शनिवार, 31 जनवरी 2026

रुपए की 12 साल में ऐतिहासिक गिरावट





पिछले 12 साल में रुपये की ऐतिहासिक फिसलन

डॉलर के मुकाबले सबसे तेज गिरावट, 20 साल की कमजोरी सिर्फ 12 साल में


भारतीय रुपया एक बार फिर इतिहास के सबसे कमजोर दौर में पहुंच गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के स्तर को पार कर गया, जिसने न सिर्फ बाजार बल्कि नीति-निर्माताओं की भी चिंता बढ़ा दी है। चौंकाने वाली बात यह है कि जितनी तेज गिरावट पिछले 12 वर्षों में देखने को मिली है, उतनी गिरावट पहले 20 साल में हुई थी। यही वजह है कि मौजूदा दौर को रुपये की अब तक की सबसे तेज फिसलन माना जा रहा है।

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, डॉलर की बढ़ती वैश्विक मांग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का अपेक्षाकृत सीमित हस्तक्षेप—इन तीनों कारणों ने मिलकर रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। सवाल यह है कि क्या यह गिरावट यहीं थमेगी या आगे और चुनौती बाकी है?

20 साल बनाम 12 साल: आंकड़े खुद कहानी कहते हैं

अगर रुपये के सफर पर नजर डालें तो मौजूदा हालात और भी ज्यादा चिंताजनक लगते हैं।

फरवरी 1993 में रुपया पहली बार 30 रुपये प्रति डॉलर के पार गया।

इसके बाद जून 2013 में वह 60 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचा—यानी 30 से 60 तक आने में पूरे 20 साल लगे।

लेकिन 2013 से 2025-26 के बीच ही रुपया 60 से 90 के पार निकल गया—सिर्फ 12 साल में।

यानी जो गिरावट पहले दो दशकों में हुई, वही कमजोरी अब आधे से भी कम समय में देखने को मिली है।

50 साल में 90% गिरावट

इतिहास में और पीछे जाएं तो तस्वीर और साफ हो जाती है।

दिसंबर 1975 में रुपया पहली बार 9 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर पाया था। तब से लेकर अब तक रुपया करीब 82 रुपये कमजोर हो चुका है। मतलब बीते करीब 50 वर्षों में रुपये की वैल्यू लगभग 90% तक घट चुकी है।

दो महीने में 3.5% टूट चुका है रुपया

मौजूदा गिरावट की रफ्तार भी असाधारण है। सिर्फ दो महीनों में भारतीय करेंसी करीब 3.5% टूट चुकी है। यह गिरावट ऐसे समय पर आई है जब:

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं

अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है

डॉलर इंडेक्स वैश्विक स्तर पर मजबूत बना हुआ है

ट्रेड डेफिसिट घटा, फिर भी रुपया कमजोर

दिलचस्प पहलू यह है कि रुपये की कमजोरी ऐसे वक्त सामने आई है, जब भारत का गुड्स ट्रेड डेफिसिट घटा है।

नवंबर में ट्रेड डेफिसिट घटकर 24.5 अरब डॉलर रह गया

जबकि अक्टूबर में यह 41.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था

इस सुधार के पीछे मुख्य वजह रही:

सोने और चांदी के आयात में तेज गिरावट

सालाना आधार पर निर्यात में करीब 19% की बढ़ोतरी

इसके बावजूद रुपये को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया, क्योंकि इस बार RBI का बाजार में दखल पहले के मुकाबले सीमित रहा।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि आमतौर पर वित्त वर्ष की पहली तिमाही रुपये के लिए सहायक रहती है। ऐसे में निकट भविष्य में रुपया 90 के आसपास कुछ स्थिरता दिखा सकता है। हालांकि लंबी अवधि में दबाव पूरी तरह खत्म होने के संकेत नहीं हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो रुपये के 91.5 तक कमजोर होने का जोखिम बना रह सकता है।

निष्कर्ष

रुपये की मौजूदा गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था, निवेश माहौल और वैश्विक चुनौतियों का आईना है। जिस रफ्तार से रुपया फिसला है, उसने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में मुद्रा प्रबंधन सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक रहने वाला है।

साभार विश्व वार्ता

ओटी पर्सनल की एक चूक से 40% तक बढ़ सकता है संक्रमण का खतरा,

 

ओटी पर्सनल की एक चूक से 40% तक बढ़ सकता है संक्रमण का खतरा, एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में हुआ विशेष प्रशिक्षण

लखनऊ। यदि ऑपरेशन थिएटर में प्रोटोकॉल का सही पालन न हो, तो सर्जरी के बाद संक्रमण का खतरा 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, वहीं उपकरणों की गलत हैंडलिंग से हर चौथे मरीज में जटिलताएं सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आपात स्थिति में प्रशिक्षित ओटी पर्सनल की कमी से प्रतिक्रिया समय 50 प्रतिशत तक धीमा हो जाता है, जो मरीज की जान के लिए घातक हो सकता है। इन्हीं जोखिमों को कम करने और सर्जिकल सेफ्टी को मजबूत करने के उद्देश्य से एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के ऑर्थोपेडिक्स विभाग ने ऑपरेटिंग रूम पर्सनल (ओआरपी) प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 31 जनवरी 2026 को आयोजित हुआ, जिसका उद्देश्य ऑपरेशन थिएटर की कार्यकुशलता बढ़ाने, सर्जिकल सेफ्टी सुनिश्चित करने और पूरी सर्जिकल टीम के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना रहा।

प्रशिक्षण के दौरान ऑपरेशन थिएटर प्रोटोकॉल, एसेप्सिस एवं स्टरलाइजेशन प्रक्रियाएं, सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स की सुरक्षित हैंडलिंग, मरीज की सही पोजिशनिंग, सर्जिकल वर्कफ्लो तथा आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की तैयारियों पर विशेष जोर दिया गया। इंटरएक्टिव सत्रों और प्रैक्टिकल डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से नर्सिंग स्टाफ, तकनीशियन और सहायक थिएटर कर्मियों की तकनीकी दक्षता को सुदृढ़ किया गया।

कार्यक्रम का नेतृत्व ऑर्थोपेडिक्स विभाग के अध्यक्ष डॉ. पुलक शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि सर्जरी की सफलता केवल सर्जन की दक्षता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ओटी पर्सनल की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। “ओटी पर्सनल सर्जरी के साइलेंट गार्डियन होते हैं। थिएटर की तैयारी, स्टरल माहौल बनाए रखना, सही समय पर सही उपकरण उपलब्ध कराना और मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी अहम जिम्मेदारी है,” उन्होंने कहा।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार मरीज की गलत पोजिशनिंग से नर्व इंजरी, प्रेशर सोर और लंबे समय तक दर्द की समस्या 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। वहीं नियमित और संरचित प्रशिक्षण से सर्जिकल एरर में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है और मरीज की रिकवरी भी तेज होती है।

कार्यक्रम में ऑपरेशन थिएटर स्टाफ, रेजिडेंट डॉक्टरों और फैकल्टी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही। यह आयोजन न केवल एक शैक्षणिक पहल रहा, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि बेहतर सर्जरी केवल अच्छे डॉक्टर से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और सजग ओटी टीम से ही संभव है।

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का सामाजिक समरसता मंच ने किया स्वागत

 

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का सामाजिक समरसता मंच ने किया स्वागत

नियम वापस लेने की मांग, कहा—सामाजिक न्याय के नाम पर नए विभाजन स्वीकार्य नहीं

लखनऊ। सामाजिक समरसता मंच ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियों का स्वागत करते हुए केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से इन नियमों को तत्काल वापस लेने की मांग की है। मंच का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां लोकतांत्रिक मूल्यों, शैक्षणिक स्वायत्तता और सामाजिक सौहार्द की रक्षा करने वाली हैं।

मंच की प्रवक्ता रीना त्रिपाठी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इन नियमों को अस्पष्ट बताते हुए इनके दुरुपयोग की आशंका जताई है, जो यह दर्शाता है कि बिना व्यापक विमर्श के ऐसे संवेदनशील नियम लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए, जो समाज में नए विभाजन पैदा करें या एकता को कमजोर करें।

महिला प्रकोष्ठ की संयोजक सीमा द्विवेदी ने न्यायालय की उस टिप्पणी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया, जिसमें अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल की अवधारणा पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा— “भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए… हम सब साथ रहते थे।” उन्होंने कहा कि यह टिप्पणी भारत की साझा संस्कृति, भाईचारे और सामाजिक समरसता की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है।

