सत्ता से टकरावों की शृंखला और माघ मेले की नई दरार
गंगा की अविरलता के लिए 2008 का अनशन, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर टूटने का खुला विरोध, ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान और 108 घंटे की भूख हड़ताल, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी में उम्मीदवार उतारने की कोशिश, 2024 में ‘गऊ गठबंधन’ के जरिए राजनीतिक दखल और जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया विवादित बयान—इन तमाम घटनाओं ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उस संत के रूप में स्थापित किया है, जो सत्ता के साथ सामंजस्य से ज्यादा टकराव की राह चुनते हैं।
इसी क्रम में 18 जनवरी को प्रयागराज के माघ मेले में हुआ विवाद कोई अचानक उपजा प्रशासनिक संकट नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रहे उसी वैचारिक संघर्ष की ताज़ा अभिव्यक्ति थी। मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज पर स्नान को लेकर शंकराचार्य और प्रशासन के बीच जो टकराव सामने आया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि आधुनिक राज्य व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक नेतृत्व के बीच संतुलन आखिर कैसे बने।
माघ मेला: परंपरा बनाम प्रबंधन
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ संगम नोज की ओर बढ़े। प्रशासन ने भारी भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सीमित संख्या में पैदल स्नान का विकल्प दिया। बात नहीं बनी। संगम नोज वॉच टावर के पास हालात तनावपूर्ण हो गए, धक्का-मुक्की की तस्वीरें सामने आईं और अंततः शंकराचार्य बिना स्नान किए लौट गए। इसके बाद वे अपने शिविर में अनशन पर बैठ गए।
अगले दिन प्रयागराज मंडल की आयुक्त सौम्या अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि स्नान की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी और दो वाहनों की अनुमति पहले ही अस्वीकार कर दी गई थी। इसके बावजूद शंकराचार्य आपातकालीन त्रिवेणी पीपा पुल से सैकड़ों अनुयायियों के साथ संगम नोज के करीब पहुंचे। शंकराचार्य का दावा इसके उलट था—उनका कहना था कि सूचना तीन दिन पहले दी गई थी और परंपरागत सम्मान का पालन किया जाना चाहिए था।
यह सिर्फ एक दिन का विवाद नहीं
राजनीतिक और धार्मिक विश्लेषक मानते हैं कि माघ मेला प्रकरण को केवल नियम उल्लंघन या भीड़ प्रबंधन की असफलता के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यह उस लंबी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार सत्ता और व्यवस्था के सामने खड़े होते रहे हैं।
उनके समर्थकों की दृष्टि में यह संघर्ष सनातन परंपराओं की रक्षा का प्रतीक है। आलोचकों का तर्क है कि वे हर बड़े मंच पर टकराव की स्थिति खुद रचते हैं, ताकि सत्ता-विरोधी संत की छवि को मजबूत किया जा सके।
साधारण जन्म, असाधारण व्यक्तित्व
15 अगस्त 1969 को प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुरा गांव में जन्मे उमाशंकर पांडेय का जीवन आरंभ से ही अलग दिशा में बहता दिखा। छठवीं कक्षा के बाद उन्हें गुजरात के बड़ौदा स्थित विश्वनाथ मंदिर ले जाया गया, जहां से साधना और सेवा की राह शुरू हुई। काशी में करपात्री जी महाराज का सान्निध्य मिला, जिन्होंने उनमें नेतृत्व और जुझारूपन देखा।
वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शास्त्र और नव्य व्याकरण की पढ़ाई के दौरान वे एक प्रखर छात्रनेता के रूप में उभरे। यहीं धर्म और राजनीति का वह संगम बना, जिसने आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा तय की।
संन्यास से आंदोलन तक
2000 में ब्रह्मचारी दीक्षा और 2003 में संन्यास के बाद वे अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बने। गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निर्देश पर उन्हें श्रीविद्यामठ की जिम्मेदारी मिली और राम मंदिर, रामसेतु तथा अविरल गंगा जैसे आंदोलनों की कमान सौंपी गई। इन आंदोलनों ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई।
2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए किया गया उनका अनशन निर्णायक मोड़ साबित हुआ। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान पुराने मंदिरों के टूटने का विरोध करते हुए उन्होंने विकास बनाम विरासत की बहस को केंद्र में ला दिया।
मुख्यधारा से दूरी की राजनीति
ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका और राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रण के बावजूद दूरी बनाए रखना—ये फैसले दिखाते हैं कि वे धार्मिक-राजनीतिक सर्वसम्मति का हिस्सा बनने से बचते हैं।
राजनीति में उनका दखल भी इसी सोच से जुड़ा है। 2019 और 2024 के प्रयोग बताते हैं कि वे धर्म को केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते हैं।
बयान, विवाद और सत्ता की असहजता
केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का आरोप हो या ‘भगवा टेरर’ जैसे शब्दों पर उनकी तीखी प्रतिक्रिया—वे बिना लाग-लपेट के बोलते हैं। जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया बयान सत्ता के शीर्ष तक सीधी चुनौती माना गया। इसके बाद उनका स्टेट गेस्ट दर्जा रद्द होना और कुछ संतों द्वारा सार्वजनिक आलोचना इस टकराव की तीव्रता को दिखाता है।
क्यों बार-बार टकराव?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती न तो सत्ता के स्थायी सहयोगी हैं, न ही उससे पूरी तरह अलग-थलग। वे उस धूसर क्षेत्र में खड़े हैं, जहां धर्म, परंपरा और राज्य लगातार एक-दूसरे से भिड़ते हैं। यही स्थिति उन्हें प्रासंगिक भी बनाती है और विवादों में भी घसीटती है।
माघ मेला विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में भी वे व्यवस्था के लिए एक असहज सवाल बने रहेंगे। इसे आस्था की रक्षा कहें या राजनीतिक हस्तक्षेप—इतना तय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम विवाद के बिना शायद ही लिया जाएगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें