रविवार, 2 अगस्त 2026

एक साल बाद मिली सही नजर, नई तकनीक से बिगड़ा चेहरा भी हुआ ठीक

 




एक साल बाद मिली सही नजर, नई तकनीक से बिगड़ा चेहरा भी हुआ ठीक


पीजीआइ में प्रदेश की पहली नेविगेशन-गाइडेड ऑर्बिटल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी


लखनऊ


 गोरखपुर निवासी 30 वर्षीय युवक एक वर्ष पहले सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया था। हादसे में उसके चेहरे और आंख के आसपास की हड्डी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। इसके कारण उसे हर चीज दो-दो दिखाई देती थी, चेहरा असमान नजर आने लगा था और सामान्य कामकाज करना भी मुश्किल हो गया था। एक साल तक इन परेशानियों से जूझने के बाद संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने नई तकनीक की मदद से उसकी आंख की हड्डी का सफल पुनर्निर्माण कर न सिर्फ उसकी सही नजर लौटाई, बल्कि चेहरे की विकृति भी ठीक कर दी।

यह उत्तर प्रदेश की पहली इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन-गाइडेड सेकेंडरी ऑर्बिटल वॉल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी है, जिसमें पेशेंट-स्पेसिफिक इम्प्लांट (पीएसआई) और ओ-आर्म इमेजिंग तकनीक का संयुक्त उपयोग किया गया। 

विशेषज्ञों ने बताया कि पुरानी चोट के कारण हड्डियां जुड़ चुकी थीं और चेहरे की सामान्य बनावट बदल गई थी, इसलिए यह ऑपरेशन डॉक्टरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।

एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के डा. भरत शुक्ला ने बताया कि मरीज एक वर्ष पहले गोरखपुर में हुए सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ था। दुर्घटना के बाद आंख की हड्डी में आई विकृति के कारण उसे लगातार दोहरा दिखाई देता था और चेहरे की बनावट भी बिगड़ गई थी। चोट के कारण  ऊतकों में बदलाव आ जाता है और शरीर की सामान्य संरचना पहचानना कठिन हो जाता है। ऐसे में ऑपरेशन के दौरान थोड़ी-सी भी चूक मरीज की दृष्टि और चेहरे की बनावट पर स्थायी असर डाल सकती है।

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दौरान कंप्यूटर आधारित इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन तकनीक से मरीज की सीटी स्कैन रिपोर्ट का रियल-टाइम मिलान किया गया। इसके आधार पर मरीज की थ्री-डी इमेजिंग से तैयार पेशेंट-स्पेसिफिक इम्प्लांट को बिल्कुल सही स्थान पर लगाया गया। सर्जरी पूरी होने से पहले ओ-आर्म इमेजिंग के जरिए इम्प्लांट की स्थिति की तत्काल जांच की गई, जिससे पुनर्निर्माण की सफलता की पुष्टि हो गई और भविष्य में दोबारा सुधारात्मक सर्जरी की जरूरत की संभावना भी काफी कम हो गई। निदेशक  प्रो. आर. के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग से प्रदेश के मरीजों को अब जटिल चेहरे की चोटों का बेहतर इलाज अपने ही राज्य में मिल सकेगा।



बॉक्स :


 क्या है इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन तकनीक


इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन एक कंप्यूटर आधारित अत्याधुनिक सर्जिकल तकनीक है, जिसे ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के लिए जीपीएस की तरह काम करने वाली प्रणाली माना जाता है। इसमें मरीज के सीटी स्कैन की त्रि-आयामी तस्वीरों का ऑपरेशन के दौरान वास्तविक शारीरिक संरचना से मिलान किया जाता है। इससे सर्जन को हड्डी और आसपास के महत्वपूर्ण हिस्सों की सटीक स्थिति रियल-टाइम में दिखाई देती है। यही वजह है कि इम्प्लांट बिल्कुल सही स्थान पर लगाया जा सकता है और ऑपरेशन अधिक सुरक्षित व सटीक होता है।


बॉक्स : ऑपरेशन करने वाली टीम


ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के मुख्य सर्जन डा भरत शुक्ला, 

डा. कुलदीप विश्वकर्मा

रेजिडेंट सर्जिकल टीम

डा. दीक्षा

डा. शशांक

डा. अभिजीत

डा. अपूर्वा

एनेस्थीसिया विभाग से

डा. रफ़त शमीम

डा. वंश

डा. निखिल

डा. शारिया

नर्सिंग ऑफिसर

आइरीन

दीक्षा

मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान;




 मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान;


 भारतीय अंगदान दिवस पर हजरतगंज चौराहे से निकली वॉकाथॉन, 


 लखनऊ



 मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान, जिंदगी के बाद भी, जीवन का विस्तार और अंगदान–जीवनदान, जीवनदान–महादान जैसे संदेशों के साथ भारतीय अंगदान दिवस के अवसर पर रविवार सुबह हजरतगंज चौराहे से अंगदान जागरूकता वॉकाथॉन निकाली गई। उत्तर प्रदेश राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो-यूपी) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के अस्पताल प्रशासन विभाग की ओर से आयोजित वॉकाथॉन हजरतगंज चौराहे से शुरू होकर एलन सॉली स्टोर तक गई और वापस हजरतगंज चौराहे पर संपन्न हुई। करीब 1.6 किलोमीटर लंबी इस वॉकाथॉन में 300 से अधिक लोगों ने भाग लेकर अंगदान के प्रति जागरूकता का संदेश दिया। वॉकाथॉन को पीजीआइ के कार्यवाहक निदेशक प्रो. शालीन कुमार, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के विशिष्ट सचिव धीरेंद्र सिंह सचान, चिकित्सा शिक्षा विभाग की अपर निदेशक नीलम , नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद तथा सोटो-यूपी के संयुक्त निदेशक एवं अस्पताल प्रशासन विभागाध्यक्ष प्रो. आर. हर्षवर्धन ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान प्रतिभागियों ने अंगदान के प्रतीक हरे रिबन की मानव शृंखला बनाई। कार्यक्रम में अंगदान संदेश वाली टी-शर्ट और कैप वितरित की गईं तथा सेल्फी बूथ भी आकर्षण का केंद्र रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि वर्ष 2024 में देश में 18,911 अंग प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किए गए, जिनमें 3,403 प्रत्यारोपण मृत अंगदाताओं से प्राप्त अंगों द्वारा हुए। इसके साथ ही भारत कुल अंग प्रत्यारोपण की संख्या के आधार पर विश्व में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। वहीं, नोट्टो पोर्टल पर 4.5 लाख से अधिक नागरिक अंगदान का संकल्प ले चुके हैं। वॉकाथॉन में आलम्बन ट्रस्ट एसोसिएट्स, स्पर्श, स्पष्ट सोच फाउंडेशन, लायंस क्लब, इनर व्हील, स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर (एसएचएसआरसी), चिकित्सा छात्रों, स्वास्थ्यकर्मियों और आम नागरिकों ने भाग लिया। आयोजन को सफल बनाने में डा. क्रिस अग्रवाल, डा. अभिषेक सिंह, डा. अक्षिता बंसल, डा. दीक्षा दुबे, डा. एकता यादव, डा. अर्पिता तिवारी, नीलिमा दीक्षित और भोलेश्वर पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अलावा कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार, महामंत्री सीमा शुक्ला , मुख्य सेनेटरी इंस्पेक्टर ओम प्रकाश सिंह सहित संस्थान के अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी वॉकाथॉन में शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने अंगदान–जीवन संजीवनी अभियान को जन-जन तक पहुंचाने तथा मृत्यु के बाद अंगदान का संकल्प लेने का आह्वान किया।


 बॉक्स-1 


ब्रेन डेड मरीजों के सिर्फ 10 प्रतिशत अंगदान से 40 से 50 हजार लोगों की बच सकती है जान : प्रो. नारायण प्रसाद


 देश में करीब दो लाख मरीज अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि ब्रेन स्टेम डेथ के मामलों में केवल 10 प्रतिशत परिजन भी अंगदान के लिए सहमत हो जाएं तो उत्तर प्रदेश के 40 से 50 हजार मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि ब्रेन स्टेम डेथ के बाद व्यक्ति दोबारा जीवित नहीं हो सकता, लेकिन उसके अंग कई लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं।