मंच के संयोजक अजय तिवारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए प्रश्न दूरगामी महत्व के हैं—जैसे क्या भौगोलिक या क्षेत्रीय आधार पर अपमान को भी भेदभाव माना जाएगा, और क्या उत्पीड़न को केवल जाति-आधारित मानना व्यावहारिक दृष्टि से सही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब रेगुलेशन 3(e) पहले से भेदभाव को कवर करता है, तो 3(c) की आवश्यकता क्यों है, तथा 2012 के अपेक्षाकृत समावेशी नियमों से 2026 में पीछे क्यों जाया जा रहा है।

मंच ने सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव का भी समर्थन किया, जिसमें इन नियमों की पुनर्समीक्षा के लिए प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं की एक छोटी समिति गठित करने की बात कही गई है। सामाजिक समरसता मंच ने स्पष्ट किया कि समाज में एकता बनाए रखने के लिए जनसंपर्क और बैठकों का अभियान आगे भी जारी रहेगा।

बैठक में मुखबरूप  से दुर्गेश पांडे ,अनिल सिंह, कैप्टन सधांशु, प्रेम तिवरी ,सुरेशचद चंद्र बाजपेई, देवेंद्र शुक्ला, अजय तिवारी, ए पी दीक्षित सहित अन्य लोग शामिल हुए। 


मंगलवार, 27 जनवरी 2026

महत्वपूर्ण क्षणों के लिए तैयार रहें:

 

“महत्वपूर्ण क्षणों के लिए तैयार रहें: हृदय सुरक्षा और सीपीआर प्रशिक्षण से सशक्त हुआ समाज”


भारत में हर वर्ष 6–7 लाख लोग अचानक हृदय गति रुकने से जान गंवाते हैं


लखनऊ। जीवनशैली जनित हृदय रोगों और अचानक हृदय गति रुकने जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए जन-तैयारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए 27 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी, प्रज्ञा, गोमतीनगर में हृदय संबंधी जीवनशैली जागरूकता एवं सीपीआर प्रशिक्षण कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यशाला एनएडीटी आरसी लखनऊ द्वारा आयोजित “अच्छे स्वास्थ्य” पर आधारित दो दिवसीय कार्यक्रम का हिस्सा थी। कार्यक्रम का नेतृत्व आईआरएस के अपर महानिदेशक डॉ. नील जैन ने किया, जबकि समन्वय की जिम्मेदारी संयुक्त निदेशक आईआरएस  अन्विका शर्मा ने निभाई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संजय गांधी पीजीआई के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि हृदय रोग की रोकथाम में जीवनशैली में सुधार सबसे प्रभावी उपाय है। उन्होंने वजन, रक्तचाप, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और शारीरिक निष्क्रियता को नियंत्रित करने पर जोर देते हुए कहा कि समय रहते की गई रोकथाम जीवन भर सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

एसजीपीजीआईएमएस के कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. आदित्य कपूर ने सीपीआर को “चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन कौशल” बताते हुए आम नागरिकों को इसे सीखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत में हर वर्ष 6–7 लाख लोग अचानक हृदय गति रुकने से जान गंवाते हैं और पहले तीन मिनट में की गई कार्रवाई ही जीवन और मृत्यु के बीच अंतर तय करती है। उन्होंने धूम्रपान छोड़ने, रक्तचाप और लिपिड स्तर नियंत्रित रखने की अपील की।

कार्यशाला में अचानक हृदय गति रुकने की पहचान, सीपीआर की सही तकनीक और स्वचालित बाह्य डिफिब्रिलेटर (एईडी) के उपयोग पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण प्रो. आदित्य कपूर और एसजीपीजीआईएमएस के कैथ लैब प्रभारी नर्स श्री शिवदयाल द्वारा संचालित किया गया। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सीपीआर-प्रशिक्षित समाज का निर्माण अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।

सोमवार, 26 जनवरी 2026

SGPGIMS में गणतंत्र दिवस–2026 पर 33 कर्मियों को “अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस”,

 





**SGPGIMS में गणतंत्र दिवस–2026 पर 33 कर्मियों को “अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस”,

वर्ष 2025 रहा ऐतिहासिक, 2026 में और बड़े लक्ष्य**

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) में गणतंत्र दिवस–2026 के अवसर पर उत्कृष्ट सेवाओं, कर्तव्यनिष्ठा और संस्थान के सर्वांगीण विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले अधिकारियों, नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मियों एवं सहयोगी कर्मचारियों को “अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान SGPGIMS की टीम भावना, गुणवत्ता आधारित कार्यसंस्कृति और समर्पित स्वास्थ्य सेवाओं का प्रतीक है।

“अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस” प्राप्त करने वाले अधिकारी एवं कर्मचारी

इस अवसर पर कुल 33 कर्मचारियों को सम्मानित किया गया, जिनमें—

सहायक प्रशासनिक अधिकारी

श्रीमती रेनू मिश्रा, श्री माता प्रसाद पाल, श्री एस.पी. यादव, श्री राजेन्द्र कुमार शर्मा

कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी

श्री रमेश कुमार साहू

सहायक जनसंपर्क अधिकारी

श्री नील मणि तिवारी

वरिष्ठ भंडार क्रय अधिकारी

श्री अभय मेहरोत्रा

उप नर्सिंग अधीक्षक

श्रीमती एन्सी जयराज, श्रीमती सुषमा डिंकर, श्रीमती संगीता सक्सेना

सहायक नर्सिंग अधीक्षक

श्रीमती शीला सिंह, श्री सत्य प्रकाश राय

वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी

श्रीमती पूनम सिंह, श्रीमती प्रियंका शर्मा, श्रीमती ज्योति भारती

नर्सिंग अधिकारी

सुश्री ट्विंकल वर्मा

मुख्य तकनीकी अधिकारी

श्री टी.एस. नेगी, श्री देव रंजन मुखर्जी

वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी

श्रीमती अंशु माला वर्मा

तकनीकी अधिकारी (परफ्यूजन)

श्री संदीप कुमार

तकनीकी अधिकारी

श्री राम कुमार पाल

डाटा एंट्री सहायक (आउटसोर्स)

सुश्री शिवानी पाल, श्री अंकित यादव, श्री अनुज सिंह

डाइटिशियन (आउटसोर्स)

श्रीमती आकांक्षा वर्मा

पेशेंट हेल्पर (आउटसोर्स)

श्री अंकुर कुमार, श्रीमती अंजू सिंह

सफाई कर्मचारी (आउटसोर्स)

श्री राम किशुन

अस्पताल परिचारक ग्रेड–I

श्रीमती दुर्गेश कुमारी, श्री रामफेर

कार्यालय परिचारक ग्रेड–I

श्री लल्लन

वरिष्ठ माली

श्री रामेश्वर

वरिष्ठ फोटोग्राफर

श्री किशोर चन्द्र शर्मा

संस्थान प्रशासन ने सभी सम्मानित कर्मचारियों को SGPGIMS की उपलब्धियों का वास्तविक आधार बताया।

SGPGIMS के लिए वर्ष 2025 उपलब्धियों से भरा रहा

वर्ष 2025 में SGPGIMS ने शैक्षणिक गुणवत्ता, चिकित्सा सेवाओं, मानव संसाधन और इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कीं।

NAAC से A++ ग्रेड, NIRF में 5वाँ स्थान

2 जनवरी 2025 को SGPGIMS को NAAC द्वारा A++ ग्रेड प्रदान किया गया। साथ ही NIRF रैंकिंग में संस्थान ने देशभर में 5वाँ स्थान प्राप्त किया।

फैकल्टी व नॉन-फैकल्टी की बड़ी भर्ती

संस्थान द्वारा—

220 नए फैकल्टी पद

98 बैकलॉग फैकल्टी पद

के लिए 24 जनवरी 2026 को विज्ञापन जारी किया गया।

इसके अतिरिक्त 1479 नॉन-फैकल्टी पदों (नर्सिंग ऑफिसर, OT असिस्टेंट, स्टेनोग्राफर, हॉस्पिटल अटेंडेंट, स्टोरकीपर आदि) पर भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

एडवांस्ड डायबिटिक सेंटर

एंडोक्राइन मेडिसिन, डायबिटिक रेटिनोपैथी, डायबिटिक नेफ्रोपैथी, फैटी लिवर और मोटापे के इलाज के लिए एडवांस्ड डायबिटिक सेंटर की स्थापना की गई।

आठ नए सुपर-स्पेशियलिटी विभाग

पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजी, हेड एंड नेक सर्जरी, इंफेक्शियस डिजीज, ऑर्थोपेडिक्स, पीडियाट्रिक यूरोलॉजी, पीडियाट्रिक कार्डियोवैस्कुलर सर्जरी, टेलीमेडिसिन एवं डिजिटल हेल्थ, पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी जैसे 8 नए विभाग शुरू किए गए।

पीडियाट्रिक सेवाओं का विस्तार

पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी, पल्मोनोलॉजी, न्यूरोलॉजी, ऑन्कोलॉजी सहित कई नई यूनिट्स शुरू की गईं।

इनका भवन निर्माण पाँचवीं मंज़िल तक पूर्ण हो चुका है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और भविष्य की दिशा

डिजिटल पैथोलॉजी, गामा नाइफ रेडियोसर्जरी, नया OPD कॉम्प्लेक्स, मल्टी-लेवल पार्किंग, फैकल्टी आवास, रेजिडेंट हॉस्टल और 1000 बेड की “रेन बसेरा” जैसी परियोजनाएँ तेज़ी से प्रगति पर हैं।


अगले 5 वर्षों की दूरदृष्टि (VISION 2030)

SGPGIMS का लक्ष्य है कि उत्तर प्रदेश के किसी भी गंभीर रोगी को इलाज के लिए राज्य से बाहर न जाना पड़े। इसके लिए—

Quaternary Health Care (SQHC) की स्थापना

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित स्वास्थ्य सेवाएँ

SGPGI–TMDH–UPMCN टेलीमेडिसिन नेटवर्क

राज्यव्यापी Tele-ICU और Tele-Education

जैसी योजनाओं को लागू किया जा रहा है।



“अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस” से सम्मानित कर्मचारियों की निष्ठा और समर्पण के साथ SGPGIMS वर्ष 2025 में उत्कृष्टता के नए मानक स्थापित कर चुका है। वर्ष 2026 में संस्थान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी स्वास्थ्य केंद्र के रूप में उभरने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।

रविवार, 25 जनवरी 2026

जेल से फरारी पर हीरक पदक, लूट के आरोपियों को रजत सम्मान

 



जेल से फरारी पर हीरक पदक, लूट के आरोपियों को रजत सम्मान

गणतंत्र दिवस पर कारागार विभाग में पदक वितरण बना सवालों के घेरे में

राजेश यादव निडर

लखनऊ। प्रदेश के कारागार विभाग में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जारी पदक सूची ने विभागीय गलियारों में तीखी चर्चाओं को जन्म दे दिया है। आरोप है कि जेलों में गंभीर अनियमितताओं और फरारी जैसे मामलों से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों को भी पदकों से नवाजा गया, जबकि कई पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए।

कारागार मुख्यालय की ओर से 23 जनवरी को जारी सूची के अनुसार, “उत्कृष्ट और सराहनीय सेवाओं” के नाम पर हीरक (प्लैटिनम), स्वर्ण, रजत पदक और डीजी प्रशंसा प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम कानपुर नगर जेल से बंदी फरारी प्रकरण में निलंबित रह चुके जेलर मनीष कुमार का है, जिन्हें डीजी जेल का हीरक पदक प्रदान किया गया।

इतना ही नहीं, बुलंदशहर, फिरोजाबाद और मुजफ्फरनगर जेलों में बैठकी, हाता समेत अन्य मदों में वसूली और अनियमितताओं के आरोप झेल रहे अधीक्षक—कोमल मंगलानी, अमित चौधरी और अभिषेक चौधरी—को रजत पदक से सम्मानित किया गया।

सूची में एक और रोचक तथ्य यह सामने आया कि एआईजी जेल प्रशासन की नोएडा के एक कॉलेज में पढ़ रही दो बेटियों की “सेवा” में लगे वार्डर अक्षय सहित अन्य को भी डीजी का प्रशंसा प्रमाण पत्र दे दिया गया। इसके अलावा, कन्नौज जेल में तैनात रहते हुए प्रशिक्षण संस्थान में रहकर मुख्यालय में अधिकारियों की निकटता रखने वाले दो डिप्टी जेलरों को भी सम्मानित किया गया है।

पदक बना वसूली का जरिया?

विभागीय सूत्रों का आरोप है कि पदक वितरण की व्यवस्था अब कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के बजाय अधिकारियों की वसूली का माध्यम बन चुकी है। एक डिप्टी जेलर ने बताया कि वह इस बार स्वर्ण पदक की प्रबल दावेदार थीं, लेकिन मुख्यालय में “संबंधित अधिकारी से संपर्क न होने” के कारण उनका नाम सूची से बाहर रह गया। वहीं, एक बाबू का कहना है कि पिछले दो वर्षों से उसका नाम भेजा ही नहीं गया, और इस बार भेजे जाने के बावजूद पदक नहीं मिला।

इन आरोपों के बीच विभाग के कई ईमानदार और पात्र कर्मी सम्मान से वंचित रह गए, जबकि दागदार अधिकारियों के नाम सूची में प्रमुखता से शामिल रहे।

अधिकारियों की चुप्पी

मामले को लेकर जब एआईजी जेल प्रशासन धर्मेंद्र सिंह और प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो दोनों अधिकारियों के फोन नहीं उठे। विभागीय चुप्पी ने पदक वितरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर और सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल, पदक वितरण की यह सूची कारागार विभाग के भीतर ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

कॉक्लियर इम्प्लांट से बच्चों और वयस्कों को मिल सकती है सुनने की नई क्षमता

 

कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए पीजीआई मेडिकल कॉलेजों के चिकित्सकों को देगा प्रशिक्षण

कार्यशाला के ज़रिए श्रवण बाधितों को नई ज़िंदगी देने की तैयारी

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) ने श्रवण हानि के उपचार और विशेषज्ञ चिकित्सकों के कौशल संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए प्रथम कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यशाला का सफल आयोजन किया। हेड एंड नेक सर्जरी विभाग द्वारा विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी के नेतृत्व में 24 और 25 जनवरी को आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों से आए विशेषज्ञों एवं युवा सर्जनों ने भाग लिया।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की सबसे जटिल प्रक्रिया माने जाने वाले टेम्पोरल बोन विच्छेदन का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना था। इस दौरान कुल 20 सर्जनों ने टेम्पोरल बोन का हैंड्स-ऑन डिसेक्शन किया, जिससे उनकी शल्य-तकनीकी दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रोबोटिक 3डी डिजिटल माइक्रोस्कोप के माध्यम से किया गया लाइव विच्छेदन प्रदर्शन रहा, जो भारत में इस तरह का पहला शैक्षणिक प्रयोग माना जा रहा है। इस उन्नत तकनीक से कान की सूक्ष्म संरचनाओं को अत्यंत स्पष्टता के साथ समझने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक  प्रोफेसर आर.के. धीमन ने अपने संबोधन में कहा कि श्रवण हानि आज भारत में एक गंभीर जन स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी ऐसे मरीजों के लिए जीवन बदलने वाली तकनीक है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि एसजीपीजीआई इन संस्थानों को प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करेगा। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सहयोग से नवजात शिशुओं की अनिवार्य श्रवण जांच, शीघ्र निदान और पुनर्वास को अत्यंत आवश्यक बताया।

मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर देवेंद्र गुप्ता ने विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कॉक्लियर इम्प्लांट कार्यक्रम को और सशक्त बनाने के लिए संस्थान स्तर पर सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी ने बताया कि एसजीपीजीआई में बच्चों और वयस्कों दोनों में नियमित रूप से कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला के माध्यम से प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी इस अत्याधुनिक सर्जरी की नींव मजबूत होगी। कार्यक्रम में सर्जनों के साथ ऑडियोलॉजिस्ट और पुनर्वास विशेषज्ञों के व्याख्यान भी शामिल रहे, जिससे प्रतिभागियों को कॉक्लियर इम्प्लांट के हर पहलू की समग्र जानकारी मिली।



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भारत में श्रवण हानि की गंभीर स्थिति

लगभग 63 लाख लोग श्रवण हानि से प्रभावित

 कॉक्लियर इम्प्लांट से बच्चों और वयस्कों को मिल सकती है सुनने की नई क्षमता

 समय पर जांच और सर्जरी से बदली जा सकती है पूरी ज़िंदगी

शनिवार, 24 जनवरी 2026

एसजीपीजीआई में कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की बारीकियों पर हैंड्स-ऑन डिसेक्शन,

