पहली तिमाही में ही मिल सकता है गर्भकालीन मधुमेह का संकेत, एसजीपीजीआई के शोध में खुलासा
गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है, लेकिन अब इसकी पहचान पहले ही महीनों में संभव हो सकती है। संजय गांधी पीजीआई के एम आर एच विभाग चिकित्सा विज्ञानियों के एक ताजा शोध में सामने आया है कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में खून की एक विशेष जांच के जरिए भविष्य में होने वाले इस रोग का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह मेटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ विभाग की प्रो इंदु लता साहू, मॉलिक्युलर मेडिसिन विभाग के डॉ कृष्ण कांत और डॉ प्रभाकर मिश्रा
की टीम द्वारा किए गए इस अध्ययन में 120 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। शोध के दौरान 7 से 13 सप्ताह के बीच महिलाओं के खून में ‘ग्लाइकोसाइलेटेड फाइब्रोनेक्टिन’ नामक प्रोटीन का स्तर जांचा गया। बाद में 24 से 28 सप्ताह के बीच सामान्य ग्लूकोज टेस्ट (ओजीटीटी) से यह पता लगाया गया कि किन महिलाओं को मधुमेह हुआ।
अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं को आगे चलकर जेस्टेशनल डायबिटीज हुई, उनमें गर्भावस्था की शुरुआत में ही इस प्रोटीन का स्तर सामान्य महिलाओं की तुलना में कम था। शोध के अनुसार यह जांच करीब 72 प्रतिशत तक सटीक संकेत देती है, जो शुरुआती स्क्रीनिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
डॉक्टरों के मुताबिक, जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण बच्चे का वजन अधिक होना, प्रसव के दौरान जटिलताएं, समय से पहले डिलीवरी और मां में उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में यदि पहली तिमाही में ही जोखिम का पता चल जाए तो खानपान, नियमित जांच और जीवनशैली में बदलाव कर इन खतरों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अध्ययन हाल में ही जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित हुआ है।
बॉक्स: कितनी महिलाओं में होती है यह समस्या
भारत में लगभग 10 से 20 फीसदी गर्भवती महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज पाई जाती है
शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा और अधिक हो सकता है
मोटापा, पारिवारिक इतिहास और उम्र बढ़ने से खतरा बढ़ता है।
बॉक्स: क्या हो सकते हैं नुकसान
मां के लिए:
उच्च रक्तचाप (प्रीक्लेम्पसिया)
ऑपरेशन (सी-सेक्शन) की संभावना बढ़ना
आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का खतरा
बच्चे के लिए:
जन्म के समय अधिक वजन (मैक्रोसोनिया)
प्रसव के दौरान चोट या जटिलता
समय से पहले जन्म
जन्म के बाद शुगर कम होना (हाइपोग्लाइसीमिया)
समय रहते पहचान और नियंत्रण से इन जोखिमों को काफी हद तक टाला जा सकता है।
