 बॉक्स-2 


हर छह मिनट में एक मरीज गंवा रहा जान, अंगदान ही सबसे बड़ा समाधान : प्रो. आर. हर्षवर्धन


 भारत में हर वर्ष करीब पांच लाख लोगों की मौत अंग विफल होने से होती है। उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में ब्रेन स्टेम डेथ के हजारों मामलों में यदि समय पर अंगदान हो जाए तो करीब 32 हजार किडनी और 16 हजार लीवर प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि अंगदान मानवता और सामाजिक उत्तरदायित्व का सबसे बड़ा प्रतीक है तथा लोगों को अपने परिवार के साथ अंगदान की इच्छा साझा करनी चाहिए। 


बॉक्स 3


 एक व्यक्ति के अंगदान से आठ लोगों को मिल सकता है जीवन एक व्यक्ति के अंगदान से आठ लोगों को नया जीवन मिल सकता है, जबकि ऊतक दान से 75 लोगों के जीवन में उल्लेखनीय सुधार संभव है। इसके बावजूद प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध अंगों की संख्या आवश्यकता की तुलना में काफी कम है। भारत में हर वर्ष लगभग दो लाख मरीज लीवर फेलियर या लीवर कैंसर के कारण जान गंवाते हैं, जबकि केवल करीब 1,500 लीवर प्रत्यारोपण हो पाते हैं। इसी प्रकार 25 से 30 हजार हृदय प्रत्यारोपण की आवश्यकता के मुकाबले हर वर्ष केवल 10 से 15 हृदय प्रत्यारोपण ही किए जा रहा है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

अपने ही वाल्व से बदला जा सकता है खराब एओर्टिक वाल्व

 




अपने ही वाल्व से बदला जा सकता है खराब एओर्टिक वाल्व



पीजीआइ के सीवीटीएस विभाग के 39वें स्थापना दिवस 


 जन्मजात या गंभीर एओर्टिक वाल्व रोग से पीड़ित बच्चों और युवाओं के लिए रॉस ऑपरेशन एक प्रभावी हृदय सर्जरी तकनीक है। इसमें मरीज के खराब एओर्टिक वाल्व को हटाकर उसकी जगह उसी का स्वस्थ पल्मोनरी वाल्व लगाया जाता है। इसके बाद पल्मोनरी वाल्व की जगह उपलब्धता के अनुसार मृत अंगदाता से प्राप्त जैविक वाल्व (होमोग्राफ्ट) या जैविक कृत्रिम (बायोप्रोस्थेटिक) वाल्व प्रत्यारोपित किया जाता है। यह तकनीक बच्चों में लंबे समय तक बेहतर परिणाम देती है।

इसी तकनीक समेत एओर्टिक रूट एनलार्जमेंट और एओर्टिक रूट रिप्लेसमेंट जैसी जटिल सर्जरी प्रक्रियाओं पर संजय गांधी पीजीआई के कार्डियोवैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग के 39वें स्थापना दिवस पर आयोजित  वैज्ञानिक संगोष्ठी एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दी । विभागाध्यक्ष प्रो. एस.के. अग्रवाल और प्रो शांतनु पांडे

ने कहा कि इन जटिल सर्जरी के लिए हृदय की संरचना की गहरी समझ और उच्च स्तरीय सर्जिकल कौशल आवश्यक है।  प्रशिक्षण कार्यक्रम आधुनिक तकनीकों को मरीजों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. अतनु साहा (नारायणा हृदयालय, कोलकाता) और डॉ. मोहम्मद इदरीस (सिम्स हॉस्पिटल, चेन्नई) ने कार्यशाला में इन प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया। विशेषज्ञों ने मिनिमली इनवेसिव वाल्व सर्जरी, ट्रांसकैथेटर वाल्व तकनीकों तथा बच्चों में वाल्व रिपेयर पर भी चर्चा की। बताया गया कि छोटे चीरे वाली सर्जरी और कैथेटर आधारित तकनीकों से मरीज जल्दी स्वस्थ होते हैं, जबकि बच्चों में जहां संभव हो, वाल्व बदलने के बजाय उसकी मरम्मत को प्राथमिकता दी जाती है।

 प्रो. प्रसन्ना सिम्हा ने प्रो. पी.के. घोष स्मृति व्याख्यान दिया। डॉ. राकेश नायक ने मिनिमली इनवेसिव माइट्रल वाल्व सर्जरी, डॉ. बुद्धादित्य चक्रवर्ती ने असफल टीएवीआई के बाद वाल्व प्रत्यारोपण, डॉ. प्रदीप नारायण ने टीएवीआर के जोखिम तथा डॉ. रविंदर सिंह राव ने ट्रांसकैथेटर माइट्रल वाल्व उपचार पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एम्स नई दिल्ली के सीवीटीएस विभागाध्यक्ष एवं आईएसीटीएस के अध्यक्ष प्रो. वी. देवगुरु रहे। समारोह में विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. पी.के. मित्तल को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड तथा विभाग के पूर्व छात्र डॉ. ललित कपूर को आउटस्टैंडिंग एलुमनाई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।


थायरॉयड बचाने की नई तकनीक विकसित, अब जीवनभर दवा खाने की मजबूरी से मिल सकती है राहत

 




थायरॉयड बचाने की नई तकनीक विकसित, अब जीवनभर दवा खाने की मजबूरी से मिल सकती है राहत 


पीजीआइ में डामा तकनीक से सात मरीजों का सफल इलाज, एक ही ऑपरेशन में दोनों ओर की सौम्य गांठों का उपचार


 


थायरॉयड की सर्जरी के बाद जीवनभर हार्मोन और कई मरीजों में कैल्शियम की दवा लेने की मजबूरी अब कम हो सकती है। संजय गांधी पीजीआइ के एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के प्रो. सबारेत्नम मयिलवगनन के नेतृत्व में डायरेक्ट एक्सेस माइक्रोवेव एब्लेशन (डामा) नामक नई हाइब्रिड तकनीक विकसित की गई है। इस तकनीक में थायरॉयड का स्वस्थ हिस्सा सुरक्षित रहेगा। मरीज की प्राकृतिक थायरॉयड कार्यक्षमता बनी रहेगी। जीवनभर हार्मोन रिप्लेसमेंट व कैल्शियम की दवा लेने की जरूरत से यथासंभव बचाया जा सकेगा। यह तकनीक उन मरीजों में कारगर है जिनके थायरॉयड के दोनों हिस्सों में सौम्य (बेनाइन) गांठें होती हैं। अब तक सात चयनित मरीजों पर इसका सफल उपयोग किया गया है। सभी ऑपरेशन तकनीकी और चिकित्सकीय रूप से सफल रहे तथा किसी भी मरीज में कोई बड़ी जटिलता सामने नहीं आई। ऑपरेशन के बाद सभी मरीजों की थायरॉयड कार्यक्षमता सामान्य रही और उपचारित गांठों के आकार में शुरुआती कमी भी दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, पहले ऐसे मरीजों में अक्सर पूरा थायरॉयड निकालना पड़ता था। इससे रोग तो ठीक हो जाता था, लेकिन मरीज को जीवनभर थायरॉयड हार्मोन की दवा लेनी पड़ती थी। कई मामलों में पैराथायरॉयड ग्रंथियां प्रभावित होने से कैल्शियम की कमी हो जाती थी और लंबे समय तक कैल्शियम की दवा भी लेनी पड़ती थी। इसके अलावा आवाज की नस को नुकसान पहुंचने और अन्य शल्य जटिलताओं का खतरा भी बना रहता था।


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क्या है तकनीक डामा तकनीक में जिस हिस्से में बड़ी या ऑपरेशन योग्य गांठ होती है, उसे सर्जरी से हटाया जाता है, जबकि दूसरी ओर की सौम्य गांठ को उसी ऑपरेशन के दौरान माइक्रोवेव एब्लेशन से नष्ट कर दिया जाता है। प्रो. सबारेत्नम ने बताया कि इस प्रक्रिया में थायरॉयड तक सीधी पहुंच मिलने से माइक्रोवेव प्रोब को अत्यंत सटीक स्थान पर लगाया जा सकता है। इससे आवाज की नस, श्वासनली, अन्ननली और प्रमुख रक्त वाहिकाओं जैसी महत्वपूर्ण संरचनाओं की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होती है। उनका कहना है कि प्रारंभिक परिणाम उत्साहजनक हैं, हालांकि तकनीक की दीर्घकालिक प्रभावशीलता के लिए मरीजों का नियमित फॉलो-अप जारी है। 



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इनकी भी रही भूमिका डामा तकनीक के विकास में सहायक प्रोफेसर डा. रजनी के. साह, डा. जगन्नाथ स्पंदना तथा रेजिडेंट डा. नम्रता मस्कारा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


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: डामा तकनीक के प्रमुख फायदे एक ही ऑपरेशन में दोनों ओर की सौम्य थायरॉयड गांठों का इलाज। थायरॉयड का स्वस्थ हिस्सा सुरक्षित रखने का प्रयास। हार्मोन और कैल्शियम की दवा पर निर्भरता कम होने की संभावना। दोबारा बड़ी सर्जरी की जरूरत घट सकती है। महत्वपूर्ण नसों और आसपास के अंगों की बेहतर सुरक्षा।



मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा को सेवानिवृत्ति पर भावभीनी विदाई





 मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा को सेवानिवृत्ति पर भावभीनी विदाई

23 वर्षों तक महामंत्री रहते हुए संगठन को दिए उल्लेखनीय योगदान के लिए किया गया सम्मानित

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के रेडियोलॉजी विभाग में शनिवार को मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा के सेवानिवृत्ति अवसर पर भावभीना विदाई एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। समारोह में उनके 23 वर्षों तक महामंत्री के रूप में संगठन के प्रति दिए गए उल्लेखनीय योगदान को याद करते हुए उन्हें सम्मानित किया गया।

मेडिटेक एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि सरोज वर्मा ने अपने लंबे कार्यकाल में कर्मचारियों के हितों की रक्षा, संगठन को मजबूत बनाने और विभिन्न मुद्दों के समाधान के लिए सदैव सक्रिय एवं सकारात्मक भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व, समर्पण और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता ने मेडिटेक एसोसिएशन को नई पहचान दिलाई। वक्ताओं ने कहा कि उनका योगदान संगठन के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेगा।

इस अवसर पर मेडिटेक एसोसिएशन की ओर से उन्हें स्मृति चिह्न एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। साथ ही उनके स्वस्थ, सुखद एवं सक्रिय सेवानिवृत्त जीवन की कामना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी गईं।

कार्यक्रम में मेडिटेक एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह, महामंत्री राकेश कुमार निगम, संयुक्त मंत्री कौशल कुमार, कोषाध्यक्ष धीरज सिंह सहित संगठन के सभी पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे। सभी ने सरोज वर्मा के साथ बिताए वर्षों को याद करते हुए उनके सरल, मिलनसार और कर्मठ व्यक्तित्व की सराहना की तथा कहा कि संगठन के प्रति उनकी सेवाओं को हमेशा सम्मान के साथ याद रखा जाएगा। समारोह का समापन सभी सदस्यों द्वारा उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने और सामूहिक रूप से उनके सुखद भविष्य की कामना के साथ हुआ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

स्टेंट लगने के दो माह बाद टूटी कूल्हे की हड्डी, एसजीपीजीआई में सफल ऑपरेशन

 






स्टेंट लगने के दो माह बाद टूटी कूल्हे की हड्डी, एसजीपीजीआई में सफल ऑपरेशन


खून पतला करने की दवा के कारण सर्जरी थी बेहद चुनौतीपूर्ण, तीन विभागों के तालमेल से बची मरीज की जान


लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के डॉक्टरों ने हाल ही में हृदय में स्टेंट लगवाने वाले एक बुजुर्ग मरीज की टूटी कूल्हे (हिप) की हड्डी का सफल ऑपरेशन किया है। मरीज को दो महीने पहले हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद हृदय की बंद धमनियों को खोलने के लिए दो ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट लगाए गए थे। स्टेंट लगाने के बाद मरीज खून को पतला रखने वाली दवाएं (ड्यूल एंटीप्लेटलेट थेरेपी) ले रहे थे। ऐसे में ऑपरेशन के दौरान ज्यादा रक्तस्राव का खतरा था, जबकि दवाएं बंद करने पर स्टेंट में खून का थक्का बनने और दोबारा हार्ट अटैक आने का जोखिम था। इसी वजह से यह सर्जरी डॉक्टरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण थी।


डॉक्टरों के मुताबिक, बुजुर्गों में हिप फ्रैक्चर होने पर जल्द ऑपरेशन करना जरूरी होता है। सर्जरी में देरी से निमोनिया, बेड सोर, नसों में खून का थक्का बनने और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।


मरीज की उम्र और अन्य बीमारियों को देखते हुए ऑर्थोपेडिक्स, कार्डियोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने संयुक्त रणनीति बनाई। ऑपरेशन के दौरान अल्ट्रासाउंड की मदद से विशेष प्रकार का कंटीन्यूअस स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया गया, जिससे पूरी सर्जरी के दौरान रक्तचाप और हृदय की कार्यप्रणाली स्थिर रही। इसके बाद डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक कूल्हे की हड्डी का ऑपरेशन कर दिया।


ऑपरेशन के तीन सप्ताह बाद मरीज सहारे से चलने लगे हैं और अपने अधिकांश दैनिक कार्य स्वयं करने लगे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि समय पर सर्जरी, आधुनिक तकनीक और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय से यह जटिल ऑपरेशन सफल हो सका। उन्होंने कहा कि इस तरह के हाई-रिस्क मरीजों का इलाज केवल अत्याधुनिक सुविधाओं वाले सुपर स्पेशियलिटी संस्थानों में ही कराया जाना चाहिए।




टीम

मुख्य सर्जन: डॉ. पुलक शर्मा, अतिरिक्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, अस्थिरोग विभाग

एनेस्थीसिया टीम प्रमुख: डॉ. वंशप्रिया

ऑर्थोपेडिक टीम: डॉ. फुरकान, डॉ. सुजीत, डॉ. अभिषेक और डॉ. विकास



स्टेंट क्यों लगाया गया था


मरीज को दो माह पहले गंभीर हार्ट अटैक आया था।

जांच में हृदय की धमनियों में रुकावट मिली।

धमनियों में रक्त प्रवाह बहाल करने के लिए दो ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट लगाए गए।

स्टेंट के बाद उन्हें खून पतला रखने वाली दवाएं लगातार दी जा रही थीं, जिससे हिप की सर्जरी और अधिक जोखिम भरी हो गई।

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

पीजीआई में निकला अंडाशय का ट्यूमर और 35 वर्षीय युवती में बचाई प्रजनन क्षमता







 पेट फूलने की वजह निकला अंडाशय का विशाल ट्यूमर


35 वर्षीय युवती  में सफल सर्जरी कर बचाई प्रजनन क्षमता 



अंडाशय में 29 सेंटीमीटर का ट्यूमर और ट्यूमर के अंदर से निकला 7.5 लीटर तरल पदार्थ




पेट फूलना, भारीपन और सांस लेने में तकलीफ को सामान्य समस्या समझ रही प्रयागराज कि रहने वाली 35 वर्षीय एक अविवाहित युवती के पेट में 29 सेंटीमीटर का विशाल अंडाशय ट्यूमर विकसित हो चुका था। संजय गांधी पीजीआइ के डाक्टरों ने जटिल सर्जरी कर न केवल ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाल दिया, बल्कि मरीज की भविष्य की प्रजनन क्षमता को ध्यान में रखते हुए उसका गर्भाशय और स्वस्थ दाहिना अंडाशय भी सुरक्षित रखा। ट्यूमर के भीतर से करीब 7.5 लीटर तरल पदार्थ निकाला गया।

कई महीनों से युवती को पेट फूलने, पेट में भारीपन और सांस लेने में कठिनाई हो रही थी। जब परेशानी बढ़ी तो वह पीजीआइ पहुंची। जांच में पता चला कि उसके बाएं अंडाशय में 28.7×20.4×15.8 सेंटीमीटर का विशाल ट्यूमर बन गया है। इसका आकार लगभग 9 महीने की गर्भावस्था जितना था। ट्यूमर इतना बड़ा हो चुका था कि वह मूत्राशय और आंतों पर दबाव डाल रहा था, जिससे चलने-फिरने और सामान्य काम करने में भी दिक्कत होने लगी थी।


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ऑपरेशन के दौरान बदली उपचार की दिशा



सर्जरी के दौरान डॉक्टरों को दाहिने अंडाशय में भी 6.5×3.8×6.5 सेंटीमीटर की एक सिस्ट मिली। ऑपरेशन के बीच ही ट्यूमर का फ्रोजन सेक्शन परीक्षण कराया गया। रिपोर्ट में ट्यूमर सौम्य (बेनाइन) निकला। इसके बाद डॉक्टरों ने केवल प्रभावित बाएं अंडाशय का ट्यूमर हटाया और दाहिना अंडाशय तथा गर्भाशय सुरक्षित रखने का फैसला किया। इससे भविष्य में मरीज के मां बनने की संभावना बरकरार रही।


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विशेषज्ञों की टीम ने निभाई अहम भूमिका



इस जटिल सर्जरी का नेतृत्व सामान्य अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. निधि सिंह ने किया। टीम में डा. अंजू रानी, डा. मोनिका और डा. शिखा शामिल रहीं। एनेस्थीसिया की जिम्मेदारी डा. निधि ने संभाली। पैथोलॉजी जांच में डा. ऋतु वर्मा और डा. राम नवल राव का महत्वपूर्ण योगदान रहा। नर्सिंग टीम में दिव्या, सोनाली, वंदना और बीरभान वर्मा शामिल रहे।


लक्षणों को हल्के में न लें



डा. निधि सिंह ने बताया कि अंडाशय के ट्यूमर शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देते और धीरे-धीरे काफी बड़े हो सकते हैं। लगातार पेट फूलना, पेट में असामान्य भारीपन, जल्दी पेट भरना, पेट का लगातार बढ़ना, पेशाब या मल त्याग में परेशानी तथा सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण लगातार बने रहने पर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेकर जांच करानी चाहिए।


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मां बनने की संभावना भी बचाई

इस सर्जरी की सबसे बड़ी सफलता केवल 29 सेंटीमीटर का विशाल ट्यूमर निकालना नहीं रही, बल्कि डॉक्टरों ने मरीज की उम्र और भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसका गर्भाशय और स्वस्थ दाहिना अंडाशय सुरक्षित रखा। इससे मरीज की भविष्य में प्राकृतिक रूप से मां बनने की संभावना बनी हुई है।

बुधवार, 29 जुलाई 2026

गुरु पूर्णिमा पर नवागत प्रधानाचार्य ने गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व बताया

 

गुरु पूर्णिमा पर नवागत प्रधानाचार्य ने गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व बताया


लखनऊ।  केंद्रीय विद्यालय, संजय गांधी पीजीआई परिसर में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ गुरु वंदना से हुआ। इस अवसर पर संकल्पित रचना के माध्यम से गुरु की महिमा का गुणगान किया गया।

विद्यालय के नवागत प्रधानाचार्य  ए.के. पाठक ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए सनातन संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कारों तथा वैदिक शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाले ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के आधार हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने गुरुजनों का सम्मान करने, अनुशासन का पालन करने तथा भारतीय संस्कृति और संस्कारों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

उपप्रधानाचार्य डॉ. कौशलेंद्र सिंह ने भी विद्यार्थियों को गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आदर का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गुरु के मार्गदर्शन से ही व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास संभव है।

कार्यक्रम में शिक्षक शोएब इस्लाम, दिव्या मिश्रा, किरण कुमारी, नौशीन सिद्दीकी, ज्योति मिश्रा एवं मोहम्मद नसरुद्दीन सहित विद्यालय परिवार के अन्य सदस्य उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने गुरु पूर्णिमा के महत्व को समझते हुए अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

100 गर्भवती महिलाओं में दो हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित

 




विश्व हेपेटाइटिस दिवस आज :

 हर 100 गर्भवती महिलाओं में दो हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित


 हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के संयुक्त शोध में खुलास


आज विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर वायरल हेपेटाइटिस के प्रति जागरूकता बढ़ाने, समय पर जांच और उपचार पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी बीच उत्तर प्रदेश से सामने आए एक महत्वपूर्ण शोध ने गर्भवती महिलाओं में हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी संक्रमण की स्थिति स्पष्ट की है। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), संजय गांधी पीजीआई (एसजीपीजीआई), राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीएचसीपी) और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों के संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच संक्रमण की पहचान और मां से नवजात में बीमारी के प्रसार को रोकने में बेहद महत्वपूर्ण है।

 लखनऊ जिले की सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में प्रसवपूर्व जांच (एएनसी) के लिए आने वाली 2,005 गर्भवती महिलाओं मैं हेपेटाइटिस स्क्रीनिंग की गई तो तो देखा गया कि

अध्ययन में शामिल 2,005 गर्भवती महिलाओं में से 37 महिलाएं हेपेटाइटिस-बी (एचबीवी) से संक्रमित पाई गईं। संक्रमण दर 1.85 प्रतिशत रही। यानी लगभग हर 100 गर्भवती महिलाओं में दो महिलाएं हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित मिलीं। शोधकर्ताओं के अनुसार यदि ऐसी महिलाओं की समय पर पहचान हो जाए और नवजात को जन्म के 24 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस-बी का टीका तथा आवश्यकता पड़ने पर हेपेटाइटिस-बी इम्युनोग्लोब्युलिन (एचबीआईजी) दिया जाए तो मां से बच्चे में संक्रमण का खतरा काफी कम किया जा सकता है

शोध में छह महिलाएं हेपेटाइटिस-सी (एचसीवी) से संक्रमित पाई गईं। संक्रमण दर 0.31 प्रतिशत रही। विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस-सी का शुरुआती चरण में पता चलने पर प्रभावी इलाज संभव है, इसलिए गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग का विशेष महत्व है।

समय पर जांच और टीकाकरण सबसे प्रभावी उपाय

एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रो. अमित गोयल ने कहा कि हेपेटाइटिस-बी और सी लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में रह सकते हैं। इसलिए समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है। गर्भवती महिलाओं की नियमित स्क्रीनिंग से संक्रमण की जल्द पहचान होती है और उचित उपचार के साथ नवजात के समय पर टीकाकरण से मां से बच्चे में संक्रमण को काफी हद तक रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए प्रभावी टीका उपलब्ध है, जबकि हेपेटाइटिस-सी का समय पर उपचार संभव है। जागरूकता, नियमित जांच और टीकाकरण ही इस बीमारी पर नियंत्रण की सबसे प्रभावी रणनीति है।

इन्होंने किया शोध 

 "सीरोप्रिवेलेंस एंड डिटरमिनेंट्स ऑफ हेपेटाइटिस-बी वायरस एंड हेपेटाइटिस-सी वायरस इंफेक्शन अमंग प्रेग्नेंट वुमेन इन नॉर्थ इंडिया : ए क्रॉस-सेक्शनल स्टडी" है। इसके प्रमुख लेखकों में डा. अभिषेक यादव, डा. मोनिका अग्रवाल, डा. विकासेंदु अग्रवाल, प्रो अमिता जैन, प्रो. सुमित रुंगटा, प्रो. प्रभाकर मिश्रा और प्रो. अमित गोयल सहित 13 विशेषज्ञ शामिल हैं। शोध को 

 अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल क्यूरियस ने स्वीकार किया है।


सोमवार, 27 जुलाई 2026

North India's First Successful Haplo-Identical Bone Marrow Transplant for Child with X-ALD at SGPGIMS

 



North India's First Successful Haplo-Identical Bone Marrow Transplant for Child with X-ALD at SGPGIMS

Five-year-old boy from Basti gets a new lease of life; father donates stem cells

Lucknow:

Doctors at Sanjay Gandhi Postgraduate Institute of Medical Sciences (SGPGIMS), Lucknow, have successfully performed North India's first haplo-identical bone marrow (stem cell) transplant for a five-year-old boy suffering from the rare genetic disorder X-linked Adrenoleukodystrophy (X-ALD). The institute said this is the first successful transplant of its kind for this disease in North India.