 




एसजीपीजीआई में कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी की बारीकियों पर हैंड्स-ऑन डिसेक्शन,


 विशेषज्ञों ने साझा किया व्यावहारिक अनुभव



लखनऊ। कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी में सबसे अहम माने जाने वाले टेम्पोरल बोन डिसेक्शन और सटीक सर्जिकल तकनीक पर आज संजय गांधी पीजीआई में विशेष वैज्ञानिक सत्र आयोजित किया गया। यह सत्र हैंड्स-ऑन कॉक्लियर इम्प्लांट वर्कशॉप का प्रमुख हिस्सा रहा, जिसमें देशभर से आए ईएनटी सर्जनों ने प्रत्यक्ष अभ्यास के माध्यम से सर्जरी की जटिल संरचनाओं को समझा।

वर्कशॉप के मुख्य समन्वयक एवं हेड एंड नेक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. अमित केशरी ने बताया कि कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी केवल मशीन लगाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह माइक्रो-एनाटॉमी और अत्यधिक सटीकता पर आधारित सर्जरी है। उन्होंने कहा कि टेम्पोरल बोन की संरचना को सही तरीके से समझना सर्जरी की सफलता और मरीज की सुनने की क्षमता लौटाने के लिए बेहद जरूरी है।

इस वैज्ञानिक कार्यशाला में सर्जरी से पहले की ऑडियोलॉजिकल जांच, सीटी और एमआरआई द्वारा कान की आंतरिक संरचना का मूल्यांकन, इम्प्लांट के इलेक्ट्रोड चयन और सर्जिकल अप्रोच पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही वेरिया तकनीक और पोस्टेरियर टायम्पैनोटॉमी जैसी उन्नत सर्जिकल तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया।

प्रो. केशरी के अनुसार, समय पर और सही तकनीक से किया गया कॉक्लियर इम्प्लांट बच्चों में सुनने और बोलने की क्षमता विकसित कर सकता है, जिससे वे सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी सकते हैं। उन्होंने आम जनता से अपील की कि बधिरता को अभिशाप न मानें, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके प्रभावी समाधान उपलब्ध हैं।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

सड़क दुर्घटना में खोई सुनने की क्षमता लौटी, एसजीपीजीआई ने कॉक्लियर इम्प्लांट से रचा चिकित्सा चमत्कार

 






सड़क दुर्घटना में खोई सुनने की क्षमता लौटी, एसजीपीजीआई ने कॉक्लियर इम्प्लांट से रचा चिकित्सा चमत्कार


भीषण हादसे में दोनों कान क्षतिग्रस्त हुए थे, अत्याधुनिक तकनीक से  ज़िंदगी का तोहफा

पीजीआई चंडीगढ़ और एसजीपीजीआई ने मिलकर किया इलाज


लखनऊ। सड़क दुर्घटना में पूरी तरह सुनने की क्षमता खो चुके मऊ निवासी धनंजय 23 वर्षीय युवक के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ ने उम्मीद की नई राह खोल दी है। अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के सफल प्रयोग से युवक की श्रवण क्षमता बहाल करने की दिशा में ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है। चिकित्सकों के अनुसार यह उपलब्धि किसी “लॉटरी” से कम नहीं, जिसने अंधेरे में डूब चुके जीवन को फिर से आवाज़ दी है।

युवक को एक भीषण सड़क दुर्घटना में गंभीर सिर की चोट लगी थी, जिससे दोनों कानों में गहरी श्रवण हानि हो गई। बायां भीतरी कान पूरी तरह नष्ट हो चुका था, जबकि दायां कान फ्रैक्चर के कारण अत्यंत जटिल स्थिति में था। ऐसे में चिकित्सकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि क्या दाहिने कान की श्रवण तंत्रिका कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए पर्याप्त रूप से सुरक्षित है या नहीं।

इस जटिल निर्णय में पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के प्रोफेसर रमनदीप के विशेषज्ञ परामर्श ने अहम भूमिका निभाई। एक विशेष नैदानिक परीक्षण के जरिए दाहिने कान की तंत्रिका कार्यप्रणाली की पुष्टि हुई, जिसके बाद सर्जरी का मार्ग प्रशस्त हुआ।

एसजीपीजीआई की न्यूरोऑटोलॉजी टीम ने डॉ. एम. रवि शंकर के नेतृत्व में जनवरी के दूसरे सप्ताह में यह जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की। इसमें अत्याधुनिक इम्प्लांट प्रोसेसर का उपयोग किया गया, जो लगभग सामान्य वाक् कोडिंग प्रदान करता है। उत्तर प्रदेश में इस तकनीक का यह पहला प्रयोग बताया जा रहा है।

डिवाइस को गुरुवार को सक्रिय किया गया, जिसके बाद युवक ने तुरंत ध्वनि के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। ऑडियोलॉजी प्रक्रिया में पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ की  पारुल , एसजीपीजीआई की  आद्या,  कीर्ति,  मंगल सहित विशेषज्ञ  माथुर और  शिवांगी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

विशेषज्ञों के अनुसार यह सफलता न केवल तकनीकी प्रगति बल्कि संस्थानों के बीच समन्वय और टीमवर्क का जीवंत उदाहरण है। अब युवक गहन श्रवण पुनर्वास से गुजरेगा, जिससे वह दोबारा प्रभावी संवाद कर सकेगा और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आएगा।




पीजीआई में मिला नया जीवन, 140 किलो वजन के बावजूद जटिल हिप सर्जरी सफल

 

पीजीआई में मिला नया जीवन, 140 किलो वजन के बावजूद जटिल हिप सर्जरी सफल





कानपुर निवासी 50 वर्षीय इस्सत बानो के लिए चलना-फिरना लगभग असंभव हो चुका था। 140 किलोग्राम से अधिक वजन, थायराइड, उच्च रक्तचाप और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया जैसी गंभीर बीमारियों के कारण कई बड़े अस्पतालों ने उनके कूल्हे (फीमर नेक) के फ्रैक्चर की सर्जरी करने से इनकार कर दिया था। सांस लेने के लिए सीपैप  मशीन पर निर्भर इस महिला के लिए हर सर्जरी जानलेवा जोखिम मानी जा रही थी।

लेकिन संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के डॉक्टरों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए जटिल हिप सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और महिला को नया जीवन दिया।

इस्सत बानो की सर्जरी के लिए  कई अस्पतालों ने जोखिम बताकर हाथ खड़े कर दिए, वहीं एसजीपीजीआई के डॉक्टरों ने मरीज की पीड़ा को समझा और इलाज का संकल्प लिया।


एसजीपीजीआई के अस्थि रोग विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. कुमार केशव और एनेस्थिसियोलॉजी विभाग की एडिशनल प्रोफेसर डॉ. वंश प्रिय ने बताया कि अत्यधिक मोटापे के कारण फ्रैक्चर तक पहुंचना और रक्तस्राव को नियंत्रित करना सर्जरी की सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन सटीक योजना और अनुभव के बल पर ऑपरेशन सफल रहा।

एनेस्थीसिया टीम के लिए भी यह केस बेहद तकनीकी था। जनरल एनेस्थीसिया से बचते हुए अत्याधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से 150 मिमी लंबी विशेष सुई द्वारा स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया गया। ऑपरेशन के बाद मरीज में रैबडोमायोलिसिस जैसी गंभीर जटिलता सामने आई, जो समय रहते इलाज न होने पर किडनी फेल होने का कारण बन सकती थी। एनेस्थीसिया आईसीयू में समय पर पहचान और इलाज से मरीज को सुरक्षित बचा लिया गया।

अब इस्सत बानो के टांके कट चुके हैं और वह वॉकर के सहारे चलने में सक्षम हैं




इन्होंने किया इलाज


डॉ. कुमार केशव (अस्थि रोग विशेषज्ञ) की टीम में 

 डॉ. उत्कर्ष, डॉ. अर्पण, डॉ. राजेश, डॉ. योगेश और स्क्रब नर्स अंकित शामिल रहे।

एनेस्थीसिया टीम में डॉ. वंश प्रिय, डॉ. रुमित, डॉ. निकिता और आईसीयू में डॉ. सुरुचि की सतर्कता ने मरीज की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

सत्ता से टकरावों की शृंखला

 






