94 दिन जीवन से संघर्ष के बाद लौटी ज़िंदगी
गिलियन-बैरे सिंड्रोम से अक्टूबर में 10 वर्षीय अज़ान हुआ था पूरी तरह लकवाग्रस्त
आलमबाग के रहने वाले 10 वर्षीय अज़ान ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के आईसीयू में 94 दिनों तक चले कठिन जीवन–संघर्ष के बाद नई ज़िंदगी पाई है। गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जी बी एस ) से पीड़ित अज़ान को 12 अक्टूबर माह में केजीएमयू के सीसीयू-2 आईसीयू में भर्ती कराया गया था। भर्ती के समय वह पूरी तरह पैरालाइज़ था, हालांकि होश में था और उसकी हालत बेहद गंभीर बनी हुई थी।
आईसीयू विभाग के डॉक्टर विपिन सिंह ने बताया कि बच्चे को लगभग तीन महीने तक लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर पर मरीज को मैनेज करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि इस दौरान संक्रमण, बेड सोर और अन्य गंभीर जटिलताओं का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि आईसीयू ड्यूटी केवल इलाज नहीं बल्कि धैर्य, सतर्कता और निरंतर मेहनत की असली परीक्षा होती है।
डॉ. विपिन सिंह के अनुसार, आईसीयू में हड़बड़ी या लापरवाही की कोई जगह नहीं होती। अच्छे परिणाम के लिए हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है। अज़ान के इलाज में सीसीयू-2 की पूरी टीम ने दिन-रात समन्वय के साथ काम किया। इलाज करने वाली टीम में डॉ. विपिन सिंह, डॉ. विनोद और डॉ. मयंक शामिल रहे, जबकि नर्सिंग ऑफिसर निशा और ममता ने निरंतर देखभाल कर अहम भूमिका निभाई।
आईसीयू विभाग की हेड ऑफ डिपार्टमेंट प्रोफेसर मोनिका कोहली के नेतृत्व में पूरी टीम ने संक्रमण और बेड सोर जैसी जटिलताओं से बच्चे को सुरक्षित रखते हुए इलाज जारी रखा, जिसका परिणाम यह रहा कि 94 दिन बाद अज़ान को सुरक्षित डिस्चार्ज किया जा सका।
डॉ. विपिन सिंह ने कहा कि मरीज के स्वस्थ होकर घर लौटने की खुशी आम लोगों को भले ही उतनी महसूस न हो, लेकिन आईसीयू में दिन-रात मेहनत करने वाले डॉक्टरों और स्टाफ के लिए यह पल अपार संतोष और गर्व का होता है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि इतने लंबे समय तक उच्चस्तरीय और निःशुल्क इलाज केवल केजीएमयू जैसे सरकारी संस्थान में ही संभव है।
: क्या है गिलियन-बैरे सिंड्रोम
गिलियन-बैरे सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन गंभीर तंत्रिका रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही नसों पर हमला करने लगती है। इससे मांसपेशियों में कमजोरी और कई मामलों में लकवा हो सकता है।
क्यों होता है जी बी एस
यह बीमारी अक्सर वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण, बुखार, दस्त या सांस के संक्रमण के कुछ दिनों या हफ्तों बाद हो सकती है।
मुख्य लक्षण
पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन
पैरों से शुरू होकर हाथों तक कमजोरी
चलने-फिरने में परेशानी
बोलने या निगलने में दिक्कत
गंभीर मामलों में सांस लेने में कठिनाई
पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाना
इलाज
गंभीर मामलों में आईसीयू में भर्ती, वेंटिलेटर सपोर्ट, लगातार निगरानी और बाद में फिजियोथेरेपी की जरूरत होती है। समय पर इलाज से अधिकांश मरीज धीरे-धीरे स्वस्थ हो सकते हैं।

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