस्या महिलाओं और बुजुर्गों में अधिक देखी जाती है। विशेष रूप से वृद्ध महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में 2 से 3 गुना तक अधिक पाई जाती है। लंबे समय तक कब्ज बना रहने पर यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।


ऐसे करें कब्ज से बचाव


विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ सरल आदतें अपनाकर कब्ज से काफी हद तक बचा जा सकता है—

रोज़ाना 2–3 लीटर पानी पिएं

भोजन में फाइबर युक्त चीजें शामिल करें

मल त्याग की इच्छा को न रोकें

नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधि करें

तनाव से बचें और तनाव प्रबंधन पर ध्यान दें

शराब और अत्यधिक कैफीन के सेवन से बचें

रोज़ाना तय समय पर शौचालय जाने की आदत डालें

रात का खाना सोने से 2–3 घंटे पहले करें

शनिवार, 10 जनवरी 2026

इनर व्हील क्लब ने रैन बसेरा में मरीज परिजनों को बांटे कंबल

 



इनर व्हील क्लब ने रैन बसेरा में मरीज परिजनों को बांटे कंबल

लखनऊ। एसजीपीजीआईएमएस के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर परिसर स्थित रैन बसेरा में इनर व्हील क्लब के सहयोग से मरीज परिजनों के लिए कंबल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। शीत ऋतु के दौरान राहत पहुंचाने के उद्देश्य से दोपहर 12 बजे लगभग 30 कंबलों का वितरण किया गया। कार्यक्रम में प्रो. आर. हर्षवर्धन (अपर चिकित्सा अधीक्षक, एपेक्स ट्रॉमा सेंटर एवं चिकित्सा अधीक्षक, एसजीपीजीआईएमएस), इनर व्हील क्लब की अध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी सिंह, क्लब सदस्य, संकाय सदस्य व अस्पताल स्टाफ उपस्थित रहे। वक्ताओं ने मरीज परिजनों के कल्याण में सामुदायिक सहभागिता के महत्व पर जोर दिया


पीजीआई परिसर में ईएसआई क्लीनिक स्थापित करने पर निदेशक ने दिया जोर

 

पीजीआई परिसर में ईएसआई क्लीनिक स्थापित करने पर जोर

ईएसआई जागरूकता सत्र में लाभों के कम उपयोग पर जताई गई चिंता

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआईएमएस) में कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ईएसआईएस) के लाभार्थियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। संस्थान के निदेशक डॉ. आर. के. धीमन ने पीजीआई परिसर के भीतर ईएसआई क्लीनिक/डिस्पेंसरी स्थापित करने पर जोर देते हुए कहा कि इससे ईएसआई कार्यकर्ताओं को समय पर उपचार, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और कार्यस्थल पर समग्र कल्याण सुनिश्चित होगा।

यह बात एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग और ईएसआईएस, लखनऊ जोन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के सहयोग से केंद्रीय पुस्तकालय परिसर स्थित एच. जी. खुराना सभागार में आयोजित ईएसआईएस जागरूकता सत्र एवं स्वास्थ्य जांच शिविर के दौरान कही गई। कार्यक्रम का शुभारंभ पुष्पांजलि और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। आयोजन सचिव डॉ. गौरव कुमार झा ने स्वागत उद्बोधन दिया।

उद्घाटन सत्र में लखनऊ जोन के सीएमओ डॉ. राजेश कुमार ने निवारक स्वास्थ्य देखभाल में सामाजिक सुरक्षा की भूमिका पर प्रकाश डाला। एसजीपीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक एवं आयोजन अध्यक्ष डॉ. आर. हर्षवर्धन ने ईएसआई कार्यकर्ताओं की दुर्दशा, जागरूकता की कमी और इसके कारण बढ़ते जेब खर्च पर चिंता जताई। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता ने ईएसआई सेवाओं के अधिकतम उपयोग पर बल दिया।

वैज्ञानिक सत्र में ईएसआईएस योजना के तहत चिकित्सा एवं नकद लाभ, ई-पहचान कार्ड, प्रतिपूर्ति प्रक्रिया और शिकायत निवारण की जानकारी दी गई। पिरामल फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कैशलेस उपचार, मातृत्व लाभ और आश्रित सहायता सहित ईएसआई के व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज की जानकारी दी।

