सोमवार, 2 मार्च 2026

अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये

 



अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये



राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो) की ओर से हाल में दो ब्रेन डेड रोगियों के अंगदान करने वाले परिवारों को 10-10 हजार रुपये दिये गए हैं। सोटो के संयुक्त निदेशक व पीजीआई के एमएस डॉ. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि मृत अंगदाता के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए उनके परिवार को 10 हजार की आर्थिक सहायता दी जाती है। छह नवंबर 2025 को सेंट्रल कमाण्ड हॉस्पिटल में 56 वर्षीय भगवंती देवी के ब्रेन डेड घोषित किये जाने के बाद उनके विनोद कुमार यादव ने अंगदान की सहमति पर तीन मरीजों को नया जीवन मिला। वहीं 22 फरवरी को सड़क हादसे में घायल 43 वर्षीय संदीप कुमार के पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में ब्रेन स्टेम डेड घोषित जाने के बाद पत्नी लक्ष्मी देवी ने अंगदान की अनुमति दी थी। तीन रोगियों को नया जीवन मिला था। पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमान के नेतृत्व में दोनों अंगदाताओं के परिजनों को 10-10 हजार की सहायता राशि डीबीटी के माध्यम से भेज गई है।


हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित

 



पीजीआई में विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम

60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोकना संभव

 हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित 


 उत्तर प्रदेश में करीब एक करोड़ सुनने की परेशानी से ग्रस्त

लखनऊ।

संजय गांधी गांधी पीजीआई के हेड एंड नेक सर्जरी विभाग द्वारा विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता   कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी और डॉक्टर रूद्र प्रकाश ने बताया कि भारत में लगभग 6.3 करोड़ लोग किसी न किसी स्तर की सुनने की समस्या से प्रभावित हैं। जनसंख्या के अनुपात के आधार पर उत्तर प्रदेश में करीब 90 लाख से एक करोड़ लोग श्रवण हानि से जूझ रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। यदि बच्चों में सुनने की समस्या समय पर नहीं पहचानी जाती तो इसका सीधा असर बोलने, सीखने, पढ़ाई और सामाजिक विकास पर पड़ता है।

प्रो. केशरी के अनुसार, बच्चों में श्रवण हानि के प्रमुख कारणों में जन्मजात समस्याएं, समय से पहले जन्म, बार-बार कान में संक्रमण, तेज आवाज का संपर्क, मोबाइल व हेडफोन का अत्यधिक उपयोग और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव शामिल हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोका या नियंत्रित किया जा सकता है, बशर्ते समय पर जांच और इलाज हो। उपचार में दवाइयां, सर्जरी, हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट और स्पीच व ऑडियोलॉजिकल थेरेपी कारगर साबित होती हैं।

प्रो केशरी ने बताया कि इस वर्ष की थीम रही— “समुदायों से कक्षाओं तक: सभी बच्चों के लिए श्रवण देखभाल”। निदेशक प्रो. आर. के. धीमान के संरक्षण में लखनऊ के दो प्रमुख विद्यालयों—द मिलेनियम स्कूल और केंद्रीय विद्यालय—में श्रवण जागरूकता व्याख्यान, स्क्रीनिंग शिविर और पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित की गई। बच्चों की प्योर टोन ऑडियोमेट्री जांच की गई और जरूरतमंद विद्यार्थियों को एसजीपीजीआई में निःशुल्क परामर्श के लिए रेफर किया गया।

दोनों विद्यालयों के कक्षा 1 से 8 तक के 150 से अधिक बच्चों ने पोस्टर प्रतियोगिता में भाग लिया। 2 मार्च को आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में एसजीपीजीआई के डीन प्रो. शलीन कुमार ने बच्चों में ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों को भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। विभाग के प्रोफेसर रुद्रा  ने कहा कि समय पर जांच, सही इलाज और जागरूकता से बच्चों को श्रवण हानि से बचाया जा सकता है।


एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव

 


एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव

लखनऊ में राष्ट्रीय सम्मेलन, विशेषज्ञों ने रखी तकनीकी दृष्टि


कैंसर उपचार के क्षेत्र में सटीकता, सुरक्षा और गुणवत्ता को नई ऊंचाई देने वाली सतह निर्देशित विकिरण चिकित्सा (एसजीआरटी) तकनीक अब भारत में तेजी से अपनाई जा रही है। कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के प्रो प्रमोद कुमार गुप्ता ने बताया कि यह आधुनिक तकनीक मरीज की शरीर की सतह की वास्तविक समय में निगरानी कर रेडियोथेरेपी को अत्यंत सटीक बनाती है, जिससे विकिरण केवल कैंसरग्रस्त भाग तक सीमित रहता है और आसपास के स्वस्थ अंग सुरक्षित रहते हैं।

एसजीआरटी तकनीक में कैमरा आधारित त्रि-आयामी सतह इमेजिंग प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसके माध्यम से उपचार के दौरान मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाती है। यदि मरीज की पोजिशन में हल्का सा भी बदलाव होता है, तो प्रणाली स्वतः संकेत देती है या उपचार रोक दिया जाता है। इससे

मरीज की पोजिशन में होने वाली त्रुटियों में कमी आती है,

अनावश्यक विकिरण जोखिम घटता है,

हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों की बेहतर सुरक्षा होती है,

और उपचार के परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि स्तन कैंसर के उपचार में डीप इंस्पिरेशन ब्रीथ होल्ड (डीआईबीएच) तकनीक के साथ एसजीआरटी का प्रयोग हृदय को विकिरण से बचाने में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। वहीं स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडियोथेरेपी (एसबीआरटी) तथा श्वसन आधारित नियंत्रित उपचारों में भी यह तकनीक उच्च स्तर की सटीकता सुनिश्चित करती है।

इन सभी तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान  द्वारा आयोजित “एसजीआरटी भारत: भारत में विकिरण चिकित्सा को आगे बढ़ाना” विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में की गई। सम्मेलन में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, मेडिकल फिजिक्स और उन्नत रेडियोथेरेपी तकनीकों से जुड़े देश-विदेश के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

सम्मेलन की प्रमुख बातें

एसजीआरटी को आधुनिक रेडियोथेरेपी की एक परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया

सिर एवं गर्दन, स्तन तथा श्रोणि क्षेत्र के कैंसर उपचार में इसके क्लिनिकल लाभ साझा किए गए

डीआईबीएच, एसबीआरटी और श्वसन नियंत्रित उपचारों में हुई नवीन प्रगति पर तकनीकी सत्र

भारत में एसजीआरटी के भविष्य और विस्तार को लेकर विशेषज्ञ पैनल चर्चा

लाइव कार्यशाला, जिसमें एसजीआरटी तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया

संस्थान के निदेशक प्रो एम एल बी भट्ट  ने कहा कि इस प्रकार की उन्नत तकनीकों से कैंसर उपचार को अधिक सुरक्षित, सटीक और मरीज-केंद्रित बनाया जा सकता है।

सम्मेलन की सफलता में तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए रोहित मेहता का विशेष योगदान रहा।

आयोजकों ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक और तकनीकी सम्मेलन भारत में कैंसर उपचार को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।