पिछले 12 साल में रुपये की ऐतिहासिक फिसलन
डॉलर के मुकाबले सबसे तेज गिरावट, 20 साल की कमजोरी सिर्फ 12 साल में
भारतीय रुपया एक बार फिर इतिहास के सबसे कमजोर दौर में पहुंच गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के स्तर को पार कर गया, जिसने न सिर्फ बाजार बल्कि नीति-निर्माताओं की भी चिंता बढ़ा दी है। चौंकाने वाली बात यह है कि जितनी तेज गिरावट पिछले 12 वर्षों में देखने को मिली है, उतनी गिरावट पहले 20 साल में हुई थी। यही वजह है कि मौजूदा दौर को रुपये की अब तक की सबसे तेज फिसलन माना जा रहा है।
विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, डॉलर की बढ़ती वैश्विक मांग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का अपेक्षाकृत सीमित हस्तक्षेप—इन तीनों कारणों ने मिलकर रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। सवाल यह है कि क्या यह गिरावट यहीं थमेगी या आगे और चुनौती बाकी है?
20 साल बनाम 12 साल: आंकड़े खुद कहानी कहते हैं
अगर रुपये के सफर पर नजर डालें तो मौजूदा हालात और भी ज्यादा चिंताजनक लगते हैं।
फरवरी 1993 में रुपया पहली बार 30 रुपये प्रति डॉलर के पार गया।
इसके बाद जून 2013 में वह 60 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचा—यानी 30 से 60 तक आने में पूरे 20 साल लगे।
लेकिन 2013 से 2025-26 के बीच ही रुपया 60 से 90 के पार निकल गया—सिर्फ 12 साल में।
यानी जो गिरावट पहले दो दशकों में हुई, वही कमजोरी अब आधे से भी कम समय में देखने को मिली है।
50 साल में 90% गिरावट
इतिहास में और पीछे जाएं तो तस्वीर और साफ हो जाती है।
दिसंबर 1975 में रुपया पहली बार 9 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर पाया था। तब से लेकर अब तक रुपया करीब 82 रुपये कमजोर हो चुका है। मतलब बीते करीब 50 वर्षों में रुपये की वैल्यू लगभग 90% तक घट चुकी है।
दो महीने में 3.5% टूट चुका है रुपया
मौजूदा गिरावट की रफ्तार भी असाधारण है। सिर्फ दो महीनों में भारतीय करेंसी करीब 3.5% टूट चुकी है। यह गिरावट ऐसे समय पर आई है जब:
विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं
अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है
डॉलर इंडेक्स वैश्विक स्तर पर मजबूत बना हुआ है
ट्रेड डेफिसिट घटा, फिर भी रुपया कमजोर
दिलचस्प पहलू यह है कि रुपये की कमजोरी ऐसे वक्त सामने आई है, जब भारत का गुड्स ट्रेड डेफिसिट घटा है।
नवंबर में ट्रेड डेफिसिट घटकर 24.5 अरब डॉलर रह गया
जबकि अक्टूबर में यह 41.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था
इस सुधार के पीछे मुख्य वजह रही:
सोने और चांदी के आयात में तेज गिरावट
सालाना आधार पर निर्यात में करीब 19% की बढ़ोतरी
इसके बावजूद रुपये को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया, क्योंकि इस बार RBI का बाजार में दखल पहले के मुकाबले सीमित रहा।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आमतौर पर वित्त वर्ष की पहली तिमाही रुपये के लिए सहायक रहती है। ऐसे में निकट भविष्य में रुपया 90 के आसपास कुछ स्थिरता दिखा सकता है। हालांकि लंबी अवधि में दबाव पूरी तरह खत्म होने के संकेत नहीं हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक, अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो रुपये के 91.5 तक कमजोर होने का जोखिम बना रह सकता है।
निष्कर्ष
रुपये की मौजूदा गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था, निवेश माहौल और वैश्विक चुनौतियों का आईना है। जिस रफ्तार से रुपया फिसला है, उसने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में मुद्रा प्रबंधन सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक रहने वाला है।
साभार विश्व वार्ता
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