The child, a resident of Basti district, received stem cells from his father, who became the donor after being found to be a 50% tissue (HLA) match. Doctors said the successful procedure means that patients from North India with this condition may no longer need to travel to southern states for treatment.

According to Prof. Sayan Sinha Roy from the Department of Clinical Hematology, the child was first evaluated by Prof. Deepti Saxena from the Department of Medical Genetics, where X-ALD was confirmed through genetic testing. After detailed counselling and consent from the family, the haplo-identical bone marrow transplant was performed on January 19, 2026. Six months after the transplant, the child's follow-up reports are normal.

Prof. Roy said that hematopoietic stem cell transplantation (HSCT) is currently the only treatment that can stop the progression of X-ALD if performed at an early stage of the disease. Early diagnosis and timely transplant are crucial for better outcomes.

The transplant was carried out under the leadership of Prof. Rajesh Kashyap, Head of the Department of Clinical Hematology. The transplant team included Prof. Sayan Sinha Roy, Dr. Louis, and Dr. Chandrachud, while Prof. Deepti Saxena played a key role in diagnosis and treatment planning. The procedure was performed under the National Programme for Rare Diseases.

Senior Technical Officer Manoj Kumar Singh also played a vital role by collecting stem cells from the father, checking their quality and quantity, and ensuring the technical processes required for the transplant were completed successfully.

What is X-ALD?

X-linked Adrenoleukodystrophy (X-ALD) is a rare inherited disorder caused by a mutation in the ABCD1 gene. The disease damages the protective myelin covering of nerve cells, affecting the brain and nervous system. It mainly affects boys.

What is a Haplo-Identical Transplant?

A haplo-identical transplant is performed when the donor and patient share about 50% HLA (tissue) match. If a fully matched donor is unavailable, a parent, sibling, or child can serve as the donor. In this case, the boy's father successfully donated stem cells.

पीजीआई -दिल के वाल्व की बीमारी के इलाज में पीजीआई की बड़ी सफलता

 



दिल के वाल्व की बीमारी के इलाज में पीजीआई की बड़ी सफलता

पहली बार मरीज के हृदय वाल्व की जीवित कोशिकाएं लैब में विकसित, नई दवाओं और कृत्रिम हार्ट वाल्व के विकास को मिलेगी नई दिशा

 लखनऊ।

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के वैज्ञानिकों ने दिल के वाल्व की बीमारी के इलाज की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने पहली बार मरीज के हृदय वाल्व से प्राप्त जीवित कोशिकाओं को प्रयोगशाला (लैब) में सफलतापूर्वक विकसित किया है। इस सफलता से भविष्य में ऐसी नई दवाएं विकसित करने का रास्ता खुलेगा, जो हृदय वाल्व को खराब होने से रोक सकें। साथ ही मरीज की अपनी कोशिकाओं से कृत्रिम (बायोइंजीनियर्ड) हार्ट वाल्व तैयार करने की दिशा में भी यह शोध मील का पत्थर साबित हो सकता है।

यह शोध एसजीपीजीआई के सीवीटीएस विभाग के हृदय शल्य चिकित्सक प्रो. शांतनु पांडे, विभागाध्यक्ष एवं हृदय शल्य चिकित्सक प्रो. सुरेंद्र कुमार अग्रवाल, क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल, डॉ. मोहित के. राय, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग के डॉ. आलोक कुमार, चरण साई रामिरेड्डी, अंजलि सिंह तथा डॉ. विनीता अग्रवाल ने संयुक्त रूप से किया। शोध के दौरान हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी कराने वाले मरीजों के क्षतिग्रस्त वाल्व से जीवित कोशिकाएं अलग कर उन्हें विशेष तकनीक से प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक विकसित किया गया।

अध्ययन में यह भी पता चला कि हृदय वाल्व में लगातार बनी रहने वाली सूजन (इन्फ्लेमेशन) और फाइब्रोसिस यानी ऊतकों का सख्त होना वाल्व के खराब होने का प्रमुख कारण है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस प्रक्रिया को शुरुआती चरण में प्रभावी दवाओं से नियंत्रित किया जा सके तो कई मरीजों में हार्ट वाल्व बदलने जैसी बड़ी सर्जरी की आवश्यकता टाली जा सकती है। यही नहीं, अब इन विकसित कोशिकाओं पर नई दवाओं का परीक्षण भी अधिक सटीक और सुरक्षित तरीके से किया जा सकेगा।

यह अध्ययन भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सहयोग से किया गया है। इसके निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकैमिस्ट्री में प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिए गए हैं। संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई देते हुए कहा कि यह शोध हृदय वाल्व रोगों के उपचार में नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा। इससे भविष्य में मरीजों को अधिक प्रभावी, सुरक्षित और व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। साथ ही रीजेनेरेटिव मेडिसिन और टिश्यू इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा।

बॉक्स : मरीजों को होंगे ये बड़े फायदे

-हृदय वाल्व खराब होने की प्रक्रिया को शुरुआती स्तर पर समझा जा सकेगा।

-वाल्व को नुकसान से बचाने वाली नई दवाओं के विकास में तेजी आएगी।

-कई मरीजों में हार्ट वाल्व बदलने की सर्जरी की जरूरत टल सकती है।

-भविष्य में मरीज की अपनी कोशिकाओं से कृत्रिम हार्ट वाल्व विकसित करने की संभावना मजबूत होगी।

-नई दवाओं का परीक्षण अधिक सटीक और विश्वसनीय तरीके से किया जा सकेगा।

बॉक्स : शोध की प्रमुख उपलब्धियां

-पहली बार मानव हृदय वाल्व की जीवित कोशिकाओं का सफल लैब कल्चर तैयार।

-नई दवाओं के परीक्षण के लिए विश्वसनीय जैविक मॉडल विकसित।

-वाल्व में सूजन और फाइब्रोसिस की प्रक्रिया को समझने में मिली महत्वपूर्ण जानकारी।

-रीजेनेरेटिव हार्ट वाल्व थेरेपी और भविष्य के कृत्रिम हार्ट वाल्व निर्माण की दिशा में मजबूत आधार तैयार।

SGPGI Achieves Major Breakthrough in Heart Valve Disease Research



SGPGI Achieves Major Breakthrough in Heart Valve Disease Research

Scientists Successfully Grow Living Human Heart Valve Cells in Laboratory for the First Time

Lucknow:

Scientists at Sanjay Gandhi Postgraduate Institute of Medical Sciences (SGPGI), Lucknow, have achieved a major breakthrough in the treatment of heart valve disease. For the first time, researchers have successfully grown living cells from a patient's heart valve in the laboratory. This achievement is expected to help develop new medicines that can prevent heart valves from getting damaged. It may also pave the way for creating artificial heart valves using a patient's own cells in the future.

The research was carried out jointly by Prof. Shantanu Pandey, Prof. Surendra Kumar Agrawal, Prof. Vikas Agrawal, Dr. Mohit K. Rai, Dr. Alok Kumar, Charan Sai Ramireddy, Anjali Singh, and Dr. Vinita Agrawal. The team collected living cells from damaged heart valves removed during valve replacement surgeries and successfully cultured them in the laboratory.

The study found that continuous inflammation and fibrosis (hardening of tissues) are the main reasons behind heart valve damage. Researchers believe that if these changes can be controlled with medicines at an early stage, many patients may avoid heart valve replacement surgery. The cultured cells will also provide a reliable model for testing new drugs before they are used in patients.

The study was supported by the Department of Biotechnology (DBT), Government of India. Its findings have been accepted for publication in the Journal of Physiology and Biochemistry.

SGPGI Director Prof. R. K. Dhiman congratulated the research team and said that this achievement opens new possibilities for the treatment of heart valve diseases. He added that the study could lead to more effective and personalized treatment for patients while also supporting future advances in regenerative medicine and tissue engineering.

Key Benefits for Patients

Better understanding of how heart valves become damaged.

Faster development of new medicines to prevent valve disease.

Possibility of reducing the need for heart valve replacement surgery.

Future potential to develop artificial heart valves using a patient's own cells.

A reliable laboratory model for testing new drugs.

Major Highlights of the Study

First successful laboratory culture of living human heart valve cells.

A reliable model for testing new heart valve medicines.