सत्ता से टकरावों की शृंखला और माघ मेले की नई दरार

गंगा की अविरलता के लिए 2008 का अनशन, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर टूटने का खुला विरोध, ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान और 108 घंटे की भूख हड़ताल, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी में उम्मीदवार उतारने की कोशिश, 2024 में ‘गऊ गठबंधन’ के जरिए राजनीतिक दखल और जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया विवादित बयान—इन तमाम घटनाओं ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उस संत के रूप में स्थापित किया है, जो सत्ता के साथ सामंजस्य से ज्यादा टकराव की राह चुनते हैं।

इसी क्रम में 18 जनवरी को प्रयागराज के माघ मेले में हुआ विवाद कोई अचानक उपजा प्रशासनिक संकट नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रहे उसी वैचारिक संघर्ष की ताज़ा अभिव्यक्ति थी। मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज पर स्नान को लेकर शंकराचार्य और प्रशासन के बीच जो टकराव सामने आया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि आधुनिक राज्य व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक नेतृत्व के बीच संतुलन आखिर कैसे बने।

माघ मेला: परंपरा बनाम प्रबंधन

मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ संगम नोज की ओर बढ़े। प्रशासन ने भारी भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सीमित संख्या में पैदल स्नान का विकल्प दिया। बात नहीं बनी। संगम नोज वॉच टावर के पास हालात तनावपूर्ण हो गए, धक्का-मुक्की की तस्वीरें सामने आईं और अंततः शंकराचार्य बिना स्नान किए लौट गए। इसके बाद वे अपने शिविर में अनशन पर बैठ गए।

अगले दिन प्रयागराज मंडल की आयुक्त सौम्या अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि स्नान की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी और दो वाहनों की अनुमति पहले ही अस्वीकार कर दी गई थी। इसके बावजूद शंकराचार्य आपातकालीन त्रिवेणी पीपा पुल से सैकड़ों अनुयायियों के साथ संगम नोज के करीब पहुंचे। शंकराचार्य का दावा इसके उलट था—उनका कहना था कि सूचना तीन दिन पहले दी गई थी और परंपरागत सम्मान का पालन किया जाना चाहिए था।

यह सिर्फ एक दिन का विवाद नहीं

राजनीतिक और धार्मिक विश्लेषक मानते हैं कि माघ मेला प्रकरण को केवल नियम उल्लंघन या भीड़ प्रबंधन की असफलता के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यह उस लंबी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार सत्ता और व्यवस्था के सामने खड़े होते रहे हैं।

उनके समर्थकों की दृष्टि में यह संघर्ष सनातन परंपराओं की रक्षा का प्रतीक है। आलोचकों का तर्क है कि वे हर बड़े मंच पर टकराव की स्थिति खुद रचते हैं, ताकि सत्ता-विरोधी संत की छवि को मजबूत किया जा सके।

साधारण जन्म, असाधारण व्यक्तित्व

15 अगस्त 1969 को प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुरा गांव में जन्मे उमाशंकर पांडेय का जीवन आरंभ से ही अलग दिशा में बहता दिखा। छठवीं कक्षा के बाद उन्हें गुजरात के बड़ौदा स्थित विश्वनाथ मंदिर ले जाया गया, जहां से साधना और सेवा की राह शुरू हुई। काशी में करपात्री जी महाराज का सान्निध्य मिला, जिन्होंने उनमें नेतृत्व और जुझारूपन देखा।

वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शास्त्र और नव्य व्याकरण की पढ़ाई के दौरान वे एक प्रखर छात्रनेता के रूप में उभरे। यहीं धर्म और राजनीति का वह संगम बना, जिसने आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा तय की।

संन्यास से आंदोलन तक

2000 में ब्रह्मचारी दीक्षा और 2003 में संन्यास के बाद वे अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बने। गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निर्देश पर उन्हें श्रीविद्यामठ की जिम्मेदारी मिली और राम मंदिर, रामसेतु तथा अविरल गंगा जैसे आंदोलनों की कमान सौंपी गई। इन आंदोलनों ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई।

2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए किया गया उनका अनशन निर्णायक मोड़ साबित हुआ। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान पुराने मंदिरों के टूटने का विरोध करते हुए उन्होंने विकास बनाम विरासत की बहस को केंद्र में ला दिया।

मुख्यधारा से दूरी की राजनीति

ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान, जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका और राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रण के बावजूद दूरी बनाए रखना—ये फैसले दिखाते हैं कि वे धार्मिक-राजनीतिक सर्वसम्मति का हिस्सा बनने से बचते हैं।

राजनीति में उनका दखल भी इसी सोच से जुड़ा है। 2019 और 2024 के प्रयोग बताते हैं कि वे धर्म को केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते हैं।

बयान, विवाद और सत्ता की असहजता

केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का आरोप हो या ‘भगवा टेरर’ जैसे शब्दों पर उनकी तीखी प्रतिक्रिया—वे बिना लाग-लपेट के बोलते हैं। जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिया गया बयान सत्ता के शीर्ष तक सीधी चुनौती माना गया। इसके बाद उनका स्टेट गेस्ट दर्जा रद्द होना और कुछ संतों द्वारा सार्वजनिक आलोचना इस टकराव की तीव्रता को दिखाता है।

क्यों बार-बार टकराव?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती न तो सत्ता के स्थायी सहयोगी हैं, न ही उससे पूरी तरह अलग-थलग। वे उस धूसर क्षेत्र में खड़े हैं, जहां धर्म, परंपरा और राज्य लगातार एक-दूसरे से भिड़ते हैं। यही स्थिति उन्हें प्रासंगिक भी बनाती है और विवादों में भी घसीटती है।

माघ मेला विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में भी वे व्यवस्था के लिए एक असहज सवाल बने रहेंगे। इसे आस्था की रक्षा कहें या राजनीतिक हस्तक्षेप—इतना तय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम विवाद के बिना शायद ही लिया जाएगा।

रविवार, 18 जनवरी 2026

सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन

 








रुचि खंड, चंपा पार्क में सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन

लखनऊ। रुचि खंड स्थित चंपा पार्क में आज सनातन सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन मां पीतांबरा समूह  , सरोजिनी नगर द्वारा किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल्यों का प्रसार, सामाजिक समरसता को मजबूत करना तथा समाज में आपसी भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करना रहा।

सम्मेलन में कमल किशोर शर्मा, अंगद जी, दुर्गेश पाण्डेय, संजय मिश्रा,  सुरेश बाजपेई, अंकित शर्मा, अमित शर्मा, दुर्गेश मिश्रा, देवेश मिश्रा, संतोष कनौजिया, डी. के. त्रिवेदी, प्रीति शर्मा, नीलू त्रिवेदी, संजय तिवारी के अलावा विशिष्ट अतीत के रूप में, पूर्व आईएएस कैप्टन एसके द्विवेदी, पूर्व आईएएस सी पी तिवारी, कर्नल दया शंकर दुबे, देवेंद्र शुक्ला, कोमल द्विवेदी, जे पी बाजपेई, आई जी पुलिस अजय पांडे जी, वरिष्ठ एडवोकेट योगेश भट्ट, ओ पी पटेल, इंजीनियर अजय श्रीवास्तव, माधवी सिंह मधुबन तिवारी, अन्नपूर्णा रसोई के उमेश मिश्रा ,नीरज अवस्थी शामिल हुए। 

सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। वक्ताओं ने सनातन परंपराओं, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के अंत में समरसता भोज का आयोजन किया गया, जिसमें सभी ने एक साथ बैठकर भोजन किया। आयोजन ने सामाजिक सौहार्द, समता और एकता का सशक्त संदेश दिया।


शनिवार, 17 जनवरी 2026

रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह भव्य रूप से संपन्न

 


रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह भव्य रूप से संपन्न

हमारे संस्थान के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग का 8वां स्थापना दिवस समारोह म निदेशक प्रो. एम. एल. बी. भट्ट के दूरदर्शी नेतृत्व में गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया।  आयोजन सचिव के रूप डॉ प्रमोद गुप्ता रहे। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सी. एम. सिंह, निदेशक, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ रहे। विशिष्ट अतिथि एवं फाउंडेशन डे ओरेटर के रूप में प्रो. सत्यजीत प्रधान, निदेशक, टाटा अस्पताल, वाराणसी उपस्थित रहे। उन्होंने फाउंडेशन डे ओरेशन प्रस्तुत करते हुए महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के उपचार में ब्रैकीथेरेपी की नवीनतम प्रगति पर अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक विचार साझा किए, जिससे उपस्थित फैकल्टी एवं रेजिडेंट डॉक्टरों को नवीनतम उपचार विधियों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।