चर्चा में सामने आया कि नियमित वेतन कटौती के बावजूद ईएसआई लाभों का उपयोग सीमित है और लगभग 80 प्रतिशत पात्र कर्मियों के पास ईएसआई कार्ड नहीं हैं। अस्पताल संक्रमण समिति की ओर से डॉ. शालिनी त्रिवेदी द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर स्पष्ट किया गया कि संविदा कर्मचारियों के लिए चिकित्सा लाभ पूरी तरह ईएसआईसी के अंतर्गत हैं। डॉ. अमित प्रकाश और डॉ. सलाम अहमद ने उपचार की प्रक्रिया स्पष्ट की।

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

दुर्लभ मूत्राशय ट्यूमर का दुनिया में पहली बार अल्ट्रा–मिनिमली इनवेसिव ऑपरेशन

 



एसजीपीजीआई मे

दुर्लभ मूत्राशय ट्यूमर का दुनिया में पहली बार अल्ट्रा–मिनिमली इनवेसिव ऑपरेशन



 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान ने रोबोटिक सर्जरी के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज की है। संस्थान के डॉक्टरों ने मूत्राशय के एक अत्यंत दुर्लभ ट्यूमर का अल्ट्रा–मिनिमली इनवेसिव रोबोटिक तकनीक से सफल ऑपरेशन किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की सर्जरी विश्व में पहली बार की गई है।

यह जटिल सर्जरी 60 वर्षीय मरीज पर की गई, जिन्हें पेशाब के दौरान अचानक चक्कर आना, बार-बार बेहोश होना, दिल की धड़कन तेज़ होना, सिरदर्द और अत्यधिक ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसी गंभीर समस्याएं हो रही थीं। जांच में सामने आया कि मरीज को मूत्राशय का ऐसा दुर्लभ ट्यूमर है, जिससे हार्मोन निकलते हैं और यही हार्मोन इन जानलेवा लक्षणों का कारण बन रहे थे।

इस ऑपरेशन का नेतृत्व संस्थान के के यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह ने किया। उनकी टीम में डॉ. संचित रुस्तगी और डॉ स्निग्ध गर्ग शामिल रहे। सर्जरी अत्याधुनिक रोबोटिक सिस्टम की मदद से सीधे मूत्राशय के अंदर से, बिना किसी बड़े चीरे के की गई, जिससे आसपास के अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा नहीं रहा।

प्रो. उदय प्रताप सिंह के अनुसार, सामान्यतः ऐसे ट्यूमर का ऑपरेशन पेट में बड़ा चीरा लगाकर या दूरबीन विधि से किया जाता है, लेकिन रोबोटिक तकनीक से सर्जरी अधिक सुरक्षित, कम दर्द वाली और तेजी से रिकवरी देने वाली साबित हुई।

ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया टीम की भूमिका भी बेहद अहम रही, क्योंकि ट्यूमर को छूते ही मरीज का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत बढ़ जाता था। इस दौरान प्रो.  संजय धीरज, प्रो.  अमित रस्तोगी, डॉ. प्रकाश चंद्र और सीनियर रेज़िडेंट डॉ. शिवेक ने मरीज की स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित रखा।

सर्जरी को सफल बनाने में ऑपरेशन थिएटर टीम का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। रोबोटिक ओटी इंचार्ज मनोज कुमार और सीनियर नर्सिंग ऑफिसर लिजी जोसेफ सहित पूरी टीम ने अहम भूमिका निभाई। इस सफलता से SGPGIMS ने देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी चिकित्सा क्षमता का लोहा मनवाया है।


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

एंटी माइक्रोबियल व टीबी की दवाएं लेने वाले रहें सजग, पेट और त्वचा पर हो सकता है कुप्रभाव

 





 






एंटी माइक्रोबियल व टीबी की दवाएं लेने वाले रहें सजग, पेट और त्वचा पर हो सकता है कुप्रभाव


 


पीजीआई की एडवर्स ड्रग रिएक्शन निगरानी इकाई के शोध में खुलासा


 


 


 


लखनऊ | कुमार संजय


 