Better understanding of inflammation and fibrosis in heart valve disease.

Strong foundation for regenerative heart valve therapy and future bioengineered heart valves.

रविवार, 26 जुलाई 2026

एसजीपीजीआई में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट, पिता बने जीवनदाता*







उत्तर भारत में पहली बार एक्स-एएलडी से पीड़ित बच्चे का हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफल


बस्ती के पांच वर्षीय बालक को एसजीपीजीआई में मिला नया जीवन, पिता बने स्टेम सेल डोनर


दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ नहीं जाना पड़ेगा उत्तर भारत के मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए 


 लखनऊ


 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के चिकित्सकों ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी (एक्स-एएलडी) से पीड़ित बस्ती के पांच वर्षीय बालक का सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो (स्टेम सेल) ट्रांसप्लांट कर उत्तर भारत में नई उपलब्धि हासिल की है। संस्थान का दावा है कि उत्तर भारत में इस बीमारी के लिए यह अपनी तरह का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इस जटिल उपचार में बच्चे के पिता स्टेम सेल डोनर बने और बेटे को नया जीवन देने में अहम भूमिका निभाई।

क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग के प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि बच्चा दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल विकार एक्स-एएलडी से पीड़ित था। उसके पिता इलाज के लिए मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रो. दीप्ति सक्सेना के पास पहुंचे थे। जांच में बीमारी की पुष्टि होने के बाद मरीज को क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग भेजा गया। परिजनों को बीमारी और उपचार की पूरी जानकारी देने तथा सहमति मिलने के बाद 19 जनवरी 2026 को हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। 6 महीने के फ़ॉलोअप के बाद सारी जांच रिपोर्ट सामान्य आ गई है। 

प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि एक्स-एएलडी जैसी बीमारी में हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (एचएससीटी) ही वर्तमान में ऐसा उपचार है, जो बीमारी की प्रगति को रोक सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी का पता शुरुआती अवस्था में चल जाए और समय रहते ट्रांसप्लांट किया जाए। इस तरह के मरीजों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए अब उत्तर भारत के मरीजों को दक्षिणी राज्यों में नहीं जाना पड़ेगा।



 यह रही ट्रांसप्लांट टीम


विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश कश्यप के नेतृत्व में यह ट्रांसप्लांट मुख्य कंसल्टेंट प्रो. सायन सिन्हा रॉय, रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. लुइस और डॉ. चंद्रचूड़ की टीम ने किया। मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के  प्रो. दीप्ति सक्सेना की उपचार प्रक्रिया में अहम योगदान दिया। यह ट्रांसप्लांट राष्ट्रीय दुर्लभ रोग कार्यक्रम (नेशनल प्रोग्राम फॉर रेयर डिजीज़) के तहत किया गया।


 


टेक्नोलॉजिस्ट की भी होती है  अहम भूमिका


 सीनियर टेक्निकल ऑफिसर मनोज कुमार सिंह की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने पिता से स्टेम सेल संग्रह (हार्वेस्टिंग), स्टेम सेल की संख्या और गुणवत्ता की जांच तथा प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक तकनीकी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण स्टेम सेल उपलब्ध कराना बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता का अहम आधार होता है।


 


 क्या है एक्स-एएलडी


एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी  एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है। इसमें एबीसीडी1 जीन में गड़बड़ी के कारण मस्तिष्क और तंत्रिकाओं की सुरक्षा करने वाली माइलिन परत क्षतिग्रस्त होने लगती है।

यह बीमारी मुख्य रूप से लड़कों में होती है


 

 क्या है हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट


इसमें मरीज और डोनर का एचएलए (टिश्यू मैच) लगभग 50 प्रतिशत मिलता है।


जब पूरी तरह मैच करने वाला डोनर नहीं मिलता, तब माता-पिता, भाई या बहन डोनर बन सकते हैं।

इस मामले में बच्चे के पिता 50 प्रतिशत एचएलए मैच होने के कारण स्टेम सेल डोनर बने।

 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

हेड एवं नेक कैंसर की जांच अब होगी और सटीक, एसजीपीजीआई में अत्याधुनिक एंडोस्कोपी लैब शुरू









 हेड एवं नेक कैंसर की जांच अब होगी और सटीक, एसजीपीजीआई में अत्याधुनिक एंडोस्कोपी लैब शुरू

विश्व हेड एवं नेक कैंसर दिवस पर उद्घाटन, हर माह 500 से 600 मरीजों को मिलेगा लाभ

 विश्व हेड एवं नेक कैंसर दिवस के अवसर पर शनिवार को संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के हेड एवं नेक सर्जरी विभाग में कैंसर मरीजों के लिए प्रदेश के किसी सरकारी चिकित्सा संस्थान की पहली अत्याधुनिक ओपीडी एंडोस्कोपी प्रयोगशाला का उद्घाटन किया गया। संस्थान के डीन प्रो. शालीन कुमार, सीएमएस प्रो. देवेंद्र गुप्ता तथा हेड एवं नेक सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अमित केशरी ने प्रयोगशाला का शुभारंभ किया।

प्रो. अमित केशरी ने बताया कि प्रयोगशाला में स्ट्रोबोस्कोप, नैरो बैंड इमेजिंग (एनबीआई) और फ्लेक्सिबल लैरिंगोफैरिंगोस्कोपी जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं। इनकी मदद से गले, स्वरयंत्र और हेड एवं नेक कैंसर की शुरुआती अवस्था में ही सटीक पहचान हो सकेगी। ओपीडी में ही आधुनिक जांच, आवश्यक एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं और उपचार के बाद नियमित निगरानी की सुविधा मिलने से मरीजों को तेजी से बेहतर इलाज उपलब्ध होगा। उन्होंने बताया कि विभाग की ओपीडी में हर माह 500 से 600 मरीज आते हैं, जबकि प्रतिमाह 35 मेजर और 10 माइनर सर्जरी की जाती हैं।

संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि हेड एवं नेक कैंसर में समय पर जांच और बहुविषयक उपचार से बेहतर परिणाम मिलते हैं। कार्यक्रम में प्रो. इंदु शुक्ला ने समय पर जांच और नियमित फॉलोअप के महत्व पर जोर दिया। वहीं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रो. अंकुर भटनागर ने कैंसर सर्जरी के बाद पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी) की भूमिका पर जानकारी दी।

'स्पंदन : कैंसर, उपचार और उससे आगे' विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कैंसर को मात दे चुके मरीजों को गुलाब का फूल देकर सम्मानित किया गया। 'वॉयसेज़ ऑफ होप' सत्र में कैंसर विजेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। हेड एवं नेक सर्जरी, रेडियोथेरेपी, प्लास्टिक सर्जरी और मनोरोग विभाग के विशेषज्ञों ने समग्र उपचार एवं पुनर्वास पर जानकारी दी। डाइटिशियन ने उपचार के दौरान संतुलित आहार की आवश्यकता बताई और अंत में मरीजों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया।

छह साल की बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी, एसजीपीजीआई ने रचा इतिहास





छह साल की बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी, एसजीपीजीआई ने रचा इतिहास

देश में पहली बार इतनी कम उम्र की बच्ची का रोबोटिक ऑपरेशन, गर्दन पर नहीं रहेगा निशान, दोबारा बीमारी होने की संभावना भी बेहद कम


भारत में पहली बार छह वर्षीय बच्ची की सफल रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी।

दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम से किया गया ऑपरेशन।

गर्दन पर नहीं रहेगा कोई निशान, रिकवरी भी होगी तेज।

ऑपरेशन वाली तरफ बीमारी दोबारा होने की संभावना लगभग नगण्य।

करीब ₹95 हजार में हुआ ऑपरेशन, वयस्कों में इसी सर्जरी पर सामान्यतः ₹3 से ₹4 लाख तक खर्च।

लखनऊ।

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग ने छह वर्ष की बच्ची की सफल रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी कर चिकित्सा क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है। संस्थान के अनुसार भारत में पहली बार इतनी कम उम्र के बच्चे के थायरॉयड ट्यूमर का सफल ऑपरेशन दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम की मदद से किया गया है। विश्व स्तर पर इससे कम उम्र की केवल दक्षिण कोरिया की पांच वर्षीय बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी का रिकॉर्ड दर्ज है।