इस सफल आयोजन के लिए विभागाध्यक्ष एवं आयोजन अध्यक्ष डॉ. शरद सिंह, आयोजन सह-सचिव डॉ. रुमिता सिंह, डॉ. वरुण विजय (एमएस), डॉ. आयुष लोहिया, एफओ रजनीकांत वर्मा (ईआर) सहित विभाग के सभी फैकल्टी सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों, प्रशासनिक अधिकारियों, नर्सिंग स्टाफ एवं संस्थान के समस्त सहयोगी कर्मचारियों का सहयोग सराहनीय रहा।

स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत स्टाफ सदस्यों के लिए पोस्टर एवं रंगोली प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया, जिससे कर्मचारियों में रचनात्मकता और सहभागिता को प्रोत्साहन मिला।

इसके अतिरिक्त लखनऊ के सभी प्रमुख चिकित्सा संस्थानों एवं अस्पतालों से पधारे फैकल्टी सदस्यों, अतिथियों एवं परामर्शदाताओं की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। यह स्थापना दिवस समारोह उत्तर प्रदेश एवं आसपास के राज्यों के कैंसर रोगियों को उन्नत, उच्च गुणवत्ता वाली, किफायती एवं समर्पित कैंसर उपचार सेवाएं प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ करता है।


पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी से अंग विच्छेदन के खतरे को किया जा सकता है कम

 

पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी से अंग विच्छेदन के खतरे को किया जा सकता है कम

लखनऊ। हाथ, पैर या शरीर के अन्य अंगों में रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट आने पर गंभीर घाव, संक्रमण और अंततः अंग विच्छेदन जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लेकिन अब इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के अंतर्गत की जाने वाली पेरीफेरल एंजियोप्लास्टी एवं अन्य एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशन तकनीकों के माध्यम से बंद धमनियों को खोलकर रक्त संचार बहाल किया जा रहा है। इससे न केवल मरीजों की जान बच रही है, बल्कि बड़ी सर्जरी और अंग कटने के खतरे से भी राहत मिल रही है। यह उन्नत चिकित्सा सुविधा संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लोहिया संस्थान और केजीएमयू जैसी प्रमुख चिकित्सा संस्थाओं के रेडियोलॉजी विभागों में उपलब्ध है।

ग्लोबल इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी डे के अवसर पर आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम में इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट प्रो. विवेक सिंह ने बताया कि डायबिटीज, रक्त जमने की समस्या या लंबे समय से चली आ रही पेरीफेरल आर्टेरियल डिजीज के मामलों में यदि समय रहते रेडियोलॉजी विभाग से संपर्क किया जाए, तो अंग विच्छेदन से प्रभावी रूप से बचाव संभव है।

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी की इमेज-गाइडेड एवं न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों ने कई जटिल और जानलेवा रोगों के उपचार को सुरक्षित और प्रभावी बनाया है। एक्यूट स्ट्रोक के इलाज में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी, ब्रेन एन्यूरिज्म में एंडोवैस्कुलर कॉइलिंग, अत्यधिक गर्भाशय रक्तस्राव में यूटेराइन आर्टरी एम्बोलाइजेशन तथा गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग में एम्बोलाइजेशन जैसी आधुनिक तकनीकों से मरीजों को तेज़ और बेहतर उपचार मिल रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि ये आधुनिक उपचार पद्धतियां कम जोखिम, कम दर्द, कम अस्पताल प्रवास और तेज़ रिकवरी के साथ मरीजों को बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान कर रही हैं। कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी भविष्य की सटीक, सुरक्षित और मरीज-केंद्रित चिकित्सा का मजबूत आधार बन चुकी है।

कार्यक्रम में एसजीपीजीआई से प्रो. अर्चना गुप्ता, प्रो. विवेक सिंह, प्रो. अनिल, प्रो. सूर्यकांत, प्रो. सत्यव्रत एवं डॉ. अनुराधा, केजीएमयू से प्रो. अनित परिहार, प्रो. मनोज, प्रो. सौरभ, प्रो. सिद्धार्थ एवं प्रो. नितिन, आरएमएलआईएमएस से प्रो. तुषांत तथा कमांड अस्पताल से प्रो. कविता ने अपने विचार साझा किए।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

केजी मेडिकल यूनिवर्सिटी =94 दिन जीवन से संघर्ष के बाद लौटी ज़िंदगी

 



94 दिन  जीवन से संघर्ष के बाद लौटी ज़िंदगी



गिलियन-बैरे सिंड्रोम से अक्टूबर में 10 वर्षीय अज़ान हुआ था पूरी तरह लकवाग्रस्त



आलमबाग के रहने वाले 10 वर्षीय अज़ान ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के आईसीयू में 94 दिनों तक चले कठिन जीवन–संघर्ष के बाद नई ज़िंदगी पाई है। गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जी बी एस ) से पीड़ित अज़ान को 12 अक्टूबर माह में केजीएमयू के सीसीयू-2 आईसीयू में भर्ती कराया गया था। भर्ती के समय वह पूरी तरह पैरालाइज़ था, हालांकि होश में था और उसकी हालत बेहद गंभीर बनी हुई थी।

आईसीयू विभाग के डॉक्टर विपिन सिंह ने बताया कि बच्चे को लगभग तीन महीने तक लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर पर मरीज को मैनेज करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि इस दौरान संक्रमण, बेड सोर और अन्य गंभीर जटिलताओं का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि आईसीयू ड्यूटी केवल इलाज नहीं बल्कि धैर्य, सतर्कता और निरंतर मेहनत की असली परीक्षा होती है।

डॉ. विपिन सिंह के अनुसार, आईसीयू में हड़बड़ी या लापरवाही की कोई जगह नहीं होती। अच्छे परिणाम के लिए हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है। अज़ान के इलाज में सीसीयू-2 की पूरी टीम ने दिन-रात समन्वय के साथ काम किया। इलाज करने वाली टीम में डॉ. विपिन सिंह, डॉ. विनोद और डॉ. मयंक शामिल रहे, जबकि नर्सिंग ऑफिसर निशा और ममता ने निरंतर देखभाल कर अहम भूमिका निभाई।

आईसीयू विभाग की हेड ऑफ डिपार्टमेंट प्रोफेसर मोनिका कोहली के नेतृत्व में पूरी टीम ने संक्रमण और बेड सोर जैसी जटिलताओं से बच्चे को सुरक्षित रखते हुए इलाज जारी रखा, जिसका परिणाम यह रहा कि 94 दिन बाद अज़ान को सुरक्षित डिस्चार्ज किया जा सका।

डॉ. विपिन सिंह ने कहा कि मरीज के स्वस्थ होकर घर लौटने की खुशी आम लोगों को भले ही उतनी महसूस न हो, लेकिन आईसीयू में दिन-रात मेहनत करने वाले डॉक्टरों और स्टाफ के लिए यह पल अपार संतोष और गर्व का होता है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि इतने लंबे समय तक उच्चस्तरीय और निःशुल्क इलाज केवल केजीएमयू जैसे सरकारी संस्थान में ही संभव है। 



 : क्या है गिलियन-बैरे सिंड्रोम 

गिलियन-बैरे सिंड्रोम  एक दुर्लभ लेकिन गंभीर तंत्रिका रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही नसों पर हमला करने लगती है। इससे मांसपेशियों में कमजोरी और कई मामलों में लकवा हो सकता है।



क्यों होता है जी बी एस

यह बीमारी अक्सर वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण, बुखार, दस्त या सांस के संक्रमण के कुछ दिनों या हफ्तों बाद हो सकती है।



मुख्य लक्षण

पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन

पैरों से शुरू होकर हाथों तक कमजोरी

चलने-फिरने में परेशानी

बोलने या निगलने में दिक्कत

गंभीर मामलों में सांस लेने में कठिनाई

पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाना


इलाज

गंभीर मामलों में आईसीयू में भर्ती, वेंटिलेटर सपोर्ट, लगातार निगरानी और बाद में फिजियोथेरेपी की जरूरत होती है। समय पर इलाज से अधिकांश मरीज धीरे-धीरे स्वस्थ हो सकते हैं।