इलाज के दौरान दी जाने वाली दवाएं जहां मरीजों को बीमारी से राहत देती हैं, वहीं कई बार यही दवाएं शरीर पर प्रतिकूल असर भी डाल सकती हैं। संजय गांधी स्नातकोत्तर चिकित्सा विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के अस्पताल प्रशासन विभाग की एडवर्स ड्रग रिएक्शन (दवा से होने वाला कुप्रभाव) निगरानी इकाई द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि एंटी माइक्रोबियल, एंटी वायरल, एंटी फंगल, एंटीबायोटिक, टीबी और कैंसर की दवाओं से मरीजों में सबसे अधिक दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। इन दवाओं का असर मुख्य रूप से त्वचा और पेट यानी पाचन तंत्र पर पड़ा है। शोध टीम में शामिल डॉ. शालिनी त्रिवेदी के अनुसार, एंटी माइक्रोबियल, टीबी और कैंसर की दवाएं देते समय मरीजों की करीबी निगरानी (क्लोज मॉनिटरिंग) बेहद जरूरी है, ताकि दुष्प्रभावों की समय रहते पहचान की जा सके और इलाज को सुरक्षित बनाया जा सके। यह शोध वर्ष 2024 (जनवरी से दिसंबर) के दौरान संस्थान की एडवर्स ड्रग रिएक्शन निगरानी इकाई में दर्ज मामलों के विश्लेषण पर आधारित है। अध्ययन में कुल 213 एडवर्स ड्रग रिएक्शन के मामले दर्ज किए गए। इनमें से 155 मामले एसजीपीजीआई के विभिन्न विभागों से सामने आए, जबकि शेष मामले प्रदेश के अन्य चिकित्सा केंद्रों से रिपोर्ट किए गए।


 


 


 


 


 


 युवाओं और पूरूषों के अधिक मामले सामने आए


 


 


 


अध्ययन में यह भी सामने आया कि 20 से 30 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों में दवाओं से होने वाले कुप्रभाव के मामले सबसे अधिक दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण युवाओं में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता है। युवा मरीज दवा लेने के बाद होने वाली परेशानी को तुरंत डॉक्टरों या स्वास्थ्य कर्मियों को बताते हैं, जबकि अधिक आयु वर्ग के लोग कई बार दुष्प्रभाव को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है।कुल मामलों में 53 प्रतिशत पुरुष और 47 प्रतिशत महिलाएं शामिल रहीं।


 


पेट और त्वचा पर अधिक कुप्रभाव


 


विभागवार विश्लेषण में सबसे अधिक एडवर्स ड्रग रिएक्शन गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (पाचन रोग) विभाग से दर्ज किए गए। इसके बाद रेडियोथेरेपी, पल्मोनरी मेडिसिन और न्यूरोलॉजी विभागों का स्थान रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि नसों के जरिए दी जाने वाली दवाओं से कुप्रभाव की आशंका अधिक रहती है। 35 प्रतिशत मामलों में त्वचा और चमड़ी से जुड़ी समस्याएं जैसे रैश, खुजली और एलर्जी सामने आईं, जबकि लगभग 30 प्रतिशत मामलों में पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी परेशानियां जैसे उल्टी, दस्त और पेट दर्द दर्ज किए गए।


 


 


 इन्होंने किया शोध


 


यह शोध “एडवर्स ड्रग रिएक्शन: ए रेट्रोस्पेक्टिव ऑब्जर्वेशनल स्टडी” विषय पर किया गया। शोध दल में प्रो. आर. हर्षवर्धन (चिकित्सा अधीक्षक एवं प्रोफेसर), डॉ. सौरभ सिंह, डॉ. शालिनी त्रिवेदी, डॉ. अमोल जैन, डॉ. वैष्णवी आनंद, डॉ. अक्षिता बंसल और डॉ. अंकित कुमार सिंह शामिल रहे।


 


 


 


दवाओं के दुष्प्रभाव के सामान्य कारण


 


 


 


विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र, वजन, किडनी-लिवर की कार्यक्षमता, पुरानी बीमारियां और एलर्जी को ध्यान में रखे बिना दवा देना दुष्प्रभाव का बड़ा कारण है। भर्ती मरीजों में एक साथ कई दवाएं दिए जाने से जोखिम और बढ़ जाता है। लंबे समय तक दवा लेना, बिना समीक्षा दवा जारी रखना और पहले से ली जा रही दवाओं की जानकारी न देना भी नुकसानदायक हो सकता है।


 


 


 


दवा की निर्धारित खुराक का महत्व


 


 


 


हर दवा की तय खुराक होती है। इससे अधिक खुराक लेने पर उल्टी, चक्कर, सुस्ती, ब्लड प्रेशर गिरना, किडनी या लिवर पर असर जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। भर्ती मरीजों में यदि जांच रिपोर्ट के अनुसार खुराक में बदलाव न किया जाए, तो दवा शरीर में जमा होकर गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है। इसलिए अस्पताल और घर—दोनों जगह खुराक का पालन बेहद जरूरी है।


 


 


 


दवाओं का कांबिनेशन और खतरा


 