बच्ची के थायरॉयड में गांठ थी। सामान्य सर्जरी में गर्दन पर चीरा लगाना पड़ता है, लेकिन इस बार बगल (ट्रांस-एक्सिलरी) के रास्ते रोबोटिक तकनीक से ट्यूमर निकाला गया। इससे गर्दन पर कोई निशान नहीं रहेगा। रोबोटिक तकनीक से सर्जन को शरीर के अंदर का हिस्सा अधिक स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे ऑपरेशन अधिक सटीक और सुरक्षित ढंग से किया जा सका। बच्ची तेजी से स्वस्थ हो रही है।

एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) ज्ञान चंद ने बताया कि छह वर्ष की बच्ची में इस तरह की सर्जरी करना चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि छोटे बच्चों में विशेष योजना और तकनीकी बदलावों की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि रोबोटिक सर्जरी में स्वर को नियंत्रित करने वाली नसों और पैराथायरॉयड ग्रंथियों को सुरक्षित रखने की संभावना अधिक रहती है। साथ ही जिस तरफ ऑपरेशन किया गया है, उस तरफ भविष्य में बीमारी दोबारा होने की संभावना लगभग नगण्य रहती है।

उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन पर लगभग ₹95 हजार का खर्च आया, जबकि वयस्क मरीजों में इसी तरह की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी पर सामान्यतः ₹3 से ₹4 लाख तक खर्च आता है। दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम एसजीपीजीआई के अलावा डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएल) और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में भी उपलब्ध है, लेकिन इतनी कम उम्र के बच्चे में इस तकनीक का सफल उपयोग पहली बार हुआ है।

इस सर्जरी का नेतृत्व प्रो. (डॉ.) ज्ञान चंद ने किया। टीम में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिनेल मैस्करेनहास और डॉ. प्राची कृष्णात्रेय, सीनियर रेजिडेंट डॉ. मिथलेश वांचू एवं डॉ. अजरा तस्नीम शामिल रहे। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. सुजीत गौतम ने किया। नर्सिंग टीम के मनोज, वंदना, लिजी, नीलम तथा ऑपरेशन थिएटर की पूरी टीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. (डॉ.) आर. के. धीमन तथा एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) गौरव अग्रवाल ने पूरी टीम को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता देश में उन्नत रोबोटिक एवं बाल शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़ती विशेषज्ञता का प्रमाण है और भविष्य में कम उम्र के बच्चों के इलाज के नए रास्ते खोलेगी।


एसआरएस तकनीक से होगा मस्तिष्क ट्यूमर का सटीक इलाज

 



एसआरएस तकनीक से होगा मस्तिष्क ट्यूमर का  सटीक इलाज


 रेडियोसर्जरी प्रक्रिया, बिना चीरा लगाए हाई-प्रिसिजन रेडिएशन से उपचार

लखनऊ। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ ने कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अस्पताल की रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग की विशेषज्ञ डॉ. गीता सिंह एवं उनकी टीम ने अत्याधुनिक स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी (एसआरएस) प्रक्रिया एक मरीज में सफलतापूर्वक संपन्न की। यह कैंसर उपचार की सबसे उन्नत और अत्यधिक सटीक रेडिएशन तकनीकों में शामिल है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से चयनित मस्तिष्क ट्यूमर और अन्य इंट्राक्रैनियल रोगों के इलाज में किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, एसआरएस में बिना किसी चीरे के अत्यधिक सटीकता के साथ ट्यूमर पर उच्च क्षमता की रेडिएशन किरणें केंद्रित की जाती हैं। इससे आसपास के स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है, उपचार अधिक प्रभावी होता है और मरीज को अपेक्षाकृत कम समय में सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिलती है। यह तकनीक जटिल मामलों में भी सुरक्षित और प्रभावी उपचार का विकल्प मानी जाती है।

यह उपलब्धि अस्पताल के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. साकेत पांडेय के कुशल मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में संभव हुई। रेडिएशन ऑन्कोलॉजी टीम की विशेषज्ञता, सूक्ष्म उपचार योजना और उत्कृष्ट समन्वय ने इस जटिल प्रक्रिया को सफल बनाया।

डॉ. गीता सिंह ने कहा कि उनका उद्देश्य लखनऊ और आसपास के मरीजों को विश्वस्तरीय, आधुनिक और सटीक कैंसर उपचार अपने ही शहर में उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मरीज के लिए सही उपचार, संवेदनशील देखभाल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनकी टीम की प्राथमिकता है।

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के प्रबंधक परमीत ने कहा कि अस्पताल आधुनिक तकनीक और अनुभवी विशेषज्ञों के माध्यम से मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि एसआरएस जैसी अत्याधुनिक तकनीक की उपलब्धता से अब प्रदेश के मरीजों को उन्नत कैंसर उपचार के लिए दूसरे महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

एशिया के प्रतिष्ठित कैंसर मंच पर डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता को बड़ी जिम्मेदारी

 






एशिया के प्रतिष्ठित कैंसर मंच पर डॉ. प्रमोद गुप्ता को बड़ी जिम्मेदारी


 एफएआरओ की पब्लिक रिलेशंस कमेटी के सदस्य बने, भारत से केवल दो विशेषज्ञों में शामिल


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई) के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर एवं डीन डॉ. प्रमोद कुमार कुमार गुप्ता को फेडरेशन ऑफ एशियन ऑर्गेनाइजेशंस फॉर रेडिएशन ऑन्कोलॉजी (एफ ए आर ओ) की पब्लिक रिलेशंस कमेटी का सदस्य नामित किया गया है। एशिया के इस प्रतिष्ठित मंच पर उनका चयन संस्थान, उत्तर प्रदेश और देश के लिए गौरव की बात माना जा रहा है।

एफएआरओ एशिया में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र का प्रमुख संगठन है, जिसमें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, सिंगापुर, मलेशिया सहित कई देशों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इस बार पब्लिक रिलेशंस कमेटी में भारत से केवल दो विशेषज्ञों को सदस्य बनाया गया है। इनमें कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता और एम्स भोपाल के डॉ. सैकत दास शामिल हैं।

डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में लंबे समय से कैंसर उपचार, शोध और शिक्षण कार्य से जुड़े हैं। उनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए कार्यों को देखते हुए एफ ए आर ओ ने उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। उनके चयन से संस्थान की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होगी तथा एशियाई देशों के विशेषज्ञों के साथ वैज्ञानिक सहयोग और अनुभवों के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा मिलेगा।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम एल भट्ट ने डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह संस्थान के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने विश्वास जताया कि डॉ. गुप्ता अपनी नई जिम्मेदारी का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए भारतीय रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की विशेषज्ञता को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाएंगे।

डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता ने कहा कि एफआरओ की पब्लिक रिलेशंस कमेटी का सदस्य बनाया जाना उनके लिए सम्मान की बात है। वह इस जिम्मेदारी का पूरी निष्ठा से निर्वहन करते हुए कैंसर उपचार और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे।

इलाज में 70 प्रतिशत तक मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका



 इलाज में 70 प्रतिशत तक मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका


 मेडिकल लैब प्रोफेशनल वीक-2026 के समापन पर विजेताओं का सम्मान, गुणवत्ता और शोध को बढ़ावा देने पर जोर