साल दर साल बढ़ता गया साइबर फ्रॉड ऐसे करें बचाव

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 साल दर साल बढ़ता साइबर फ्रॉड: मामलों की रफ्तार भी तेज, नुकसान की रकम ने तोड़े सारे रिकॉर्ड


ऐसे ही करें बचाव

देश में साइबर और बैंकिंग फ्रॉड लगातार बढ़ते जा रहे हैं और उपलब्ध आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को साफ तौर पर उजागर करते हैं। बीते पांच वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे न सिर्फ फ्रॉड के मामलों की संख्या बढ़ी, बल्कि धोखाधड़ी से होने वाला आर्थिक नुकसान भी कई गुना हो गया।

वर्ष 2019-20 को आधार वर्ष माना जाए तो उस समय देश में 73,386 साइबर/बैंकिंग फ्रॉड के मामले दर्ज किए गए थे। इन मामलों में कुल 244.01 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह वह दौर था जब डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग का विस्तार तो हो रहा था, लेकिन साइबर अपराध अभी सीमित दायरे में थे।

2020-21 में मामलों की संख्या लगभग स्थिर रही, लेकिन कुल नुकसान 228.65 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। यानी मामलों में बड़ा बदलाव नहीं हुआ, पर फ्रॉड की प्रकृति अधिक संगठित होने लगी।

वर्ष 2021-22 में फ्रॉड के मामलों की संख्या घटकर 65,893 रह गई, लेकिन इसके बावजूद आर्थिक नुकसान बढ़कर 258.61 करोड़ रुपये हो गया। यह संकेत था कि अपराधी कम मामलों में ज्यादा रकम की ठगी करने लगे थे।

2022-23 में हालात तेजी से बिगड़े। इस साल फ्रॉड के मामले बढ़कर 75,800 हो गए और इससे होने वाला नुकसान सीधे 421.4 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह पहला मौका था जब नुकसान की रकम 400 करोड़ रुपये के पार गई।

सबसे गंभीर स्थिति 2023-24 में देखने को मिली। इस साल साइबर फ्रॉड के मामलों में अचानक विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई और मामलों की संख्या बढ़कर 2,92,800 तक पहुंच गई। इसी अवधि में धोखाधड़ी से होने वाला कुल नुकसान 2,054.6 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग, फर्जी कॉल, ओटीपी और केवाईसी ठगी, सोशल मीडिया लिंक और ऑनलाइन निवेश फ्रॉड इसके प्रमुख कारण हैं। आंकड़े साफ बताते हैं कि जैसे-जैसे डिजिटल लेन-देन बढ़ा, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों की सक्रियता भी कई गुना बढ़ती गई।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते साइबर सुरक्षा, बैंकिंग निगरानी और जन-जागरूकता को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह नुकसान और भी भयावह रूप ले सकता है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

[16/01, 9:55 pm] Kumar Sanjay: साइबर फ्रॉड से बचने के 10 ज़रूरी उपाय

1. ओटीपी और पिन कभी साझा न करें

बैंक, पुलिस या कोई भी सरकारी संस्था कभी भी ओटीपी, एटीएम पिन या यूपीआई पिन फोन पर नहीं मांगती। ऐसा कोई कॉल आए तो तुरंत काट दें।

2. फर्जी कॉल और मैसेज से सावधान रहें

अगर कोई खुद को बैंक अधिकारी, केवाईसी टीम, कूरियर कंपनी या सरकारी अफसर बताकर कॉल करे, तो उसकी बातों पर भरोसा न करें।

👉 अचानक डर या लालच दिखाने वाले कॉल सबसे खतरनाक होते हैं।

3. अनजान लिंक पर क्लिक न करें

एसएमएस, व्हाट्सऐप या ई-मेल में आए इनाम, रिफंड, केवाईसी अपडेट या अकाउंट ब्लॉक जैसे मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक न करें।

4. यूपीआई में “कलेक्ट रिक्वेस्ट” समझकर ही स्वीकार करें

ध्यान रखें—

✔️ पैसा भेजने के लिए पिन डालते हैं

❌ पैसा पाने के लिए पिन नहीं लगता

अगर कोई पैसा भेजने के बहाने पिन डालने को कहे, तो वह फ्रॉड है।

5. मोबाइल में केवल भरोसेमंद ऐप ही डाउनलोड करें

थर्ड पार्टी वेबसाइट या फर्जी लिंक से ऐप डाउनलोड न करें। केवल गूगल प्ले स्टोर या ऐप स्टोर का ही इस्तेमाल करें।

6. सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा न करें

जन्मतिथि, मोबाइल नंबर, बैंक डिटेल, लोकेशन या परिवार से जुड़ी जानकारी सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें।

7. फोन में स्क्रीन लॉक और ऐप लॉक रखें

मोबाइल खो जाने या चोरी होने की स्थिति में आपका डेटा सुरक्षित रहेगा।

8. अकाउंट स्टेटमेंट और अलर्ट नियमित जांचें

बैंक एसएमएस और ई-मेल अलर्ट चालू रखें।

कोई संदिग्ध लेन-देन दिखे तो तुरंत बैंक को सूचना दें।

9. फ्रॉड होते ही तुरंत शिकायत करें

जितनी जल्दी शिकायत, उतनी ज़्यादा रकम बचने की संभावना।

✔️ हेल्पलाइन: 1930

✔️ वेबसाइट: cybercrime.gov.in

10. परिवार को भी जागरूक करें

खासतौर पर बुज़ुर्गों, बच्चों और नए स्मार्टफोन यूज़र्स को साइबर ठगी के तरीकों के बारे में जरूर बताएं।

याद रखें

डर, लालच और जल्दबाज़ी — साइबर ठगों के सबसे बड़े हथियार हैं।

सोच-समझकर कदम उठाएं, तभी आप और आपकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहेगी।

सोमवार, 12 जनवरी 2026

सावधान! मैट्रिमोनियल साइट कहीं न बन जाए आर्थिक तबाही का कारण




सावधान! मैट्रिमोनियल साइट कहीं न बन जाए आर्थिक तबाही का कारण

45 वर्ष से अधिक उम्र के लोग साइबर ठगों के नए निशाने पर


लखनऊ। मैट्रिमोनियल साइट अब रिश्ते ही नहीं, बल्कि साइबर ठगी का नया जाल भी बनती जा रही हैं। साइबर अपराधियों ने 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और बुजुर्गों को निशाना बनाने के लिए बेहद सुनियोजित और खतरनाक तरीका अपनाया है। ठग गिरोह महिलाओं के जरिए मैट्रिमोनियल साइट पर दोस्ती कर भरोसा जीतते हैं और फिर निवेश व मुनाफे का लालच देकर लाखों–करोड़ों रुपये की ठगी कर लेते हैं।

साइबर क्राइम सेल के अनुसार अब तक इस तरह के 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 25 से ज्यादा मामलों में एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। पुलिस ठगी की रकम वापस दिलाने के प्रयास में जुटी है।

ऐसे रचते हैं ठगी का जाल

जांच में सामने आया है कि गिरोह पहले मैट्रिमोनियल साइट पर 45 वर्ष से अधिक उम्र के, अकेले या भावनात्मक रूप से कमजोर लोगों को चिह्नित करता है। महिला प्रोफाइल के जरिए बातचीत शुरू की जाती है। खुद को कभी सामाजिक कार्यकर्ता, कभी निवेश सलाहकार, तो कभी सरकारी योजना से जुड़ा बताकर भरोसा जीता जाता है। इसके बाद ट्रेडिंग, शेयर मार्केट या क्रिप्टो निवेश के नाम पर मोटी रकम लगवाई जाती है।

25 लाख से शुरू हुई ठगी, फिर संपर्क ब्लॉक

गोमतीनगर निवासी एक व्यापारी ने बताया कि अकेलेपन के कारण उन्होंने मैट्रिमोनियल साइट पर एक महिला से संपर्क किया। महिला लगातार फोन कॉल, मैसेज और वीडियो कॉल करती थी। धीरे-धीरे ट्रेडिंग में निवेश के लिए प्रेरित किया। 25 लाख रुपये से अधिक लगाने के बाद कभी टैक्स, कभी प्रोसेसिंग फीस और कभी खाते में रकम फंसने का बहाना बनाकर और पैसे ट्रांसफर कराए गए। जब पीड़ित ने पैसे वापस मांगे तो महिला ने सभी संपर्क ब्लॉक कर दिए।