 


 


कई मरीज एक साथ कई दवाएं लेते हैं या अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज कराते हैं। इससे दवाओं के बीच प्रतिक्रिया  हो सकती है। भर्ती मरीजों में यह खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि उन्हें इंजेक्शन, एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और अन्य दवाएं एक साथ दी जाती हैं। कुछ दवाएं एक-दूसरे के असर को बढ़ा देती हैं, जिससे ब्लीडिंग, बेहोशी या अचानक ब्लड प्रेशर गिरने जैसी स्थिति बन सकती है।


 


 


 


मरीजों द्वारा होने वाली आम गलतियां


 


 


 


डॉक्टरों के अनुसार दवा समय पर न लेना, बीच में दवा छोड़ देना, खुद से खुराक बदलना, पुरानी बची दवा दोबारा लेना और दूसरों की दवा लेना बड़ी गलतियां हैं। भर्ती मरीजों या उनके परिजनों द्वारा घर से लाई गई दवा बिना बताए लेना भी खतरनाक हो सकता है। आयुर्वेदिक, हर्बल या सप्लीमेंट दवाएं बिना सलाह लेना भी दुष्प्रभाव बढ़ा सकता है।


 


 


 


असामान्य लक्षणों पर सतर्कता जरूरी


 


 


 


यदि दवा लेने के बाद तेज खुजली, सांस लेने में दिक्कत, चेहरे या होंठों में सूजन, अत्यधिक नींद, उलझन, लगातार उल्टी-दस्त, पेशाब कम होना या त्वचा पर चकत्ते दिखें, तो इसे नजरअंदाज न करें। घर पर इलाज कर रहे मरीज तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और भर्ती मरीज बिना देर किए नर्स या डॉक्टर को जानकारी दें।


 


 


 


बचाव के उपाय


 


 


 


डॉक्टर सलाह देते हैं कि दवा हमेशा पर्चे के अनुसार लें, सभी चल रही दवाओं और एलर्जी की जानकारी डॉक्टर को दें, बिना पूछे कोई दवा न लें और दुष्प्रभाव दिखने पर तुरंत बताएं। डिस्चार्ज के समय दवाओं की सूची और खुराक ठीक से समझ लेना भी जरूरी है। सही जानकारी, सतर्कता और निगरानी से घर और अस्पताल—दोनों जगह दवाओं के दुष्प्रभाव से काफी हद तक बचा जा सकता है।

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

60 फीसदी में गंभीर क्षति के बाद पहचान में आती है किडनी बीमारी

 




60 फीसदी में गंभीर क्षति के बाद पहचान में आती है किडनी बीमारी


20 रुपए में चल जाता है किडनी खराबी का पता


 हर 6 महीने पर पेशाब में प्रोटीन की जांच जरूरी




संजय गांधी पीजीआई में आयोजित इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी (आईएसएन) के 54वें वार्षिक सम्मेलन आईएसएनकॉन 2025 में किडनी रोगों की रोकथाम, समय पर पहचान और स्वदेशी तकनीक के विकास पर विशेष जोर दिया गया। सम्मेलन में आयोजित राष्ट्रपति व्याख्यान में विशेषज्ञों ने बताया कि क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) एक साइलेंट बीमारी है, जिसका पता अधिकांश मामलों में समय पर नहीं चल पाता।


 


आयोजक एवं नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि करीब 60 प्रतिशत मामलों में किडनी खराबी का पता तब चलता है, जब किडनी का 60–80 प्रतिशत कार्य पहले ही समाप्त हो चुका होता है। यही कारण है कि सीकेडी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है।सीकेडी की शुरुआती अवस्था में लक्षण न होने के कारण अधिकांश मरीज बीमारी से अनजान रहते हैं। देश में लगभग 19 प्रतिशत किडनी रोग ऐसे हैं, जिनका स्पष्ट कारण पता नहीं चल पाता। सलाह दिया कि हर 6 महीने में पेशाब में प्रोटीन की जांच कराने से शुरुआती दौर में ही खराबी का पता लग जाता है। यह जांच 20 से 50 रुपए में होती है। बीपी और शुगर नियंत्रित रखें।   


 


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स्क्रीनिंग की जरूरत


 


विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि इस स्थिति से निपटने के लिए जनसंख्या स्तर पर नियमित स्क्रीनिंग और मजबूत रोकथाम रणनीतियाँ आवश्यक हैं। विशेष रूप से मधुमेह और उच्च रक्तचाप से ग्रस्त लोगों के लिए अत्यंत जरूरी है।  