संजय गांधी पीजीआइ में आयोजित मेडिकल लैब प्रोफेशनल वीक-2026 के समापन समारोह में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में मरीजों के इलाज में मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका लगभग 70 प्रतिशत तक है। अधिकांश चिकित्सीय निर्णय जांच रिपोर्ट के आधार पर लिए जाते हैं। ऐसे में टेक्नोलॉजिस्ट गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी हैं। संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. आर हर्षवर्धन ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल्स को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पेशेवर पहचान मजबूत करने के लिए संगठित होकर आगे आना होगा। उन्होंने शोध, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक गतिविधियों और पेशेवर संस्थाओं से जुड़ने पर जोर देते हुए कहा कि गुणवत्ता आधारित कार्यशैली ही इस क्षेत्र को नई पहचान दिला सकती है। डीन प्रो. शालीन कुमार ने कहा कि केवल जांच करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्ता सुनिश्चित करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने प्लान-डू-स्टडी-एक्ट मॉडल अपनाकर कार्यप्रणाली में निरंतर सुधार, शोध और वैज्ञानिक प्रकाशनों को बढ़ावा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अपनी उपलब्धियों को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि गुणवत्ता संवर्धन प्रत्येक प्रोफेशनल की कार्यशैली का हिस्सा होना चाहिए। इस अवसर पर एसजीपीजीआई कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला सहित अन्य वक्ताओं ने मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मरीजों के सही निदान, समय पर उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में लैब प्रोफेशनल्स का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। समारोह में सप्ताहभर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया। टेक्नोलॉजिस्ट श्वेता चौरसिया, आयुष शुक्ला, मनु सिंह और मनीष, जबकि बैडमिंटन प्रतियोगिता में पिंकी, दिनेश प्रसाद तिवारी, प्रशांत, नंदिनी यादव, सुभाष, पियूष यादव, आशीष सिंह, विनीत और अंशिका को पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह में संस्थान के फैकल्टी सदस्य, मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट, छात्र और कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सौ रूपए में पता लगता है पैराथायरायड हारमोन असंतुलल का पता

 

पैराथायरॉयड जागरूकता माह: समय पर जांच से हड्डियों और किडनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है


सौ रूपए में पता लगता है पैराथायरायड हारमोन असंतुलल का पता



पैराथायरॉयड शरीर की चार छोटी ग्रंथियां होती हैं, जो पैराथायरॉयड हार्मोन (पीटीएच) बनाकर शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का संतुलन बनाए रखती हैं। इन ग्रंथियों में गड़बड़ी होने पर हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, बार-बार किडनी में पथरी बन सकती है, मांसपेशियों में दर्द, अत्यधिक थकान, याददाश्त में कमी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। यह बीमारी लगभग 1 से 7 प्रति 1,000 वयस्कों में पाई जाती है। स 90 फीसदी मरीजों की पहचान तब होती है, जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। विश्व पैराथायरायड जागरूकता माह के मौके पर संजय गांधी पीजीआई के इंडो सर्जरी विभाग के  प्रो. ज्ञान चंद के मुताबिक किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हड्डियों में दर्द, बार-बार फ्रैक्चर, बार-बार किडनी स्टोन, लगातार कमजोरी है तो   रक्त में कैल्शियम की जांच करानी चाहिए जो सौ रूपए में कही भी हो ताजी है।  स्तर बढ़ा या घटा है तो ले तो पैराथायरॉयड हरमोन की जांच अवश्य करानी चाहिए। समय पर पहचान होने पर अधिकांश मरीजों का सफल इलाज दवा या आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी से किया जा सकता है।


 


एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर प्रो. एम. सब्बारत्नम ने कहा कि समय पर उपचार से हड्डियों, किडनी और हृदय पर पड़ने वाले गंभीर दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। आधुनिक मिनिमली इनवेसिव पैराथायरॉयड सर्जरी के माध्यम से अधिकांश मरीज तेजी से स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।


 


विशेषज्ञों ने लोगों से संतुलित आहार, पर्याप्त विटामिन-डी, नियमित स्वास्थ्य जांच तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार कैल्शियम की निगरानी कराने की अपील की। उनका कहना है कि पैराथायरॉयड जागरूकता माह का उद्देश्य लोगों को इस कम चर्चित लेकिन गंभीर बीमारी के लक्षणों, जांच और उपचार के बारे में जागरूक बनाना है, ताकि समय पर इलाज से जटिलताओं को रोका जा सके।




कितना होना चाहिए कैल्शियम





 


 रक्त में कुल कैल्शियम


 


8.5 से 10.5 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर होना चाहिए। यदि कुल कैल्शियम 10.5  से अधिक हो, तो इसे हाइपरकैल्सीमिया माना जाता है और ऐसे मामलों में पैराथायरॉयड हार्मोन  सहित अन्य जांच की सलाह दी जा सकती है। कम है तो हाइपो कैल्सीमिय  की परेशानी हो सकती है। 


 


आयनाइज्ड कैल्शियम :


 


4.5–5.3 एमजी प्रति डेली  के बीच होना चाहिए

यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

 




यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा और साक्ष्य आधारित नीति निर्माण पर रहेगा फोकस, पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप होगा तैयार



उत्तर प्रदेश में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर-उत्तर प्रदेश (एसएचएसआरसी-यूपी) का पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसके तहत डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा, गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर स्वास्थ्य नीति तैयार करने पर विशेष जोर रहेगा।

एसएचएसआरसी-यूपी के कार्यकारी निदेशक एवं एसजीपीजीआइ के चिकित्सा अधीक्षक प्रो.आर हर्षवर्धन ने बताया कि लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राउंडटेबल बैठक के पहले दिन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनकेंद्रित बनाने पर व्यापक मंथन हुआ। विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित समीक्षा, डिजिटल तकनीक के बेहतर उपयोग, मरीजों की सुरक्षा, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय को भविष्य की प्राथमिकता बताया।

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एसएचएसआरसी-यूपी के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने कहा कि एसएचएसआरसी-यूपी को प्रदेश का प्रमुख तकनीकी थिंक टैंक बनाया जाएगा, जो नीति निर्माण, शोध और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करेगा। एसजीपीजीआई के निदेशक एवं एसएचएसआरसी-यूपी के सह-अध्यक्ष प्रो.  आरके धीमन ने कहा कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार, चिकित्सा संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच निरंतर सहयोग तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण आवश्यक है।

बैठक में आईआईएम लखनऊ के निदेशक डॉ. एम.पी. गुप्ता, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष,  चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव ऋतु माहेश्वरी, चिकित्सा शिक्षा विभाग की सचिव डॉ. नेहा शर्मा, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका के प्रो. डॉ. साइरस इंजीनियर तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग की विशेष सचिव कृतिका शर्मा सहित देश-विदेश के विशेषज्ञों ने विचार रखे। एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के आयोजन सचिव डॉ. गौरव के. झा ने बताया कि पहले दिन के सुझावों के आधार पर दूसरे दिन एसएचएसआरसी-यूपी के संस्थागत ढांचे और पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप को अंतिम रूप दिया जाएगा।यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा और साक्ष्य आधारित नीति निर्माण पर रहेगा फोकस, पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप होगा तैयार



उत्तर प्रदेश में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर-उत्तर प्रदेश (एसएचएसआरसी-यूपी) का पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसके तहत डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा, गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर स्वास्थ्य नीति तैयार करने पर विशेष जोर रहेगा।

एसएचएसआरसी-यूपी के कार्यकारी निदेशक एवं एसजीपीजीआइ के चिकित्सा अधीक्षक प्रो.आर हर्षवर्धन ने बताया कि लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राउंडटेबल बैठक के पहले दिन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनकेंद्रित बनाने पर व्यापक मंथन हुआ। विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित समीक्षा, डिजिटल तकनीक के बेहतर उपयोग, मरीजों की सुरक्षा, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय को भविष्य की प्राथमिकता बताया।

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एसएचएसआरसी-यूपी के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने कहा कि एसएचएसआरसी-यूपी को प्रदेश का प्रमुख तकनीकी थिंक टैंक बनाया जाएगा, जो नीति निर्माण, शोध और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करेगा। एसजीपीजीआई के निदेशक एवं एसएचएसआरसी-यूपी के सह-अध्यक्ष प्रो.  आरके धीमन ने कहा कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार, चिकित्सा संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच निरंतर सहयोग तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण आवश्यक है।

बैठक में आईआईएम लखनऊ के निदेशक डॉ. एम.पी. गुप्ता, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष,  चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव ऋतु माहेश्वरी, चिकित्सा शिक्षा विभाग की सचिव डॉ. नेहा शर्मा, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका के प्रो. डॉ. साइरस इंजीनियर तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग की विशेष सचिव कृतिका शर्मा सहित देश-विदेश के विशेषज्ञों ने विचार रखे। एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के आयोजन सचिव डॉ. गौरव के. झा ने बताया कि पहले दिन के सुझावों के आधार पर दूसरे दिन एसएचएसआरसी-यूपी के संस्थागत ढांचे और पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप को अंतिम रूप दिया जाएगा।