कुछ पुराने बड़े मामले

इंदिरानगर निवासी इंजीनियर से 15.98 लाख रुपये की ठगी

गोमतीनगर निवासी व्यापारी से 2.54 करोड़ रुपये की ठगी

जानकीपुरम निवासी बुजुर्ग से 28.60 लाख रुपये हड़प लिए गए

कई राज्यों में फैला नेटवर्क

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह कई राज्यों में सक्रिय है। महिलाएं केवल शुरुआती संपर्क के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, जबकि ठगी की रकम अलग-अलग बैंक खातों में तुरंत ट्रांसफर कर दी जाती है, जिससे रकम का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

पुलिस उपायुक्त अपराध व यातायात कमलेश दीक्षित ने बताया कि शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, निवेश ऑफर या मदद की मांग पर तुरंत भरोसा न करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी थाने में दें।

पुलिस का साफ कहना है—सतर्कता ही इस तरह की साइबर ठगी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है।


हर चौथा वयस्क कब्ज से परेशान, बच्चों में भी 29.6 फीसदी मामले

 







कॉन्स्टिपेशन

हर चौथा वयस्क  कब्ज से परेशान, बच्चों में भी 29.6 फीसदी मामले

फास्ट फूड और बिगड़ी जीवनशैली बनी बड़ी वजह


कुमार संजय

देश में कब्ज (कॉन्स्टिपेशन) अब केवल व्यक्तिगत परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रही है। संजय गांधी पीजीआई के पेट रोग विभाग में  आने वाले मरीजों में देखा गया है कि 22 फीसदी यानी लगभग हर चौथा वयस्क कब्ज की समस्या से जूझ रहा है। चिंताजनक तथ्य यह है कि बच्चों में भी कब्ज के मामले तेजी से बढ़े हैं। अध्ययनों में बच्चों में 29.6 फीसदी तक कब्ज की समस्या पाई गई है, यानी लगभग हर तीन में एक बच्चा इससे प्रभावित है।

 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार ने बताया कि बच्चों में बढ़ता फास्ट फूड कल्चर कब्ज का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। तली-भुनी चीजें, चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर और नूडल्स जैसे भोजन फाइबर की कमी पैदा करते हैं, जिससे पाचन तंत्र प्रभावित होता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली, कम पानी पीने की आदत, मोबाइल और स्क्रीन टाइम बढ़ने से शारीरिक गतिविधि में कमी आई है। सुबह स्कूल जाने की जल्दी में बच्चे अक्सर मल त्याग की इच्छा को रोक लेते हैं, जिससे धीरे-धीरे कब्ज की आदत विकसित हो जाती है।



बवासीर और फिशर की जड़ है कब्ज


प्रो. अशोक कुमार के मुताबिक 40 से 60 फीसदी बवासीर के मामलों के पीछे कब्ज प्रमुख कारण होता है। वहीं, कब्ज से बनने वाले एनल फिशर के 10 से 15 फीसदी पुराने मामलों में संक्रमण बढ़कर फिस्टुला का रूप ले सकता है। फिस्टुला का इलाज केवल सर्जरी से ही संभव है, जबकि बवासीर में दवाओं, लेज़र और न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों से राहत मिल जाती है।

इसके अलावा लंबे समय तक कब्ज रहने से पेल्विक फ्लोर को नुकसान, मल असंयम, यूरिन रिटेंशन, स्टरकोरल परफोरेशन (आंत में छेद), रेक्टल प्रोलैप्स और वॉल्वुलस (आंत का मुड़ना) जैसी गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं।


उम्र के साथ बढ़ती है परेशानी


गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अंशुमन एल्हेस ने बताया कि कब्ज की समस्या महिलाओं और बुजुर्गों में अधिक देखी जाती है। विशेष रूप से वृद्ध महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में 2 से 3 गुना तक अधिक पाई जाती है। लंबे समय तक कब्ज बना रहने पर यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।


ऐसे करें कब्ज से बचाव


विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ सरल आदतें अपनाकर कब्ज से काफी हद तक बचा जा सकता है—

रोज़ाना 2–3 लीटर पानी पिएं

भोजन में फाइबर युक्त चीजें शामिल करें

मल त्याग की इच्छा को न रोकें

नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधि करें

तनाव से बचें और तनाव प्रबंधन पर ध्यान दें

शराब और अत्यधिक कैफीन के सेवन से बचें

रोज़ाना तय समय पर शौचालय जाने की आदत डालें

रात का खाना सोने से 2–3 घंटे पहले करें

शनिवार, 10 जनवरी 2026

इनर व्हील क्लब ने रैन बसेरा में मरीज परिजनों को बांटे कंबल

 



इनर व्हील क्लब ने रैन बसेरा में मरीज परिजनों को बांटे कंबल

लखनऊ। एसजीपीजीआईएमएस के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर परिसर स्थित रैन बसेरा में इनर व्हील क्लब के सहयोग से मरीज परिजनों के लिए कंबल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। शीत ऋतु के दौरान राहत पहुंचाने के उद्देश्य से दोपहर 12 बजे लगभग 30 कंबलों का वितरण किया गया। कार्यक्रम में प्रो. आर. हर्षवर्धन (अपर चिकित्सा अधीक्षक, एपेक्स ट्रॉमा सेंटर एवं चिकित्सा अधीक्षक, एसजीपीजीआईएमएस), इनर व्हील क्लब की अध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी सिंह, क्लब सदस्य, संकाय सदस्य व अस्पताल स्टाफ उपस्थित रहे। वक्ताओं ने मरीज परिजनों के कल्याण में सामुदायिक सहभागिता के महत्व पर जोर दिया


पीजीआई परिसर में ईएसआई क्लीनिक स्थापित करने पर निदेशक ने दिया जोर

 

पीजीआई परिसर में ईएसआई क्लीनिक स्थापित करने पर जोर

ईएसआई जागरूकता सत्र में लाभों के कम उपयोग पर जताई गई चिंता

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआईएमएस) में कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ईएसआईएस) के लाभार्थियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। संस्थान के निदेशक डॉ. आर. के. धीमन ने पीजीआई परिसर के भीतर ईएसआई क्लीनिक/डिस्पेंसरी स्थापित करने पर जोर देते हुए कहा कि इससे ईएसआई कार्यकर्ताओं को समय पर उपचार, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और कार्यस्थल पर समग्र कल्याण सुनिश्चित होगा।

यह बात एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग और ईएसआईएस, लखनऊ जोन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के सहयोग से केंद्रीय पुस्तकालय परिसर स्थित एच. जी. खुराना सभागार में आयोजित ईएसआईएस जागरूकता सत्र एवं स्वास्थ्य जांच शिविर के दौरान कही गई। कार्यक्रम का शुभारंभ पुष्पांजलि और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। आयोजन सचिव डॉ. गौरव कुमार झा ने स्वागत उद्बोधन दिया।

उद्घाटन सत्र में लखनऊ जोन के सीएमओ डॉ. राजेश कुमार ने निवारक स्वास्थ्य देखभाल में सामाजिक सुरक्षा की भूमिका पर प्रकाश डाला। एसजीपीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक एवं आयोजन अध्यक्ष डॉ. आर. हर्षवर्धन ने ईएसआई कार्यकर्ताओं की दुर्दशा, जागरूकता की कमी और इसके कारण बढ़ते जेब खर्च पर चिंता जताई। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता ने ईएसआई सेवाओं के अधिकतम उपयोग पर बल दिया।

वैज्ञानिक सत्र में ईएसआईएस योजना के तहत चिकित्सा एवं नकद लाभ, ई-पहचान कार्ड, प्रतिपूर्ति प्रक्रिया और शिकायत निवारण की जानकारी दी गई। पिरामल फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कैशलेस उपचार, मातृत्व लाभ और आश्रित सहायता सहित ईएसआई के व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज की जानकारी दी।

चर्चा में सामने आया कि नियमित वेतन कटौती के बावजूद ईएसआई लाभों का उपयोग सीमित है और लगभग 80 प्रतिशत पात्र कर्मियों के पास ईएसआई कार्ड नहीं हैं। अस्पताल संक्रमण समिति की ओर से डॉ. शालिनी त्रिवेदी द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर स्पष्ट किया गया कि संविदा कर्मचारियों के लिए चिकित्सा लाभ पूरी तरह ईएसआईसी के अंतर्गत हैं। डॉ. अमित प्रकाश और डॉ. सलाम अहमद ने उपचार की प्रक्रिया स्पष्ट की।