 


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राष्ट्रीय किडनी रोग रोकथाम दिवस का प्रस्ताव


 


सम्मेलन में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि हर साल अप्रैल के दूसरे रविवार को ‘राष्ट्रीय किडनी रोग रोकथाम दिवस’ मनाया जाना चाहिए, ताकि लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके। 


 


चिकित्सा शिक्षा में बदलाव की जरूरत


 


प्रो. रवि शंकर कुशवाहा ने कहा कि किडनी रोगों की रोकथाम को प्रभावी बनाने के लिए प्रिवेंटिव नेफ्रोलॉजी का एक संरचित पाठ्यक्रम मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि रोकथाम रोजमर्रा की चिकित्सा प्रक्रिया का हिस्सा बन सके।


 


किडनी प्रत्यारोपण में सुधार पर जोर


 


प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि किडनी प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश में सभी सेंटर को मिलकार 400 प्रत्यारोपण होता है लेकिन ब्रेन डेड दाता से होने वाले प्रत्यारोपण की दर अभी भी कम है। ब्रेन डेड दाता प्रत्यारोपण में 16 प्रतिशत की वृद्धि को सकारात्मक बताते हुए उन्होंने जन जागरूकता, अंगदान प्रणाली और नीतिगत समर्थन को और मजबूत करने की आवश्यकता बताई।


 


नेफ्रोलॉजी में ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान


 


विशेषज्ञों ने नेफ्रोलॉजी क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।पेरिटोनियल डायलिसिस फ्लूइड,हीमोडायलिसिस तकनीक,और डायलिसिस उपकरणों का स्वदेशी विकास और निर्माण देश को आत्मनिर्भर बनाएगा और इलाज को सस्ता व सुलभ करेगा।










गर्भावस्था और प्रसव के दौरान हो सकती है  किडनी इंजरी


 


प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि एक सत्र में गर्भावस्था, प्रसव या प्रसवोत्तर के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव, अनियमित बीपी , सेप्सिस, असुरक्षित गर्भपात और लंबे समय तक कम रक्तचाप की समय पर पहचान न होने पर यह मां के लिए जानलेवा हो सकती है और किडनी को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है। नियमित प्रसवपूर्व जांच, रक्तचाप व पेशाब की निगरानी, सुरक्षित प्रसव, संक्रमण की त्वरित पहचान तथा समय पर विशेषज्ञ उपचार से गर्भावस्था एकेआई की रोकथाम और सफल उपचार संभव है।

पीआरपी थेरेपी से दूर हुआ कंधे का दर्द

 


पीआरपी थेरेपी से दूर हुआ कंधे का दर्द

पीजीआई में दर्द उपचार से फ्रोज़न शोल्डर मरीज को मिली राहत


कई महीनों से कंधे और बांह के असहनीय दर्द से जूझ रहीं देवरिया की 51 वर्षीय  सुमन पांडे को संजय गांधी पीजीआई में आधुनिक दर्द उपचार के बाद बड़ी राहत मिली है। इलाज के बाद न केवल उनका दर्द कम हुआ, बल्कि कंधे की जकड़न भी दूर होने लगी है और हाथ की हरकत में  सुधार आया है।

  यह फ्रोज़न शोल्डर (एडहेसिव कैप्सूलाइटिस) की समस्या से पीड़ित थीं। इस बीमारी में कंधे में तेज़ दर्द होने लगता है और हाथ उठाना या पीछे ले जाना मुश्किल हो जाता है। सामान्य दवाओं और पारंपरिक इलाज से आराम न मिलने पर उन्हें पीजीआई के पेन मैनेजमेंट चिकित्सा क्लिनिक में भर्ती किया गया।

एनेस्थीसिया विभाग के पेन मैनेजमेंट विशेषज्ञ प्रो. सुजीत गौतम और उनकी टीम ने सुमन को पीआरपी (प्लेटलेट रिच प्लाज्मा) थेरेपी दी। यह उपचार शरीर के अपने रक्त से तैयार प्लाज्मा के माध्यम से सूजन कम करने और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत में मदद करता है। इसके साथ कंधे के विशेष व्यायाम भी कराए गए, जिससे मूवमेंट बेहतर हो सके।

इलाज के बाद  दर्द में उल्लेखनीय कमी आई और वे अब रोज़मर्रा के काम पहले की तुलना में कहीं आसानी से कर पा रही हैं। प्रो  सुजीत के अनुसार फ्रोज़न शोल्डर की समस्या डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों में अधिक देखने को मिलती है, हालांकि चोट या लंबे समय तक दर्द बने रहने के बाद भी यह समस्या हो सकती है।

  विशेषज्ञों का कहना है कि दर्द प्रबंधन को केवल अंतिम विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य मरीज की दर्द से राहत, चलने-फिरने की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है।


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यहां ले सकते है सलाह

पेन मैनेजमेंट केयर  क्लिनिक  डी ब्लॉक, ग्राउंड फ्लोर, नवीन ओपीडी में रोजा होती है जहां लंबे समय से चले आ रहे दर्द, फ्रोज़न शोल्डर व अन्य जटिल दर्द का इलाज

होता है।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

ए आइ के जरिए लगेगा कितना सफल होगा किडनी प्रत्यारोपण






 आईएसएनकॉन 2025:


 ए आइ  के जरिए लगेगा कितना सफल होगा किडनी प्रत्यारोपण 


पीजीआई तैयार कर रहा है एआई आधारित सिस्टम




संजय गांधी पीजीआई में आयोजित इंडियन सोसायटी आफ नेफ्रोलॉजी के वार्षिक अधिवेशन ( आईएसएनकॉन 2025)  में विशेषज्ञों ने बताया कि   आर्टिफिशियल इंटीलेजेंस ( एआई) अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में तेजी से अपनी उपयोगिता साबित होगी। एआई तकनीक की मदद से प्रत्यारोपण प्रक्रिया को अधिक सटीक, सुरक्षित और दीर्घकालिक रूप से सफल बनाया जा सकता है।


 


नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नरायान प्रसाद ने बताया कि विभाग एआई आधारित सिस्टम तैयार कर रहा है जिससे  बड़ी मात्रा में मरीजों के क्लिनिकल डेटा, लैब रिपोर्ट, इमेजिंग, रक्त समूह और ऊतक संगतता (एचएलए मैचिंग) का विश्लेषण करेंगे।  इसके आधार पर यह अनुमान लगाया जाएगा किस दाता का अंग किस मरीज के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा। इससे प्रत्यारोपण की सफलता दर बढ़ती है और अंगों की अनावश्यक बर्बादी कम होती है।


 

प्रत्यारोपण के बाद है ए आई की हम भूमिका 



प्रत्यारोपण के बाद एआई की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मरीज की रक्त और पेशाब जांच, क्रिएटिनिन स्तर, इम्यूनोलॉजिकल मार्कर और संक्रमण संकेतों का निरंतर विश्लेषण कर एआई अंग अस्वीकृति (रीजेक्शन) या जटिलताओं के शुरुआती संकेत पहचान सकता है। इससे डॉक्टर समय रहते इलाज में बदलाव कर पाते हैं और गंभीर स्थिति से बचाव संभव होता है।


 


एआई तकनीक इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं की खुराक को व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार तय करने में भी मदद करती है। प्रत्येक मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली अलग होती है और एआई डेटा आधारित विश्लेषण से दवा की सही मात्रा तय की जा सकती है, जिससे दुष्प्रभाव कम होते हैं और अंग लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।


 ऑर्गन वेटिंग होगी सरल


भारत जैसे देश में, जहां अंगों की उपलब्धता सीमित और प्रतीक्षा सूची लंबी है, एआई अंग आवंटन प्रणाली को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और वैज्ञानिक बना सकता है। यह तकनीक मरीज की गंभीरता, प्रतीक्षा अवधि और चिकित्सीय प्राथमिकताओं का संतुलित आकलन करती है।


 


जहर और जहरीले जीव के काटने से किडनी हो सकती है प्रभावित


प्रो. नरायण प्रसाद के मुताबिक ज़हर  और जहर देने वाले जीवों के डंक या काटने से एक्यूट किडनी इंजरी (एकेआई) एक गंभीर समस्या बन सकती है। विष, कीट या सांप के विष किडनी की नलिकाओं और रक्त प्रवाह को प्रभावित कर तीव्र किडनी फेल्योर का कारण बनते हैं। इसके परिणामस्वरूप पेशाब कम होना, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और जीवन-धमकाने वाली जटिलताएं हो सकती हैं। इलाज में तुरंत विष नियंत्रण, हाइड्रेशन, इलेक्ट्रोलाइट संतुलन और जरूरत पड़ने पर डायलिसिस शामिल है। समय पर पहचान और उचित उपचार से जटिलताओं को कम किया जा सकता है।